रिपोर्ट: रितेश कुमार गुप्ता
सीतापुर। बैराजों से पानी छोड़े जाने के बाद सीतापुर के गांजर इलाके में बाढ़ और कटान का संकट लगातार बना हुआ है। शारदा और घाघरा नदियों के जलस्तर में उतार-चढ़ाव के बीच नदी किनारे बसे गांवों के लोगों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। बेहटा क्षेत्र के बसंतापुर और खाना मरोड़ में शारदा नदी के तेज कटान से करीब 40 बीघा से अधिक जमीन नदी में समा चुकी है। खेतों के बाद अब आबादी और घरों पर भी खतरा बढ़ता जा रहा है। दूसरी ओर रामपुर मथुरा क्षेत्र में घाघरा नदी के बढ़ते दबाव ने ग्रामीणों को तटबंधों और सुरक्षित स्थानों की ओर जाने को मजबूर कर दिया है।
शुक्रवार रात बैराजों से 3,32,196 क्यूसेक पानी छोड़े जाने के बाद घाघरा नदी का जलस्तर 118.40 मीटर दर्ज किया गया। इसका खतरे का निशान 119.00 मीटर है। यानी नदी खतरे के निशान से 60 सेंटीमीटर नीचे है। शारदा नदी 135.15 मीटर पर बह रही है, जबकि इसका खतरे का निशान 135.49 मीटर है। इस तरह शारदा भी खतरे के निशान से महज 34 सेंटीमीटर नीचे है। जलस्तर फिलहाल लाल निशान से नीचे होने के बावजूद नदी का कटान ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है।
40 बीघा जमीन शारदा में समाई, किसानों की बढ़ी चिंता
बेहटा क्षेत्र के बसंतापुर और खाना मरोड़ गांव में शारदा नदी का कटान तेजी से हो रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक अब तक करीब 40 बीघा से अधिक कृषि भूमि नदी में समा चुकी है। खाना मरोड़ में गांव के उत्तर दिशा की ओर लगातार कटान होने से ग्रामीणों को आशंका है कि यदि नदी का रुख इसी तरह बना रहा तो आने वाले दिनों में आबादी भी इसकी चपेट में आ सकती है।
किसान हीरा सिंह, रामचंद्र, द्रोणा, विनीत तिवारी, राजू, रामनरेश, मनोज कुमार और केशव का कहना है कि नदी का कटान अचानक तेज हुआ है। ग्रामीणों का आरोप है कि कटान रोकने के लिए जिन परियोजनाओं पर काम होना चाहिए था, वहां अपेक्षित तरीके से काम नहीं हुआ। उनका कहना है कि समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाते तो खेतों को नदी में समाने से बचाया जा सकता था।
ग्रामीणों की परेशानी केवल जमीन के नुकसान तक सीमित नहीं है। खेती की जमीन ही इन परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार है। एक बार जमीन नदी में समा जाने के बाद किसान के सामने दोहरी समस्या खड़ी हो जाती है—पहली, तत्काल आर्थिक नुकसान और दूसरी, भविष्य की रोजी-रोटी का संकट।
सीतापुर में इस वर्ष बाढ़ के साथ कटान की समस्या लगातार अलग-अलग इलाकों में सामने आती रही है। अगस्त में भी बेहटा क्षेत्र के कई गांवों में शारदा-घाघरा के बढ़ते जलस्तर को लेकर प्रशासन को सतर्क रहना पड़ा था।
रामपुर मथुरा में घरों पर नदी का खतरा
रामपुर मथुरा क्षेत्र में घाघरा नदी का दबाव ग्रामीण आबादी पर दिखाई दे रहा है। नागेश्वर पुरवा में कल्लू के घर का आधे से अधिक हिस्सा नदी में समा चुका है। बिंद्रा का घर भी कटान की कगार पर बताया गया है। घरों के आसपास नदी का कटाव बढ़ने से ग्रामीणों में भय का माहौल है।
कटान के डर से कई परिवार तटबंध पर रहने को मजबूर हैं। मनोहर और अमेरिका ने बताया कि प्रशासन की ओर से भोजन पैकेट वितरित किए जा रहे हैं, जिससे तत्काल भोजन की समस्या कुछ कम हुई है। लेकिन परिवारों के सामने रहने के सुरक्षित स्थान की समस्या अभी भी गंभीर है।
