समीक्षा

‘किराए का बाप’ : रक्त से नहीं, उत्तरदायित्व से बनते रिश्तों का असाधारण आख्यान

पुस्तक समीक्षा l कभी-कभी कोई लेखक पुराने विषय में ऐसा नया भाव-बोध जोड़ देता है कि पाठक को लगता है—यह कहानी उसने पहले कभी नहीं पढ़ी। अनिल अनूप का उपन्यास 'किराए का बाप' इसी श्रेणी की कृति है।

समीक्षक : पूर्णेंदु झा

पुस्तक : किराए का बाप
लेखक : अनिल अनूप
प्रकाशक : समाचार दर्पण प्रकाशन
संस्करण : प्रथम संस्करण
पृष्ठ : 125
मूल्य : ₹199


हिंदी साहित्य में पारिवारिक संबंधों पर असंख्य उपन्यास लिखे गए हैं। प्रेम, विवाह, विघटन, पुनर्मिलन, संघर्ष और सामाजिक दबाव जैसे विषय नए नहीं हैं। लेकिन कभी-कभी कोई लेखक पुराने विषय में ऐसा नया भाव-बोध जोड़ देता है कि पाठक को लगता है—यह कहानी उसने पहले कभी नहीं पढ़ी। अनिल अनूप का उपन्यास ‘किराए का बाप’ इसी श्रेणी की कृति है।

यह उपन्यास अपने शीर्षक से चौंकाता है, कथानक से बाँधता है और समापन तक पहुँचते-पहुँचते पाठक के भीतर ऐसी संवेदनात्मक हलचल छोड़ जाता है, जो पुस्तक बंद होने के बाद भी लंबे समय तक शांत नहीं होती।

आज का समाज जैविक रिश्तों पर बहुत गर्व करता है, लेकिन भावनात्मक रिश्तों के महत्व को धीरे-धीरे भूलता जा रहा है। ऐसे समय में ‘किराए का बाप’ एक कठिन प्रश्न पूछता है—

“क्या पिता केवल वही होता है, जो जन्म देता है?”

और इस प्रश्न का उत्तर लेखक किसी भाषण से नहीं, बल्कि एक ऐसी कथा के माध्यम से देते हैं, जिसमें करुणा है, संघर्ष है, आत्मसम्मान है, पर कहीं भी कृत्रिम भावुकता नहीं है।

शीर्षक ही इस उपन्यास की पहली साहित्यिक उपलब्धि है

किसी भी पुस्तक का शीर्षक उसका पहला पाठ होता है।

‘किराए का बाप’ पढ़ते ही मन में अनेक आशंकाएँ जन्म लेती हैं। कहीं यह कोई व्यंग्य तो नहीं? कहीं यह बाजारवाद पर कटाक्ष तो नहीं? या फिर कोई सनसनीखेज सामाजिक कथा? लेकिन अनिल अनूप ने जिस सूझ-बूझ से इस शीर्षक को कथा के भीतर अर्थ दिया है, वह उल्लेखनीय है। पुस्तक के अंतिम हिस्से में जब आरव मंच से कहता है— “लोग रिश्तों को खून से मापते हैं। मैं रिश्तों को समय से मापता हूँ।”

तो पाठक समझ जाता है कि लेखक ने “किराया” शब्द का प्रयोग लेन-देन के अर्थ में नहीं, बल्कि जीवन की उस रिक्तता के लिए किया है, जिसे किसी संवेदनशील मनुष्य ने अपने समय, स्नेह और जिम्मेदारी से भर दिया। यही वह क्षण है, जहाँ शीर्षक पाठक के भीतर स्थायी अर्थ ग्रहण कर लेता है।

चार पात्र… और पूरा समाज

अनिल अनूप ने अपने उपन्यास को भीड़ से नहीं भरा। उन्होंने केवल चार प्रमुख पात्रों के माध्यम से पूरे समाज की मानसिकता को सामने रख दिया है।

अभय—एक स्वतंत्र लेखक, जिसके पास शब्दों की संपत्ति है लेकिन जीवन में आर्थिक अभाव है।

मीरा—प्रेम-विवाह से उसकी जीवनसंगिनी, जो परिस्थितियों की मार झेलती है, पर अपने भीतर की गरिमा कभी नहीं खोती।

नैना—एक निजी कंपनी में कार्यरत, आर्थिक रूप से समृद्ध, आधुनिक लेकिन संस्कारों से जुड़ी महिला, जो सहायता करना जानती है, उपकार जताना नहीं।

और आरव—एक बालक, जिसके जीवन में पिता का स्थान रिक्त है, लेकिन जिसकी संवेदनाएँ किसी भी वयस्क से अधिक परिपक्व हैं।

