कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
लखनऊ। देश की रक्षा के लिए अपना बेटा कुर्बान करने वाले परिवार को अगर उसी बेटे की शहादत के 22 साल बाद भी अपने हक के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है? जिस शहीद की वीरता को देश ने शौर्य चक्र से सम्मानित किया, उसी शहीद की 80 वर्षीय मां आज अपने अधिकार के लिए अधिकारियों के सामने गुहार लगाने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं, कथित तौर पर मिले अपमान से आहत होकर मां के मुंह से यह तक निकल गया कि ‘जब जमीन के लिए इतना अपमान सहना पड़ रहा है तो सरकार मेरे बेटे को मिला शौर्य चक्र, राष्ट्रपति पुलिस पदक और सम्मान राशि वापस ले ले।’
यह सिर्फ एक मां की नाराजगी नहीं है। यह उस पीड़ा की आवाज है, जो 22 वर्षों से सरकारी फाइलों, आश्वासनों और तारीखों के बीच दबती चली आ रही है। लखनऊ के शहीद असिस्टेंट कमांडेंट विवेक सक्सेना का परिवार आज भी उस जमीन और स्मारक पार्क के लिए संघर्ष कर रहा है, जिसका आश्वासन शहादत के बाद सरकार की ओर से दिए जाने की बात परिवार कहता है।
संपूर्ण समाधान दिवस में फिर सामने आया 22 साल पुराना दर्द
शनिवार को सरोजनीनगर तहसील में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस में शहीद विवेक सक्सेना की 80 वर्षीय मां सावित्री सक्सेना और उनके बड़े बेटे रंजीत सक्सेना पहुंचे थे। उम्मीद थी कि शायद इस बार वर्षों पुरानी समस्या का समाधान होगा और परिवार को सरकारी कार्यालयों के चक्कर से मुक्ति मिलेगी।
लेकिन परिवार का आरोप है कि समाधान दिवस में उनकी समस्या सुनने के बजाय उन्हें निराशा और कथित अपमान का सामना करना पड़ा।
रंजीत सक्सेना का आरोप है कि तहसीलदार ने फाइल देखते ही कथित तौर पर कहा, “जमीन तो तुम्हें मिलेगी नहीं। जैसे सालों से भाग रहे हो, वैसे ही भागते रहो। अब ये फाइल नगर निगम जाएगी।”
तहसीलदार की ओर से लगाए गए इन आरोपों पर यदि प्रशासनिक स्तर पर पुष्टि होती है तो यह सवाल बेहद गंभीर हो जाता है कि आखिर एक शहीद परिवार के साथ सरकारी कार्यालय में बातचीत का स्तर ऐसा क्यों होना चाहिए?
मां के मुंह से निकला दर्द—‘शौर्य चक्र वापस ले लो सरकार’
22 वर्षों से अपने बेटे की शहादत का दर्द सीने में दबाए बैठी 80 वर्षीय मां सावित्री सक्सेना के लिए यह स्थिति कितनी पीड़ादायक रही होगी, इसका अंदाजा उनके कथित बयान से लगाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि जब जमीन के लिए इतना अपमान सहना पड़ रहा है तो सरकार उनके बेटे को मिले शौर्य चक्र, राष्ट्रपति पुलिस पदक और सम्मान राशि वापस ले ले। एक मां का यह कथन अपने आप में व्यवस्था के सामने बहुत बड़ा सवाल है।
किसी परिवार के लिए बेटे की शहादत की कीमत कोई सम्मान राशि या पदक नहीं हो सकती। पदक केवल राष्ट्र की ओर से उस बलिदान के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। लेकिन जब उसी परिवार को अपने अधिकार के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़े, तो सम्मान का वास्तविक अर्थ ही सवालों के घेरे में आ जाता है।
कौन थे शहीद विवेक सक्सेना?
