हिन्दी दिवस पर देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय में भव्य आयोजन

देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय देहरादून में हिन्दी दिवस समारोह के दौरान शिक्षक और छात्र-छात्राएं, रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर के साथ

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

देहरादून। हिन्दी दिवस के अवसर पर देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय, देहरादून में हिन्दी भाषा, साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को समर्पित विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के विवेकानंद पुस्तकालय विभाग के सौजन्य से आयोजित इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने विभिन्न प्रस्तुतियों के माध्यम से हिन्दी के महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम का सबसे आकर्षक पक्ष विद्यार्थियों की ओर से प्रस्तुत किया गया नुक्कड़ नाटक रहा, जिसके माध्यम से हिन्दी की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक भूमिका और जनभाषा के रूप में उसकी व्यापकता को प्रभावी ढंग से सामने रखा गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ गणेश वंदना और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके बाद हिन्दी भाषा के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक महत्व पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने हिन्दी को केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय समाज की विविध संस्कृतियों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रस्तुत किया।

14 सितंबर को क्यों मनाया जाता है हिन्दी दिवस

कार्यक्रम में वक्ताओं ने हिन्दी दिवस के ऐतिहासिक संदर्भ पर भी प्रकाश डाला। बताया गया कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है।

वक्ताओं ने कहा कि हिन्दी का महत्व केवल सरकारी कामकाज तक सीमित नहीं है। हिन्दी देश के बड़े हिस्से में लोगों के बीच संवाद का माध्यम है और साहित्य, पत्रकारिता, सिनेमा, शिक्षा तथा सामाजिक जीवन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। हिन्दी दिवस ऐसे अवसर के रूप में सामने आता है, जब भाषा के वर्तमान स्वरूप, भविष्य की चुनौतियों और बदलते समय में उसकी उपयोगिता पर विचार किया जा सकता है।

शिक्षा में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों की अपनी भूमिका

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अजय कुमार ने अपने संबोधन में हिन्दी की संवैधानिक स्थिति और शिक्षा के क्षेत्र में उसकी भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी भारत की राजभाषा है और देश की भाषाई विविधता को समझना भी उतना ही आवश्यक है।

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कुलपति ने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है, लेकिन हिन्दी की उपयोगिता को कम करके नहीं देखा जा सकता। विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए वैश्विक स्तर की भाषाओं का ज्ञान भी हासिल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाषा किसी प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं, बल्कि ज्ञान और संवाद का माध्यम है।

उन्होंने विद्यार्थियों से हिन्दी को लेकर आत्मविश्वास विकसित करने और अपने अध्ययन के साथ हिन्दी साहित्य तथा भारतीय भाषाओं के समृद्ध ज्ञान से जुड़ने का आह्वान किया।

साहित्यकारों के योगदान को किया याद

विश्वविद्यालय की प्रति कुलपति प्रोफेसर ऋतिका मेहरा ने हिन्दी साहित्य के विकास में साहित्यकारों की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि हिन्दी को व्यापक स्वरूप देने में कवियों, लेखकों, कहानीकारों, उपन्यासकारों और पत्रकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

उन्होंने विद्यार्थियों को हिन्दी साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि साहित्य केवल भाषा का ज्ञान नहीं देता, बल्कि समाज को समझने की दृष्टि भी विकसित करता है। साहित्य के माध्यम से विद्यार्थी देश के सामाजिक जीवन, संघर्ष, संवेदना, संस्कृति और मानवीय मूल्यों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

प्रोफेसर ऋतिका मेहरा ने कहा कि डिजिटल दौर में पढ़ने की आदतों में बदलाव आया है, लेकिन पुस्तकों और साहित्य की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है। विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए हिन्दी साहित्य की पुस्तकों और डिजिटल सामग्री से भी जुड़ना चाहिए।

हिन्दी राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं

विधि विभाग के डीन प्रोफेसर ने हिन्दी की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि हिन्दी भारत की राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं। उन्होंने कहा कि देश की भाषाई विविधता भारत की विशेष पहचान है और विभिन्न राज्यों में बोली जाने वाली भाषाओं का अपना समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक महत्व है।

उन्होंने कहा कि भारत में अनेक भाषाएं और बोलियां लोगों के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा हैं। किसी भाषा को दूसरी भाषा से छोटा या बड़ा मानना उचित नहीं है। सभी भारतीय भाषाएं अपनी-अपनी परंपरा, साहित्य और संस्कृति के कारण महत्वपूर्ण हैं।

