17 अक्टूबर 2026 9:28 अपराह्न

ज़िंदगी, तुम अभी हार नहीं सकती, अंक–2 : वह महिला, जिसने मुझे मेरे अंदर से ही मिलवाया

लेखक अनिल अनूप की तस्वीर के साथ एक संघर्षशील महिला की सांकेतिक छवि, "ज़िंदगी, तुम अभी हार नहीं सकती" श्रृंखला के दूसरे अंक की फीचर इमेज।

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लेखक अनिल अनूप

जिस सुबह मैं केवल एक आदमी नहीं, अपने भाग्य से मिलने निकला था।

रात भर नींद आँखों से दूर रही। सुबह जब दरवाज़ा खोला तो बाहर वही दुनिया थी, जो रोज़ होती थी। सूरज ने किसी नए दिन की घोषणा नहीं की थी। पक्षियों की आवाज़ भी वैसी ही थी। गलियों में वही लोग थे, जो रोज़ दिखाई देते थे। लेकिन मेरे भीतर कुछ बदल चुका था।

मैंने उस दिन घर से निकलते समय कोई विशेष निर्णय नहीं लिया था। बस इतना तय किया कि यदि वे लोग फिर दिखाई दिए, तो इस बार चुपचाप आगे नहीं बढ़ूँगा। मैं तेज़ कदमों से नहीं चला। शायद मन चाहता था कि रास्ता थोड़ा लंबा हो जाए।

जिस मोड़ पर कल वह परिवार दिखाई दिया था, वहाँ पहुँचने से पहले ही मेरी नज़र अनायास उसी दिशा में चली गई। वे वहाँ थे।

स्त्री ज़मीन पर बैठी थी। दोनों बच्चे उसके बिल्कुल पास खेल रहे थे। वह आदमी, जिसे देखकर पहली नज़र में ही समझ में आ जाता था कि उसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है, कभी बच्चों को देखता, कभी बिना किसी कारण आकाश की ओर मुस्कुरा देता।

मैं कुछ क्षण दूर खड़ा रहा। मन में संकोच था। अजनबी होकर किसी के जीवन में प्रवेश करना आसान नहीं होता। लेकिन न जाने कहाँ से साहस आया। मैं धीरे-धीरे उनके पास पहुँचा। मेरे कदमों की आहट सुनकर स्त्री ने सिर उठाया। उसकी आँखों में डर नहीं था… थकान थी। ऐसी थकान, जो एक दिन की नहीं, वर्षों की होती है।

मैंने बहुत सहज स्वर में पूछा— “बहन… कहीं जाना है क्या?” उसने क्षणभर मुझे देखा। फिर धीमे से बोली— “जाना तो बहुत जगह है… लेकिन ठिकाना कहीं नहीं है।”

उसका उत्तर सुनकर मैं कुछ पल मौन रह गया। यह वाक्य किसी साहित्यकार ने नहीं लिखा था। यह जीवन ने लिखा था। मैंने बच्चों की ओर देखा। एक बच्चा माँ की साड़ी का किनारा पकड़े खड़ा था। दूसरा मिट्टी में कुछ रेखाएँ बना रहा था। मैंने पूछा— “ये आपके बच्चे हैं?”

उसने मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन वह मुस्कान होंठों तक पहुँचने से पहले ही बुझ गई। “हाँ… यही मेरी दुनिया हैं।”

मैंने उस व्यक्ति की ओर संकेत किया— “और ये…?” उसने बिना किसी झिझक के कहा— “ये मेरे पति हैं…”

कुछ क्षण रुककर उसने अगला वाक्य कहा… और वही वाक्य मेरे जीवन के सबसे भारी वाक्यों में शामिल हो गया।

“लोग इन्हें पागल कहते हैं… लेकिन मैं आज भी इन्हें अपने बच्चों का पिता कहती हूँ।”

मैं अवाक् रह गया। उसने अपने पति की ओर वैसे देखा, जैसे कोई पत्नी नहीं… जैसे कोई मनुष्य दूसरे मनुष्य की टूटी हुई गरिमा को अपने आँचल से ढँक लेना चाहता हो। मैंने पहली बार महसूस किया… गरीबी से बड़ा दुःख है— किसी अपने को धीरे-धीरे दुनिया से बिछुड़ते हुए देखना। मैं बहुत कुछ पूछना चाहता था। लेकिन उस दिन मैंने केवल इतना पूछा— “खाना खाया?”

उसने सिर झुका लिया। उत्तर शब्दों में नहीं था। उत्तर उसकी खामोशी में था। समय बीत रहा था। अब हमारी मुलाक़ातें संयोग नहीं रह गई थीं। पत्रकार होने के कारण शहर के उस हिस्से में मेरा आना-जाना बना रहता था। कभी दो मिनट की बातचीत होती, कभी आधा घंटा बीत जाता। धीरे-धीरे औपचारिकता की दीवार गिरने लगी।

मैंने महसूस किया कि वह अपने बारे में कम बोलती थी, लेकिन बच्चों के बारे में घंटों बात कर सकती थी। एक दिन मैंने सहज ही पूछा— “तुम बिहार के किस इलाके की हो?”

