रोटी और रोज़गार की तलाश में भटकता पाठा: महंगाई, बेरोज़गारी और पलायन के बीच युवाओं की पुकार
संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
चित्रकूट। बुंदेलखंड के पिछड़े और वनवासी बहुल पाठा क्षेत्र में आज भी सबसे बड़ा सवाल दो जून की रोटी और स्थायी रोज़गार का बना हुआ है। विकास के दावों और सरकारी योजनाओं की लंबी सूची के बावजूद बरगढ़, मानिकपुर और आसपास के गांवों में रहने वाले हजारों परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। बढ़ती महंगाई, सीमित रोजगार के अवसर और लगातार हो रहे पलायन ने क्षेत्र के युवाओं और आम जनमानस के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
एक समय था जब ग्रामीण क्षेत्रों में खेती और उससे जुड़े कार्य लोगों के जीवन-यापन का मुख्य आधार हुआ करते थे, लेकिन बदलते समय के साथ खेती की लागत बढ़ती गई और आय घटती चली गई। ऐसे में युवाओं के सामने रोजगार का संकट और गहराता गया। आज हालात यह हैं कि पढ़े-लिखे युवा भी नौकरी की तलाश में दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
महंगाई ने बढ़ाई आम आदमी की मुश्किलें
पिछले कुछ वर्षों में रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। इसका सीधा असर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ा है। गांवों में रहने वाले लोगों का कहना है कि आमदनी सीमित है जबकि खर्च लगातार बढ़ रहा है।
घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों ने गरीब परिवारों के बजट को प्रभावित किया है। कई परिवार आज भी लकड़ी और उपलों के सहारे भोजन बनाने को मजबूर हैं। वहीं पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने परिवहन और कृषि कार्यों की लागत में भी वृद्धि कर दी है।
ग्रामीणों का कहना है कि महंगाई केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और मानसिक दबाव भी पैदा कर रही है। परिवारों के लिए बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक जरूरतों को पूरा करना कठिन होता जा रहा है।
पढ़े-लिखे युवा भी रोजगार के लिए परेशान
पाठा क्षेत्र के अनेक युवा स्नातक, परास्नातक और तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद रोजगार के अवसरों से वंचित हैं। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या और निजी क्षेत्र में निवेश की कमी के कारण युवाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहा है।
कई युवाओं का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, लेकिन सफलता नहीं मिली। दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर उद्योग और रोजगार के साधनों का अभाव उन्हें निराश कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में लघु उद्योग, कृषि आधारित उद्योग और स्वरोजगार योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए तो बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिल सकता है।
बरगढ़ और मानिकपुर में बंद होते रोजगार के रास्ते
चित्रकूट जिले के बरगढ़ और मानिकपुर क्षेत्र लंबे समय से रोजगार संकट का सामना कर रहे हैं। यहां सीमित औद्योगिक गतिविधियां और रोजगार सृजन की कमजोर व्यवस्था लोगों की परेशानियों को बढ़ा रही हैं।
वन क्षेत्र होने के कारण यहां बड़े उद्योग स्थापित नहीं हो सके हैं। वहीं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध रोजगार के अवसर भी पर्याप्त नहीं हैं। परिणामस्वरूप युवा रोज़गार की तलाश में प्रयागराज, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, हस्तशिल्प केंद्र, वन उत्पाद आधारित उद्योग और पर्यटन परियोजनाएं विकसित की जाएं तो हजारों लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सकता है।
पलायन बन रहा सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती
रोजगार के अभाव में लगातार बढ़ रहा पलायन क्षेत्र की सामाजिक संरचना को भी प्रभावित कर रहा है। गांवों में बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रह जाते हैं जबकि युवा रोजगार की तलाश में बाहर चले जाते हैं।
