भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के : लोकगीत की लोकप्रियता, नीलोत्पल मृणाल की रचनात्मक यात्रा और विवादों के बीच उठते सवाल

लोकगायक एवं लेखक नीलोत्पल मृणाल और प्रस्तुति कर्ता तरुण मोहम्मद की तस्वीरों के साथ सोहर गीत “भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के” पर आधारित फीचर इमेज, जिसमें लोकसंस्कृति, मातृत्व, साहित्य और लोकसंगीत के प्रतीकात्मक दृश्य दर्शाए गए हैं।

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कलाकार: युवा मोहम्मद
आलेख: अनिल अनूप, प्रकाशक-संपादक, जनगणदूत डॉट कॉम

आजकल सोशल मीडिया पर अगर किसी लोकगीत ने सबसे ज्यादा लोगों को जुमने, गुनगुनाने और अपनी मिट्टी की ओर आने के लिए मजबूर किया है, तो वह है- “भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के, बबुआ के माँ महलों की रानी, ​​पापा हनवे रंगदार रे होरिलवा के…”। रीलों, शॉर्ट वीडियो, फेसबुक पोस्ट और व्हाट्सएप स्टेटस से लेकर गांव की चौपाल तक यह गाना अपनी अलग पहचान बना चुका है। लोकगायक, कवि और कलाकार उपन्यासकार नीलोत्पल मृणाल की आवाज में प्रस्तुत यह पारंपरिक सोहर केवल एक गीत नहीं है, बल्कि भारतीय लोकजीवन की जीवंत झलक है।

गीत की रिकॉर्डिंग में ऐसा लगता है कि किसी गांव की संपत्ति में नवजात शिशु के जन्म की खुशी में महिलाओं को ढोलक की थाप पर रखा जा रहा है, बुजुर्ग आशीर्वाद दे रहे हैं और पूरे परिवार का जश्न मना रहे हैं। यही लोकगीतों की सबसे बड़ी शक्ति है। वे समय की सीमा को पार कर सीधे दिल तक की चौकी हैं।

क्या है सोहर की परंपरा?

उत्तर भारत के भोजपुरी, अवधी, मगही, मैथिली और विविध सांस्कृतिक क्षेत्रों के व्यापक सांस्कृतिक क्षेत्र में बच्चों के जन्म पर जाने वाले मीरा को ‘सोहर’ कहा जाता है। सोहर केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि वह लोक समाज की सामूहिक संवेदना का उत्सव भी है।

जब किसी के घर में बच्चे का जन्म हुआ, तब महिलाएं एक साथ ढोलक, मंजीरा और ताली की थाप पर सोहर गाती थीं। इन मृतकों में नवजात शिशु के भविष्य की कामना की गई, माता-पिता के गौरव और पूरे परिवार की कामना की गई।

“भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के” भी यही परंपरा उपजी है। यह गीत उस क्षण का उत्सव है जब एक नया जीवन परिवार में प्रवेश करता है और उसके साथ उम्मीदें, सपने और खुशियों का नया संसार भी जन्म लेता है।

“भुअर भुअर बाल” का लोक अर्थ

भोजपुरी लोकभाषा में “भुअर” शब्द का अर्थ भूरा, सोनार या नारंगी रंग होता है। “भुअर भुअर बाल” नवजात शिशु के सुंदर और आकर्षक बाल का वर्णन किया गया है।

लोकगीतों में बच्चों की प्रकृति का वर्णन केवल उसके रूप के लिए नहीं होता है, बल्कि उसके आभूषण और भविष्य के सौभाग्य के प्रतीक के रूप में भी किया जाता है। बाल, काजल, मुसकान और चेहरा—सब कुछ लोककवि के लिए आशा और मंगल के चिन्ह बन जाते हैं।

“बबुआ के माँ महलों की रानी” का भावार्थ

गीत की सबसे बड़ी हस्ती में से एक है- “बबुआ के जादुई महलों की रानी…”

यहां किसी भी असली महल का जिक्र नहीं है। यह लोककवि की किंवदंती अतिशयोक्ति है। बच्चे के जन्म के बाद माँ परिवार का केंद्र बन जाती है। उसकी देखभाल होती है, उसकी किसालिन का ध्यान रखा जाता है और पूरा परिवार उसके आसपास रहता है।

लोकगीत में समान सम्मान और गौरव व्यक्त करने के लिए माँ को “महलों की रानी” कहा जाता है। भारतीय लोकपरंपरा में स्त्री को देवी, लक्ष्मी, अन्नपूर्णा और रानी जैसी महिलाओं से चित्रित करना सामान्य बात है। यह स्त्री के प्रति आदर और स्नेह का प्रतीक है।

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दरअसल इस पंक्ति का संदेश यह है कि जिस महिला ने नए जीवन को जन्म दिया है, वह पूरे परिवार की सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित सदस्य है।

“पापा हनवे रंगदार” का वास्तविक अर्थ

सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा इस पंक्ति को लेकर हुई- “पापा हनवे रंगदार रे होरिलवा के…”

