शख्शियत

पंडवानी की अमर आवाज़ : तीजन बाई का जाना केवल एक कलाकार का नहीं, भारतीय लोक चेतना के एक युग का अवसान है

अनिल अनूप

जब किसी महान कलाकार का निधन होता है तो केवल एक व्यक्ति इस दुनिया से विदा नहीं होता, बल्कि उसके साथ एक पूरा सांस्कृतिक कालखंड भी स्मृतियों में बदल जाता है। छत्तीसगढ़ की लोकगायिका, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन भारतीय लोक संस्कृति के लिए ऐसी ही अपूरणीय क्षति है। उन्होंने केवल पंडवानी नहीं गाई, बल्कि महाभारत की विराट कथा को अपनी अद्भुत आवाज़, अभिनय, भाव-भंगिमाओं और मंचीय ऊर्जा के माध्यम से इस तरह जीवंत किया कि दुनिया ने पहली बार महसूस किया कि भारत की लोककलाएं केवल गांवों की धरोहर नहीं, बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक विरासत हैं।

तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साहस, आत्मविश्वास और कला के प्रति अटूट समर्पण की ऐसी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को दशकों तक प्रेरित करती रहेगी। उन्होंने सामाजिक बंधनों, आर्थिक अभावों, पारिवारिक विरोध, व्यक्तिगत दुखों और तमाम कठिनाइयों को अपनी कला के आगे कभी टिकने नहीं दिया। यही कारण है कि आज उनका नाम केवल एक लोकगायिका के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा की सबसे ऊंची पहचान के रूप में लिया जाता है।

मिट्टी से उठी वह आवाज़ जिसने दुनिया को चौंका दिया

छत्तीसगढ़ के एक साधारण ग्रामीण परिवार में जन्मी तीजन बाई का बचपन सुविधाओं से कोसों दूर था। परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर था। जीवन में संघर्ष बचपन से ही साथी बन गया था। लेकिन प्रकृति, लोकगीत, गांव का वातावरण और परिवार में संगीत की सहज उपस्थिति ने उनके भीतर कला का ऐसा बीज बो दिया, जो आगे चलकर एक विशाल वटवृक्ष बन गया।

कहते हैं कि कलाकार पैदा होते हैं, बनाए नहीं जाते। तीजन बाई इसका सबसे सशक्त उदाहरण थीं। बचपन में जब उन्होंने अपने बुजुर्ग रिश्तेदारों से पंडवानी सुनी तो उनके भीतर यह कला हमेशा के लिए बस गई। उन्होंने तय कर लिया कि जीवन चाहे जिस दिशा में जाए, वह इसी लोक परंपरा को अपना जीवन बनाएंगी।

पंडवानी क्या है और इसकी विशेषता क्यों है?

पंडवानी छत्तीसगढ़ की अत्यंत समृद्ध लोकगायन परंपरा है, जिसमें महाभारत की कथा को गायन, अभिनय, संवाद और संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है। यह केवल गीत नहीं, बल्कि लोक रंगमंच का जीवंत रूप है।

इस कला में मुख्य कलाकार महाभारत की घटनाओं का गायन करते हुए स्वयं ही भीष्म, अर्जुन, दुर्योधन, भीम, द्रौपदी, श्रीकृष्ण और अन्य पात्रों की भूमिका निभाता है। हाथ में तंबूरा केवल वाद्य नहीं होता, बल्कि कभी धनुष, कभी गदा, कभी रथ और कभी तलवार का प्रतीक बन जाता है। यही अभिनय और गायन का अद्भुत संगम पंडवानी को दूसरी लोक परंपराओं से अलग पहचान देता है।

जब महिलाओं के लिए यह कला लगभग वर्जित थी

आज यह जानकर आश्चर्य होता है कि एक समय पंडवानी पर पुरुषों का लगभग एकाधिकार था। महिलाओं का मंच पर आकर इसे गाना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जाता था।

ऐसे समय में तीजन बाई ने परंपराओं को चुनौती दी। उन्होंने केवल मंच पर कदम नहीं रखा बल्कि उस शैली को अपनाया, जिसे सबसे कठिन माना जाता था—कापालिक शैली।

इस शैली में कलाकार बैठकर नहीं बल्कि पूरे मंच पर घूमते हुए अभिनय करता है। कथा के साथ-साथ शरीर की ऊर्जा, चेहरे के भाव, हाथों की गति और संवाद की शक्ति इस शैली की पहचान है। एक किशोरी का इस शैली को अपनाना उस दौर में किसी क्रांति से कम नहीं था।