लखनऊ के दरोगा खेड़ा, कृष्णा लोक कॉलोनी निवासी विवेक सक्सेना ने 8 जनवरी 2003 को मणिपुर में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के दौरान उनकी वीरता और साहस के लिए भारत सरकार ने उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया। उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक से भी सम्मानित किए जाने की जानकारी परिवार की ओर से दी गई है। विवेक सक्सेना की स्मृति को जीवित रखने के लिए एयरफोर्स स्टेशन मेमौरा में उनका मेमोरियल भी बनाया गया है।
यानी देश ने उनके बलिदान को सम्मान दिया, उनके नाम को याद रखा और उनकी वीरता को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। लेकिन परिवार का कहना है कि शहादत के बाद किए गए कुछ सरकारी वादे आज भी पूरे नहीं हो सके हैं।
शहादत के बाद जमीन और स्मारक पार्क का मिला था आश्वासन
परिवार के अनुसार विवेक सक्सेना की शहादत के बाद सरकार की ओर से स्मारक पार्क और ग्रामीण कोटे से जमीन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया था। परिवार का आरोप है कि 22 वर्ष बीत जाने के बावजूद जमीन का मामला अब तक समाधान की प्रतीक्षा में है।
सवाल यह है कि किसी आम नागरिक के मामले में भी यदि कोई सरकारी प्रक्रिया 22 वर्षों तक लंबित रहे तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन जब मामला एक ऐसे परिवार का हो, जिसने देश के लिए अपना बेटा खोया हो, तब प्रशासन से कहीं अधिक संवेदनशील और समयबद्ध कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है।
2016 में तत्कालीन डीएम ने दिए थे 15 दिन में कार्रवाई के निर्देश
इस मामले में वर्ष 2016 में परिवार को एक बार फिर उम्मीद जगी थी। परिवार के मुताबिक तत्कालीन जिलाधिकारी राजशेखर ने मामले का संज्ञान लेते हुए 15 दिन के भीतर जमीन आवंटन और स्मारक के संबंध में कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
निर्देश के बाद प्रक्रिया शुरू भी हुई, लेकिन परिवार का कहना है कि इसके बाद प्रशासनिक प्रक्रिया में एक नया पेंच सामने आ गया। परिवार से कथित तौर पर कहा गया कि उन्हें यह साबित करना होगा कि वे उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हैं।
यहां तक कि शहीद की मां से शादी से पहले उनके निवास स्थान के संबंध में भी प्रमाण और शपथपत्र मांगे जाने की बात परिवार ने कही है।
शहीद परिवार से मांगा गया मूल निवासी का प्रमाण
शहीद के बड़े भाई रंजीत सक्सेना के मुताबिक उन्होंने अधिकारियों के निर्देश पर एफिडेविट भी प्रस्तुत किया, लेकिन परिवार का आरोप है कि उसे आधा-अधूरा बताते हुए स्वीकार नहीं किया गया। यहीं से परिवार की परेशानी और बढ़ती गई।
सवाल यह है कि जिस परिवार के बेटे ने देश की रक्षा करते हुए मणिपुर में प्राण न्योछावर किए, उसके परिवार की पहचान और निवास को साबित करने के लिए सरकारी रिकॉर्ड का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया?
क्या अलग-अलग विभागों के पास उपलब्ध रिकॉर्ड को आपस में मिलाकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता था? क्या हर बार एक वृद्ध मां और उसके परिवार को ही दस्तावेज लेकर एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक दौड़ना जरूरी था?