इस स्थिति का असर पारिवारिक जीवन, बच्चों की शिक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। कई परिवार साल भर अपने सदस्यों के लौटने की प्रतीक्षा करते हैं। वहीं शहरों में काम करने वाले युवाओं को भी असुरक्षित और अस्थायी रोजगार पर निर्भर रहना पड़ता है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराया जाए तो पलायन की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।
केवल खाद्यान्न नहीं, रोजगार भी जरूरी
सरकार द्वारा संचालित मुफ्त खाद्यान्न वितरण योजनाओं से गरीब परिवारों को राहत अवश्य मिलती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान रोजगार सृजन ही है। केवल राशन उपलब्ध कराना गरीबी उन्मूलन का स्थायी उपाय नहीं माना जा सकता।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें मुफ्त अनाज के साथ-साथ सम्मानजनक रोजगार भी चाहिए। उनका मानना है कि आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलने पर वे स्वयं अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकते हैं।
क्षेत्र के युवाओं का कहना है कि वे किसी प्रकार की सहायता के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उनकी प्राथमिक मांग रोजगार और आजीविका के स्थायी साधनों की है।
“रोटी के साथ रोजगार चाहिए, भीख नहीं अधिकार चाहिए”
यह नारा आज पाठा क्षेत्र के युवाओं की आवाज बनता जा रहा है। रोजगार, शिक्षा और विकास की मांग को लेकर युवा अब अधिक जागरूक हो रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनकी समस्याएं शासन और प्रशासन तक प्रभावी ढंग से पहुंचें।
सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों में भी रोजगार को प्रमुख मुद्दा बनाया जा रहा है। युवाओं का कहना है कि विकास की वास्तविक परिभाषा तभी पूरी होगी जब प्रत्येक हाथ को काम और प्रत्येक परिवार को सम्मानजनक जीवन का अवसर मिलेगा।
“चलो गांव की ओर” अभियान से जुड़ने की अपील
रोजगार और विकास के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने के लिए सामाजिक स्तर पर भी प्रयास किए जा रहे हैं। “चलो गांव की ओर” जागरूकता अभियान के माध्यम से युवाओं और ग्रामीणों से अपील की जा रही है कि वे अपने मुद्दों को संगठित रूप से शासन और प्रशासन तक पहुंचाएं।
अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनभागीदारी और जागरूकता के माध्यम से ही सकारात्मक परिवर्तन संभव है। यदि ग्रामीण युवा संगठित होकर अपनी समस्याओं को मजबूती से उठाएंगे तो निश्चित रूप से समाधान की दिशा में पहल होगी।
चित्रकूट का पाठा क्षेत्र आज विकास और रोजगार की नई संभावनाओं की प्रतीक्षा कर रहा है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और पलायन ने यहां के लोगों के जीवन को कठिन बना दिया है। ऐसे समय में आवश्यकता है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर रोजगार सृजन के ठोस उपाय करें।
क्षेत्र के युवाओं की मांग स्पष्ट है—उन्हें केवल सहायता नहीं, बल्कि सम्मानजनक रोजगार चाहिए। यदि स्थानीय स्तर पर उद्योग, पर्यटन, कृषि आधारित इकाइयां और स्वरोजगार योजनाएं विकसित की जाएं तो पाठा क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। दो जून की रोटी का संघर्ष तभी समाप्त होगा जब हर हाथ को काम और हर परिवार को आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दो जून की रोटी का मुद्दा क्यों अहम है?
क्योंकि महंगाई और बेरोजगारी के कारण आम परिवारों के सामने भोजन, शिक्षा और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना कठिन होता जा रहा है।
पाठा क्षेत्र के युवा रोजगार के लिए क्यों भटक रहे हैं?
बरगढ़ और मानिकपुर क्षेत्र में स्थानीय उद्योग, स्थायी रोजगार और स्वरोजगार के अवसर सीमित हैं, इसलिए युवाओं को बाहर जाना पड़ रहा है।
पलायन रोकने के लिए क्या कदम जरूरी हैं?
स्थानीय स्तर पर लघु उद्योग, कृषि आधारित रोजगार, पर्यटन विकास और कौशल प्रशिक्षण केंद्र शुरू करना जरूरी है।
ग्रामीणों और युवाओं की मुख्य मांग क्या है?
युवाओं की मांग है कि उन्हें केवल राशन नहीं, बल्कि सम्मानजनक रोजगार, आत्मनिर्भरता और अधिकार आधारित विकास मिले।