आज के समय में “रंगदार” शब्द को अक्सर गालिब या घटिया व्यक्ति के अर्थ में लिया जाता है, लेकिन भोजपुरी लोकभाषा में इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। रंगदार वह व्यक्ति है जिसका व्यक्तित्व समाज में पहचाना जाता है, जिसका व्यक्तित्व प्रभावशाली हो, जो व्यक्तित्व हो और उपस्थिति से वातावरण में रंग और उत्साह आ जाए।

सोहर में पिता को रंगदार कहने का अर्थ यह है कि बच्चा ऐसे पिता का पुत्र है जो सम्मानित, व्यक्तित्ववान और प्रभावशाली है। यह पिता के प्रति गर्व और सम्मान की अभिव्यक्ति है।

लोकगीतों की भाषा भावनाओं की भाषा होती है। वहां मां रानी बन जाती है, पिता रंगदार बन जाता है और नवजात पूरे संसार का सबसे प्रिय व्यक्ति।

लोकगीतों में अतिशयोक्ति का सौंदर्य

लोकसाहित्य का एक महत्वपूर्ण गुण है—अतिशयोक्ति। गांव की महिलाएं जब सोहर गाती हैं तो बच्चे को चांद का टुकड़ा, मां को रानी और पिता को राजा या रंगदार कह देती हैं।

यह तथ्यात्मक वर्णन नहीं होता, बल्कि प्रेम और उत्सव की भाषा होती है। लोकगीतों का संसार तर्क से अधिक भाव का संसार है। इसी कारण सदियों पुराने गीत आज भी नए लगते हैं।

सोशल मीडिया पर क्यों छा गया यह गीत?

इस गीत की लोकप्रियता के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण इसकी सहजता है। कोई जटिल शब्द नहीं, कोई कृत्रिमता नहीं। दूसरा कारण इसकी लोकगंध है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में लोग अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर खोज रहे हैं और यह गीत उन्हें वही अवसर देता है।

तीसरा कारण नीलोत्पल मृणाल की प्रस्तुति है। उन्होंने गीत को केवल गाया नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को महसूस करते हुए प्रस्तुत किया है। उनकी आवाज में गांव की मिट्टी, लोकजीवन की सहजता और लोकभाषा की मिठास सुनाई देती है।

यही कारण है कि लाखों लोग इस गीत पर रील बना रहे हैं और इसे साझा कर रहे हैं।

नीलोत्पल मृणाल: मिट्टी से उठकर साहित्य के शिखर तक

सोहर के इस नए लोकप्रिय संस्करण ने एक बार फिर नीलोत्पल मृणाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। लेकिन उनकी पहचान केवल एक गायक की नहीं है। वे लेखक, कवि, वक्ता और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करने वाले सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में भी जाने जाते हैं।

दुमका की धरती से शुरू हुई यात्रा

नीलोत्पल मृणाल का जन्म 25 दिसंबर 1984 को वर्तमान झारखंड के दुमका जिले में हुआ। उनका बचपन नोनीहाट क्षेत्र में बीता। गांव, खेत, लोकगीत, मेलों और जनजीवन की विविध छवियों ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।

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ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े नीलोत्पल ने बहुत करीब से आम लोगों के संघर्ष और सपनों को देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके लेखन की सबसे बड़ी ताकत बने।

छात्र जीवन और शिक्षा

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नोनीहाट के रानी सोनावती कुमारी सरकारी +2 हाई स्कूल से प्राप्त की। छात्र जीवन में वे केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहे, बल्कि खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे।

बाद में वे रांची पहुंचे और सेंट जेवियर्स कॉलेज से इंटरमीडिएट तथा इतिहास विषय में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। कॉलेज जीवन में उनकी रुचि साहित्य, सामाजिक बहसों और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों की ओर बढ़ी।

लोकगायक से साहित्यकार तक

बहुत कम लोग जानते हैं कि चर्चित उपन्यासकार बनने से पहले नीलोत्पल लोकगीतों और जनगीतों के क्षेत्र में सक्रिय थे। झारखंड राज्य गठन के बाद के वर्षों में उन्होंने लोकधुनों पर आधारित रचनात्मक कार्य किए।

लोकसंस्कृति से उनका जुड़ाव आज भी उनके गीतों और कविताओं में दिखाई देता है। “भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के” जैसे गीतों की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि वे लोकभाषा और लोकभावना को सहज रूप से अभिव्यक्त कर पाते हैं।

दिल्ली का संघर्ष और ‘डार्क हॉर्स’

स्नातक के बाद वे दिल्ली पहुंचे और सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में जुट गए। मुखर्जी नगर में बिताए गए वर्षों ने उन्हें देशभर से आए उन युवाओं के संघर्ष को देखने का अवसर दिया जो बड़े सपनों के साथ दिल्ली आते हैं।

इसी अनुभव ने आगे चलकर उनके चर्चित उपन्यास ‘डार्क हॉर्स’ को जन्म दिया। यह उपन्यास प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के जीवन, संघर्ष और आकांक्षाओं का सशक्त चित्रण माना जाता है।‘डार्क हॉर्स’ की सफलता ने उन्हें हिंदी के सबसे लोकप्रिय युवा लेखकों में शामिल कर दिया।

