डीएम साहब! जिला मुख्यालय से सटे कालूपुर (पाही) भी आइए… मंदिर से स्कूल तक दिखेगी बदहाली की पूरी तस्वीर!

चित्रकूट के कालूपुर (पाही) गांव की बदहाल सड़क, मंदिर और विद्यालयों के साथ रिपोर्टर संजय सिंह राणा

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संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

चित्रकूट। जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित गांव कालूपुर (पाही) इन दिनों विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच खड़े एक बड़े सवाल की तरह दिखाई दे रहा है। गांव में मंदिर से लेकर शिक्षा के मंदिर तक अव्यवस्थाओं का ऐसा सिलसिला नजर आता है, जिसे देखकर सहज ही सवाल उठता है कि जब जिला मुख्यालय के आसपास के गांवों की यह स्थिति है तो दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की तस्वीर कैसी होगी? ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की शिकायतों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की कथित चुप्पी इस सवाल को और गंभीर बना रही है।

कालूपुर (पाही) में राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित खेड़ापति देवी मंदिर की जमीन पर कथित अवैध कब्जे की तैयारी का मामला भी सामने आया है। वहीं गांव के प्राचीन शिव मंदिर तक जाने वाले रास्ते को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इस रास्ते पर पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद द्वारा अवैध रूप से कब्जा किया गया है। इन शिकायतों को लेकर प्रशासन से पत्राचार किए जाने की बात कही गई है।

सबसे बड़ा सवाल हालांकि गांव के शिक्षा के मंदिरों तक पहुंचने वाले रास्ते को लेकर खड़ा है। प्राथमिक विद्यालय कालूपुर (पाही), प्राथमिक विद्यालय कुम्हारन पुरवा और पूर्व माध्यमिक विद्यालय कालूपुर (पाही) तक पहुंचने वाला रास्ता लंबे समय से बदहाल बताया जा रहा है। बरसात के दिनों में स्थिति और गंभीर हो जाती है। कीचड़ और गड्ढों से भरे रास्ते से होकर बच्चों और शिक्षकों को विद्यालय पहुंचना पड़ता है।

24 साल पहले बनी सड़क, लेकिन आज रास्ता पूछ रहा है अपना रखरखाव

ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2002-03 में जिला पंचायत द्वारा सड़क का निर्माण कराया गया था। निर्माण के बाद सड़क का नियमित रखरखाव और मरम्मत न होने के कारण लगभग 24 वर्षों में इसकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। सवाल यह है कि जिस सड़क का निर्माण ग्रामीणों और स्कूली बच्चों की सुविधा के लिए किया गया था, उसके रखरखाव की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?

सड़क की मौजूदा हालत देखकर लगता है कि विकास कार्य केवल निर्माण तक सीमित रह गया। निर्माण के बाद उसकी निगरानी, मरम्मत और उपयोगिता बनाए रखने की जिम्मेदारी पर ध्यान नहीं दिया गया। यदि वर्षों पहले बनी सड़क आज चलने लायक नहीं रह गई है तो यह केवल एक सड़क की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण बुनियादी ढांचे के प्रति लंबे समय तक बरती गई कथित उदासीनता का विषय है।

ग्रामीणों का कहना है कि रास्ते की स्थिति इतनी खराब है कि यदि शिक्षक जमींदारों के खेतों से निकलने वाली पगडंडियों का सहारा न लें तो विद्यालय तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। यह स्थिति अपने आप में शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा गंभीर प्रश्न है।

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पगडंडी के सहारे स्कूल पहुंचने को मजबूर शिक्षक और बच्चे

किसी भी गांव में विद्यालय तक पहुंचने के लिए सुरक्षित और सुगम रास्ता होना बुनियादी जरूरत है। लेकिन कालूपुर (पाही) में स्थिति इसके उलट दिखाई देती है। ग्रामीणों के मुताबिक विद्यालय जाने वाला रास्ता जगह-जगह खराब है। बारिश के दौरान कीचड़ जमा हो जाता है और बच्चों को उसी रास्ते से होकर स्कूल जाना पड़ता है।

नन्हे बच्चों के लिए यह परेशानी और भी ज्यादा गंभीर हो जाती है। छोटे बच्चे कीचड़ से होकर गुजरते हैं तो उनके कपड़े खराब होने से लेकर गिरने और चोटिल होने तक का खतरा बना रहता है। अभिभावकों के सामने भी चिंता रहती है कि जिस रास्ते से उनका बच्चा विद्यालय जा रहा है, वह सुरक्षित है या नहीं।

यहां सवाल केवल सुविधा का नहीं है। सवाल यह है कि क्या खराब रास्ता किसी बच्चे की शिक्षा के रास्ते में बाधा बन सकता है? यदि विद्यालय तक पहुंचने में ही परेशानी हो तो शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात कितनी सार्थक रह जाती है?

