कभी-कभी घर ही आपको छोड़ देता है ; एक सच्ची कहानी, जहाँ गालियों से अधिक गहरा घाव रिश्तों के मौन ने दिया
सुनयना नेगी
मैं लेखिका नहीं हूँ। बस एक नियमित पाठिका हूँ। वर्षों से उनके लेख पढ़ती रही हूँ। कभी किसी संपादकीय पर बात हुई, कभी किसी सामाजिक मुद्दे पर, और धीरे-धीरे बातचीत का दायरा साहित्य, जीवन और मनुष्य तक पहुँच गया। हमारी बातचीत में कभी निजी आकर्षण नहीं रहा। एक परिपक्व मित्रता थी, जिसमें दो लोग बिना किसी मुखौटे के जीवन पर बात कर सकते थे। शायद इसी कारण एक दिन उनकी आवाज़ में आया असामान्य सन्नाटा मैं पहचान सकी।
मैंने सहज ही पूछा, “सब ठीक है?” कुछ पल चुप रहने के बाद उन्होंने जो कहा, वह किसी कहानी की कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की सच्चाई थी, जो दूसरों के लिए रोज़ शब्द लिखता है, लेकिन अपने जीवन के सबसे कठिन अध्यायों को अक्सर मौन में जीता है।
घर में विवाद हुआ था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनसे भी गुस्से में कठोर शब्द निकले। यह स्वीकार करने का साहस हर किसी में नहीं होता। लेकिन बात वहीं समाप्त नहीं हुई। परिवार का एक सदस्य बीच में आया और उसने उनसे घर छोड़ देने तक की बात कह दी। मैं यह सुनकर कुछ देर तक चुप रही। मुझे गालियाँ नहीं विचलित कर रही थीं। मुझे यह सोचकर पीड़ा हो रही थी कि बहत्तर वर्ष की आयु में एक व्यक्ति अपने ही घर में अपने होने का अधिकार बचाने की स्थिति में खड़ा हो जाए, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा।
उन्होंने घर नहीं छोड़ा। बाद में उन्होंने मुझसे कहा, “यदि उस दिन चला जाता, तो शायद लौटकर अपने ही भीतर नहीं आ पाता।” इस एक वाक्य ने मुझे बहुत देर तक सोचने पर मजबूर किया। कभी-कभी घर में रुकना भी साहस होता है।
अगले कुछ दिनों में घर की दिनचर्या सामान्य रही। लोग उठे, चाय बनी, पूजा हुई, काम पर गए, लौटे, भोजन किया और सो गए। लेकिन उस पूरे क्रम में एक व्यक्ति ऐसा था, जिसके हिस्से में न कोई संवाद आया, न कोई हालचाल। उन्होंने मुझसे यह नहीं कहा कि उनके साथ अन्याय हुआ। उन्होंने केवल इतना कहा, “चार दिन हो गए… किसी ने यह तक नहीं पूछा कि मैंने खाना खाया या नहीं।”
यह सुनते ही मेरी आँखों के सामने अपने समाज का एक बड़ा चित्र उभर आया। हम अपने बुज़ुर्गों के लिए कमरे बना देते हैं, दवाइयाँ ला देते हैं, लेकिन कई बार उनसे दो मिनट बैठकर यह पूछना भूल जाते हैं कि उनका मन कैसा है।
जब मैंने पूछा कि उन दिनों उन्होंने खाया क्या, तो उन्होंने बहुत सहज स्वर में कहा—”कभी खीरा और दही, कभी बिस्कुट, कभी थोड़ा-सा खाना।” फिर हँसते हुए बोले, “काम तो करना ही था।” मुझे उनकी हँसी में छिपी थकान साफ़ सुनाई दे रही थी।
