अनिल अनूप द्वारा लिखित लेख
डॉ. अनिल दीक्षित के विचारों पर आधारित विस्तृत आलेख
मसूरी की पहाड़ियों में प्रकृति जितनी खूबसूरत है, इतिहास की परतें भी उतनी ही गहरी हैं। यहां की सड़कों, पुराने भवनों, चर्चों और कब्रिस्तानों में बीते दौर की ऐसी अनेक कहानियां छिपी हैं, जिन्हें समय के साथ पढ़ने और समझने की जरूरत है। इन्हीं ऐतिहासिक निशानियों में एक है जॉन लैंग की कब्र। यह कब्र केवल किसी व्यक्ति की अंतिम विश्रामस्थली नहीं, बल्कि भारत के औपनिवेशिक इतिहास, पत्रकारिता, कानून, साहित्य और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से जुड़े एक महत्वपूर्ण अध्याय की जीवित स्मृति है।
देव भूमि उत्तराखंड विश्वाविद्यालय देहरादून के डीन प्रोफेसर डॉ. अनिल दीक्षित के विचारों का मूल आग्रह यही है कि ऐतिहासिक धरोहरों को उनकी वर्तमान राजनीतिक पसंद-नापसंद के आधार पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक महत्व के आधार पर देखा जाना चाहिए। किसी स्मारक या कब्र का संरक्षण उस व्यक्ति का महिमामंडन नहीं होता; वह इतिहास को सुरक्षित रखने का प्रयास होता है।
मसूरी के पुराने कब्रिस्तान में स्थित जॉन लैंग की कब्र इसी दृष्टि से विशेष महत्व रखती है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार जॉन लैंग ऑस्ट्रेलिया में जन्मे वकील, लेखक और पत्रकार थे। भारत में उन्होंने कानून और पत्रकारिता के क्षेत्र में काम किया तथा रानी लक्ष्मीबाई के कानूनी संघर्ष से भी उनका नाम जुड़ा रहा। 1864 में मसूरी में उनकी मृत्यु हुई और उन्हें यहीं दफनाया गया। बाद में उनकी कब्र लंबे समय तक उपेक्षित और लगभग विस्मृत रही।
जॉन लैंग की कब्र आखिर क्यों महत्वपूर्ण है?
पहली नजर में सवाल उठ सकता है कि किसी विदेशी व्यक्ति की कब्र को संरक्षित करने की इतनी चिंता क्यों होनी चाहिए? भारत में हजारों ऐतिहासिक कब्रें, इमारतें और स्मारक हैं। इनमें से हर एक को बचाना संभव भी नहीं है। फिर जॉन लैंग की कब्र को अलग महत्व क्यों दिया जाए? इस सवाल का जवाब व्यक्ति की राष्ट्रीयता में नहीं, बल्कि इतिहास से उसके संबंध में छिपा है।
जॉन लैंग उस दौर में भारत आए थे जब ईस्ट इंडिया कंपनी का राजनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। वह केवल ब्रिटिश सत्ता के प्रतिनिधि नहीं थे। वे लेखक और पत्रकार भी थे और तत्कालीन प्रशासन की नीतियों की आलोचना करने के लिए भी जाने जाते थे। उन्होंने The Mofussilite नामक अखबार शुरू किया था, जिसमें तत्कालीन शासन और ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों पर तीखी टिप्पणियां प्रकाशित होती थीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रानी लक्ष्मीबाई के कानूनी संघर्ष में उनका नाम सामने आता है। इस कारण जॉन लैंग की कब्र केवल एक व्यक्तिगत स्मृति नहीं रह जाती। वह 19वीं सदी के भारत में कानून, सत्ता, औपनिवेशिक शासन और भारतीय प्रतिरोध के बीच के संबंधों को समझने का एक भौतिक स्रोत बन जाती है। कब्र का संरक्षण व्यक्ति का नहीं, उससे जुड़े इतिहास का संरक्षण है। यही अंतर हमें समझना होगा।
रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ाव कब्र को देता है अतिरिक्त ऐतिहासिक महत्व
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित और सम्मानित वीरांगनाओं में से एक हैं। 1857 के संघर्ष और उससे जुड़े घटनाक्रम में उनका नाम राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन चुका है।
