बलराम पण्डित की रिपोर्ट
समस्तीपुर। बिहार में शराबबंदी लागू है और कानून की नजर में शराब की एक बोतल भी सवाल खड़ा कर सकती है। लेकिन जब शराब की खेप फर्स्ट एसी कोच में सफर करने लगे तो मामला सिर्फ तस्करी का नहीं, बल्कि व्यवस्था को चिढ़ाने वाली उस मानसिकता का भी दिखाई देता है जिसमें अपराधी सुविधा, गोपनीयता और रुतबे का सहारा लेकर कानून की नजर से बच निकलने का भरोसा पाल लेते हैं।
समस्तीपुर में सामने आया शराब तस्करी का मामला कुछ ऐसा ही है। दिल्ली से जयनगर जा रही स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस के फर्स्ट एसी कोच में यात्रा कर रही एक युवती के दो ट्रॉली बैग से करीब 75 लीटर विदेशी शराब बरामद होने के बाद रेलवे पुलिस ने युवती समेत एक युवक को गिरफ्तार किया है।
कहानी में ट्विस्ट यह है कि पुलिस को पहले से सूचना थी कि ट्रेन के फर्स्ट एसी कोच में शराब की खेप लाई जा रही है। यानी तस्करी का सफर भले ही ‘फर्स्ट क्लास’ था, लेकिन पुलिस की सूचना व्यवस्था उससे एक कदम आगे निकली।
फर्स्ट एसी में शराब का सफर, कानून को ‘जनरल’ समझने की कोशिश?
शराब की तस्करी करने वालों की कल्पना शायद यही होती है कि महंगे कोच, अच्छे कपड़े, ट्रॉली बैग और सामान्य यात्री जैसा व्यवहार पुलिस की नजरों को धोखा दे सकता है। लेकिन समस्तीपुर में यह फार्मूला काम नहीं आया।
पुलिस के मुताबिक, 12561 स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस में एक युवती शराब की खेप लेकर सफर कर रही थी। ट्रेन का गंतव्य जयनगर था, जबकि युवती को दरभंगा उतरना था। लेकिन दरभंगा पहुंचने से पहले ही समस्तीपुर में पुलिस ने उसके सफर पर ब्रेक लगा दिया।
कहने को सफर फर्स्ट एसी का था, लेकिन मंजिल जेल की निकली।
युवती के पास मौजूद दो सूटकेस की जांच की गई तो उनमें विदेशी शराब की बोतलें बरामद हुईं। पुलिस ने शराब जब्त करने के साथ युवती और उसके साथ मौजूद युवक को गिरफ्तार कर लिया।
गुप्त सूचना ने खोल दिया ‘फर्स्ट एसी’ का राज
इस मामले की सबसे अहम कड़ी पुलिस को मिली गुप्त सूचना बताई जा रही है। सूचना थी कि स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस से एक युवती शराब लेकर जा रही है और वह फर्स्ट एसी कोच में यात्रा कर रही है।
अब सवाल यह है कि अगर पुलिस को सूचना नहीं मिलती तो क्या शराब अपने कथित खरीदारों तक पहुंच जाती?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शराबबंदी वाले राज्य में तस्करी का पूरा नेटवर्क केवल एक व्यक्ति के बैग से नहीं चलता। कहीं न कहीं शराब की खरीद, परिवहन, भुगतान और बिक्री से जुड़े लोग भी होते हैं। यही वजह है कि पुलिस अब गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के साथ उनके पुराने संपर्कों और संभावित नेटवर्क की जांच कर रही है।
यानी मामला दो सूटकेस से शुरू हुआ है, लेकिन जांच की दिशा शायद इससे कहीं आगे जा सकती है।
पुलिस से अंग्रेजी में बातचीत का भी खूब हुआ जिक्र
घटना के दौरान युवती द्वारा पुलिसकर्मियों से अंग्रेजी में बातचीत किए जाने की बात भी सामने आई है। अगर इसका उद्देश्य पुलिस पर प्रभाव जमाना था, तो यह रणनीति भी शराब की बोतलों की तरह ही ज्यादा देर तक टिक नहीं सकी।
अंग्रेजी बोलना अपराध नहीं है और न ही किसी व्यक्ति की भाषा उसके अपराध या निर्दोष होने का प्रमाण होती है। लेकिन इस मामले में चर्चा इस बात की है कि जांच के दौरान युवती कथित तौर पर पुलिस पर रौब जमाने की कोशिश कर रही थी।