उसने कहा— “भागलपुर जिले का एक छोटा-सा गाँव है… वहीं की हूँ।” उसके चेहरे पर गाँव का नाम लेते ही एक अलग-सी चमक आ गई।

मैंने मुस्कुराकर पूछा— “फिर बनारस तक का सफर कैसे तय हुआ?” इस बार उसने उत्तर देने में जल्दबाज़ी नहीं की। कुछ क्षण तक सामने खेल रहे बच्चों को देखती रही। फिर बोली— “कभी-कभी आदमी सफर नहीं चुनता… हालात चुन लेते हैं।”

मैं चुप रहा। वह आगे कहने लगी— “हम लोग बहुत साधारण परिवार से हैं। पिता चाहते थे कि बेटी का घर बस जाए। मेरी भी शादी हो गई। मैं यह सोचकर ससुराल गई थी कि जैसे हर लड़की नए सपने लेकर जाती है, वैसे ही मेरा भी संसार बनेगा।” वह कुछ पल के लिए रुक गई। “शादी के बाद धीरे-धीरे समझ में आया कि मेरे पति मानसिक रूप से बीमार हैं। गाँव में किसी ने बीमारी नहीं देखी, सबने सिर्फ़ एक शब्द कहा— ‘पागल’।”

उसने यह शब्द बहुत धीरे बोला। जैसे किसी का अपमान नहीं करना चाहती हो। “लोग सलाह देते थे— भाग जाओ… अभी पूरी ज़िंदगी पड़ी है।”

मैंने पूछा— “तुमने क्या सोचा?” वह मेरी ओर देखकर हल्का-सा मुस्कुराई। “सोचने का समय कहाँ था? शादी हो चुकी थी। वे मेरे पति थे। बीमारी उनकी थी… बेवफाई तो नहीं थी।”

उसका यह उत्तर सुनकर मैं भीतर तक हिल गया। आज के समय में जब छोटे-छोटे कारण रिश्तों को तोड़ देते हैं, यह ग्रामीण युवती बीमारी और इंसान में फर्क कर रही थी। उसने आगे कहा— “मैं उन्हें डॉक्टरों के पास भी ले गई। ओझा-गुनी के पास भी लोग ले गए। दवा भी चली, दुआ भी चली… लेकिन जो होना था, वही होता रहा।”

मैंने देखा… वह अपने पति की एक भी शिकायत नहीं कर रही थी। मैंने पूछा— “फिर तुम्हारी ज़िंदगी कैसे चली?”

वह हँसी। इस बार सचमुच हँसी। “ज़िंदगी पूछकर थोड़ी चलती है…”

फिर उसने अपने दोनों बच्चों की ओर इशारा किया। “पहले बेटा आया, फिर बेटी और मुझे लगा कि भगवान ने मेरे हिस्से की सारी ताकत इन्हीं दोनों में बाँट दी है।”

मैंने सहजता से पूछा— “डर नहीं लगा?” उसने बिना एक पल गंवाए उत्तर दिया— “डर तो हर रोज़ लगता था। लेकिन माँ बनने के बाद औरत को डरने की छुट्टी नहीं रहती।”

मैं कुछ लिख नहीं रहा था। उस दिन मैं केवल सुन रहा था। पत्रकार मुझमें कहीं पीछे छूट गया था। सामने केवल एक मनुष्य बैठा था, जो दूसरे मनुष्य के साहस को देख रहा था।

उसने कहा— “दस साल बीत गए। लोग कहते रहे— अब भी देर नहीं हुई। लेकिन मुझे लगता था कि किसी बीमार आदमी को छोड़कर चले जाना मेरी जीत नहीं हो सकती।”

मैंने पहली बार महसूस किया… साहस हमेशा तलवार लेकर नहीं आता। कभी-कभी वह एक स्त्री के धैर्य के रूप में घर के आँगन में चुपचाप बैठा रहता है। कुछ देर बाद उसने धीमे स्वर में कहा— “लेकिन एक दिन मुझे समझ में आ गया… अब मुझे अपने बच्चों का भविष्य बचाना है। अगर मैं यहीं रुकी रही, तो ये दोनों भी उसी अँधेरे में बड़े होंगे।”

उसने बेटी के सिर पर हाथ रखा। बेटे को अपनी ओर खींच लिया।

और बोली— “मैंने कोई क्रांति नहीं की… बस एक माँ ने अपने बच्चों का हाथ पकड़ा… और एक नया रास्ता चुन लिया।” उस दिन पहली बार मुझे मालूम हुआ कि वह बनारस किसी सपने की तलाश में नहीं आई थी।

वह अपने बच्चों के भविष्य को बचाने आई थी। आज… वर्षों बाद… जब मैं उसे आत्मसम्मान के साथ अपने पैरों पर खड़ा देखता हूँ… जब उसके बच्चे पढ़-लिख रहे हैं… जब उसके चेहरे पर हार नहीं, संतोष दिखाई देता है… तब मुझे लगता है कि उस दिन उसने केवल शहर नहीं बदला था… उसने अपने बच्चों की तक़दीर बदलने का निर्णय लिया था।

और सच पूछिए… उस दिन पहली बार मेरे मन में उसके लिए सहानुभूति नहीं… सम्मान जन्मा। क्योंकि मैंने समझ लिया था— जो स्त्री अपने टूटे हुए जीवन को अपने बच्चों के लिए फिर से खड़ा कर दे… उसे दया नहीं, प्रणाम मिलना चाहिए।


अगले सोमवार… अंक–3

“मैं भागी नहीं थी… मैं अपने बच्चों को बचाने निकली थी।”

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