ऐसे में उस व्यक्ति की कब्र, जिसने रानी लक्ष्मीबाई के कानूनी संघर्ष में उनका पक्ष रखा था, स्वाभाविक रूप से इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। जॉन लैंग ने ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध रानी लक्ष्मीबाई के कानूनी मामले में उनका प्रतिनिधित्व किया था।
जॉन लैंग की भूमिका को समझे बिना उस दौर के कई कानूनी और राजनीतिक संदर्भों को पूरी तरह समझना कठिन हो सकता है। यही कारण है कि उनकी कब्र को केवल पत्थर, मिट्टी और एक पुराने नाम के रूप में देखना इतिहास के साथ अन्याय होगा।
रस्किन बॉन्ड ने फिर सामने ला दी भूली हुई कहानी
जॉन लैंग की कब्र की कहानी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष वह प्रयास भी है, जिसने लगभग एक सदी बाद इस भूली हुई निशानी को फिर लोगों की नजरों के सामने ला दिया। जॉन लैंग की मृत्यु के लगभग सौ वर्ष बाद, 1964 में प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड ने उनकी कब्र को खोज निकाला।
कब्र की तलाश आसान नहीं थी। पुराने कब्रिस्तान में समय और मौसम के कारण अनेक कब्रों के निशान मिट चुके थे। रस्किन बॉन्ड ने कई प्रयासों के बाद झाड़ियों, काई और वनस्पतियों से ढकी उस कब्र को खोजा। उपलब्ध विवरणों के अनुसार उन्होंने स्वयं इस खोज को अपनी साहित्यिक और ऐतिहासिक रुचि से जोड़ा तथा बाद में जॉन लैंग की कहानी को व्यापक पाठक समाज तक पहुंचाने में भूमिका निभाई।
यह प्रसंग अपने आप में बताता है कि ऐतिहासिक धरोहरें केवल सरकारी रिकॉर्ड से जीवित नहीं रहतीं। कभी-कभी किसी संवेदनशील लेखक, इतिहासप्रेमी या स्थानीय व्यक्ति की जिज्ञासा उन्हें विस्मृति से बाहर निकालती है।
रस्किन बॉन्ड का यह प्रयास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने केवल एक कब्र नहीं खोजी थी; उन्होंने उसके पीछे छिपी हुई एक पूरी ऐतिहासिक कहानी को फिर से खोजा था।
डॉ. अनिल दीक्षित की पहल और दृष्टि का महत्व
इसी कड़ी को आगे बढ़ाने में उत्तरांचल विश्वविद्यालय के डीन डॉ. अनिल दीक्षित का प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जॉन लैंग की कब्र और उससे जुड़े इतिहास को गंभीरता से सामने लाने तथा उसके संरक्षण की आवश्यकता पर विचार करने का उनका दृष्टिकोण इस विषय को केवल स्थानीय चर्चा तक सीमित नहीं रहने देता।
डॉ. दीक्षित का जोर इस बात पर है कि किसी ऐतिहासिक धरोहर का महत्व केवल उसके भव्य आकार, स्थापत्य या वर्तमान लोकप्रियता से तय नहीं होना चाहिए। कई बार एक उपेक्षित कब्र, पुराना शिलालेख या किसी भूले हुए व्यक्ति से जुड़ा छोटा-सा स्थल इतिहास की ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी अपने भीतर समेटे होता है, जिसे खो देने के बाद फिर से प्रमाण के साथ हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
जॉन लैंग की कब्र इसी श्रेणी में आती है। इसके साथ रानी लक्ष्मीबाई, औपनिवेशिक भारत, कानून, पत्रकारिता और साहित्य के कई सूत्र जुड़े हुए हैं। इसलिए इसे बचाने का अर्थ केवल एक कब्र की देखभाल करना नहीं, बल्कि इतिहास के उन सूत्रों को सुरक्षित रखना है जो आने वाली पीढ़ियों को 19वीं सदी के भारत को समझने में मदद कर सकते हैं।
डॉ. दीक्षित की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक क्यों महत्वपूर्ण है?
