पटनीटॉप से लौटकर मिला सबसे बड़ा सवाल : क्या विकास सिर्फ सड़कों का नाम है, इंसानों का नहीं?
पनगोत्रा की चिट्ठी (साप्ताहिक स्तंभ)-5

संपादकीय टिप्पणी
पिछले सप्ताह जनगणदूत ने “गर्मी से राहत नहीं, सुकून की तलाश में पटनीटॉप पहुँचे केवल कृष्ण पनगोत्रा” शीर्षक से हमारी जम्मू-कश्मीर ब्यूरो प्रमुख रजनी वर्मा का एक आत्मीय यात्रा-लेख प्रकाशित किया था। उसमें उन्होंने वरिष्ठ लेखक, विचारक और स्वतंत्र पत्रकार केवल कृष्ण पनगोत्रा की पटनीटॉप यात्रा को अपनी संवेदनशील दृष्टि से शब्द दिए थे।
उस लेख को पाठकों का भरपूर स्नेह मिला। अब उसी यात्रा के अनुभवों को स्वयं पनगोत्रा जी अपने विशिष्ट अंदाज़ में पाठकों के सामने रख रहे हैं। यह केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं, बल्कि शब्दों, संवेदनाओं, प्रकृति, समाज और व्यवस्था के बीच संवाद स्थापित करने वाली एक आत्मीय चिट्ठी है। आइए, इस सप्ताह की “पनगोत्रा की चिट्ठी” का आनंद लें।
प्रिय पाठकों,
एक गीत की ये सुंदर पंक्तियाँ मुझे बार-बार क्यों याद आने लगीं? क्योंकि जब शब्द आत्मीय संबंधों का साधन बन जाते हैं, तब उनकी सुंदरता समुद्र से भी अधिक गहरी हो जाती है। जब किसी के शब्द आत्मा को तृप्त कर देते हैं तो रचनात्मकता केवल साहित्य नहीं रहती, वह अनुभूति बन जाती है। शायद इसी भाव ने गीतकार इंदीवर से कहलवाया था—
“तुझे देख कर जग वाले पर यकीं नहीं क्यों कर होगा,
जिसकी रचना इतनी सुंदर, वो कितना सुंदर होगा।”
रजनी वर्मा जी… आफ़रीं! मैंने आपकी काया तो नहीं देखी, लेकिन आपकी माया देख ली है। दुनिया वाले अक्सर सामने खड़े व्यक्ति को भी पूरी तरह नहीं पहचान पाते, लेकिन आपने एक अधूरे-से शब्द साधक को जिस आत्मीयता से देखा, वह मेरे लिए किसी मायालोक से कम नहीं था। ऐसा मायालोक, जहाँ सवाल भी हैं और उनके उत्तर पाने की सच्ची लालसा भी।
क्या किसी की कल्पना इतनी जीवंत हो सकती है? रजनी जी ने अपने लेख में एक काल्पनिक संवाद रचते हुए लिखा था— “मैंने मुस्कराकर उनसे पूछा, ‘पटनीटॉप कैसा लग रहा है?’ उन्होंने सहज भाव से उत्तर दिया, ‘गर्मी को तो यहीं छोड़ जाना चाहता हूँ।’”
फिर आपने लिखा— “मेरा विश्वास है कि पनगोत्रा जी भी यहाँ से केवल सुकून ही नहीं, बल्कि अनेक नई अनुभूतियाँ साथ लेकर जाएँगे। यही अनुभूतियाँ किसी दिन किसी लेख, संस्मरण या साहित्यिक रचना का रूप लेकर पाठकों तक अवश्य पहुँचेंगी।”
वाह! रजनी जी, वाह! कैसे इनकार करता? मैं तो एक नई, लेकिन बेहद मनोहारी उलझन में पड़ गया।
उलझन से मिली नई ऊर्जा
पंजाब से सटे कठुआ की तपती धूप और उमस से राहत पाने के लिए मैं परिवार सहित जम्मू-कश्मीर के पटनीटॉप, नत्था टॉप और सनासर झील की ओर निकल पड़ा था। उद्देश्य केवल मौसम से राहत पाना नहीं था, बल्कि रोजमर्रा की भागदौड़ और उलझनों से भी कुछ पल दूर होना था।
लेकिन इस यात्रा के दौरान रजनी वर्मा जी की रचना ने मुझे ऐसी मनोहारी उलझन में डाल दिया, जिसने मेरे भीतर नई ऊर्जा का संचार कर दिया।
एक लेखक को ऊर्जा आखिर मिलती कहाँ से है?
जब पाठक भी लेखक को नई दृष्टि दे
इस आत्मीय उलझन को और गहरा किया अलीगढ़, उत्तर प्रदेश के श्याम किशोर वर्मा जी ने। उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा— “रजनी वर्मा जी का यह लेख पढ़ते समय लगा ही नहीं कि मैं कोई यात्रा-वृत्तांत पढ़ रहा हूँ, बल्कि ऐसा महसूस हुआ जैसे स्वयं पटनीटॉप की वादियों में घूम रहा हूँ। लेख में समाचार भी है, साहित्य भी है और प्रकृति का सौंदर्य भी। सबसे अच्छी बात यह लगी कि लेखिका ने पनगोत्रा जी की यात्रा को महज पर्यटन नहीं बनने दिया, बल्कि उसे संवेदनाओं और आत्मीय रिश्तों का दस्तावेज़ बना दिया। हाँ, एक बात जरूर कहूँगा—अब पटनीटॉप वालों को भी सावधान हो जाना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि पनगोत्रा जी वहाँ से लौटकर ऐसी शानदार रचना लिख दें कि लोग पहले उनकी कलम पढ़ने जाएँ और बाद में पटनीटॉप घूमने!”
