मिश्री लाल कोरी की रिपोर्ट
काठमांडू। हिमालय की गोद में बसा नेपाल इस समय ऐसी प्राकृतिक त्रासदी से जूझ रहा है, जिसकी भयावहता दिन-ब-दिन सामने आती जा रही है। 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के निकट ग्लेशियर से जुड़ी बर्फ और चट्टानों के विनाशकारी ढहने के बाद भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने उत्तरी और मध्य नेपाल के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया। पानी के साथ आए मलबे ने देखते ही देखते घरों, सड़कों, पुलों, वाहनों, जलविद्युत परियोजनाओं और सीमावर्ती व्यापारिक ढांचे को निगल लिया।
नेपाल में राहत और बचाव अभियान अभी भी युद्धस्तर पर जारी है। 7 सितंबर 2026 को नेपाल राष्ट्रीय शोक दिवस मना रहा है। नेपाल सरकार ने मृतकों की स्मृति में देशभर के सरकारी कार्यालयों और विदेशों में स्थित नेपाली मिशनों पर राष्ट्रीय ध्वज आधा झुकाने का निर्णय लिया है। नवीनतम उपलब्ध पुलिस आंकड़ों के अनुसार 1,342 शव बरामद किए जा चुके हैं और 3,992 लोग अब भी लापता हैं। हालांकि, इससे पहले 5-6 सितंबर के अपडेट में नेपाल पुलिस के हवाले से मृतकों की संख्या 1,344 और लापता लोगों की संख्या करीब 5,000 बताई गई थी। आंकड़ों में यह अंतर लगातार जारी खोज, शवों की पहचान और विभिन्न समय पर जारी अपडेट के कारण है।
नेपाल बाढ़ त्रासदी ने बदला जिंदगी का पूरा नक्शा
26 अगस्त की सुबह भोटेकोशी नदी क्षेत्र में शुरू हुई आपदा ने देखते ही देखते विनाशकारी रूप ले लिया। बाढ़ का पानी केवल नदी के किनारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसके साथ भारी मात्रा में मिट्टी, चट्टान, पेड़ और निर्माण मलबा भी नीचे की ओर बहता चला गया।
नेपाल के गृह मंत्रालय ने बताया कि रासुवा जिले से शुरू हुई इस भीषण बाढ़ ने रासुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा समेत नदी के बहाव वाले अन्य इलाकों को प्रभावित किया। सरकारी एजेंसियों ने तत्काल खोज, बचाव, निकासी और राहत अभियान शुरू किया, लेकिन दुर्गम हिमालयी भूभाग और क्षतिग्रस्त सड़कों ने अभियान को बेहद कठिन बना दिया।
बाढ़ ने कई जगहों पर नदी के पुराने रास्तों और आसपास बसे इलाकों का स्वरूप बदल दिया। जहां कल तक बाजार, मकान, सड़कें और पुल दिखाई देते थे, वहां अब कीचड़ और मलबे का विशाल ढेर नजर आ रहा है।
हजारों परिवारों को अब भी अपनों की तलाश
इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि बड़ी संख्या में परिवारों को अभी तक यह पता नहीं है कि उनके प्रियजन जीवित हैं या नहीं। मलबे के नीचे दबे लोगों की तलाश के लिए नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के जवान लगातार अभियान चला रहे हैं।
कई स्थानों पर शवों की हालत इतनी खराब है कि उनकी पहचान करना कठिन हो गया है। नेपाल में डीएनए नमूनों के जरिए मृतकों की पहचान की जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बड़ी संख्या में शव अभी भी अज्ञात हैं और उनके बारे में विवरण सार्वजनिक किया जा रहा है ताकि परिवार अपने लापता परिजनों की पहचान कर सकें।
मृतकों की पहचान के लिए नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी मांगा है। भारत की फोरेंसिक विशेषज्ञ टीम समेत विभिन्न देशों के विशेषज्ञ पहचान प्रक्रिया में सहायता कर रहे हैं। इस त्रासदी में तकनीक और मानवीय संवेदना दोनों की परीक्षा हो रही है।
दस दिन बाद मलबे से जिंदा निकली महिला ने जगाई उम्मीद
इतने बड़े विनाश के बीच कुछ घटनाओं ने नेपाल को उम्मीद भी दी है। नुवाकोट के बेट्रावती क्षेत्र में एक महिला को करीब दस दिन तक मलबे में फंसे रहने के बाद जीवित निकाला गया। परिवार ने उन्हें मृत मानकर अंतिम संस्कार की रस्में तक शुरू कर दी थीं, लेकिन बचावकर्मियों को मलबे के भीतर से आवाज सुनाई दी।