इस पूरे विषय को और अधिक गंभीरता इसलिए भी मिलती है क्योंकि डॉ. अनिल दीक्षित की इस विषय पर एक पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य बताई जा रही है। यदि इसमें जॉन लैंग के जीवन, उनकी भारत यात्रा, रानी लक्ष्मीबाई से उनके संबंध, मसूरी में उनके अंतिम दिनों, उनकी कब्र की उपेक्षा और फिर उसके पुनः उजागर होने की कहानी को दस्तावेजों और ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर समेटा गया है, तो यह पुस्तक इस विषय पर अत्यंत उपयोगी संदर्भ-सामग्री साबित हो सकती है।
ऐसी पुस्तक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि जॉन लैंग से संबंधित इतिहास अलग-अलग स्रोतों, लेखों, संस्मरणों और अभिलेखों में बिखरा हुआ है। उनके लेखन और जीवन पर भी समय-समय पर शोध हुआ है। उनकी Wanderings in India जैसी कृतियां भारत के उस दौर की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को समझने के लिए उपयोगी मानी जाती हैं।
यदि डॉ. दीक्षित की पुस्तक इस बिखरी सामग्री को एक स्थान पर लाकर प्रमाणों, संदर्भों और स्थानीय इतिहास के साथ प्रस्तुत करती है, तो वह केवल जॉन लैंग की जीवनी अथवा कब्र की कहानी भर नहीं होगी। वह मसूरी और औपनिवेशिक भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन सकती है।
और शायद यही किसी ऐतिहासिक पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है—वह किसी भूली हुई जगह को केवल याद नहीं करती, बल्कि उसे प्रमाण और संदर्भ देकर इतिहास की मुख्य धारा में वापस लाती है।
क्या किसी औपनिवेशिक दौर की कब्र को बचाना उचित है?
यहां एक महत्वपूर्ण तर्क-वितर्क सामने आता है। भारत ने लंबे औपनिवेशिक शासन का दंश झेला है। अंग्रेजी शासन से जुड़े प्रतीकों को लेकर स्वाभाविक रूप से ऐतिहासिक और भावनात्मक प्रश्न उठते हैं। ऐसे में कुछ लोग यह पूछ सकते हैं कि जब देश स्वतंत्रता के संघर्ष के नायकों की स्मृतियों को अधिक प्रमुखता देने की जरूरत है, तब किसी ब्रिटिश या विदेशी व्यक्ति की कब्र पर संसाधन क्यों खर्च किए जाएं?