विरोध, तिरस्कार और बहिष्कार भी नहीं रोक पाए

तीजन बाई के जीवन का सबसे बड़ा अध्याय संघर्ष का है। जब उन्होंने पंडवानी सीखनी शुरू की तो समाज ने विरोध किया। परिवार ने भी इसे स्वीकार नहीं किया। सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा। घर से अलग होना पड़ा। उनकी पहली शादी टूट गई। बाद के वैवाहिक जीवन में भी कला को लेकर मतभेद बने रहे।

लेकिन उन्होंने कभी अपनी कला से समझौता नहीं किया। उन्होंने एक बार कहा था कि यदि जीवन में सब कुछ छोड़ना पड़े तो छोड़ दें, लेकिन पंडवानी नहीं छोड़ेंगी। यही जिद आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

पहला मंच और पहचान की शुरुआत

महज तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। ग्रामीण परिवेश में हुए उस छोटे से कार्यक्रम ने शायद किसी को यह अनुमान नहीं दिया होगा कि सामने खड़ी यह किशोरी आगे चलकर भारत की सांस्कृतिक पहचान बनने वाली है। धीरे-धीरे गांव से कस्बा, कस्बे से शहर और फिर बड़े सांस्कृतिक मंच उनके सामने खुलते चले गए।

उनकी आवाज़ में ऐसी गूंज थी जो सीधे श्रोताओं के मन तक पहुंचती थी। अभिनय में इतनी ऊर्जा थी कि दर्शक स्वयं को महाभारत के युद्धक्षेत्र में खड़ा महसूस करने लगते थे।

भारत भवन से लेकर दुनिया के मंच तक

उनकी प्रतिभा को असली विस्तार तब मिला जब उन्हें बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में आमंत्रित किया जाने लगा। भारत भवन जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति ने कला जगत का ध्यान उनकी ओर खींचा। प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर उनकी प्रस्तुति से अत्यंत प्रभावित हुए। यहीं से राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान का नया अध्याय शुरू हुआ। बाद में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति देने का अवसर मिला।

एक प्रसिद्ध प्रसंग अक्सर याद किया जाता है। इंदिरा गांधी ने उनकी प्रस्तुति के बाद कहा—”आप बहुत अच्छा महाभारत करती हैं।”

इस पर तीजन बाई ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया— “महाभारत नहीं करती हूं, महाभारत की कथा सुनाती हूं।” यह उत्तर उनकी कला की गहरी समझ और आत्मविश्वास दोनों को दर्शाता है।

अभिनय जिसने दर्शकों को बांध लिया

तीजन बाई केवल गायिका नहीं थीं। वे मंच पर पहुंचते ही पूरी तरह पात्रों में ढल जाती थीं। कभी भीम की गर्जना, कभी अर्जुन का आत्मविश्वास, कभी द्रौपदी का दर्द और कभी श्रीकृष्ण की नीति—हर पात्र उनके चेहरे, स्वर और शरीर की भाषा में उतर आता था। उनका तंबूरा केवल संगीत का साधन नहीं, अभिनय का सबसे प्रभावी उपकरण बन जाता था। इसी कारण विदेशी दर्शक भी भाषा न समझने के बावजूद उनकी प्रस्तुति से जुड़ जाते थे।

संघर्षों से भरा निजी जीवन

लोकप्रियता का अर्थ सुखद निजी जीवन नहीं होता। तीजन बाई का जीवन अनेक व्यक्तिगत त्रासदियों से भी गुजरा। उन्होंने अपने जीवन में कई प्रियजनों को खोया। वैवाहिक संबंध टूटे। आर्थिक संकट झेले। सामाजिक अपमान सहा। इसके बावजूद उन्होंने कभी मंच नहीं छोड़ा। उनके लिए पंडवानी केवल पेशा नहीं, जीवन का आधार थी।

शिक्षा नहीं मिली, लेकिन ज्ञान की धनी थीं

तीजन बाई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकीं। लेकिन महाभारत की हजारों पंक्तियां उन्हें कंठस्थ थीं। लोकभाषा, संवाद, अभिनय और मानवीय मनोविज्ञान की उनकी समझ किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं थी। यही कारण है कि अनेक विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियों से सम्मानित किया। उन्होंने यह भी साबित किया कि प्रतिभा केवल डिग्रियों की मोहताज नहीं होती।

सम्मानों से सजा गौरवशाली सफर

भारतीय संस्कृति के लिए उनके योगदान को देश ने समय-समय पर सर्वोच्च सम्मान दिए। उन्हें पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी सम्मान, पद्म भूषण और अंततः पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया। यह सम्मान केवल तीजन बाई के लिए नहीं थे।

इन सम्मानों के माध्यम से पहली बार देश ने लोक कलाकारों और लोक परंपराओं के महत्व को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ को विश्व सांस्कृतिक मानचित्र पर स्थापित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

