हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष रिपोर्ट
DEHRADOON हिंदी दिवस केवल हिंदी के सम्मान और उसके प्रचार-प्रसार का अवसर नहीं है, बल्कि यह भारत की भाषाई विविधता, संवैधानिक व्यवस्था और उस लंबे ऐतिहासिक विमर्श को समझने का भी अवसर है, जिसके बीच हिंदी को देश की राजभाषा का स्थान मिला। इसी संदर्भ में देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय, देहरादून के विधि विभाग के डीन प्रोफेसर डॉ. अनिल दीक्षित द्वारा हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर दिए गए शुभकामना संदेश में वरिष्ठ कॉलमकार, पत्रकार और संपादक अनिल अनूप के भाषा संबंधी विचारों का उल्लेख चर्चा का विषय बना है।
अनिल अनूप लंबे समय से भाषा को केवल भावनात्मक अथवा राजनीतिक मुद्दे के रूप में देखने के बजाय उसके संवैधानिक और सामाजिक पक्ष को समझने की जरूरत पर जोर देते रहे हैं। उनका मूल चिंतन यह है कि भारत की कोई संवैधानिक “राष्ट्रभाषा” नहीं है। हिंदी भारत संघ की राजभाषा है और देवनागरी उसकी लिपि है। यह अंतर सामान्य बातचीत में भले ही छोटा दिखाई दे, लेकिन संवैधानिक दृष्टि से इसका महत्व बहुत बड़ा है।
राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अंतर समझना जरूरी
भारत में अक्सर यह कहा जाता है कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा है। लेकिन भारतीय संविधान ने किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी है। साथ ही संविधान ने अंग्रेजी के प्रयोग के लिए भी व्यवस्था की और बाद में कानून के माध्यम से केंद्र के सरकारी कामकाज में हिंदी के साथ अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहा।
यहीं से राष्ट्रभाषा और राजभाषा के बीच का अंतर सामने आता है। राष्ट्रभाषा का संबंध व्यापक राष्ट्रीय पहचान से जोड़ा जाता है, जबकि राजभाषा का संबंध सरकारी कामकाज और प्रशासन से है। भारत के संविधान ने हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के बजाय संघ की राजभाषा का दर्जा दिया।
अनिल अनूप के विचारों का केंद्रीय बिंदु भी यही है कि हिंदी के सम्मान के लिए उसे राष्ट्रभाषा बताने की जरूरत नहीं है। हिंदी अपनी व्यापक जनस्वीकृति, साहित्यिक परंपरा, पत्रकारिता, सिनेमा, शिक्षा और जनसंचार के माध्यम से देश के सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
22 भाषाओं का संवैधानिक संदर्भ
भारत की भाषाई संरचना अत्यंत विविध है। संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएँ शामिल हैं। इनमें हिंदी के अलावा असमिया, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू, सिंधी, मैथिली, बोडो, संथाली, डोगरी और मणिपुरी जैसी भाषाएँ शामिल हैं।
हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि आठवीं अनुसूची में शामिल होना और “संघ की राजभाषा” होना एक ही संवैधानिक स्थिति नहीं है। हिंदी को संघ की राजभाषा का विशेष संवैधानिक प्रावधान प्राप्त है, जबकि अन्य भाषाओं को आठवीं अनुसूची में स्थान मिला हुआ है। अंग्रेजी आठवीं अनुसूची की भाषा नहीं है, लेकिन केंद्र के आधिकारिक कामकाज में हिंदी के साथ अंग्रेजी का प्रयोग कानून के तहत जारी है।
इसलिए भाषा संबंधी बहस में संवैधानिक शब्दों का सही इस्तेमाल आवश्यक है। यही वह बिंदु है जहां अनिल अनूप का चिंतन भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर संवैधानिक समझ की ओर जाता दिखाई देता है।
भारत की ताकत उसकी भाषाई विविधता में है
भारत में हिंदी व्यापक रूप से बोली और समझी जाती है। हिंदी का प्रभाव उत्तर भारत से निकलकर देश के अनेक हिस्सों तक पहुंचा है। बाजार, सिनेमा, टेलीविजन, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ने हिंदी के प्रसार को और बढ़ाया है।