यह सवाल पूरी तरह निराधार नहीं है। लेकिन इसका उत्तर भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इतिहास को संरक्षित करना और इतिहास का महिमामंडन करना दो अलग-अलग बातें हैं।
यदि किसी औपनिवेशिक अधिकारी, सैनिक, वकील या लेखक से जुड़ी कोई ऐतिहासिक वस्तु हमें उस समय को समझने में मदद करती है, तो उसे सुरक्षित रखना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम उस शासन व्यवस्था का समर्थन कर रहे हैं।
जॉन लैंग की कब्र को संरक्षित करने का उद्देश्य ब्रिटिश शासन का गुणगान करना नहीं, बल्कि उस दौर की जटिलताओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना होना चाहिए।
इतिहास केवल विजेताओं की कहानी नहीं है
इतिहास को यदि केवल सत्ता के नजरिए से पढ़ा जाए तो उसकी बहुत-सी परतें गायब हो जाती हैं। एक ओर अंग्रेजी सत्ता थी, दूसरी ओर भारतीय समाज था। इनके बीच कानून, पत्रकारिता, साहित्य और व्यक्तिगत संबंधों की भी एक दुनिया थी। जॉन लैंग इसी जटिल इतिहास की एक कड़ी हैं।
वह व्यक्ति जिसने भारत में रहकर लेखन और पत्रकारिता की, जिसने तत्कालीन परिस्थितियों को देखा और लिखा तथा जिसने रानी लक्ष्मीबाई से जुड़े कानूनी मामले में भूमिका निभाई—उसकी कब्र इतिहास के शोधार्थियों के लिए स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है। इसलिए कब्र को बचाना दरअसल एक ऐतिहासिक दस्तावेज को बचाना है।
उपेक्षा भी इतिहास को मिटाने का एक तरीका है
ऐतिहासिक स्मारक हमेशा किसी विस्फोट या तोड़फोड़ से ही नष्ट नहीं होते। कई बार उन्हें समय, मौसम, झाड़ियां, नमी, लापरवाही और प्रशासनिक उपेक्षा धीरे-धीरे मिटा देती है।
जॉन लैंग की कब्र भी लंबे समय तक झाड़ियों और वनस्पतियों के बीच छिपी रही। रस्किन बॉन्ड द्वारा 1964 में इसे खोजे जाने के विवरण बताते हैं कि एक समय यह कब्र काई और झाड़ियों से लगभग ढक चुकी थी।
यही स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। किसी ऐतिहासिक धरोहर को गिराने के लिए बुलडोजर जरूरी नहीं होता। कई बार उसे अकेला छोड़ देना ही पर्याप्त होता है।
जब किसी कब्र का शिलालेख मिटने लगता है, आसपास की जमीन असुरक्षित हो जाती है, पेड़-पौधों की जड़ें संरचना को प्रभावित करने लगती हैं और आने वाली पीढ़ियां उसके इतिहास से अनजान हो जाती हैं, तब धीरे-धीरे पूरा इतिहास हमारी सामूहिक स्मृति से बाहर हो जाता है।
क्या संरक्षण पर बहुत पैसा खर्च करना जरूरी है?
यह भी एक व्यावहारिक सवाल है। संरक्षण का अर्थ हमेशा भव्य निर्माण, संगमरमर की दीवार या करोड़ों रुपये की परियोजना नहीं होता। जॉन लैंग की कब्र के लिए प्राथमिक आवश्यकता शायद बहुत साधारण हो सकती है—स्थान की पहचान, सीमांकन, साफ-सफाई, जल निकासी, वनस्पतियों की नियंत्रित कटाई, शिलालेख की सुरक्षा और नियमित निगरानी।
कब्र के आसपास एक छोटा और सुरुचिपूर्ण सूचना-पट्ट लगाया जा सकता है। उस पर जॉन लैंग का संक्षिप्त परिचय, भारत से उनका संबंध और रानी लक्ष्मीबाई के कानूनी संघर्ष में उनकी भूमिका दर्ज की जा सकती है।