लेखक की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इन चारों में कोई खलनायक नहीं है। यहाँ परिस्थितियाँ विरोधी हैं, मनुष्य नहीं।

अभय : समकालीन हिंदी कथा का एक यादगार पात्र

हिंदी कथा-साहित्य में लेखक पात्र बहुत कम मिलते हैं। अनिल अनूप ने अभय को केवल लेखक नहीं बनाया, बल्कि उस लेखक का प्रतिनिधि बनाया है जो सम्मान के साथ जीना चाहता है।

उसके संघर्ष का सबसे मार्मिक पक्ष तब सामने आता है, जब वह मीरा के नाम घर खरीदने का सपना देखता है। वह नैना की आर्थिक शक्ति का लाभ उठाकर संपन्न नहीं बनना चाहता। वह चाहता है कि अपनी पत्नी के लिए खरीदा गया घर उसकी कलम की कमाई से हो। उसी प्रसंग में लेखक एक अद्भुत पंक्ति लिखते हैं—

“दौलत का सबसे सुंदर रूप वह है, जो किसी का आत्मसम्मान छीने बिना उसके सपनों का रास्ता आसान कर दे।”

यह केवल एक संवाद नहीं। यह पूरे उपन्यास का नैतिक दर्शन है। आज जब सहायता भी कई बार अहसान बन जाती है, यह पंक्ति मनुष्य की गरिमा की रक्षा करती दिखाई देती है।

मीरा और नैना : हिंदी कथा-साहित्य की दो विलक्षण स्त्रियाँ

इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्त्रियाँ हैं। हिंदी के अनेक उपन्यासों में दो स्त्रियों का अर्थ होता है—प्रतिस्पर्धा। लेकिन ‘किराए का बाप’ इस रूढ़ि को तोड़ता है।

मीरा और नैना एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं बनतीं। वे एक-दूसरे के दर्द को पहचानती हैं। जब मीरा पहली बार नैना से मिलती है, तो लेखक लिखते हैं— “तुमने मेरे अभय को सहारा दिया है… ईश्वर तुम्हारे बेटे को कभी अकेला न छोड़े।”

और इससे पहले डायरी में अभय लिखता है— “आज मेरे जीवन की दो सबसे मज़बूत स्त्रियाँ एक-दूसरे से मिलीं। मुझे लगा, ईश्वर ने मेरे सभी अधूरे रिश्तों पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।”

यहाँ लेखक केवल पात्रों को नहीं मिला रहा, बल्कि भारतीय परिवार की एक नई संभावना रच रहा है।

आरव : वह पात्र जो उपन्यास को साधारण से असाधारण बना देता है

यदि मुझसे पूछा जाए कि इस उपन्यास का सबसे जीवंत पात्र कौन है, तो मेरा उत्तर बिना किसी संकोच के होगा—आरव। हिंदी उपन्यासों में बच्चे अक्सर सहायक पात्र बनकर रह जाते हैं, लेकिन ‘किराए का बाप’ में आरव केवल एक बच्चा नहीं, बल्कि पूरी कथा का नैतिक केंद्र है।

वह अभय को कभी “पिता” कहने की जल्दी नहीं करता। पहले उन्हें समझता है, परखता है, उनके साथ चलता है और फिर धीरे-धीरे अपने मन में वह रिक्त स्थान भरता है, जो जन्मदाता के अभाव में वर्षों से खाली था।

लेखक ने एक स्थान पर लिखा है— “बच्चे खून के रिश्ते नहीं समझते, वे समय देने वाले हाथ पहचान लेते हैं।” यह पंक्ति केवल आरव पर लागू नहीं होती, बल्कि पूरे उपन्यास की आत्मा बन जाती है। और जब विद्यालय के मंच से आरव कहता है— “उन्होंने मुझे जन्म नहीं दिया… लेकिन जीना सिखाया।”

तो यह संवाद किसी साहित्यिक अलंकरण का परिणाम नहीं लगता; यह जीवन की गहराइयों से निकला हुआ सत्य प्रतीत होता है।

संवाद : छोटे, सहज और लंबे समय तक याद रहने वाले

अनिल अनूप की लेखकीय शक्ति उनके संवादों में सबसे अधिक दिखाई देती है। वे पाठक को चौंकाने के लिए भारी-भरकम वाक्य नहीं गढ़ते। साधारण शब्दों से असाधारण भाव रचते हैं। उदाहरण के लिए— “जिस घर में अपने न रहते हों, वह मकान है; जिस मकान में अपनापन बस जाए, वही घर बन जाता है।”

यह संवाद केवल घर का अर्थ नहीं बदलता, बल्कि पूरे उपन्यास की यात्रा का सार बन जाता है। इसी प्रकार एक और पंक्ति— “प्रेम-विवाह करने वाले लोग एक-दूसरे के शत्रु नहीं बनते, वे केवल समय से हार जाते हैं।”