विडंबना देखिए—बिहार में शराबबंदी के कानून से बचने के लिए बोतलें सूटकेस में छिपाई गईं और पुलिस के सामने रौब दिखाने के लिए अंग्रेजी का सहारा लिया गया। मगर कानून की भाषा अंततः वही रही—शराब बरामदगी और गिरफ्तारी।
नेहा झा और ईशान कुमार गिरफ्तार
पुलिस के अनुसार गिरफ्तार युवती की पहचान समस्तीपुर जिले के सिंघिया थाना क्षेत्र के बारी निवासी नेहा झा, उम्र करीब 25 वर्ष, के रूप में हुई है।
उसके साथ गिरफ्तार युवक की पहचान हरियाणा के करनाल जिले के सदर थाना क्षेत्र स्थित पुरुषोत्तम गार्डन निवासी ईशान कुमार, उम्र करीब 31 वर्ष, के रूप में बताई गई है।
बताया गया है कि ईशान कुमार, नेहा की बड़ी बहन का देवर है। दोनों के बीच पारिवारिक संबंध होने के कारण पुलिस अब यह भी जानने की कोशिश कर रही है कि शराब की खेप लाने और उसे संभावित रूप से आगे पहुंचाने में दोनों की भूमिका क्या थी।
यह भी जांच का विषय है कि शराब की खरीद किसने की, किसके कहने पर खेप लाई गई और इसे दरभंगा में किसे सौंपा जाना था।
पिता की गिरफ्तारी से जुड़ रही परिवार की कड़ी
इस मामले में एक और तथ्य जांच को गंभीर बनाता है। स्थानीय स्तर पर यह जानकारी सामने आई है कि नेहा के पिता पंकज झा भी पहले शराब तस्करी से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार हो चुके हैं।
हालांकि किसी व्यक्ति के रिश्तेदार के पुराने मामले के आधार पर दूसरे व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता। इसलिए नेहा की भूमिका का निर्धारण मौजूदा मामले के साक्ष्यों और पुलिस जांच से ही होगा।
फिर भी पुलिस के लिए यह तथ्य महत्वपूर्ण हो सकता है कि परिवार से जुड़े किसी व्यक्ति का पहले शराब के मामले में गिरफ्तार होना क्या वर्तमान मामले से किसी तरह जुड़ता है या यह केवल संयोग है।
यही वह बिंदु है जहां जांच को भावनात्मक चर्चा से निकालकर ठोस सबूतों तक पहुंचना होगा।
क्या शराब पहले भी दरभंगा पहुंचती रही?
पुलिस को आशंका है कि नेहा पहली बार शराब लेकर दरभंगा नहीं जा रही थी। जीआरपी इंस्पेक्टर बीरबल कुमार के अनुसार, मौजूदा गिरफ्तारी शराब के साथ पहली बार हुई है, लेकिन पुलिस उसके पुराने रिकॉर्ड और संपर्कों की जांच कर रही है।
यदि जांच में यह सामने आता है कि वह पहले भी इसी तरह शराब की खेप लेकर यात्रा कर चुकी है, तो मामला एक अकेली बरामदगी से बढ़कर संगठित तस्करी की दिशा में जा सकता है।
यही कारण है कि पुलिस कथित तौर पर उसके पुराने संपर्कों, यात्रा से जुड़े विवरण और संभावित नेटवर्क को खंगाल रही है।
फर्स्ट एसी से जेल तक—तस्करी का सफर महंगा जरूर था!
शराब तस्करी करने वालों की एक आम कोशिश रहती है कि वे सामान्य यात्रियों की भीड़ में अपनी पहचान छिपा लें। लेकिन यहां तो कथित तस्करी का तरीका ही कुछ अलग दिखाई देता है—फर्स्ट एसी कोच, ट्रॉली बैग और ब्रांडेड विदेशी शराब।
मानो शराब भी कह रही हो—“जब सफर करना ही है तो थोड़ा शाही अंदाज में किया जाए!”
लेकिन कानून के सामने फर्स्ट एसी और स्लीपर का फर्क नहीं होता। शराब अवैध है तो कोच का किराया, कपड़े, भाषा या सामाजिक पहचान कोई सुरक्षा कवच नहीं बन सकती।
समस्तीपुर में यही हुआ। जिस सफर को आरामदायक और सुरक्षित समझा गया होगा, वह पुलिस की कार्रवाई के बाद सीधे जेल की राह बन गया।
असली सवाल शराब की बोतलों से आगे का है
इस पूरे मामले में 75 लीटर शराब की बरामदगी निश्चित रूप से बड़ी कार्रवाई है, लेकिन जांच का असली महत्व इस बात में छिपा है कि यह खेप आखिर किसके लिए थी?