लेकिन भारत को केवल हिंदी के चश्मे से देखना उसकी भाषाई वास्तविकता को छोटा करना होगा। दक्षिण भारत के केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक से लेकर पश्चिम के महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा तक अलग-अलग भाषाओं की मजबूत सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं। पंजाब, जम्मू-कश्मीर, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी अपनी-अपनी भाषाओं और बोलियों की गहरी जड़ें हैं।
इसलिए हिंदी का सम्मान दूसरी भारतीय भाषाओं के सम्मान के साथ ही सार्थक हो सकता है। हिंदी को बढ़ाने का अर्थ तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, मराठी, पंजाबी, असमिया या किसी अन्य भारतीय भाषा को पीछे करना नहीं हो सकता।
संविधान सभा में भी भाषा का सवाल आसान नहीं था
आज हिंदी की संवैधानिक स्थिति को समझने के लिए संविधान सभा की बहसों को याद करना जरूरी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब देश का संविधान तैयार किया जा रहा था, तब भाषा का प्रश्न सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल था।
यह केवल यह तय करने का प्रश्न नहीं था कि सरकार किस भाषा में काम करेगी। इसके पीछे राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय अस्मिता, प्रशासनिक सुविधा और भविष्य के भारत की सांस्कृतिक दिशा जैसे कई सवाल जुड़े हुए थे।
महात्मा गांधी हिंदी या हिंदुस्तानी को जनसंपर्क की भाषा के रूप में देखते थे और उन्होंने हिंदी के व्यापक प्रसार की वकालत की थी। जवाहरलाल नेहरू भी हिंदी के व्यापक उपयोग के समर्थक थे, लेकिन स्वतंत्र भारत के सामने चुनौती यह थी कि हिंदी को बढ़ावा देते हुए गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों की आशंकाओं को कैसे दूर किया जाए।
संविधान सभा में दक्षिण भारत के प्रतिनिधियों की ओर से हिंदी को थोपे जाने की आशंका व्यक्त की गई। भाषा का सवाल इतना संवेदनशील था कि इस पर तीखी बहस हुई। अंततः एक ऐसा संवैधानिक रास्ता निकाला गया जिसमें हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार किया गया, लेकिन अंग्रेजी के प्रयोग को तत्काल समाप्त नहीं किया गया।
1965 और हिंदी विरोधी आंदोलन का प्रभाव
संविधान के अनुसार हिंदी को संघ की राजभाषा बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के साथ अंग्रेजी के प्रयोग के लिए संक्रमणकाल की व्यवस्था की गई थी। लेकिन जैसे-जैसे 1965 का समय नजदीक आया, गैर-हिंदी भाषी राज्यों में चिंता बढ़ती गई।
विशेष रूप से तत्कालीन मद्रास राज्य, वर्तमान तमिलनाडु, में हिंदी के संभावित वर्चस्व के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ। आंदोलन ने गंभीर राजनीतिक रूप लिया और कई स्थानों पर हिंसक घटनाएं भी हुईं। इस दौर ने केंद्र सरकार को यह संदेश दिया कि भारत जैसे बहुभाषी देश में किसी एक भाषा को प्रशासनिक रूप से थोपना राष्ट्रीय एकता के लिए उलटा असर पैदा कर सकता है।
इसके बाद केंद्र स्तर पर हिंदी के साथ अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखने की व्यवस्था बनी। इस घटनाक्रम ने भारत की भाषा नीति को स्थायी रूप से प्रभावित किया। आज भी केंद्र सरकार के अनेक आधिकारिक कार्यों में हिंदी और अंग्रेजी दोनों का इस्तेमाल होता है।
हिंदी की शक्ति संख्या से अधिक उसके सामाजिक विस्तार में है
हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति केवल यह नहीं कि इसे बड़ी संख्या में लोग बोलते हैं। इसकी वास्तविक ताकत इसके विशाल साहित्य, पत्रकारिता, लोकभाषाओं, फिल्मों, गीत-संगीत, रंगमंच और आधुनिक डिजिटल संसार में दिखाई देती है।
हिंदी ने अलग-अलग क्षेत्रों के शब्दों को आत्मसात किया है। संस्कृत, फारसी, अरबी, अंग्रेजी और भारत की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं से शब्द लेकर हिंदी का आधुनिक स्वरूप लगातार बदलता रहा है। यही लचीलापन हिंदी को जीवंत बनाता है।
अनिल अनूप के भाषा संबंधी विचारों को इसी व्यापक संदर्भ में देखना जरूरी है। हिंदी के प्रति सम्मान का अर्थ संवैधानिक वास्तविकता से मुंह मोड़ना नहीं, बल्कि हिंदी की वास्तविक शक्ति को स्वीकार करना है।
प्रो. डॉ. अनिल दीक्षित ने अनिल अनूप के विचारों को क्यों जोड़ा?
हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के विधि विभाग के डीन प्रोफेसर डॉ. अनिल दीक्षित की ओर से दिए गए शुभकामना संदेश में वरिष्ठ कॉलमकार, पत्रकार और संपादक अनिल अनूप के विचारों का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि हिंदी पर विमर्श केवल साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
डॉ. दीक्षित ने अनिल अनूप के चिंतन को भाषा के संवैधानिक पक्ष से जोड़ते हुए इस बात को रेखांकित किया कि हिंदी के सम्मान और संवैधानिक सच्चाई के बीच कोई विरोध नहीं है। अनिल अनूप का यह दृष्टिकोण कि हिंदी भारत की राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं, भाषा को लेकर होने वाली बहस को तथ्य और संविधान की जमीन पर खड़ा करता है।
उनके विचारों का महत्व इसलिए भी है कि हिंदी दिवस जैसे अवसर पर भावनात्मक उत्साह के साथ संवैधानिक जानकारी भी समाज तक पहुंचे। हिंदी का सम्मान तभी व्यापक होगा, जब उसके साथ भारत की सभी भाषाओं के सम्मान की भावना भी जुड़ी हो।
हिंदी दिवस का वास्तविक संदेश क्या होना चाहिए?
हिंदी दिवस को केवल सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग और समारोहों तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। यह अवसर इस बात पर विचार करने का भी है कि हिंदी को आधुनिक ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, कानून, पत्रकारिता और डिजिटल संचार की प्रभावी भाषा कैसे बनाया जाए।
आज हिंदी के सामने चुनौती दूसरी भारतीय भाषाओं से प्रतिस्पर्धा की नहीं, बल्कि ज्ञान और तकनीक की दुनिया में अपनी क्षमता को और मजबूत करने की है। यदि हिंदी उच्च शिक्षा, शोध, न्याय, विज्ञान, तकनीकी शिक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मजबूत होती है तो उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा।
दूसरी ओर, भारत की भाषाई विविधता को स्वीकार करना भी उतना ही जरूरी है। जिस देश में अनेक भाषाएं सदियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं, वहां किसी एक भाषा को राष्ट्रीय पहचान का पर्याय बना देना संवैधानिक भावना के अनुरूप नहीं होगा।
भाषा पर बहस भावनाओं से नहीं, संविधान से हो
हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने का भावनात्मक आग्रह अपनी जगह हो सकता है, लेकिन संवैधानिक तथ्य यह है कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा घोषित नहीं है। हिंदी संघ की राजभाषा है और देवनागरी उसकी लिपि है। अंग्रेजी भी केंद्र के आधिकारिक कामकाज में हिंदी के साथ प्रयोग की जाती है। वहीं संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को स्थान प्राप्त है।
यही तथ्य हिंदी दिवस के अवसर पर देश के सामने रखने की जरूरत है।
प्रोफेसर डॉ. अनिल दीक्षित द्वारा अनिल अनूप के विचारों का उल्लेख इसी व्यापक विमर्श को आगे बढ़ाने वाला संकेत माना जा सकता है। यह विमर्श हिंदी के गौरव को कम नहीं करता, बल्कि उसे अधिक मजबूत आधार देता है। क्योंकि किसी भाषा का सम्मान गलत संवैधानिक दावे पर नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक शक्ति पर होना चाहिए।
हिंदी भारत की महत्वपूर्ण राजभाषा है, करोड़ों लोगों की अभिव्यक्ति का माध्यम है और भारतीय समाज के विशाल हिस्से को जोड़ने वाली भाषा है। लेकिन भारत की पहचान केवल हिंदी से नहीं, बल्कि हिंदी समेत उसकी समूची भाषाई विविधता से बनती है।
हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर शायद यही सबसे जरूरी संदेश है—हिंदी का सम्मान हो, भारतीय भाषाओं का सम्मान हो और संविधान की भाषा को सही अर्थों में समझा जाए।

























