प्रिय पाठकों,
हर सप्ताह की तरह आज फिर आपके सामने अपनी चिट्ठी लेकर उपस्थित हूं। यह मुलाकात मेरे लिए केवल शब्दों का सिलसिला नहीं है। यह उन अनुभवों को आपके साथ बांटने का प्रयास है, जिन्हें जिंदगी ने धीरे-धीरे मेरी सोच का हिस्सा बनाया है। कभी कोई घटना कुछ सिखा जाती है, कभी किसी व्यक्ति का व्यवहार कोई नया प्रश्न खड़ा कर देता है और कभी वर्षों पहले सुनी हुई किसी बात का अर्थ उम्र के साथ और गहरा होता चला जाता है।
आज की यह चिट्ठी ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का दसवां भाग है और इसका विषय भी ऐसा है, जिसे हम सब जानते हैं, बोलते हैं, दूसरों पर लागू करते हैं, लेकिन कई बार स्वयं पर लागू करना भूल जाते हैं।
विषय है—कथनी और करनी। हमारे समाज में एक बहुत सुंदर कहावत प्रचलित है— “जो कथनी करनी एक समान, जग में मिलता तब सम्मान।” कहावत छोटी है, लेकिन इसके भीतर पूरा जीवन-दर्शन समाया हुआ है।
एंड्र्यू कार्नेजी एक औद्योगपति के साथ एक मानव प्रेमी थे। उन्होंने अपने अनुभव बताते हुए कहा था- मैं जैसे-जैसे बड़ा होता गया, मैंने इसकी तरफ कम ध्यान दिया कि लोग क्या कहते हैं। मैंने यह देखा कि वो क्या करते हैं। समय के साथ यह विचार प्रसिद्ध हुआ और सोशल मीडिया पर अंग्रेजी के एक पैरा के रूप में स्थापित हो गया।
I no longer listen to what people say. I just watch what they do. … Behaviour never lies.
यह पैरा सीधे तौर पर कथनी और करनी के प्रचलित दर्शन पर आधारित है। इसका मतलब यह नहीं है कि आप सिर्फ दूसरों पर ही इस जीवन सूत्र का प्रयोग करें। इस जीवन सूत्र का प्रयोग आपके व्यवहार को परखने और समझने के लिए भी होगा। आपका व्यवहार भी परीक्षा और पड़ताल के दायरे में आ रहा है। इस बात को समझना मुश्किल नहीं है।
कथनी और करनी का अर्थ है कि इंसान जो कहता है, उसे अपने व्यवहार में भी लागू करना चाहिए। जब किसी व्यक्ति की कही हुई बातें और उसके असल काम एक समान होते हैं, तभी उसे समाज में सच्चा आदर और सम्मान प्राप्त होता है।
मैं इस बात का दावा नहीं करता कि मेरी तरफ से कथनी और करनी के दर्शन का हमेशा पालन हुआ है। इसकी वजह मेरी नीयत नहीं रही अपितु भौतिक परिवेश या परिस्थितियों की मजबूरी रही होगी। जब मैं सरकारी शिक्षक की नौकरी करता था तो नीयत और नीति हमेशा यही रही कि स्कूल समय पर ही पहुंचा जाए। निर्धारित कार्य किए जाएं।परिवारिक और सामाजिक जीवन में भी कथनी और करनी में अंतर नहीं रखा। इसकी वजह मेरे पिताजी रहे। जब भी कहीं जाना या कहीं से आना होता तो वह अक्सर कहा करते- जल्दी करो, समय हो रहा है। ‘जल्दी करो, समय हो रहा है।’ सिर्फ सुनते-सुनते ही नहीं बल्कि अभ्यास रूप में देखते-देखते भी यह शब्द मेरे दिलो-दिमाग में एक संस्कार की तरह घुस गए। पिताजी की अनुशासित जीवन शैली और कहने से ज्यादा कर्म पर केंद्रित जीवन यात्रा का मुझ पर काफी प्रभाव रहा। पिताजी बोलते कम, सुनते ज्यादा थे और कहते कम करते ज्यादा थे।
एक मज़ेदार बात सुनाता हूं। सन् 2016 में मेरे छोटे बेटे की शादी हुई थी। बारात घर से लगभग 12 किलोमीटर दूर एक गांव में जानी थी। सड़क मार्ग की स्थिति और दूरी को देखते हुए मैंने अधिकतम 15 मिनट का सफर तय पाया।
