डर को बनाया हथियार, खुद को एंटी करप्शन इंस्पेक्टर बताकर यातायात पुलिस से मांगे 10 हजार रुपये

आगरा में यातायात पुलिस से 10 हजार रुपये मांगने वाले फर्जी एंटी करप्शन इंस्पेक्टर के साथ पुलिसकर्मी और रिपोर्टर कमलेश कुमार चौधरी की फीचर इमेज

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कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

आगरा: सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार के नाम पर कार्रवाई का डर दिखाकर अवैध वसूली करने का एक हैरान करने वाला मामला आगरा में सामने आया है। नोएडा से आगरा घूमने आए एक युवक ने यहां रुपये खत्म होने के बाद कमाई का ऐसा तरीका अपनाया, जिसने खुद उसे ही कानून के शिकंजे में पहुंचा दिया। युवक ने खुद को एंटी करप्शन इंस्पेक्टर बताकर यातायात पुलिसकर्मियों पर रौब जमाने की कोशिश की और उनसे 10 हजार रुपये की मांग कर डाली। उसने पुलिसकर्मियों को भ्रष्टाचार के मामले में फंसाने और तत्काल मुकदमा दर्ज कराकर गिरफ्तार कराने की धमकी भी दी।

मामला आगरा के ईदगाह चौराहे का बताया जा रहा है, जहां यातायात पुलिसकर्मी नियमित ड्यूटी कर रहे थे। कथित एंटी करप्शन इंस्पेक्टर ने पुलिसकर्मियों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि उसे यातायात पुलिस की कथित वसूली की पूरी जानकारी है और यदि उसे रुपये नहीं दिए गए तो वह भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत कार्रवाई करा देगा। हालांकि, उसकी योजना उस समय धरी की धरी रह गई, जब यातायात पुलिस के एक अधिकारी ने उससे उसकी विभागीय पहचान और बैच नंबर पूछ लिया।

ईदगाह चौराहे पर पहुंचकर खुद को बताया एंटी करप्शन अधिकारी

पुलिस के अनुसार, ईदगाह चौराहे पर टीएसआई पीयूष सिंह के साथ कांस्टेबल राजीव कुमार और कुलदीप ड्यूटी पर तैनात थे। दोपहर करीब डेढ़ बजे संजय कुमार राय नाम का एक व्यक्ति वहां पहुंचा। उसने पुलिसकर्मियों के सामने अपना परिचय एंटी करप्शन इंस्पेक्टर के रूप में दिया। पहचान का दावा करने के बाद उसने एक सिपाही से 10 हजार रुपये की मांग की।

आरोप है कि रुपये मांगने का उसका तरीका भी सामान्य बातचीत जैसा नहीं था। उसने पुलिसकर्मी पर दबाव बनाने के लिए भ्रष्टाचार और सरकारी कार्रवाई का डर दिखाया। उसने दावा किया कि उसे यातायात पुलिस की गतिविधियों की जानकारी है और वह चाहे तो तत्काल मामला दर्ज कराकर संबंधित पुलिसकर्मी को गिरफ्तार करा सकता है। इस धमकी का उद्देश्य साफ तौर पर सामने वाले व्यक्ति को मानसिक दबाव में लाकर रुपये हासिल करना बताया जा रहा है।

लेकिन यातायात पुलिसकर्मी ने कथित अधिकारी की मांग के सामने झुकने के बजाय पूरे घटनाक्रम की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारी को दी। इसके बाद मामले की असलियत जानने की कोशिश शुरू हुई।

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बैच नंबर पूछते ही बदल गया कथित इंस्पेक्टर का व्यवहार

मामले में सबसे अहम मोड़ तब आया जब टीएसआई पीयूष सिंह ने युवक से उसकी विभागीय पहचान से जुड़े सवाल पूछने शुरू किए। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में किसी जांच एजेंसी या विभाग में अधिकारी है तो उसके पास विभागीय पहचान, पद, बैच नंबर और संबंधित कार्यालय की जानकारी होना स्वाभाविक है। इसी आधार पर टीएसआई ने उससे बैच नंबर तथा अन्य विभागीय विवरण मांगे।