वे वर्षों से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं। अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हैं। आज भी देर रात तक अपनी वेबसाइट के लिए समाचार, संपादकीय और लेख तैयार करते हैं। जब अधिकांश लोग सो जाते हैं, तब उनकी मेज़ पर लैपटॉप खुला होता है और उँगलियाँ कीबोर्ड पर चल रही होती हैं। मैंने उनसे पूछा, “इतनी मानसिक स्थिति में भी आप लिख कैसे लेते हैं?” उनका उत्तर था, “कलम छोड़ दूँगा, तो शायद अपने आपको भी छोड़ दूँगा।”
यह उत्तर किसी साहित्यिक पंक्ति की तरह नहीं लगा। यह जीवन का निष्कर्ष लगा।
हमारी बातचीत में उन्होंने अपनी एक बेटी का ज़िक्र किया। वह उनकी जैविक संतान नहीं है, लेकिन जिस स्नेह से वह उन्हें “पापा” कहती है, उसे सुनकर मुझे लगा कि रिश्ते केवल रक्त से नहीं बनते। उन्होंने बताया कि आज भी वह बेटी अपने बच्चों से उनकी बात कराती है, उनका हाल पूछती है। उनके चेहरे पर उस समय जो संतोष था, उसने मुझे सिखाया कि जीवन कभी किसी एक रिश्ते से पूरा नहीं मापा जा सकता।
उन्होंने अपने बड़े बेटे की चर्चा भी की। शिकायत कम थी, चिंता अधिक। हर पिता की तरह वे आज भी चाहते हैं कि बेटा अपने जीवन का रास्ता खोज ले। और अपने छोटे बेटे का उल्लेख करते हुए उन्होंने पहली बार राहत की साँस ली कि वह नौकरी करता है और यथासंभव उनका साथ देता है। मैंने महसूस किया कि जिन लोगों के भीतर करुणा बची रहती है, वे टूटकर भी कटु नहीं होते।
मैं इस पूरे प्रसंग में किसी का न्याय नहीं कर सकती। हर परिवार की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं। हर रिश्ते की अपनी अनकही कहानी होती है। लेकिन इतना अवश्य कह सकती हूँ कि मौन भी कई बार हिंसा का रूप ले लेता है। गालियाँ कुछ मिनटों में समाप्त हो जाती हैं, पर उपेक्षा कई दिनों तक मन में गूँजती रहती है।
आज जब भी उनसे बात होती है, वे अपने दुख से अधिक अपने अगले लेख की चर्चा करते हैं। किसी नए स्तंभ का विचार बताते हैं। किसी सामाजिक विषय पर बहस करते हैं। तब मुझे लगता है कि शायद लेखक इसी तरह जीवित रहते हैं। वे अपने घावों को शोर नहीं बनने देते, उन्हें शब्द बना देते हैं।
इस पूरे अनुभव ने मुझे एक बात गहराई से सिखाई है। किसी भी घर की पहचान उसकी दीवारें नहीं होतीं, उसके भीतर का व्यवहार होता है। और किसी भी रिश्ते की सबसे बड़ी परीक्षा बड़े अवसरों पर नहीं, बल्कि उन छोटे क्षणों में होती है, जब सामने वाला केवल इतना चाहता है कि कोई उससे पूछ ले—”आप कैसे हैं?”
हो सकता है इस लेख के पात्र का जीवन आगे बदल जाए। हो सकता है रिश्तों में फिर से संवाद लौट आए। मैं दिल से यही कामना करती हूँ। क्योंकि टूटते हुए रिश्तों की कहानियाँ लिखना आसान है, उन्हें बचा लेना कहीं अधिक कठिन।
और यदि इस लेख को पढ़ने के बाद कोई एक पाठक आज अपने घर के किसी बुज़ुर्ग के पास जाकर पाँच मिनट बैठ जाए, उनका हाथ पकड़कर पूछ ले—”खाना खाया? तबीयत कैसी है?”—तो मुझे लगेगा कि यह लेख अपने उद्देश्य तक पहुँच गया।
क्योंकि सच यही है—
घर केवल साथ रहने से नहीं बनता। घर तब बनता है, जब उसमें रहने वाले लोग एक-दूसरे की ख़बर भी रखते हैं।