समधियों की मुलाकात(जिसे हमारी डोगरी और पंजाबी भाषा में मेलनी या मिलणी कहते हैं) का समय शाम आठ बजे तय किया था।
मैंने अपने हैडमास्टर साहिब और कुछेक परम मित्रों को भी बारात में शामिल होने का न्योता दिया था। हैड मास्टर साहब ने मेरे घर से चलने के बजाए सीधे बैंक्विट हाल में ही पहुंचना था। बारात ठीक आठ बजे बैंक्विट हाल पहुंच गई और ठीक आठ बजे ही बैंक्विट हाल के मुख्य द्वार पर समधी मुलाकात यानि मिलणी संपन्न हो गई।
किन्हीं परिवेश जन्य परिस्थितियों के चलते हैड मास्टर साहब 15 मिनट लेट हो गए। जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझे हंसते हुए कहा- आप यहां भी स्कूल की तरह समयनिष्ठ हो। मैंने भी हंसते हुए कह दिया- सर, मैं आपसे डरता हुआ स्कूल समय पर नहीं आता बल्कि यह मेरे पिताजी का दिया हुआ संस्कार है कि इन्सान की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। जब मैंने कहा है कि बारात आठ बजे बैंक्विट हाल के द्वार पर होगी तो व्यावहारिक रूप में भी होनी चाहिए।
कहने का तात्पर्य यह हो रहा है कि सिर्फ दूसरों को ही बर्ताव और व्यवहार के तराजू पर नहीं तोलें अपितु अपने बर्ताव और व्यवहार को भी उसी तराजू के लिए तैयार रखें।
आखिर कथनी और करनी में समानता का महत्व क्या है?
*विश्वसनीयता: जो लोग अपनी कथनी को करनी में बदलते हैं, उन पर लोग आसानी से विश्वास करते हैं। उनकी विश्वसनीयता यानि Credibility का ग्राफ ऊंचा रहता है।
*सफलता का आधार: बड़े-बड़े दावे (कथनी) करने से सफलता नहीं मिलती। सफलता के लिए निरंतर कर्म करना आवश्यक है।
*चरित्र निर्माण: शब्द केवल वादे हो सकते हैं, लेकिन आपके कर्म आपकी सच्ची नीयत और चरित्र का आइना होते हैं।
एंड्र्यू कार्नेजी का अनुभव- कि जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, मैंने इसकी तरफ कम ध्यान दिया कि लोग क्या कहते हैं। मैंने यह देखा कि वो क्या करते हैं; एक विचार में कैसे परिवर्तित हो गया? असल में यह विचार पहले ही मौजूद था। एंड्र्यू ने इसका एक जीवन सूत्र के रूप में परिचय कराया। इसे कथनी और करनी के सिद्धांत से जोड़ा।
आज जीवन मूल्यों का पतन सीमा से अधिक हो रहा है। लोग बहुसंख्या में चतुर-चालाकी के माहिर होते जा रहे हैं। वे सिर्फ कथनी के ही नहीं बल्कि करनी के भी माहिर होते जा रहे हैं। कई बार प्रेम पूर्वक व्यवहार को हथियार बना लिया जाता है। ऐसी स्थिति में कथनी से प्रेम महसूस करवाया जाता है और करनी यानि व्यावहारिक रूप में दिखाया जाता है। मगर उद्देश्य कुछ और ही रहता है।
• कथनी, करनी और उद्देश्य
एक अनुभव बताता हूं। एक आदमी के पास कीमती भूमि के रूप में अचल संपत्ति थी। वह उस पर खेती तो करता था मगर गुजर-बसर मुश्किल से होती थी। वह भूमि को बेचना नहीं चाहता था। पुरखों की विरासत को वह संभाल कर रखना चाहता था। लेकिन उस भूमि को हथियाने वाले एक करीबी रिश्तेदार ने एक लम्बी पारी खेलना शुरू कर दी। वह कथनी में भी प्रेमी था और करनी में भी प्रेमी था मगर उद्देश्य खोटा था। वह जरूरत के समय काम आता। मान लो कि तन-मन-धन से सेवा के लिए उपस्थित रहता। उसने कभी जाहिर नहीं होने दिया कि वह अंततः किसी भी तरह, खरीद कर या प्रेम पूर्वक मांग कर, जमीन हासिल करना चाहता है।