अगर शराब दरभंगा ले जाई जा रही थी तो वहां इसे किसे सौंपा जाना था? क्या कोई निश्चित खरीदार था? क्या यात्रा से पहले किसी ने खेप उपलब्ध कराई? क्या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है? क्या इससे पहले भी इसी रास्ते से शराब लाई गई? क्या ट्रेन के जरिए शराब पहुंचाने का यह तरीका पहले भी इस्तेमाल किया गया?
इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि मामला दो गिरफ्तारियों तक सीमित है या इसके पीछे कोई बड़ा तस्करी नेटवर्क सक्रिय है।
डॉक्टरों को शराब सप्लाई करने की चर्चा, लेकिन पुलिस जांच जरूरी
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी सामने आई है कि शराब कथित रूप से दरभंगा में कुछ डॉक्टरों तक पहुंचाई जाती थी। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है और न ही इसे किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप के रूप में देखा जा सकता है। ऐसी चर्चाओं को जांच के दौरान पुलिस को तथ्य और सबूत के आधार पर परखना होगा।
किसी पेशे या समुदाय के लोगों का नाम केवल स्थानीय चर्चा के आधार पर जोड़ना उचित नहीं होगा। अगर पुलिस को इस दिशा में कोई प्रमाण मिलता है तो वही इस कथित नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।
पुलिस के सामने अब बड़ी चुनौती
गिरफ्तारी और शराब बरामदगी के बाद पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल केस दर्ज करना नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क तक पहुंचना है।
शराब कहां से आई? किसने उपलब्ध कराई? किसके निर्देश पर लाई गई? यात्रा का पूरा खर्च किसने उठाया? दरभंगा में संभावित संपर्क कौन था? क्या इससे पहले भी ऐसी खेप भेजी गई? इन सवालों के जवाब तस्करी की जड़ों तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं।
यदि पुलिस केवल वाहक तक पहुंचकर जांच रोक देती है तो शराब की खेप पकड़ने की कार्रवाई तो सफल मानी जाएगी, लेकिन उसके पीछे बैठे संभावित संचालकों तक पहुंचना बाकी रह जाएगा।
शराबबंदी और तस्करी का विरोधाभास
बिहार में शराबबंदी के बावजूद समय-समय पर शराब की बरामदगी और तस्करी के मामले सामने आते रहे हैं। यह विरोधाभास प्रशासन के लिए लगातार चुनौती बना हुआ है।
एक तरफ कानून शराब की बिक्री और सेवन पर रोक लगाता है, दूसरी तरफ तस्कर नए-नए रास्ते तलाशते रहते हैं। कभी कार, कभी एंबुलेंस, कभी ट्रक और अब फर्स्ट एसी जैसे महंगे ट्रेन कोच भी तस्करी के कथित रास्ते के रूप में सामने आ जाते हैं।
समस्तीपुर का यह मामला इसी विरोधाभास पर एक तीखा सवाल खड़ा करता है—जब शराब की एक बोतल तक कानून की नजर में अपराध है, तो 75 लीटर शराब लेकर चलने वालों को भरोसा आखिर किस बात का था?
‘फर्स्ट क्लास’ का टिकट, लेकिन कानून के सामने कोई वीआईपी नहीं
इस घटना का सबसे बड़ा कटाक्ष शायद यही है कि तस्करी का रास्ता चाहे कितना भी ‘फर्स्ट क्लास’ क्यों न हो, कानून की नजर में अपराध की श्रेणी नहीं बदलती।
दो सूटकेस में छिपी शराब ने सफर को जितना आरामदायक बनाने की कोशिश की, पुलिस की सूचना ने उतनी ही तेजी से उस सफर का अंत कर दिया।
अब यह पुलिस की जांच पर निर्भर है कि मामला केवल 75 लीटर शराब की बरामदगी और दो गिरफ्तारियों तक सीमित रहता है या फिर इसके पीछे मौजूद संभावित सप्लायर, खरीदार और नेटवर्क तक भी पहुंचता है।
फिलहाल नेहा झा और ईशान कुमार जेल में हैं और पुलिस उनके पुराने रिकॉर्ड तथा संपर्कों की जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि फर्स्ट एसी में हुई यह शराब यात्रा एक अकेली कोशिश थी या किसी बड़े नेटवर्क की नियमित कड़ी।
फर्स्ट एसी में सफर जरूर शाही था, लेकिन कानून की पकड़ ने यह साफ कर दिया कि शराब तस्करी के लिए कोई कोच ‘सेफ जोन’ नहीं है।

