मंदिर की शिकायत पर प्रशासन पहुंचा, फिर विद्यालय के रास्ते पर चुप्पी क्यों?

कालूपुर (पाही) के मामलों में एक सवाल प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर भी उठ रहा है। शिकायत के अनुसार खेड़ापति देवी मंदिर से संबंधित शिकायत पर उप जिलाधिकारी तत्काल मौके पर पहुंचे थे। प्रशासन की सक्रियता का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि जब गांव में विद्यालयों तक जाने वाले रास्ते की समस्या लंबे समय से बनी हुई है तो उस पर भी उसी गंभीरता से कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही?

यदि मंदिर की जमीन से जुड़ी शिकायत प्रशासन के संज्ञान में आते ही अधिकारी मौके पर पहुंच सकते हैं, तो शिक्षा के मंदिर तक पहुंचने वाले रास्ते की बदहाली का निरीक्षण क्यों नहीं हो सकता?

ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालयों तक पहुंचने वाले रास्ते की समस्या को लेकर भी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से पत्राचार किया गया है। बावजूद इसके समस्या का स्थायी समाधान दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में ग्रामीणों के मन में यह भावना पैदा होना स्वाभाविक है कि उनकी समस्या प्राथमिकता की सूची में कहीं पीछे छूट गई है।

‘चलो गांव की ओर’ अभियान ने भी उठाई आवाज

गांव की समस्याओं को लेकर ‘चलो गांव की ओर जागरूकता अभियान’ के संस्थापक अध्यक्ष संजय सिंह राणा ने जिलाधिकारी को पत्र सौंपकर कालूपुर (पाही) गांव का निरीक्षण करने की मांग की थी। उद्देश्य यही बताया गया कि जिला मुख्यालय से सटे गांव की वास्तविक स्थिति को अधिकारी स्वयं मौके पर पहुंचकर देखें और समस्याओं का स्थायी समाधान कराया जाए।

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संजय सिंह राणा की ओर से जिला प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधियों तक गांव के विकास और मूलभूत समस्याओं को लेकर पत्राचार किए जाने की बात कही गई है। इसके बावजूद शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जिलाधिकारी स्तर से अभी तक गांव की बदहाली का मौके पर पहुंचकर जायजा नहीं लिया गया है।

यहीं से सवाल और बड़ा हो जाता है। जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता गांव की समस्या को प्रशासन के सामने रखता है, अधिकारियों को पत्र देता है और स्वयं गांव की स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करता है, तो क्या उस शिकायत की वास्तविकता जांचने के लिए मौके का निरीक्षण नहीं होना चाहिए?

जिला मुख्यालय से सटा गांव, फिर भी विकास की राह इतनी दूर क्यों?

कालूपुर (पाही) की समस्या का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह कोई अत्यंत दुर्गम क्षेत्र नहीं है। गांव जिला मुख्यालय से सटा हुआ बताया जा रहा है। ऐसे में यदि यहां मंदिर, रास्ते और विद्यालय जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं बदहाल हैं तो यह प्रशासनिक निगरानी पर सवाल खड़ा करता है।

अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में भौगोलिक दूरी को बड़ी चुनौती माना जाता है। अधिकारी दूरस्थ गांवों तक नहीं पहुंच पाते, संसाधनों की कमी रहती है और निगरानी में कठिनाई होती है। लेकिन कालूपुर (पाही) के मामले में शिकायतकर्ताओं का सवाल है कि जब गांव जिला मुख्यालय से इतना करीब है तो फिर उसकी समस्याओं की जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचने के बावजूद समाधान क्यों नहीं हो रहा?