भूमि का मालिक आर्थिक रूप से कमजोर जरूर था मगर दिमागी तौर पर चार आंखों और सिरे तक की दूरदर्शिता का मालिक भी था। उसने कथनी और करनी की परख से आगे निकल कर भूमि हथियाने वाले शातिर की खोटी नीयत को पहचान लिया था।
समय-समय पर जिन्दगी के अनुभव और अनुभूतियां बदलती रहती हैं। सोच बदलती है, विचार बदलते हैं। लेकिन कथनी और करनी का कालजयी सिद्धांत आपको इन्सानी व्यवहार और फितरत से रूबरू करवाता रहेगा।
लोकप्रिय कहावत के अनुसार:“जो कथनी करनी एक समान, जग में मिलता तब सम्मान।”
अगले हफ्ते मिलने की प्रतीक्षा में !
केवल कृष्ण पनगोत्रा
जम्मू-कश्मीर


























4 Responses
अरे वाह पनगोत्रा जी! 😄 आपकी चिट्ठी तो सीधे कथनी और करनी की पुरानी जोड़ी के बीच बैठकर पंचनामा लिख रही है! आजकल बातों के घोड़े दौड़ाने वालों की कमी नहीं, लेकिन जब कर्मों की बारी आती है तो कई महारथियों के घोड़े भी आराम फरमाने लगते हैं। 😂
लेख ने बड़े मज़ेदार अंदाज़ में एकदम सटीक बात कही है—शब्दों की चमक कुछ देर भले ही लोगों को चकाचौंध कर दे, लेकिन असली पहचान तो कर्मों की रोशनी से ही होती है। कथनी और करनी की दोस्ती बनी रहे तो जिंदगी भी मुस्कुराए और समाज भी! 👏😊🌿
लिखते रहिए… क्योंकि ऐसी चिट्ठियां पढ़कर दिमाग भी जागता है और चेहरे पर मुस्कान भी आ जाती है! 😄👌
पनगोत्रा जी की यह चिट्ठी आज के समाज के लिए एक सार्थक और विचारोत्तेजक संदेश देती है। व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से होती है। कथनी और करनी में समानता ही चरित्र, विश्वास और व्यक्तित्व की सच्ची कसौटी है। लेखक ने सरल एवं प्रभावी भाषा में एक गंभीर सामाजिक सत्य को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। ऐसी रचनाएँ पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं।
पनगोत्रा जी की यह चिट्ठी केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को टटोलने के लिए भी प्रेरित करती है। आज के समय में जब शब्दों और वादों की चमक अक्सर कर्मों की सच्चाई पर भारी पड़ जाती है, तब यह लेख हमें याद दिलाता है कि इंसान की असली पहचान उसकी कथनी से नहीं, बल्कि उसकी करनी से होती है। सरल, सहज और प्रभावशाली भाषा में लिखा गया यह लेख समाज को एक सार्थक संदेश देता है।
पनगोत्रा जी की यह रचना जीवन के उस शाश्वत सत्य को रेखांकित करती है कि विचारों और शब्दों का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वे हमारे आचरण में भी दिखाई दें। कथनी और करनी के बीच बढ़ती दूरी आज व्यक्ति और समाज—दोनों के लिए एक गंभीर चुनौती है। एक शिक्षिका के रूप में मेरा अनुभव रहा है कि उपदेश से अधिक प्रभाव उदाहरण का होता है। लेखक ने इसी महत्वपूर्ण सत्य को सरल, सारगर्भित और विचारोत्तेजक शैली में प्रस्तुत किया है। यह चिट्ठी हमें दूसरों को समझाने से पहले स्वयं के कर्मों का आत्ममंथन करने की प्रेरणा देती है।