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उन्होंने विद्यार्थियों से अपील की कि हिन्दी के प्रति सम्मान रखने के साथ-साथ देश की अन्य भाषाओं के प्रति भी समान सम्मान की भावना विकसित करें। भारत की भाषाई विविधता को उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए।

नुक्कड़ नाटक ने खींचा विद्यार्थियों और अतिथियों का ध्यान

हिन्दी दिवस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं की ओर से प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से हिन्दी की सांस्कृतिक पहचान और समाज में उसकी भूमिका को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा।

नुक्कड़ नाटक के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की स्मृतियों, परंपराओं, भावनाओं और सांस्कृतिक पहचान को अपने भीतर समेटे रहती है। विद्यार्थियों की प्रस्तुति में हिन्दी के प्रति आत्मीयता के साथ-साथ बदलते समय में भाषा के सामने खड़ी चुनौतियों को भी रेखांकित किया गया।

विद्यार्थियों की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में मौजूद शिक्षकों और अन्य विद्यार्थियों का ध्यान आकर्षित किया। मंचीय भाषणों के साथ नुक्कड़ नाटक जैसे रचनात्मक माध्यम के जरिए हिन्दी दिवस को विद्यार्थियों से जोड़ने का प्रयास कार्यक्रम की खास विशेषता रहा।

पुस्तकालय विभाग ने किया कार्यक्रम का संयोजन

हिन्दी दिवस समारोह के आयोजन में विश्वविद्यालय के पुस्तकालय विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विश्वविद्यालय पुस्तकालय की अध्यक्ष रेखा ठाकुर ने कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों का स्वागत किया।

लाइब्रेरी कमेटी की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति हांडा कक्कड़ ने कार्यक्रम के संयोजन की जिम्मेदारी संभाली। उनके मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम में हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।

आयोजकों ने कहा कि पुस्तकालय केवल पुस्तकों को रखने का स्थान नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों के ज्ञान, विचार और शोध को दिशा देने वाला महत्वपूर्ण केंद्र है। हिन्दी दिवस जैसे आयोजन विद्यार्थियों को हिन्दी साहित्य और भारतीय भाषाओं से जोड़ने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

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14 से 28 सितंबर तक चलेगा हिन्दी पखवाड़ा

कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में हिन्दी पखवाड़े का आयोजन 14 सितंबर से 28 सितंबर तक किया जाता है। इस अवधि में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार और विद्यार्थियों में हिन्दी के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

विश्वविद्यालय में भी हिन्दी से जुड़े आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों को भाषा और साहित्य के करीब लाने का प्रयास किया जा रहा है। वक्ताओं ने कहा कि हिन्दी दिवस केवल एक दिन का आयोजन बनकर न रह जाए, बल्कि पूरे वर्ष हिन्दी के अध्ययन, लेखन और प्रयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

भाषा के साथ संस्कृति को बचाने का भी संदेश

समारोह में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि हिन्दी का विकास केवल सरकारी कार्यालयों या औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। भाषा तभी मजबूत होती है, जब उसका प्रयोग शिक्षा, शोध, साहित्य, पत्रकारिता, तकनीक और सामान्य जनजीवन में निरंतर बढ़ता है।

विद्यार्थियों से कहा गया कि वे हिन्दी में पढ़ने और लिखने को लेकर संकोच न करें। साथ ही दूसरी भाषाओं का ज्ञान हासिल करना भी जारी रखें। बहुभाषिक भारत में एक-दूसरे की भाषाओं का सम्मान ही सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को मजबूत कर सकता है।

कार्यक्रम के अंत में डिप्टी लाइब्रेरियन मीनाक्षी राजपूत ने सभी अतिथियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों और आयोजन से जुड़े सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय की पुस्तकालय अध्यक्ष रेखा ठाकुर, लाइब्रेरी कमेटी की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति हांडा कक्कड़, सदस्य अंजली अधिकारी, तृप्ति पाण्डेय, डॉ. दीपा, हिमांशु जखमोला सहित बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

हिन्दी दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि हिन्दी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति और विविधता से जुड़ी एक महत्वपूर्ण भाषा है। विद्यार्थियों की रचनात्मक प्रस्तुतियों और शिक्षकों के विचारों ने हिन्दी के प्रति सम्मान, भाषाई समानता और भारतीय भाषाओं के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया।

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Author: यायावर

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