बचाव दल ने कठिन अभियान के बाद उन्हें बाहर निकाला। यह घटना उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बनी है, जो अभी भी अपने लापता परिजनों के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
इसी तरह जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों से भी जीवित लोगों को निकालने की घटनाएं सामने आई हैं। कई दिनों तक अंधेरी और मलबे से भरी सुरंगों में फंसे श्रमिकों को बचाना नेपाली सेना और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के लिए बेहद कठिन अभियान रहा।
जलविद्युत परियोजनाएं बनीं सबसे बड़ी चुनौती
नेपाल की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा व्यवस्था में जलविद्युत परियोजनाओं की बड़ी भूमिका है, लेकिन इस आपदा ने इन परियोजनाओं की भौगोलिक संवेदनशीलता भी उजागर कर दी है।
बाढ़ से कई जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा है और बड़ी संख्या में श्रमिकों के लापता होने की खबर सामने आई। कई लोग ऐसी सुरंगों में फंसे होने की आशंका में हैं, जहां भारी मलबा और पानी जमा है।
भारतीय, चीनी और अन्य अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की मदद से सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश की जा रही है। ड्रोन, ग्राउंड रडार, पंप, उत्खनन मशीनों और अन्य तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा है। नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उच्च क्षमता वाले ड्रोन, LiDAR, ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार, डीएनए किट, बेली ब्रिज और जल निकासी उपकरण सहित कई तरह की सहायता मांगी है।
चीन के तिब्बत में भी भारी तबाही
यह आपदा केवल नेपाल तक सीमित नहीं रही। नेपाल-चीन सीमा के दूसरी तरफ तिब्बत के ग्यिरोंग क्षेत्र में भी मलबे और बाढ़ ने भारी तबाही मचाई।
ग्यिरोंग सीमा चौकी, जो नेपाल-चीन व्यापार और धार्मिक यात्राओं के लिए महत्वपूर्ण मार्ग थी, मलबे और पानी की चपेट में आ गई। 7 सितंबर तक चीन की तरफ कम से कम 43 मौतों और 519 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। इनमें बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक भी शामिल हैं।
इस प्रकार नेपाल और तिब्बत को मिलाकर इस आपदा का मानवीय दायरा और भी बड़ा हो जाता है। दोनों देशों में बचाव दल मलबे में जीवन के संकेत खोज रहे हैं।
विदेशी नागरिकों की बड़ी संख्या ने बढ़ाई चिंता
नेपाल की इस आपदा में विदेशी नागरिक भी बड़ी संख्या में प्रभावित हुए हैं। नेपाल पुलिस और आपदा प्रबंधन अधिकारियों के अलग-अलग अपडेट में सैकड़ों विदेशी नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। 5 सितंबर के अपडेट में करीब 589 विदेशी नागरिकों के लापता होने की बात कही गई थी।
इनमें पर्यटक, पर्वतारोही, तीर्थयात्री, जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले विदेशी कर्मचारी और सीमा क्षेत्र से गुजर रहे लोग शामिल हो सकते हैं।
इस स्थिति ने नेपाल के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, भारत, चीन, कनाडा और कई यूरोपीय देशों में परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। कई परिवार लगातार अपने रिश्तेदारों की सूचना पाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ
भारत ने नेपाल की राहत और बचाव गतिविधियों में महत्वपूर्ण सहयोग दिया है। भारतीय विशेषज्ञों ने फोरेंसिक पहचान और सुरंग बचाव अभियान में सहायता की है। भारत की ओर से राहत सामग्री और विशेषज्ञ दल नेपाल भेजे गए हैं।
भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार सैकड़ों भारतीय नागरिकों के संबंध में खोज और बचाव गतिविधियां की गई हैं। भारत और नेपाल के बीच लगातार संपर्क बना हुआ है ताकि प्रभावित भारतीय नागरिकों की पहचान, निकासी और सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा सके।