अब मेरी स्थिति कुछ यूँ हो गई है—
“ज़िंदगी अब कुछ इस कदर चल रही है,
हर उलझन किसी दूसरी से उलझ रही है।”
पत्रकार की नज़र और साहित्य की आत्मा
रजनी जी ने अपने लेख में लिखा— “पत्रकार होने के नाते मैं प्रतिदिन अनेक लोगों के आने-जाने की खबरें लिखती हूँ। कोई नेता आता है, कोई अधिकारी, कोई कलाकार। लेकिन किसी साहित्य साधक का आगमन अलग होता है। वह केवल किसी स्थान तक नहीं पहुँचता, बल्कि उस स्थान की आत्मा से जुड़ जाता है।”
यकीन मानिए, पटनीटॉप, नत्था टॉप और सनासर की यात्रा के दौरान मैंने प्रकृति के असंख्य चमत्कार देखे। लेकिन रजनी वर्मा जी केवल दिल से सुंदर ही नहीं, बेहद चतुर भी हैं।
वे जानती हैं कि किसी भी पर्यटन स्थल की आत्मा की आवाज़ नेताओं, शासकों और प्रशासनिक अधिकारियों तक अक्सर नहीं पहुँचती। इसलिए उन्होंने किसी और के मुंह से वह बात कह दी, जिसे सीधे कहना शायद आसान नहीं होता। आप भी प्रकृति की एक सुंदर और दुर्लभ रचना हैं।
पहाड़ों की खूबसूरती के पीछे छिपा दर्द
प्रकृति की गोद में बैठकर उसकी सुंदरता की प्रशंसा करना सहज है। पहाड़, देवदार, बादल और ठंडी हवाएँ हर किसी को आकर्षित करती हैं।
लेकिन किसी स्थान की वास्तविक आत्मा उसके वहाँ रहने वाले लोग होते हैं। मैंने केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं देखे, बल्कि इंसानी मजबूरियाँ भी देखीं। मैंने विकास के नारों के बीच गरीबी का मौन रुदन देखा। मैंने एयरकंडीशन कारों के आगे हाथ फैलाते बच्चे देखे।
मैंने उन युवा घोड़ेवालों से बहस करते सम्पन्न पर्यटक देखे, जिनकी एक दिन की कमाई शायद उन घोड़ेवालों की कई महीनों की आमदनी से अधिक होगी।
मैंने पहाड़ों की तलहटी से अपनी जान जोखिम में डालकर एक-दो किलो कसरोड़ (एक पहाड़ी सब्जी) लाकर सड़क किनारे बेचते मासूम लोगों को देखा।

“एम.ए. चाय वाला”—एक बोर्ड नहीं, व्यवस्था से सवाल
इस यात्रा की सबसे मार्मिक तस्वीर नत्था टॉप पर देखने को मिली। वहाँ चाय की एक छोटी-सी झोपड़ीनुमा दुकान थी, जिसके बाहर लिखा था— “M.A. CHAI WALA” दुकान चलाने वाला युवक परास्नातक यानी एम.ए. पास था।
यह केवल एक बोर्ड नहीं था। यह हमारी व्यवस्था पर एक तीखा प्रश्न था। यह उस विकास मॉडल पर एक करारा व्यंग्य था, जहाँ डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन अवसर नहीं। सोचता हूँ, इस मार्ग से न जाने कितने नेता, मंत्री, अधिकारी और प्रभावशाली लोग गुजरे होंगे। दिल तो शायद सबके पास है। लेकिन दिल की गहराई हर किसी के पास नहीं होती।
विकास का वास्तविक अर्थ
हमारा देश अभी तक विकासशील कहलाता है। और शायद तब तक विकासशील ही कहलाता रहेगा, जब तक विकास केवल इमारतों, सड़कों और पर्यटन परियोजनाओं तक सीमित रहेगा। सच्चा विकास तब होगा, जब हमारे दिल भी उतने ही विकसित होंगे, जितनी हमारी योजनाएँ।
रजनी वर्मा जी ने पटनीटॉप की ओर से केवल एक आत्मीय स्वागत-पत्र नहीं लिखा, बल्कि एक साधक को सच्ची साधना की ओर प्रेरित किया है।
उन्होंने मुझे एक बार फिर यह एहसास कराया कि— देह की सुंदरता क्षणिक हो सकती है, लेकिन मन, वचन और कर्म की सुंदरता ही किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान होती है।
रजनी वर्मा जी को एक बार फिर— आफ़रीं!
चिट्ठी कैसी लगी?
अगले सप्ताह फिर मुलाकात होगी। तब तक—
राम-राम, नमस्कार, सत श्री अकाल, अल्लाह हाफ़िज़।
— केवल कृष्ण पनगोत्रा
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार, जम्मू-कश्मीर










