अल नीनो की आहट से बढ़ी चिंता : कम बारिश, भीषण गर्मी और सूखे के खतरे ने बढ़ाई किसानों की बेचैनी

रिपोर्टर कमलेश कुमार चौधरी की तस्वीर के साथ अल नीनो, भीषण गर्मी, सूखा और कमजोर मॉनसून को दर्शाती लैंडस्केप फीचर इमेज।

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कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

देशभर में मई महीने की तपती गर्मी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। राजधानी नई दिल्ली समेत उत्तर भारत के अधिकांश हिस्से भीषण लू की चपेट में हैं। कहीं-कहीं हल्की बारिश जरूर हो रही है, लेकिन उमस और तापमान में कोई खास राहत देखने को नहीं मिल रही। इसी बीच मौसम विभाग और अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों की नई चेतावनियों ने चिंता और बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वर्ष प्रशांत महासागर में तेजी से विकसित हो रहा “सुपर अल नीनो” भारतीय मॉनसून पर गंभीर असर डाल सकता है।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के 26 मई के आसपास केरल पहुंचने की संभावना है। सामान्य तौर पर मॉनसून एक जून के आसपास केरल में दस्तक देता है, लेकिन इस बार इसके समय से पहले आने के संकेत मिले हैं। हालांकि मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मॉनसून का जल्दी आना जरूरी नहीं कि पूरे देश में अच्छी बारिश का संकेत हो। असली चिंता अगस्त और सितंबर के महीनों को लेकर जताई जा रही है, जब अल नीनो का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई दे सकता है।

क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?

अल नीनो एक समुद्री और वायुमंडलीय स्थिति है, जिसमें प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम चक्र पर पड़ता है। भारत में इसका सीधा प्रभाव मॉनसूनी बारिश पर दिखाई देता है। जब अल नीनो मजबूत होता है, तब भारत में सामान्य से कम बारिश होती है, जिससे सूखे जैसे हालात बनने लगते हैं।

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मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस बार बनने वाला अल नीनो वर्ष 1997 और 2015 जैसे खतरनाक दौर की याद दिला सकता है। उन वर्षों में भारत के कई राज्यों में भारी जल संकट, फसल नुकसान और भीषण गर्मी देखने को मिली थी। इस बार भी वैसी ही स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है।

अगस्त-सितंबर में सबसे ज्यादा असर

विशेषज्ञों का कहना है कि जून और जुलाई में मॉनसून सामान्य दिखाई दे सकता है, लेकिन अगस्त और सितंबर में बारिश अचानक कमजोर पड़ सकती है। यही समय खरीफ फसलों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि इन महीनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई, तो धान, मक्का, सोयाबीन, दाल और कपास जैसी फसलों को भारी नुकसान हो सकता है।

भारत के लगभग 60 प्रतिशत किसान खेती के लिए मॉनसूनी बारिश पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में बारिश में कमी सीधे कृषि उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्यान्न आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है। कम बारिश का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जलाशयों, नदियों और भूजल स्तर पर भी पड़ेगा।

मध्य भारत में सबसे ज्यादा संकट की आशंका

मौसम एजेंसियों के मुताबिक मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में इस बार हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, चंबल, जबलपुर, रीवा, शहडोल, सागर और नर्मदापुरम संभागों में सामान्य से काफी कम बारिश होने की आशंका जताई गई है। इन इलाकों में पहले से ही तापमान तेजी से बढ़ रहा है और जलस्रोतों पर दबाव बढ़ने लगा है।

यदि अगस्त और सितंबर में बारिश कमजोर रही, तो यहां सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। इसका सीधा असर किसानों की आय और ग्रामीण जीवन पर पड़ेगा। कई जिलों में पेयजल संकट भी गहराने की संभावना जताई जा रही है।

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पंजाब, हरियाणा और राजस्थान पर भी खतरा

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान को भी इस बार अल नीनो की सबसे बड़ी मार झेलनी पड़ सकती है। ये राज्य देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में गिने जाते हैं, लेकिन कम बारिश होने की स्थिति में खेतों में नमी की भारी कमी हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मॉनसून कमजोर रहा तो धान और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होगी।

राजस्थान के कई इलाके पहले से ही भीषण गर्मी और जल संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में बारिश की कमी हालात को और गंभीर बना सकती है। हरियाणा और पंजाब में भी भूमिगत जलस्तर लगातार गिर रहा है, जो चिंता का विषय बन चुका है।

दिल्ली-एनसीआर में गर्मी से राहत की उम्मीद कम

नई दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में लोगों को इस बार लंबी और अधिक तीखी गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। मौसम विभाग के अनुसार यहां सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। इसके चलते लू के थपेड़े लंबे समय तक जारी रह सकते हैं।

दिल्ली-एनसीआर पहले ही प्रदूषण, हीटवेव और जल संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। यदि मॉनसून कमजोर रहा, तो बिजली की मांग बढ़ेगी और जल आपूर्ति पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में भी बढ़ेगी मुश्किल

मौसम विशेषज्ञों ने दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र, उत्तरी कर्नाटक, गुजरात, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भी सूखे जैसी स्थिति बनने की चेतावनी दी है। इन क्षेत्रों में बारिश की कमी से जलाशयों का स्तर गिर सकता है, जिससे खेती और पेयजल दोनों प्रभावित होंगे।

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विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जून के बाद मॉनसून कमजोर पड़ता है, तो बिजली उत्पादन और औद्योगिक गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है। ग्रामीण इलाकों में रोजगार संकट भी गहरा सकता है।

समय से पहले मॉनसून, लेकिन चिंता बरकरार

भारतीय मौसम विभाग ने कहा है कि मॉनसून 26 मई के आसपास केरल पहुंच सकता है। हालांकि इसमें चार दिन आगे-पीछे होने की संभावना भी बनी हुई है। पिछले वर्ष मॉनसून 24 मई को केरल पहुंचा था।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मॉनसून का जल्दी आना हमेशा अच्छी बारिश का संकेत नहीं होता। कई बार शुरुआती तेजी के बाद बारिश कमजोर पड़ जाती है। इस बार भी अल नीनो के कारण ऐसा होने की आशंका जताई जा रही है।

सरकार और किसानों के लिए बड़ी चुनौती

कम बारिश और भीषण गर्मी की आशंका ने सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यों को अभी से जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और सूखा राहत योजनाओं पर काम शुरू करना होगा। किसानों को भी कम पानी वाली फसलों और वैकल्पिक खेती की ओर बढ़ने की सलाह दी जा रही है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते तैयारी नहीं की गई, तो आने वाले महीनों में देश के कई हिस्सों में जल संकट, खाद्यान्न संकट और महंगाई जैसी समस्याएं गहरा सकती हैं। फिलहाल पूरे देश की नजर मॉनसून की चाल और अल नीनो के प्रभाव पर टिकी हुई है।

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Author: यायावर

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