इस त्रासदी ने एक बार फिर यह साबित किया है कि हिमालयी क्षेत्र में किसी भी बड़ी प्राकृतिक आपदा का प्रभाव सीमाओं में बंधा नहीं रहता। नेपाल, भारत और चीन—तीनों देशों को ऐसे संकटों से निपटने के लिए साझा तंत्र की जरूरत है।
गोरखा में फिर आई बाढ़, पुल और घर बहे
जबकि मुख्य आपदा से उबरने की कोशिश चल रही है, नेपाल के गोरखा जिले में भी बाढ़ की नई घटना ने चिंता बढ़ा दी है।
उत्तरी गोरखा के चुमनुब्री क्षेत्र में थेरांग खोला में आई बाढ़ ने चार मकानों और एक पुल को बहा दिया। स्थानीय लोगों ने समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचकर अपनी जान बचाई, इसलिए इस घटना में किसी व्यक्ति के हताहत होने की सूचना नहीं है।
रेडियो नेपाल की रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में बाढ़ से दो पुलों और दो जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है। इसके कारण मनास्लु ट्रेकिंग क्षेत्र का संपर्क प्रभावित हुआ है। प्रशासन ने पर्यटकों और ट्रेकर्स को मनास्लु और लार्के पास मार्गों पर फिलहाल यात्रा रोकने की सलाह दी है।
यह घटनाक्रम बताता है कि मुख्य बाढ़ के बाद भी नेपाल में खतरा समाप्त नहीं हुआ है। भूस्खलन, नदी का बढ़ता जलस्तर और कमजोर हो चुके पहाड़ी ढांचे आने वाले दिनों में भी खतरा पैदा कर सकते हैं।
राहत सामग्री की आपूर्ति के लिए वैकल्पिक रास्ते
बाढ़ और भूस्खलन ने नेपाल के सड़क नेटवर्क को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। कई प्रमुख मार्ग टूटने के कारण काठमांडू और प्रभावित क्षेत्रों तक आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति चुनौती बन गई है।
खासकर रसोई गैस की आपूर्ति को बनाए रखने के लिए नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन ने वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल शुरू किया है। 3 से 5 सितंबर के बीच करीब 87,877 एलपीजी सिलेंडर काठमांडू घाटी पहुंचाए गए। सामान्य मार्ग बाधित होने के बाद गैस को घाटी के बाहर स्थित संयंत्रों में भरकर वैकल्पिक रास्तों से राजधानी पहुंचाया गया।
यह कदम बताता है कि आपदा का असर केवल राहत शिविरों तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था और शहरी जीवन पर भी पड़ रहा है।
नेपाल ने दुनिया से मांगा ‘क्लाइमेट जस्टिस’
नेपाल सरकार अब इस आपदा को केवल प्राकृतिक त्रासदी के रूप में नहीं देख रही, बल्कि इसे जलवायु परिवर्तन से जुड़े बड़े वैश्विक संकट के रूप में भी उठा रही है।
नेपाल का तर्क है कि हिमालयी क्षेत्र ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के प्रति बेहद संवेदनशील है। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, ग्लेशियल झीलों का बढ़ना और अचानक आने वाली बाढ़ों का जोखिम पर्वतीय समुदायों के सामने गंभीर चुनौती बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों ने भी चेतावनी दी है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल बाढ़ का जोखिम आने वाले वर्षों में बढ़ सकता है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलें अस्थिर हो सकती हैं, जिससे अचानक बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर आ सकता है। यही वजह है कि नेपाल अंतरराष्ट्रीय मंच पर जलवायु न्याय, अनुकूलन वित्त और आपदा-पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की मांग उठा रहा है।
नेपाल जैसे देश का सवाल बेहद गंभीर है—यदि वैश्विक तापमान बढ़ाने में उसका योगदान तुलनात्मक रूप से कम है, तो जलवायु परिवर्तन से होने वाली भारी मानवीय और आर्थिक क्षति का बोझ उसे अकेले क्यों उठाना पड़े?
