चलो गाँव की ओर

चलो गाँव की ओर ; बेरोज़गारी के चौराहे पर खड़ा युवा भारत और गाँवों से उठती नई पुकार

हर हाथ को काम दो : जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिल रही

✍️ संजय सिंह राणा की पड़ताल

इस विषय पर ‘बेरोजगारी-गरीबी मुक्त भारत अभियान, युवा भारत’ ने “चलो गाँव की ओर” के स्तंभकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता संजय सिंह राणा के साथ विस्तृत विचार-विमर्श किया। अभियान से जुड़े युवाओं का मानना है कि देश में बेरोजगारी अब केवल आर्थिक चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक असमानता, पारिवारिक तनाव और युवाओं में बढ़ती निराशा का भी प्रमुख कारण बनती जा रही है।

चर्चा के दौरान यह विचार सामने आया कि भारत जैसे विशाल युवा देश में रोजगार को केवल सरकारी योजनाओं या चुनावी वादों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद, ठोस नीति और दीर्घकालिक संकल्प की आवश्यकता है।

अभियान से जुड़े युवाओं ने यह भी कहा कि जब तक हर युवक-युवती को सम्मानजनक रोजगार प्राप्त करने का वास्तविक अवसर सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक गरीबी उन्मूलन, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं किए जा सकेंगे।

📊 एक नजर में
भारत की लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है
ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बड़ी सामाजिक चुनौती बन रही है
पढ़े-लिखे युवाओं में रोजगार को लेकर निराशा बढ़ रही है
रोजगार अब आर्थिक ही नहीं, सामाजिक न्याय का भी प्रश्न बन गया है

भारत का युवा और रोजगार का सवाल

भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश कहलाता है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह वह शक्ति है जो किसी भी राष्ट्र को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से नई ऊँचाइयों तक पहुंचा सकती है।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यही युवा शक्ति आज बेरोज़गारी के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है। गाँवों से लेकर महानगरों तक लाखों नहीं, करोड़ों युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं।

डिग्रियां बढ़ रही हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं के आवेदन बढ़ रहे हैं, कोचिंग संस्थान फल-फूल रहे हैं, लेकिन नौकरी के अवसर उसी अनुपात में नहीं बढ़ रहे।

गाँवों की चौपालों में एक ही सवाल

आज भारत के गाँवों में यदि कोई सबसे बड़ा सामाजिक प्रश्न है तो वह बेरोज़गारी है। किसान परिवार अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए खेत बेच रहे हैं, मजदूर परिवार कर्ज लेकर शिक्षा दिला रहे हैं, लेकिन पढ़ाई पूरी होने के बाद भी रोजगार का कोई भरोसा नहीं है।

यही कारण है कि गांवों की चौपालों, कस्बों की चाय दुकानों और शहरों के छात्रावासों में एक ही सवाल सबसे ज्यादा सुनाई देता है—“आखिर नौकरी कब मिलेगी?”

डिग्री हाथ में, रोजगार नहीं

देश के हजारों गांवों में ऐसे युवा मिल जाएंगे जिनके पास बीए, एमए, बीएससी, एमएससी, बीएड, इंजीनियरिंग, नर्सिंग, एलएलबी और यहां तक कि पीएचडी जैसी डिग्रियां हैं, लेकिन उनके पास रोजगार नहीं है।

कई युवा दस-दस और बारह-बारह वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। उम्र बढ़ रही है, जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिल रही।

एक समय था जब पढ़ाई को रोजगार की गारंटी माना जाता था। परिवारों को विश्वास था कि बेटा या बेटी पढ़-लिख जाएगी तो उसका भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने इस विश्वास को कमजोर किया है।

युवाओं के जीवन के कीमती वर्ष प्रतीक्षा में

आज लाखों शिक्षित युवा अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष रोजगार की प्रतीक्षा में गुजार रहे हैं। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं है। यह व्यवस्था की एक ऐसी चुनौती है जिसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ रहा है।

गाँवों में क्यों गहराता जा रहा है संकट?

ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था पारंपरिक रूप से कृषि पर आधारित रही है। लेकिन खेती की बढ़ती लागत, छोटे होते खेत, मौसम की अनिश्चितता और बाजार की समस्याओं ने कृषि को कम लाभकारी बना दिया है।

परिणामस्वरूप नई पीढ़ी खेती को भविष्य का सुरक्षित विकल्प नहीं मानती। गांव का युवा पढ़ाई के बाद सरकारी नौकरी या किसी स्थायी रोजगार की ओर देखता है। लेकिन जब वर्षों तक नौकरी नहीं मिलती तो वह या तो शहरों की ओर पलायन करता है या फिर बेरोजगारी के चक्र में फंस जाता है।

ग्रामीण समाज में बढ़ती बेचैनी

आज उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखंड और देश के अनेक राज्यों के गांवों में यही स्थिति दिखाई देती है। रोजगार की कमी ने ग्रामीण समाज में एक गहरी बेचैनी पैदा कर दी है।

बेरोज़गारी का दर्द केवल आर्थिक नहीं

बेरोज़गारी को अक्सर केवल आर्थिक समस्या मान लिया जाता है, जबकि इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होता है। जब परिवार का पढ़ा-लिखा बेटा या बेटी वर्षों तक बेरोजगार रहता है तो पूरे परिवार पर मानसिक दबाव बढ़ता है। माता-पिता की उम्मीदें कमजोर पड़ती हैं। विवाह प्रभावित होते हैं। आत्मविश्वास टूटता है। समाज में हीनभावना पैदा होती है।

कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि लंबे समय तक बेरोजगारी युवाओं को अवसाद, तनाव और सामाजिक अलगाव की ओर धकेल सकती है। यही कारण है कि रोजगार का प्रश्न केवल अर्थव्यवस्था का नहीं बल्कि सामाजिक स्वास्थ्य का भी विषय है।

योजनाएं हैं, लेकिन सवाल भी हैं

बीते वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने रोजगार और स्वरोजगार को लेकर अनेक योजनाएं शुरू की हैं। स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मुद्रा योजना, डिजिटल प्रशिक्षण कार्यक्रम और विभिन्न रोजगार मेले इसी दिशा में किए गए प्रयास हैं।

इन योजनाओं से अनेक युवाओं को लाभ भी मिला है। कई लोगों ने स्वरोजगार के माध्यम से अपनी पहचान बनाई है। लेकिन जमीनी स्तर पर यह सवाल लगातार उठता है कि क्या ये योजनाएं उस विशाल युवा आबादी की जरूरतों को पूरा कर पा रही हैं जो स्थायी और सम्मानजनक रोजगार की तलाश में है?

ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में युवा मानते हैं कि प्रशिक्षण तो मिलता है, लेकिन उसके अनुरूप रोजगार नहीं मिलता। यही कारण है कि रोजगार का मुद्दा आज भी सबसे बड़ा जनसरोकार बना हुआ है।

युवा भारत की नई बहस : रोजगार संवैधानिक अधिकार बने?

इसी विषय पर बेरोजगारी-गरीबी मुक्त भारत अभियान, युवा भारत ने स्तंभकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता संजय सिंह राणा के साथ विस्तृत विचार-विमर्श किया। इस चर्चा में देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े युवाओं ने भागीदारी की और रोजगार के सवाल को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

चर्चा के दौरान यह विचार उभरकर सामने आया कि बेरोज़गारी अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक असमानता, पारिवारिक तनाव, मानसिक स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक भागीदारी से भी जुड़ा विषय बन चुकी है।

अभियान से जुड़े युवाओं का मानना है कि यदि शिक्षा नागरिक का अधिकार है तो सम्मानजनक रोजगार के अवसर भी सुनिश्चित किए जाने चाहिए। हालांकि इस विषय पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह बहस निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है कि क्या भारत को रोजगार के प्रश्न पर नई संवैधानिक और नीतिगत सोच विकसित करने की आवश्यकता है?

“हर हाथ को काम दो, हर युवा को सम्मानजनक रोजगार दो”

सरकारी नौकरी की चाह आखिर क्यों?

गांवों में सरकारी नौकरी आज भी सबसे बड़ा सपना है। इसके पीछे केवल वेतन नहीं बल्कि स्थिरता, सामाजिक सम्मान और भविष्य की सुरक्षा का भाव जुड़ा हुआ है।

जब किसी गरीब परिवार का एक सदस्य सरकारी नौकरी पाता है तो अक्सर पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति बदल जाती है। यही कारण है कि लाखों युवा सीमित पदों के लिए वर्षों तक संघर्ष करते रहते हैं।

समस्या यह है कि आवेदकों की संख्या लगातार बढ़ रही है जबकि उपलब्ध पद अपेक्षाकृत कम हैं। कई विभागों में वर्षों तक रिक्त पद भरे ही नहीं जाते। भर्ती प्रक्रियाओं में देरी युवाओं की निराशा को और बढ़ाती है।

क्या समाधान केवल नौकरी है?