क्या विकास की योजनाएं केवल कागजों पर पूरी हो जाती हैं? क्या सड़क बनने के बाद उसके रखरखाव की कोई व्यवस्था नहीं है? क्या विद्यालय तक जाने वाला रास्ता केवल इसलिए उपेक्षित रहेगा क्योंकि वह किसी बड़े मार्ग का हिस्सा नहीं है? और क्या ग्रामीणों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए बार-बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के दरवाजे खटखटाते रहना होगा?

मंदिर की जमीन से लेकर स्कूल के रास्ते तक कई सवाल

कालूपुर (पाही) की तस्वीर को यदि एक साथ देखा जाए तो यहां अलग-अलग समस्याएं नहीं बल्कि व्यवस्थागत सवाल दिखाई देते हैं। एक ओर मंदिर की जमीन पर कथित कब्जे की शिकायत है, दूसरी ओर प्राचीन शिव मंदिर तक जाने वाले रास्ते को लेकर आरोप हैं। तीसरी ओर विद्यालयों तक पहुंचने वाला रास्ता बदहाल है और चौथी ओर वर्षों पहले बनी सड़क के रखरखाव पर सवाल है।

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इन सभी मामलों में एक साझा बात सामने आती है—ग्रामीण चाहते हैं कि जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचें और वास्तविक स्थिति देखें।

कागजों पर शिकायत का जवाब देना और जमीन पर समस्या को देखना दोनों अलग बातें हैं। ग्रामीणों की अपेक्षा यही है कि अधिकारी गांव में पहुंचें, रास्ते को देखें, विद्यालयों तक जाकर स्थिति का निरीक्षण करें, मंदिर की जमीन से संबंधित शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराएं और जिस विभाग की जिम्मेदारी बनती है, उसे समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दें।

आखिर कब बदलेगी कालूपुर (पाही) की तस्वीर?

गांव के बच्चों को बेहतर शिक्षा चाहिए तो विद्यालय तक सुरक्षित रास्ता भी चाहिए। मंदिर तक श्रद्धालुओं को पहुंचना है तो रास्ता सुरक्षित और अतिक्रमण मुक्त होना चाहिए। ग्रामीणों को आवागमन करना है तो सड़क की मरम्मत जरूरी है। और यदि किसी सार्वजनिक अथवा धार्मिक भूमि पर कब्जे की शिकायत है तो उसकी निष्पक्ष जांच भी आवश्यक है।

कालूपुर (पाही) में उठ रहे सवालों का जवाब केवल बयान से नहीं, बल्कि मौके पर दिखाई देने वाली कार्रवाई से मिलना चाहिए। ग्रामीणों की समस्या का समाधान तब माना जाएगा जब सड़क की स्थिति सुधरेगी, विद्यालयों तक पहुंचने वाला रास्ता दुरुस्त होगा और मंदिरों से संबंधित शिकायतों का नियमानुसार निस्तारण होगा।

फिलहाल ग्रामीणों की निगाह जिला प्रशासन पर है। सवाल सीधा है—क्या जिलाधिकारी महोदय कभी जिला मुख्यालय से सटे गांव कालूपुर (पाही) पहुंचकर स्वयं गांव के हालात देखेंगे?

क्या वे उस रास्ते से विद्यालय तक पहुंचेंगे, जिस पर आज शिक्षक और बच्चे कथित तौर पर पगडंडियों और कीचड़ के बीच से गुजरने को मजबूर हैं? क्या लगभग 24 वर्ष पहले जिला पंचायत से बनी सड़क की वर्तमान स्थिति की जांच होगी? क्या मंदिर और सार्वजनिक रास्तों से संबंधित शिकायतों पर निष्पक्ष कार्रवाई होगी?

और सबसे बड़ा सवाल—जब जिला मुख्यालय से सटे गांव की यह हालत है तो विकास का वह मॉडल आखिर गांव की चौखट तक कब पहुंचेगा, जिसकी बातें सरकारी योजनाओं और कागजी रिपोर्टों में लगातार होती हैं?

कालूपुर (पाही) अब केवल एक गांव नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुका है। जरूरत है कि जिम्मेदार अधिकारी फाइलों से बाहर निकलकर गांव की जमीन पर उतरें। क्योंकि गांव की वास्तविक तस्वीर किसी रिपोर्ट की पंक्ति में नहीं, बल्कि उसी कीचड़ भरे रास्ते में दिखाई देगी, जिस पर होकर बच्चे रोज शिक्षा के मंदिर तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।

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Author: यायावर

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