पर्यटन उद्योग पर भी मंडराया संकट
नेपाल की अर्थव्यवस्था में पर्यटन का महत्वपूर्ण स्थान है। पर्वतारोहण, ट्रेकिंग, धार्मिक यात्राएं और प्राकृतिक पर्यटन देश के लिए विदेशी मुद्रा तथा रोजगार का बड़ा स्रोत हैं।
बाढ़ और भूस्खलन की तस्वीरों से अंतरराष्ट्रीय यात्रियों में भय पैदा होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि नेपाल सरकार दूसरे देशों से आग्रह कर रही है कि यात्रा संबंधी सलाह पूरे देश पर लागू न की जाए, बल्कि केवल प्रभावित क्षेत्रों तक सीमित रखी जाए।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि प्रभावित विशिष्ट क्षेत्रों को छोड़कर देश का बाकी हिस्सा यात्रा और पर्यटन के लिए खुला और सुरक्षित है। मंत्रालय विदेशी सरकारों और अपने विदेश स्थित मिशनों के माध्यम से इस संदेश को पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।
हालांकि, जहां प्रशासन ने पर्यटकों को कुछ क्षेत्रों से दूर रहने की सलाह दी है, वहां सुरक्षा निर्देशों का पालन करना अत्यंत जरूरी है।
विदेशी पत्रकारों के लिए नए नियम
आपदा की अंतरराष्ट्रीय कवरेज को देखते हुए नेपाल ने विदेशी पत्रकारों के लिए भी विशेष व्यवस्था लागू की है।
नेपाल के विदेश मंत्रालय के 6 सितंबर के अपडेट के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों में रिपोर्टिंग करने वाले विदेशी पत्रकारों को सूचना तथा प्रसारण विभाग के ऑनलाइन माध्यम से प्रेस मान्यता प्राप्त करनी होगी। इसका उद्देश्य चल रहे बचाव अभियान, अस्थिर भूभाग, भूस्खलन और हेलीकॉप्टर संचालन से जुड़े जोखिमों को देखते हुए सुरक्षित और जिम्मेदार रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना है।
नियमों के तहत विदेशी पत्रकारों को वैध पासपोर्ट और वीजा अथवा प्रवेश परमिट की प्रति, अपने मीडिया संस्थान की सिफारिश तथा संबंधित दूतावास, कांसुलर कार्यालय या विदेश मंत्रालय की सिफारिश देनी होगी। जारी होने वाली मान्यता और पत्रकार पहचान पत्र की वैधता 15 दिनों तक रहेगी।
पत्रकारों को सक्रिय बचाव क्षेत्रों में बिना अनुमति प्रवेश न करने, राहत एवं बचाव कार्य में बाधा न डालने और सुरक्षा बलों के निर्देशों का पालन करने को कहा गया है।

मलबे में सिर्फ इंसान नहीं, नेपाल का भविष्य भी दबा है
नेपाल की मौजूदा त्रासदी केवल मृतकों और लापता लोगों की संख्या का आंकड़ा नहीं है। इसके पीछे हजारों टूटे परिवार, उजड़े गांव, नष्ट हुई सड़कें, क्षतिग्रस्त पुल, बंद व्यापार मार्ग और भविष्य की अनिश्चितता है।
हाइड्रोपावर परियोजनाओं को नुकसान का असर ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ सकता है। सड़क और पुलों के टूटने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। पर्यटन पर असर पड़ा तो रोजगार और विदेशी मुद्रा की आमदनी को झटका लगेगा। कृषि क्षेत्रों में मलबा पहुंचने और जल स्रोतों के दूषित होने से खाद्य एवं स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।
विशेषज्ञों ने पेयजल प्रदूषण और संक्रामक बीमारियों के संभावित खतरे को लेकर भी चिंता जताई है। ऐसे में राहत अभियान को केवल भोजन और आश्रय उपलब्ध कराने तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। स्वच्छ पानी, चिकित्सा सुविधा, शवों का सुरक्षित प्रबंधन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और दीर्घकालिक पुनर्वास भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे।
क्या नेपाल अकेला इस संकट से लड़ पाएगा?