इसके साथ QR कोड लगाया जाए तो कोई भी विद्यार्थी या पर्यटक अपने मोबाइल से इस इतिहास की विस्तृत जानकारी पढ़ सकता है। इससे बिना भारी निर्माण किए एक उपेक्षित कब्र को इतिहास के अध्ययन का केंद्र बनाया जा सकता है।
संरक्षण का अर्थ कब्र को पर्यटन स्थल बनाना नहीं
यह भी सावधानी जरूरी है कि संरक्षण के नाम पर ऐतिहासिक स्थल का व्यावसायीकरण न हो। जॉन लैंग की कब्र को किसी मनोरंजन केंद्र या केवल फोटो खिंचवाने की जगह में बदलना उचित नहीं होगा। वहां आने वाले लोगों में इतिहास के प्रति सम्मान और जिज्ञासा पैदा होनी चाहिए।
एक छोटा हेरिटेज वॉक तैयार किया जा सकता है, जिसमें मसूरी के पुराने कब्रिस्तान, जॉन लैंग और अन्य ऐतिहासिक व्यक्तियों के संदर्भ को जोड़ा जाए। इससे स्थानीय युवाओं को भी अपने शहर के इतिहास से परिचित कराया जा सकता है।
मसूरी के कैमल्स बैक रोड कब्रिस्तान में अनेक ऐतिहासिक व्यक्तियों की कब्रें हैं और जॉन लैंग की कब्र इस ऐतिहासिक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सरकार से ज्यादा समाज की भी जिम्मेदारी
ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं हो सकती। स्थानीय इतिहासकार, लेखक, पत्रकार, विश्वविद्यालय, स्कूल, पर्यटन संस्थाएं और नागरिक संगठन मिलकर इसके संरक्षण में भूमिका निभा सकते हैं।
सबसे पहले जॉन लैंग की कब्र की वर्तमान स्थिति का वैज्ञानिक सर्वेक्षण होना चाहिए। इसके बाद उसकी फोटोग्राफिक और डिजिटल रिकॉर्डिंग की जाए। पुराने दस्तावेजों, कब्रिस्तान के रजिस्टर और उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों को एक जगह संकलित किया जाए।
जॉन लैंग की कब्र को फिर से सामने लाने वाले रस्किन बॉन्ड जैसे प्रयास और अब डॉ. अनिल दीक्षित जैसे विद्वानों की शोधपरक पहल इस बात का प्रमाण है कि जब व्यक्ति और संस्थाएं इतिहास को गंभीरता से लेते हैं तो भूली हुई धरोहरें फिर चर्चा में आ सकती हैं।
स्कूल-कॉलेजों को इससे जोड़ना होगा
किसी धरोहर का वास्तविक संरक्षण तब होता है जब समाज उसकी कहानी जानता हो। यदि मसूरी के स्कूलों के विद्यार्थियों को बताया जाए कि उनके शहर में एक ऐसी कब्र है जिसका संबंध झांसी की रानी के कानूनी संघर्ष से जुड़े व्यक्ति से है, तो उनके भीतर इतिहास के प्रति स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा होगी।
इतिहास की किताबों में कुछ पंक्तियां पढ़ लेना और इतिहास को अपने आसपास मौजूद किसी स्थल के रूप में देखना—दो बिल्कुल अलग अनुभव हैं। इसलिए जॉन लैंग की कब्र को स्थानीय इतिहास शिक्षण से जोड़ा जा सकता है।
जॉन लैंग की कब्र हमें एक बड़ा संदेश देती है
आज विरासत संरक्षण को केवल पुराने भवनों की रक्षा तक सीमित नहीं माना जा सकता। किसी स्थान से जुड़ी स्मृति, दस्तावेज, कब्र, शिलालेख और स्थानीय कथाएं भी सामूहिक विरासत का हिस्सा होती हैं।
जॉन लैंग की कब्र इसी बात का उदाहरण है। यह हमें बताती है कि इतिहास हमेशा स्मारकों के रूप में भव्य दिखाई नहीं देता। कभी-कभी वह एक पुराने पत्थर पर लिखे कुछ धुंधले शब्दों में छिपा होता है।
सवाल यह है कि क्या हम उन शब्दों को पढ़ने की कोशिश करेंगे? या फिर उन्हें झाड़ियों और उपेक्षा के बीच गायब होने देंगे?