पुलिस के मुताबिक, सवालों का सामना करते ही युवक घबरा गया। उसके जवाबों में असहजता दिखाई देने लगी। इससे ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मियों को उसके दावे पर संदेह हुआ। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने उसके द्वारा बताए गए पद और विभाग की वास्तविकता की जांच कराने का निर्णय लिया।

एंटी करप्शन विभाग से ऑनलाइन स्तर पर जानकारी का सत्यापन कराया गया। जांच में युवक के दावे की पुष्टि नहीं हुई। पुलिस के अनुसार, संबंधित विभाग में संजय कुमार नाम का ऐसा कोई इंस्पेक्टर नहीं मिला, जैसा कि युवक खुद को बता रहा था। इसके बाद यह स्पष्ट होने लगा कि एंटी करप्शन इंस्पेक्टर बनकर पुलिसकर्मियों से रुपये मांगने वाला व्यक्ति वास्तव में उस विभाग का अधिकारी नहीं था।

विभागीय सत्यापन में खुली फर्जी अधिकारी की पोल

विभागीय जानकारी सामने आने के बाद पुलिस ने पूरे मामले को गंभीरता से लिया। उच्च अधिकारियों को घटना की जानकारी दी गई और युवक को हिरासत में ले लिया गया। पुलिस की प्रारंभिक जांच में उसके पास एंटी करप्शन अधिकारी होने से संबंधित कोई वैध दस्तावेज भी नहीं मिला। इससे पुलिस का संदेह और मजबूत हो गया।

घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि आरोपी ने सरकारी कर्मचारियों के बीच मौजूद भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई के डर को ही अपनी कथित वसूली का माध्यम बनाया। आम तौर पर एंटी करप्शन और विजिलेंस जैसी एजेंसियों के नाम से सरकारी कर्मचारियों के बीच कार्रवाई को लेकर गंभीरता रहती है। इसी मनोवैज्ञानिक दबाव का कथित तौर पर फायदा उठाने की कोशिश की गई।

आरोपित ने पुलिसकर्मियों को यह संदेश देने का प्रयास किया कि यदि वे उसकी मांग पूरी नहीं करेंगे तो उनके खिलाफ भ्रष्टाचार से संबंधित कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। लेकिन पुलिसकर्मियों ने उसकी धमकी के बजाय उसकी पहचान की जांच करना उचित समझा। यही कदम उसके पूरे कथित फर्जीवाड़े को उजागर करने में निर्णायक साबित हुआ।

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नोएडा में करता है काम, आगरा घूमने आया था युवक

पुलिस पूछताछ में कथित तौर पर युवक के आगरा आने और उसके बाद इस घटना को अंजाम देने की वजह सामने आई। पुलिस के अनुसार, संजय कुमार राय नोएडा में काम करता है और पिछले कुछ दिनों से आगरा घूमने आया हुआ था। आगरा में घूमने के दौरान उसके पास मौजूद रुपये खत्म हो गए। आर्थिक जरूरत पूरी करने के लिए उसने कथित तौर पर ऐसा रास्ता चुना, जिसमें सरकारी कर्मचारियों को कार्रवाई का डर दिखाकर पैसे हासिल करने की योजना बनाई गई।

पूछताछ में यह भी सामने आया कि उसे इस बात की जानकारी थी कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में एंटी करप्शन और विजिलेंस जैसी एजेंसियां सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच और कार्रवाई कर सकती हैं। इसी जानकारी को उसने अपने कथित फर्जी परिचय का आधार बनाया। उसने खुद को एंटी करप्शन अधिकारी बताकर यातायात पुलिसकर्मियों को डराने और रुपये लेने की कोशिश की।

हालांकि, जिस डर को वह अपने लिए कमाई का जरिया बनाना चाहता था, वही उसके लिए मुसीबत बन गया। पुलिसकर्मियों ने उसकी पहचान पर सवाल उठाया और विभागीय सत्यापन करा दिया। पहचान की पुष्टि न होने के बाद उसकी कथित योजना सामने आ गई।