आज के सामाजिक संदर्भ में यह कथन गहरे चिंतन को जन्म देता है। लेखक दोषारोपण नहीं करता, बल्कि परिस्थितियों की भूमिका को समझने का आग्रह करता है।

आत्मसम्मान और प्रेम का दुर्लभ संतुलन

उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक यह भी है कि लेखक ने आर्थिक विषमता को कथा का केंद्र बनाया, लेकिन उसे दया या उपकार की कहानी नहीं बनने दिया।

नैना संपन्न है। अभय संघर्षरत लेखक है। यहाँ लेखक आसानी से एक भावुक या सुविधाजनक मोड़ ले सकते थे, लेकिन वे ऐसा नहीं करते। वे लिखते हैं— “आत्मसम्मान भी प्रेम की तरह होता है… उसे दिया नहीं जाता, बचाया जाता है।”

यही कारण है कि नैना का सहयोग कभी अभय पर बोझ नहीं बनता। वह उसके आत्मविश्वास को बचाते हुए उसके जीवन में उपस्थित रहती है। समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में ऐसे संतुलित संबंध कम देखने को मिलते हैं।

लेखक का सबसे बड़ा साहस : कोई खलनायक नहीं

यह उपन्यास एक अलग कारण से भी उल्लेखनीय है। यहाँ कोई षड्यंत्रकारी पात्र नहीं है। कोई बनावटी खलनायक नहीं। कोई फिल्मी मोड़ नहीं। संघर्ष परिस्थितियों से है, मनुष्य से नहीं।

आज जब अधिकांश कथाएँ नकारात्मक पात्रों के सहारे आगे बढ़ती हैं, अनिल अनूप मनुष्य की जटिलताओं को ही कथा का आधार बनाते हैं। यही साहित्य का परिपक्व स्वरूप है।

भाषा : सहजता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है

‘किराए का बाप’ की भाषा पर विशेष चर्चा आवश्यक है। लेखक ने कठिन शब्दों की भीड़ नहीं लगाई। वे पाठक को प्रभावित करने के बजाय उससे संवाद करते हैं। इसलिए पुस्तक पढ़ते समय कहीं भी कृत्रिमता नहीं लगती।

कई स्थानों पर ऐसा अनुभव होता है कि लेखक नहीं, हमारे अपने घर का कोई बुज़ुर्ग अपने जीवन की कहानी सुना रहा है। यही सहजता पुस्तक को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाने की क्षमता रखती है।

कुछ पंक्तियाँ जो पुस्तक बंद होने के बाद भी साथ रहती हैं

इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताक़त इसकी स्मरणीय उक्तियाँ हैं। कुछ पंक्तियाँ तो जैसे पाठक के भीतर स्थायी निवास बना लेती हैं— “रिश्तों की सबसे कठिन परीक्षा अदालत में नहीं, पड़ोस की निगाहों में होती है।”

“दौलत का सबसे सुंदर रूप वह है, जो किसी का आत्मसम्मान छीने बिना उसके सपनों का रास्ता आसान कर दे।”

“आज मेरे जीवन की दो सबसे मज़बूत स्त्रियाँ एक-दूसरे से मिलीं। मुझे लगा, ईश्वर ने मेरे सभी अधूरे रिश्तों पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।”

“लोग रिश्तों को खून से मापते हैं। मैं रिश्तों को समय से मापता हूँ।”

“पिता जन्म से नहीं, जिम्मेदारी से बनते हैं।”

और अंत में—

“रिश्ते खरीदे नहीं जाते… निभाए जाते हैं।”

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक ने केवल कथानक नहीं लिखा, बल्कि जीवन के अनुभवों को शब्द दिए हैं।

क्या पुस्तक में कोई कमी भी है?

एक निष्पक्ष समीक्षक होने के नाते यह कहना भी आवश्यक है कि पुस्तक परिपूर्ण होने का दावा नहीं करती। कुछ प्रसंग—विशेषकर अभय के साहित्यिक जीवन और नैना के व्यावसायिक संसार—यदि थोड़े और विस्तार से आते, तो कथा का कैनवास और व्यापक हो सकता था।

इसी प्रकार कुछ भावनात्मक दृश्य इतने प्रभावशाली हैं कि पाठक चाहता है, लेखक उन्हें थोड़ा और ठहरकर लिखता। लेकिन आश्चर्य यह है कि ये कमियाँ असंतोष नहीं, बल्कि पात्रों के प्रति लगाव का प्रमाण बन जाती हैं।

अनिल अनूप : संवेदना के कथाकार

‘किराए का बाप’ पढ़ने के बाद अनिल अनूप के बारे में एक बात पूरे विश्वास से कही जा सकती है कि वे सनसनी नहीं, संवेदना के लेखक हैं। वे आँसू निकालने के लिए घटनाओं का सहारा नहीं लेते, बल्कि मनुष्य के भीतर की करुणा को धीरे-धीरे जगाते हैं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने पात्रों का न्याय नहीं करते। वे उन्हें समझते हैं। यही कारण है कि पाठक भी किसी पात्र से घृणा नहीं करता।

यह पुस्तक क्यों पढ़ी जानी चाहिए?