यह सवाल अब केवल नेपाल का नहीं, पूरी दुनिया का है।
हिमालय भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान सहित कई देशों के लिए जल सुरक्षा का आधार है। यहां ग्लेशियरों में होने वाला परिवर्तन केवल एक देश की समस्या नहीं है। यदि ग्लेशियर अस्थिर होते हैं, ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ता है और अचानक बाढ़ आती है तो उसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार भी जा सकता है।
नेपाल की मौजूदा त्रासदी इसलिए पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। हिमालय में बेहतर निगरानी प्रणाली, ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की नियमित मैपिंग, रियल-टाइम अलर्ट, नदी घाटियों में सुरक्षित निर्माण, आपदा-रोधी पुल और सड़कें तथा सीमापार आपदा सूचना साझा करने की व्यवस्था अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुकी है।
नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उच्च तकनीक और मानवीय सहायता की मांग की है। 6 सितंबर तक नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार मित्र देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की राहत सामग्री व बचाव टीमों को लेकर 26 उड़ानों की सुविधा के लिए समन्वय किया जा चुका था।
आज नेपाल शोक में है, लेकिन उम्मीद अभी जिंदा है
7 सितंबर को नेपाल राष्ट्रीय शोक दिवस मना रहा है। देश की आंखों में आंसू हैं और हजारों परिवार अब भी किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
मलबे से दस दिन बाद महिला का जिंदा निकलना हो या अंधेरी सुरंगों से श्रमिकों को बचाया जाना—ये घटनाएं बताती हैं कि जब तक अंतिम संभावना खत्म न हो, तलाश बंद नहीं होनी चाहिए।
नेपाल की इस त्रासदी ने दुनिया को एक कठोर सवाल के सामने खड़ा कर दिया है—क्या हिमालय के कमजोर होते पर्यावरण और वहां रहने वाले करोड़ों लोगों की सुरक्षा के लिए दुनिया पर्याप्त गंभीर है? आज नेपाल पूछ रहा है कि प्रकृति की मार वह आखिर कब तक अकेले झेलता रहेगा?
इस सवाल का जवाब केवल राहत राशि में नहीं, बल्कि जलवायु न्याय, वैज्ञानिक सहयोग, मजबूत आपदा तैयारी और हिमालयी क्षेत्र के लिए साझा अंतरराष्ट्रीय रणनीति में छिपा है।
नेपाल को इस समय संवेदना से ज्यादा सहयोग चाहिए, आश्वासन से ज्यादा कार्रवाई चाहिए और तत्काल राहत के साथ ऐसा भविष्य चाहिए जिसमें अगली ग्लेशियल बाढ़ हजारों परिवारों की जिंदगी को फिर इस तरह न उजाड़ सके।
रिपोर्टिंग नोट : 7 सितंबर के नवीनतम उपलब्ध नेपाली अपडेट में 1,342 शव बरामद और 3,992 लोग लापता बताए गए हैं, जबकि 5-6 सितंबर के कई राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय समाचार अपडेट नेपाल पुलिस के हवाले से 1,344 मौतें और करीब 5,000 लापता बताते हैं। इसलिए प्रकाशित संस्करण में “आंकड़ों में लगातार बदलाव” का उल्लेख बनाए रखना तथ्यात्मक रूप से अधिक सुरक्षित है।

