रोजगार का समाधान केवल सरकारी नौकरी में नहीं छिपा है। लेकिन यह भी सच है कि स्थायी रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा किए बिना समस्या का समाधान संभव नहीं।

गांवों में कृषि आधारित उद्योग, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, ग्रामीण पर्यटन, हस्तशिल्प, लघु उद्योग, स्थानीय उद्यमिता और सहकारी मॉडल रोजगार सृजन के बड़े स्रोत बन सकते हैं।

यदि गांवों में ही रोजगार उपलब्ध होगा तो पलायन रुकेगा, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और सामाजिक संतुलन भी बना रहेगा।

नया भारत गांवों से बनेगा

महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। आज यह बात पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। जब तक गांव आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होंगे, तब तक भारत का समग्र विकास संभव नहीं है।

गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत सुविधाओं का विस्तार ही वास्तविक आत्मनिर्भरता की नींव बनेगा। आज आवश्यकता केवल योजनाओं की नहीं बल्कि ऐसी विकास नीति की है जो गांवों को उत्पादन, उद्यम और रोजगार का केंद्र बना सके।

युवा शक्ति को निराश नहीं होने देना होगा

भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर उसकी युवा आबादी है। लेकिन यदि यही युवा निराशा, बेरोज़गारी और असुरक्षा से घिर जाएंगे तो यह अवसर चुनौती में बदल सकता है।

देश को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जहां शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कम हो, भर्ती प्रक्रियाएं पारदर्शी हों, रिक्त पद समय पर भरे जाएं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नए अवसरों से जोड़ा जाए।

रोजगार केवल आर्थिक नीति का विषय नहीं है। यह सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और राष्ट्रीय विकास का आधार है।

यह केवल नौकरी नहीं, राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है

आज गांवों से एक नई आवाज उठ रही है। यह आवाज किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि उन करोड़ों परिवारों की है जिन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा पर भरोसा किया है।

यह आवाज उन युवाओं की है जो अवसर चाहते हैं, सम्मान चाहते हैं और अपने श्रम का उचित मूल्य चाहते हैं। “हर हाथ को काम दो, हर युवा को सम्मानजनक रोजगार दो” केवल एक नारा नहीं है। यह उस भारत की मांग है जो गरीबी, बेरोज़गारी और निराशा से मुक्त होकर आगे बढ़ना चाहता है।

यदि भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है तो उसे अपने युवाओं को केवल सपने नहीं, अवसर भी देने होंगे। क्योंकि नया भारत केवल इमारतों, सड़कों और आंकड़ों से नहीं बनेगा। नया भारत तब बनेगा जब गांव का युवा भी यह महसूस करेगा कि इस देश के विकास में उसका भी समान अधिकार और सम्मानजनक स्थान है।

📌 अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत में बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण क्या है?
रोजगार के अवसरों की धीमी वृद्धि, शिक्षा और कौशल के बीच अंतर, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोरी इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं।
ग्रामीण युवाओं की सबसे बड़ी समस्या क्या है?
ग्रामीण युवाओं के सामने पढ़ाई के बाद स्थायी रोजगार की कमी, स्थानीय उद्योगों का अभाव और पलायन की मजबूरी सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आती है।
सरकारी नौकरी की चाह क्यों बनी हुई है?
सरकारी नौकरी को स्थिरता, सामाजिक सम्मान और भविष्य की सुरक्षा से जोड़ा जाता है। इसी कारण ग्रामीण परिवारों में आज भी सरकारी नौकरी बड़ा सपना मानी जाती है।
क्या रोजगार को संवैधानिक अधिकार बनाया जा सकता है?
यह एक नीतिगत और संवैधानिक बहस का विषय है। युवाओं का मानना है कि शिक्षा की तरह सम्मानजनक रोजगार के अवसरों पर भी गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए।
स्किल इंडिया जैसी योजनाओं का कितना असर पड़ा?
इन योजनाओं से कई युवाओं को प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसर मिले हैं, लेकिन ग्रामीण स्तर पर प्रशिक्षण के अनुरूप रोजगार उपलब्ध कराना अभी भी बड़ी चुनौती है।
गांवों में रोजगार कैसे बढ़ सकता है?
कृषि आधारित उद्योग, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, ग्रामीण पर्यटन, लघु उद्योग और सहकारी मॉडल गांवों में रोजगार बढ़ाने के प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
बेरोजगारी का मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?
लंबे समय तक बेरोजगारी युवाओं में तनाव, अवसाद, आत्मविश्वास की कमी और सामाजिक अलगाव जैसी स्थितियां पैदा कर सकती है।
युवा भारत अभियान की प्रमुख मांग क्या है?
अभियान की प्रमुख मांग है कि हर हाथ को काम मिले, हर युवा को सम्मानजनक रोजगार मिले और रोजगार को राष्ट्रीय विकास नीति के केंद्र में रखा जाए।

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2 Comments

  1. बहुत सुंदर खबर है संजय सिंह राणा जी की

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