कुन्ना पुरवा गांव में छब्बे, बेचेलाल, इद्रीश, धनीराम, गोबरे और गुन्नी देवी के घरों में बाढ़ का पानी भरा हुआ है। गुन्नी देवी फिलहाल आंगनबाड़ी भवन में रहने को मजबूर हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि उन्हें अस्थायी राहत के बजाय सुरक्षित स्थान पर स्थायी रूप से बसाने की व्यवस्था की जाए।
एसडीएम महमूदाबाद अभिषेक प्रियदर्शी के अनुसार प्रभावित लोगों के लिए प्रतिदिन 1,260 भोजन पैकेट वितरित कराए जा रहे हैं। साथ ही ग्रामीणों के पुनर्वास के लिए जमीन चिह्नित करने की प्रक्रिया चल रही है। यह व्यवस्था उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके घर नदी के कटान या बाढ़ के कारण रहने लायक नहीं रह गए हैं।
बाढ़ उतरने का इंतजार, लेकिन कटान का खतरा कायम
बाढ़ की स्थिति में एक सामान्य धारणा रहती है कि पानी घटने के साथ संकट समाप्त हो जाएगा, लेकिन नदी किनारे बसे गांवों में कहानी कुछ अलग होती है। कई बार जलस्तर घटने के दौरान भी मिट्टी कमजोर होने और नदी की धारा बदलने से कटान तेज हो जाता है। यही कारण है कि खतरे के निशान से नीचे बह रही नदी को देखकर ग्रामीण पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं।
सीतापुर में हाल के दिनों में नदियों के जलस्तर में उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है। 11 सितंबर की प्रशासनिक गतिविधियों में भी बाढ़ और जलभराव प्रभावित क्षेत्रों में निरीक्षण तथा राहत व्यवस्था तेज किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
12 सितंबर की स्थानीय रिपोर्टों में बेहटा ब्लॉक की कई न्याय पंचायतों और तटीय गांवों में बाढ़ का पानी बने रहने की बात सामने आई। इससे स्पष्ट है कि जलस्तर में कमी आने के बावजूद जमीन पर हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं।
स्वास्थ्य की चिंता, इलाज के लिए झोलाछाप का सहारा
बाढ़ प्रभावित गांवों में सबसे बड़ी चिंता अब स्वास्थ्य को लेकर भी दिखाई दे रही है। पानी जमा रहने, गंदगी और जलभराव के कारण संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। बेहटा क्षेत्र के रतौली गांव में करुणाशंकर मिश्र, शिवम, दीपक, ज्ञानेंद्र और सोनी समेत कई लोगों के बुखार से पीड़ित होने की बात ग्रामीणों ने बताई है।
बसंतापुर में भी राजू, शिवानी, मोनू, जगदीश, मंजू और मुकेश के बुखार से पीड़ित होने की जानकारी दी गई है। ग्रामीणों की शिकायत है कि प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य टीम नियमित रूप से नहीं पहुंच रही है। ऐसे में मजबूरी में लोग स्थानीय झोलाछाप चिकित्सकों से इलाज कराने को विवश हैं।
बाढ़ के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौती और बढ़ जाती है। दूषित पानी, मच्छरों की बढ़ती संख्या, साफ पेयजल की कमी और घरों के आसपास जमा पानी से बीमारी फैलने की आशंका रहती है। ऐसे में केवल दवा वितरण पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य शिविर, जांच, क्लोरीनेशन, स्वच्छ पेयजल और नियमित निगरानी की जरूरत है।
सीएचसी अधीक्षक बेहटा डॉ. मनोज ने बताया कि मतुवा में स्वास्थ्य शिविर लगाया गया है। प्रभावित अन्य गांवों में दवा वितरण कराया जाएगा तथा बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सूचना प्रसारित कराई जा रही है।
स्कूलों में पानी, बच्चों की पढ़ाई पर लगा ब्रेक
बाढ़ का असर केवल घर और खेतों तक नहीं है। इसका सीधा प्रभाव बच्चों की शिक्षा पर भी पड़ा है। कई विद्यालय परिसरों में पानी भरने के कारण शिक्षण कार्य बाधित हो गया है।