संरक्षण के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क
जॉन लैंग की कब्र के संरक्षण के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह नहीं है कि जॉन लैंग कौन थे। सबसे बड़ा तर्क यह है कि उनकी कब्र हमें बताती है कि भारत का इतिहास कितना बहुस्तरीय रहा है।
यहां कानून है, राजनीति है, पत्रकारिता है, साहित्य है, औपनिवेशिक शासन है, भारतीय प्रतिरोध है और रानी लक्ष्मीबाई जैसी ऐतिहासिक शख्सियत से जुड़ा प्रसंग भी है।
इतिहास की ऐसी कड़ियों को बचाना इसलिए जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियां अतीत को केवल भावनाओं या राजनीतिक व्याख्याओं के जरिए नहीं, बल्कि प्रमाणों और वास्तविक स्थलों के माध्यम से भी समझ सकें।
डॉ. अनिल दीक्षित के विचारों का सार इसी व्यापक दृष्टिकोण में दिखाई देता है—विरासत किसी एक व्यक्ति, समुदाय या सत्ता की संपत्ति नहीं होती; वह समाज की सामूहिक स्मृति होती है।
निष्कर्ष: कब्र बचाना इतिहास बचाना है
मसूरी में जॉन लैंग की कब्र के संरक्षण का सवाल केवल एक पुरानी कब्र के रखरखाव का सवाल नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि हम अपने इतिहास को किस नजर से देखते हैं। क्या हम इतिहास के केवल उन्हीं पन्नों को बचाएंगे जो हमें पसंद हैं? या उन पन्नों को भी सुरक्षित रखेंगे जिनसे हम सहमत नहीं हैं, लेकिन जो हमारे अतीत को समझने के लिए जरूरी हैं?
जॉन लैंग की कब्र को बचाना अंग्रेजी शासन का समर्थन नहीं है। यह रानी लक्ष्मीबाई के इतिहास को और व्यापक संदर्भ में समझने का अवसर है। यह पत्रकारिता और कानून के उस दौर को जानने का माध्यम है, जब भारत में सत्ता और समाज के बीच नए संघर्ष आकार ले रहे थे।
रस्किन बॉन्ड ने जिस कब्र को लगभग एक सदी बाद खोजकर फिर से स्मृति में लौटाया, उसे अब स्थायी संरक्षण की जरूरत है। और यदि डॉ. अनिल दीक्षित की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक इस पूरे इतिहास को दस्तावेजी प्रमाणों और शोध के साथ सामने लाती है, तो वह इस संरक्षण अभियान के लिए एक महत्वपूर्ण बौद्धिक आधार बन सकती है। आवश्यकता किसी भव्य स्मारक की नहीं, बल्कि सम्मानजनक, वैज्ञानिक और सतत संरक्षण की है।
कब्र के चारों ओर उगी झाड़ियां हटें, शिलालेख सुरक्षित हो, स्थान का सीमांकन हो, ऐतिहासिक परिचय उपलब्ध हो और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसकी कहानी दर्ज की जाए—इतना भर भी इस विरासत को नया जीवन दे सकता है। क्योंकि इतिहास को हमेशा बड़ी इमारतों में सुरक्षित नहीं रखा जाता।
कभी-कभी इतिहास एक अकेली कब्र में सो रहा होता है—और उसे जगाने के लिए केवल हमारी संवेदनशीलता, हमारी स्मृति और संरक्षण की इच्छाशक्ति की जरूरत होती है।


























3 Responses
Very nice respected Dr. Anil Dixit sir…
Your work really appreciable.
Thank you so much for giving us this type of Great knowledge.
विरासतें सिर्फ पत्थर या इमारतें नहीं हैं, वे हमारी आने वाली पीढ़ियों को उनकी जड़ों और इतिहास से जोड़ने वाली सबसे मजबूत कड़ी हैं।
This Article on Jhansi ki Rani Advocate John Lang, will open the Eyes of Uttarakhand Govt. and Govt. Of india 🇮🇳 too. PM narendra modi must give direction to Dhami Govt. of uttarakhand to take steps preserving. Thanks to Prof. Anil Dixit and you too Mr.Anil Anup ji for raising this issue on National portel Jangandoot.com
Jai Hind 🇮🇳 वन्देमातरम