भ्रष्टाचार के नाम पर वसूली की कोशिश ने पहुंचाया थाने

यह मामला सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच किसी जांच एजेंसी के नाम पर धमकी देकर रुपये मांगने के खतरे को भी सामने लाता है। यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी विभाग या जांच एजेंसी का अधिकारी होने का दावा करता है तो उसकी पहचान की पुष्टि किए बिना उसके दबाव में आना जोखिम भरा हो सकता है। इस मामले में यातायात पुलिसकर्मियों ने कथित धमकी के बावजूद विभागीय सत्यापन को प्राथमिकता दी, जिसके कारण पूरा घटनाक्रम सामने आ गया।

पुलिस ने संजय कुमार राय के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। अब पुलिस पूरे मामले की आगे जांच कर रही है और यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि उसने इससे पहले भी किसी अन्य सरकारी कर्मचारी या विभागीय अधिकारी को इसी तरह निशाना बनाया था या नहीं।

एक सवाल यह भी: क्या पहले भी किसी को बनाया निशाना?

आरोपी द्वारा अपनाई गई कथित कार्यप्रणाली ने जांच के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा किया है। क्या उसने केवल आगरा में ही इस तरह की कोशिश की या इससे पहले भी किसी दूसरे शहर अथवा विभाग में सरकारी अधिकारी बनकर लोगों से पैसे मांग चुका है? पुलिस पूछताछ और उपलब्ध जानकारी के आधार पर इस पहलू की जांच महत्वपूर्ण होगी।

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फिलहाल आगरा पुलिस के सामने प्राथमिक तथ्य यह है कि एक व्यक्ति ने खुद को एंटी करप्शन इंस्पेक्टर बताकर यातायात पुलिसकर्मियों से 10 हजार रुपये मांगने की कोशिश की। जब उससे बैच नंबर और विभागीय पहचान से जुड़े सवाल किए गए तो उसका दावा संदिग्ध हो गया। विभागीय सत्यापन के बाद उसका परिचय फर्जी पाया गया और उसे हिरासत में लेकर कानूनी कार्रवाई की गई।

डर की रणनीति उलटी पड़ी

पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यही है कि आरोपी ने जिस सरकारी कार्रवाई के डर को हथियार बनाकर कथित वसूली की योजना बनाई थी, उसी पहचान की जांच ने उसकी सच्चाई सामने ला दी। महज किसी पद का नाम लेना और सरकारी एजेंसी का अधिकारी होने का दावा करना पर्याप्त नहीं है। इस मामले में बैच नंबर और विभागीय जानकारी पूछे जाने के बाद कथित फर्जी अधिकारी की घबराहट ने पुलिसकर्मियों को सतर्क कर दिया।

आगरा के ईदगाह चौराहे की यह घटना बताती है कि फर्जी सरकारी अधिकारी बनकर लोगों को डराने और रुपये ऐंठने की कोशिश कितनी जल्दी कानून के शिकंजे में पहुंच सकती है। फिलहाल आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस मामले की जांच में जुटी है। आगे की जांच में यह स्पष्ट होगा कि कथित आरोपी ने इस तरीके से पहले किसी और व्यक्ति से वसूली की थी या नहीं और उसके पास ऐसी कोई अन्य योजना या पहचान संबंधी सामग्री थी या नहीं।

निष्कर्ष: आगरा में सामने आया यह मामला सिर्फ 10 हजार रुपये की कथित वसूली की कोशिश नहीं है, बल्कि सरकारी जांच एजेंसियों के नाम और उनके अधिकारों का दुरुपयोग करने की कोशिश का उदाहरण भी है। यातायात पुलिसकर्मियों की सतर्कता और तत्काल विभागीय सत्यापन के कारण कथित फर्जी एंटी करप्शन इंस्पेक्टर की योजना सफल नहीं हो सकी। पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और अब मामले की विस्तृत जांच की जा रही है।

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Author: यायावर

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