कंपोजिट विद्यालय तेजवापुर, भदफर और बसंतापुर के अलावा प्राथमिक विद्यालय चंदवासोत, मंजरी पासिन और मंजरी कारिंदा के परिसरों में जलभराव की स्थिति बताई गई है। विद्यालयों में पानी भरे होने के कारण बच्चों का स्कूल पहुंचना मुश्किल हो गया है।
ग्रामीण परिवार पहले ही बाढ़, बीमारी और रोजगार के संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई रुकना भविष्य के लिए एक अलग चिंता पैदा कर रहा है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में लंबे समय तक विद्यालय बंद रहने से बच्चों की पढ़ाई का नुकसान बढ़ सकता है।
बीईओ बेहटा सुरेंद्र प्रजापति ने बताया कि बाढ़ के कारण कई विद्यालयों में शिक्षण कार्य बंद करना पड़ा है। विद्यालयों का संचालन दूसरी जगह करने की योजना बनाई जा रही है।
राहत से आगे अब स्थायी समाधान की जरूरत
बाढ़ प्रभावित ग्रामीणों के लिए भोजन पैकेट और दवा तत्काल राहत जरूर हैं, लेकिन बार-बार आने वाली बाढ़ और कटान का स्थायी समाधान केवल राहत सामग्री बांटने से नहीं होगा। ग्रामीण वर्षों से नदी कटान की समस्या झेल रहे हैं। खेत कटते हैं, घर खतरे में आते हैं और फिर परिवारों को अस्थायी स्थानों पर शरण लेनी पड़ती है।
सीतापुर के तटीय इलाकों में इस बार भी यही तस्वीर दिखाई दे रही है। अगस्त से ही शारदा और घाघरा के जलस्तर को लेकर प्रशासनिक सतर्कता बढ़ती रही है। अलग-अलग चरणों में दर्ज बाढ़ के हालात बताते हैं कि गांजर क्षेत्र में नदी का दबाव मौसमी संकट के साथ-साथ दीर्घकालिक समस्या भी है।
प्रशासन के सामने अब तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, तत्काल कटान रोकना और संवेदनशील आबादी को सुरक्षित करना। दूसरी, बाढ़ प्रभावित लोगों तक स्वास्थ्य, भोजन और स्वच्छ पेयजल पहुंचाना। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती उन परिवारों के पुनर्वास की है जिनकी जमीन और घर नदी में समा चुके हैं।
ग्रामीणों की मांग—कटान रोकें, सुरक्षित बसाएं
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें हर साल बाढ़ के समय राहत का इंतजार करना पड़ता है। इसके बाद पानी घटता है और समस्या फिर अगली बरसात तक दब जाती है। बसंतापुर और खाना मरोड़ के किसानों की मांग है कि कटान रोकने के लिए स्थायी तकनीकी उपाय किए जाएं और नदी के संवेदनशील हिस्सों का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए।
रामपुर मथुरा क्षेत्र के प्रभावित परिवार भी सुरक्षित स्थान पर स्थायी पुनर्वास की मांग कर रहे हैं। जिन घरों का हिस्सा नदी में समा चुका है या जो कटान की जद में हैं, उनके परिवारों के लिए केवल तिरपाल अथवा भोजन पैकेट पर्याप्त नहीं होंगे।
फिलहाल घाघरा और शारदा दोनों नदियां खतरे के निशान से नीचे हैं, लेकिन शारदा का जलस्तर खतरे के निशान से केवल 34 सेंटीमीटर नीचे होना और दूसरी ओर तेजी से हो रहा कटान यह संकेत देता है कि खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। प्रशासन के लिए आने वाले दिनों में जलस्तर के साथ-साथ नदी की धारा और कटान की निगरानी भी उतनी ही जरूरी होगी।
सीतापुर के बाढ़ प्रभावित गांवों में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि पानी कब उतरेगा, यह तो नदी तय करेगी; लेकिन लोगों को सुरक्षित रखना, उनकी जमीन और घरों को बचाना तथा बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य व्यवस्था को पटरी पर रखना प्रशासनिक तैयारी और इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा।

