‘औघड़’ और साहित्यिक प्रतिष्ठा

‘डार्क हॉर्स’ के बाद उनका उपन्यास ‘औघड़’ भी अत्यंत चर्चित रहा। इन दोनों कृतियों ने उन्हें व्यापक पाठक वर्ग दिलाया। हिंदी के पिछले दशक में सर्वाधिक चर्चित पुस्तकों की चर्चा हो और इन उपन्यासों का नाम न आए, ऐसा कम ही होता है।

साल 2016 में उन्हें साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके साहित्यिक योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति का प्रमाण माना गया।

मंच, कविता और जनसंपर्क

नीलोत्पल मृणाल केवल उपन्यासकार नहीं हैं। वे मंचीय कवि और वक्ता के रूप में भी लोकप्रिय रहे हैं। प्रयागराज, दिल्ली, पटना, कानपुर और देश के अनेक शहरों में उनके कविता पाठ और गीतों के कार्यक्रम चर्चा में रहे हैं।

यूट्यूब और सोशल मीडिया ने उनकी पहुंच को और व्यापक बनाया। उनके कई वीडियो लाखों बार देखे जा चुके हैं।

लोकप्रियता, सार्वजनिक जीवन और विवाद

लोकप्रियता के साथ सार्वजनिक जीवन की चुनौतियां भी आती हैं। नीलोत्पल मृणाल भी इससे अछूते नहीं रहे।

वर्ष 2022 में एक महिला ने उन पर विवाह का झांसा देकर लंबे समय तक यौन शोषण करने का आरोप लगाया था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस संबंध में दिल्ली में प्राथमिकी दर्ज की गई थी और मामला जांच के दायरे में आया था।

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यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोप और दोष सिद्धि अलग-अलग बातें होती हैं। न्यायालय द्वारा अंतिम निर्णय आने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करना उचित नहीं माना जाता। इसलिए ऐसे मामलों को तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

नीलोत्पल मृणाल के संदर्भ में भी यही सिद्धांत लागू होता है। एक ओर उनकी साहित्यिक उपलब्धियां हैं, दूसरी ओर सार्वजनिक जीवन से जुड़े विवाद। अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया और प्रमाणों के आधार पर ही तय होते हैं।

कलाकार, कला और समाज

आज जब “भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के” लाखों लोगों की जुबान पर है, तब एक बड़ा प्रश्न भी सामने आता है—क्या कलाकार की कला और उसके निजी जीवन को अलग-अलग देखा जा सकता है?

इस प्रश्न पर समाज में लंबे समय से बहस होती रही है। कुछ लोग मानते हैं कि रचना का मूल्यांकन उसकी कलात्मक गुणवत्ता के आधार पर होना चाहिए। वहीं कुछ लोग कलाकार के सार्वजनिक आचरण को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते हैं।

संभवतः इस प्रश्न का कोई एक अंतिम उत्तर नहीं है। लेकिन इतना निश्चित है कि कला का मूल्यांकन संवेदनशीलता से और आरोपों का मूल्यांकन न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।

लोकगीतों की अमर शक्ति

“भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के” की सफलता केवल एक वायरल ट्रेंड की सफलता नहीं है। यह उस लोकसंस्कृति की सफलता है जो आधुनिकता की आंधी के बावजूद जीवित है।

यह गीत हमें याद दिलाता है कि चाहे समय कितना भी बदल जाए, मां की ममता, पिता का गर्व, बच्चे का जन्म और परिवार की खुशी जैसे भाव कभी पुराने नहीं होते। यही भाव लोकगीतों को अमर बनाते हैं।

शायद यही कारण है कि सोशल मीडिया के तेजी से दौर में भी एक पारंपरिक सोहर लाखों लोगों को ज़ुमाने, गाने और पूर्वजों को याद करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। “भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के” केवल एक गीत नहीं है, बल्कि भारतीय लोकजीवन का वह जीवंत दर्शन है जो कि पवित्र है और हमें हमारी सांस्कृतिक विरासत का स्मरण कराती है।

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा निवासी युवा मोहम्मद बहुआब्दी व्यक्तित्व के धनी हैं। वे वृद्ध रंगकर्मी, फिल्मकार, लेखक, पत्रकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। भारतीय जननाट्य संघ ( इप्टा ) से लंबे समय से जुड़े युवा मोहम्मद ने थीम, जनसंस्कृति और सामाजिक विचारधाराओं को केंद्र में भर्ती किया है। उनके सक्रिय एकमात्र मंच तक सीमित नहीं रही, बल्कि साहित्य, संगीत और फिल्म निर्माण के माध्यम से भी उन्होंने समाज, संस्कृति और मानवीय भावनाओं को व्यक्त किया है। लोकजीवन, जनपक्षधरता और सांस्कृतिक अनूदित के प्रति उनके समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है।

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Author: यायावर

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