सरकार के ही चेक की पुरानी रसीद बनी अहम दस्तावेज
वर्षों तक चलती रही इस दौड़भाग के दौरान परिवार को एक पुरानी रसीद मिली। परिवार के अनुसार इसमें शहादत के बाद उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इसी लखनऊ के पते पर 75 हजार रुपये का चेक दिए जाने का उल्लेख था।
यह दस्तावेज परिवार के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि जिस पते को लेकर परिवार की पहचान और निवास संबंधी सवाल उठाए जा रहे थे, उसी पते पर सरकार स्वयं शहीद परिवार को सहायता राशि दे चुकी थी।
परिवार का कहना है कि इस पुराने सरकारी रिकॉर्ड के सामने आने के बाद मामले में कई सवालों के जवाब स्वयं प्रशासनिक दस्तावेजों से मिलने लगे।
यह घटना सरकारी रिकॉर्ड के आपसी समन्वय पर भी सवाल खड़ा करती है। यदि किसी परिवार को पहले सरकार ने सहायता दी है, तो उसी परिवार की पहचान से जुड़े रिकॉर्ड सरकारी तंत्र में मौजूद होने चाहिए।
शौर्य चक्र की सम्मान राशि के लिए भी करना पड़ा इंतजार
परिवार का दर्द केवल जमीन तक सीमित नहीं है। रंजीत सक्सेना का आरोप है कि शौर्य चक्र की सम्मान राशि पाने के लिए भी परिवार को लंबे समय तक सरकारी कार्यालयों की दौड़ लगानी पड़ी और यह प्रक्रिया वर्ष 2024 तक चली।
परिवार का यह भी आरोप है कि उनकी फाइल महीनों तक एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रही।
यदि किसी शहीद परिवार को अपने वैधानिक अधिकार और सम्मान से जुड़ी राशि प्राप्त करने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़े तो यह व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
अब एसडीएम के आदेश से फिर जगी उम्मीद
मामला एक बार फिर प्रशासन के सामने पहुंचा तो अब एसडीएम ने जांच कर एक सप्ताह के भीतर मामले का निस्तारण करने का आदेश दिया है।
यह आदेश निश्चित रूप से शहीद परिवार के लिए उम्मीद लेकर आया है। लेकिन 22 वर्षों के अनुभव ने परिवार को शायद इतना सिखा दिया है कि केवल आदेश से अधिक जरूरी उसका जमीन पर उतरना है।
परिवार अब देखना चाहता है कि इस बार फाइल वास्तव में आगे बढ़ती है या फिर एक बार फिर किसी नए दस्तावेज, नए विभाग और नई तारीख के बीच मामला अटक जाता है।
प्रशासन से बड़ा सवाल—क्या शहीद परिवार भी तारीखों का मोहताज?
यह पूरा मामला प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या किसी शहीद परिवार को अपने अधिकार के लिए 22 वर्षों तक इंतजार करना चाहिए? क्या 80 वर्षीय मां को अपने बेटे की शहादत के बाद भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने चाहिए?
क्या संपूर्ण समाधान दिवस में आने वाले किसी फरियादी के साथ ऐसा व्यवहार होना चाहिए कि वह अपने बेटे को मिले राष्ट्रीय सम्मान तक को वापस लेने की बात कहने के लिए मजबूर हो जाए?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर शहीद का परिवार ही सरकारी व्यवस्था से निराश हो जाए तो आम नागरिक किस भरोसे के साथ प्रशासन के दरवाजे पर जाएगा?
यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, समाज के लिए भी चेतावनी है
शहीद विवेक सक्सेना का परिवार आज जिस पीड़ा से गुजर रहा है, वह केवल प्रशासनिक लापरवाही का संभावित मामला नहीं है। यह समाज के लिए भी चिंता का विषय है।
हम शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं, उनके नाम पर कार्यक्रम आयोजित करते हैं, उनके स्मारक बनाते हैं और उनकी वीरता की कहानियां सुनाते हैं। लेकिन शहीद के परिवार की वास्तविक जिंदगी में जब कोई समस्या आती है, तब क्या समाज और प्रशासन उतनी ही मजबूती से उनके साथ खड़ा होता है? शहीद के परिवार को सम्मान देने का सबसे बड़ा तरीका यही है कि उसे अपने अधिकार के लिए भटकना न पड़े।
विवेक सक्सेना ने 8 जनवरी 2003 को देश के लिए अपने प्राण न्योछावर किए थे। 22 साल बाद भी उनकी मां को अपने परिवार के अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील व्यवस्था को भीतर तक झकझोरने के लिए पर्याप्त है। अब सबकी निगाहें एसडीएम के एक सप्ताह में निस्तारण के आदेश पर टिकी हैं।
उम्मीद यही की जानी चाहिए कि इस बार 80 वर्षीय सावित्री सक्सेना को फिर किसी कार्यालय की चौखट पर खड़ा न होना पड़े। उन्हें अपने शहीद बेटे के सम्मान के लिए नहीं, बल्कि एक मां के सम्मान के साथ न्याय मिले।
क्योंकि शौर्य चक्र किसी कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि विवेक सक्सेना के बलिदान की राष्ट्रीय स्वीकृति है। और उस बलिदान की सबसे बड़ी कीमत उनकी मां ने चुकाई है।
अब सवाल जमीन का ही नहीं है। सवाल यह है कि 22 साल बाद क्या शहीद की मां को इंसाफ मिलेगा?

