फिल्मों और रंगमंच तक पहुंची पंडवानी

प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें अपने चर्चित धारावाहिक में स्थान दिया। इसके बाद देशभर के दर्शकों ने पहली बार दूरदर्शन पर पंडवानी की अद्भुत प्रस्तुति देखी।

यहीं से यह कला गांवों से निकलकर महानगरों और विदेशों तक पहुंची। आज यदि पंडवानी को वैश्विक पहचान मिली है तो उसके सबसे बड़े सूत्रधार के रूप में तीजन बाई का नाम सदैव लिया जाएगा।

लोककला को आधुनिक संदर्भ देने वाली कलाकार

तीजन बाई केवल पारंपरिक कथा नहीं सुनाती थीं। वे महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से समकालीन समाज, राजनीति, अन्याय, स्त्री असमानता और मानवीय मूल्यों पर भी संकेत करती थीं। यही कारण है कि उनकी प्रस्तुतियां केवल धार्मिक आख्यान नहीं बल्कि सामाजिक विमर्श भी बन जाती थीं। उनकी कला अतीत और वर्तमान के बीच एक सशक्त संवाद स्थापित करती थी।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आज जब युवा तेजी से डिजिटल संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में तीजन बाई का जीवन यह याद दिलाता है कि अपनी जड़ों से जुड़कर भी विश्व स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है। उन्होंने कभी आधुनिकता का विरोध नहीं किया, लेकिन अपनी लोक परंपरा को छोड़ा भी नहीं।

यही संतुलन उन्हें असाधारण बनाता है। उनका जीवन हर कलाकार को यह संदेश देता है कि सफलता प्रतिभा से मिलती है, लेकिन अमरता समर्पण से मिलती है।

अमर रहेगी पंडवानी की यह स्वर-गाथा

तीजन बाई आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ आने वाली पीढ़ियों तक गूंजती रहेगी। जब भी कहीं पंडवानी गाई जाएगी, जब भी महाभारत की लोकधारा मंच पर जीवंत होगी, जब भी कोई युवा कलाकार तंबूरा उठाकर मंच पर उतरेगा, वहां किसी न किसी रूप में तीजन बाई उपस्थित होंगी। उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति की आत्मा को स्वर दिया।

उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि व्यक्ति अपने उद्देश्य से जुड़ा रहे तो एक दिन वही संघर्ष उसकी सबसे बड़ी पहचान बन जाता है। भारतीय लोककला के इतिहास में तीजन बाई का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज रहेगा। वह चली गई हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनका अभिनय, उनकी ऊर्जा और पंडवानी के प्रति उनका अटूट समर्पण आने वाली सदियों तक भारतीय सांस्कृतिक चेतना को प्रेरित करता रहेगा।

❖ तीजन बाई विशेष : सवाल-जवाब ❖
प्रश्न 1. तीजन बाई कौन थीं?
तीजन बाई छत्तीसगढ़ की विश्वप्रसिद्ध पंडवानी गायिका थीं। उन्होंने अपनी दमदार आवाज़, अभिनय और मंचीय प्रस्तुति से पंडवानी लोककला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया।
प्रश्न 2. पंडवानी क्या है?
पंडवानी छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोकगायन शैली है जिसमें महाभारत की कथा को संगीत, अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं के साथ प्रस्तुत किया जाता है। इसमें मुख्य कलाकार कई पात्रों का अभिनय भी करता है।
प्रश्न 3. तीजन बाई का सबसे बड़ा योगदान क्या माना जाता है?
उन्होंने पंडवानी को गांवों की सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया तथा महिलाओं के लिए इस लोककला में नए अवसर खोले।
प्रश्न 4. तीजन बाई को कौन-कौन से प्रमुख सम्मान मिले?
उन्हें पद्मश्री (1988), संगीत नाटक अकादमी सम्मान (1995), पद्म भूषण (2003), फुकुओका पुरस्कार (2018) तथा पद्म विभूषण (2019) सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।
प्रश्न 5. तीजन बाई का जीवन प्रेरणादायक क्यों माना जाता है?
उन्होंने सामाजिक विरोध, आर्थिक अभाव, पारिवारिक संघर्ष और व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद अपनी कला नहीं छोड़ी। उनका जीवन संघर्ष, साहस और समर्पण का अद्भुत उदाहरण है।
प्रश्न 6. तीजन बाई को भारतीय लोककला की अमर आवाज़ क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी पंडवानी को समर्पित कर दी। उनकी प्रस्तुति में गायन, अभिनय, ऊर्जा और लोकसंस्कृति का ऐसा अद्भुत संगम था जिसने उन्हें भारतीय लोककला का वैश्विक चेहरा बना दिया।

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