यदि आप ऐसी पुस्तक की तलाश में हैं—

  • जो परिवार को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा दे,
  • जो पितृत्व को जैविक संबंध से आगे ले जाकर उत्तरदायित्व से जोड़े,
  • जो प्रेम, आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा को एक साथ रख सके,
  • और जो बिना शोर मचाए आपके भीतर गहरा असर छोड़ जाए,

तो ‘किराए का बाप’ आपके लिए है। ₹199 मूल्य और 125 पृष्ठों में यह पुस्तक केवल एक कहानी नहीं देती, बल्कि जीवन को देखने की एक नई दृष्टि भी सौंपती है।

अंतिम निर्णय

बहुत कम उपन्यास ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़कर पाठक पात्रों को भूल नहीं पाता। ‘किराए का बाप’ उन्हीं दुर्लभ कृतियों में शामिल होने की क्षमता रखता है। यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि हर रिश्ता रक्त से नहीं बनता, हर परिवार एक ही ढाँचे में नहीं बसता और हर पिता जन्मदाता नहीं होता।

अनिल अनूप ने इस कृति के माध्यम से समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में एक ऐसे विषय को संवेदनशीलता के साथ उठाया है, जिस पर चर्चा तो बहुत हुई, लेकिन इतनी गरिमा और आत्मीयता से बहुत कम लिखा गया।

पुस्तक का अंतिम पृष्ठ बंद करने के बाद मन अनायास ही उसी वाक्य पर लौट आता है— “पिता जन्म से नहीं, जिम्मेदारी से बनते हैं।”

और शायद इसी एक पंक्ति में इस पूरे उपन्यास का शाश्वत सत्य समाया हुआ है।

‘किराए का बाप’ केवल पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं, बल्कि अपने भीतर सँजोकर रखने योग्य साहित्यिक अनुभव है।


रेटिंग : ⭐⭐⭐⭐⭐ (5/5)

एक बुज़ुर्ग व्यक्ति बच्चे को स्नेहपूर्वक गले लगाए हुए है। फीचर इमेज पर "किराए का बाप" शीर्षक के साथ लेखक पत्रकार अनिल अनूप की मार्मिक सामाजिक कहानी को दर्शाया गया है।
“किराए का बाप”— लेखक पत्रकार अनिल अनूप की संवेदनशील कहानी, जो बताती है कि पिता का रिश्ता केवल जन्म से नहीं, बल्कि प्रेम, जिम्मेदारी और अपनत्व से बनता है।

— पूर्णेंदु झा

📚 सूचना:
बहुप्रतीक्षित उपन्यास ‘किराए का बाप’ आगामी 15 अगस्त से देशभर के प्रमुख पुस्तक विक्रेताओं, सभी ए.एच. व्हीलर्स (A.H. Wheeler) स्टोर्स तथा चुनिंदा बुक स्टॉल्स पर उपलब्ध होगा।

One Comment

  1. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

    माननीय पूर्णेंदु झा साहिब ने सुप्रसिद्व लेखक-पत्रकार श्री अनिल अनूप जी रचित उपन्यास ‘किराए का बाप’ की रूपरेखा जिस लेखकीय कौशल और गहरी सूझबूझ से तैयार की है वो अपने आप में एक सराहनीय प्रयास है।
    पाठकों को किसी रचना के प्रति आकर्षित करने में सबसे अधिक शीर्षक और उसके बाद समीक्षा की विशेष भूमिका होती है। झा साहिब ने अपने कर्तव्य का बड़ी जिम्मेदारी से निर्वाह किया है।
    भाई अनिल अनूप की कलम के जादूई सम्मोहन के कारण ही उनसे मेरी नजदीकियां संभव हुई हैं। लेखन सिर्फ निजी अभिव्यक्ति का साधन नहीं होता बल्कि समाज में एक सार्थक संवाद स्थापित करने की जिम्मेदारी भी होता है।
    भाई अनूप पत्रकारिता और साहित्य संबंधी लेखन के माध्यम से इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा रहे हैं।
    पूर्णेंदु झा साहिब ने भी ‘किराए का बाप’ की समीक्षा लिख कर कर्तव्य बोध की जिस भावना को मूर्त रूप दिया है, उसके लिए मैं उनका आभारी हूं।

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