राखी के रंगों में सजी कविता की शाम, भाई-बहन के रिश्ते की स्मृतियों ने छुआ मन

मुंबई के गोरेगांव में ‘राखी के रंग, कविता के संग’ कार्यक्रम में कवयित्रियों, साहित्यकारों और कलाकारों के साथ रिपोर्टर शमी एम. इरफ़ान की तस्वीर

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‘राखी के रंग, कविता के संग’ में गीत, ग़ज़ल, नज़्म और कजरी से सजा साहित्यिक-सांस्कृतिक समारोह

शामी एम. इरफ़ान की रिपोर्ट

मुंबई। रक्षाबंधन केवल कलाई पर बंधे एक धागे का उत्सव नहीं, बल्कि स्मृतियों, स्नेह, विश्वास और रिश्तों की उस अदृश्य डोर का पर्व है, जो समय और दूरी की सीमाओं से परे मनुष्य को अपनेपन से जोड़ती है। मुंबई में इसी भावभूमि को कविता, गीत, ग़ज़ल, नज़्म और संगीत के सुरों में महसूस किया गया, जब चित्रनगरी संवाद मंच, मुंबई की ओर से रविवार, 30 अगस्त को गोरेगांव स्थित केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट सभागार में विशेष सांस्कृतिक संध्या ‘राखी के रंग, कविता के संग’ का आयोजन किया गया।

साहित्य और संस्कृति से जुड़े इस आयोजन में रक्षाबंधन के बहाने भाई-बहन के रिश्ते की अनेक छवियां सामने आईं। कहीं बचपन की शरारतों और साझा स्मृतियों की खुशबू थी, कहीं दूर चले गए भाई की याद ने आंखों को नम किया तो कहीं बहन के स्नेह में परिवार, संस्कार और सामाजिक समरसता की व्यापक तस्वीर दिखाई दी। मंच पर शब्द जब स्वर बने और स्वर जब संगीत से मिले, तो पूरा सभागार रिश्तों की आत्मीयता से भर उठा।

कविता में उतर आया भाई-बहन का संसार

चित्रनगरी संवाद मंच की साप्ताहिक साहित्यिक महफ़िल लंबे समय से साहित्य, सिनेमा और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को एक साझा मंच उपलब्ध कराती रही है। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस बार महिला रचनाकारों को विशेष रूप से मंच प्रदान किया गया।

पारंपरिक परिधानों और विविध रंगों में सजी कवयित्रियों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को केवल साहित्यिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव का रूप भी दे दिया। उनकी रचनाओं में भाई-बहन के रिश्ते की कोमलता कई रूपों में दिखाई दी। किसी कविता में राखी के धागे के साथ बचपन का आंगन लौट आया तो किसी गीत में बहन की प्रतीक्षा और भाई की स्मृति ने भावनाओं को गहराई दी।

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इन प्रस्तुतियों में निजी अनुभूति के साथ भारतीय पारिवारिक संस्कृति की वह संवेदना भी मौजूद रही, जिसमें भाई-बहन का रिश्ता केवल पारिवारिक संबंध नहीं बल्कि जीवन की कठिन राहों में साथ निभाने वाली भावनात्मक शक्ति के रूप में सामने आता है।

महिला रचनाकारों की रचनात्मक उपस्थिति

कार्यक्रम का एक उल्लेखनीय पक्ष यह रहा कि महिला रचनाकारों को अपनी संवेदनाओं और रचनात्मक अनुभवों को व्यक्त करने के लिए प्रमुखता से मंच दिया गया। अनामिका शर्मा, अर्चना वर्मा सिंह, मधु चौधरी, अर्चना झा, मंजू शर्मा, रीता कुशवाहा, अम्बिका झा, आभा दवे, नूतन राय, जयमाला राय, पूनम विश्वकर्मा, डॉ. अनु और शशिकला कालकर सहित अनेक रचनाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से शाम को विविध साहित्यिक रंग प्रदान किए।

कविताओं में रिश्तों की मिठास के साथ जीवन की बदलती परिस्थितियों की छाया भी महसूस हुई। रचनाकारों ने राखी को केवल उत्सव का प्रतीक मानने के बजाय उसे भावनात्मक जुड़ाव, पारिवारिक स्मृति और सामाजिक सौहार्द के रूप में प्रस्तुत किया।

प्रज्ञा मिश्र के सहज संचालन ने बांधे रखा कार्यक्रम

कार्यक्रम का संचालन कवयित्री प्रज्ञा मिश्र ने आत्मीय और सहज अंदाज में किया। उनके संचालन में मंचीय औपचारिकता की जगह साहित्यिक संवाद का भाव अधिक दिखाई दिया। उन्होंने एक प्रस्तुति से दूसरी प्रस्तुति के बीच भावनात्मक सेतु बनाते हुए कार्यक्रम की गति को स्वाभाविक बनाए रखा।

साहित्यिक आयोजनों में संचालन केवल नाम पुकारने की औपचारिकता नहीं होता, बल्कि वह पूरे कार्यक्रम की संवेदना को एक सूत्र में पिरोने का माध्यम भी होता है। इस दृष्टि से प्रज्ञा मिश्र का संचालन कार्यक्रम की आत्मीयता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण रहा।

गीत, ग़ज़ल और कजरी ने रचा सावन का रंग

रक्षाबंधन के आयोजन में सावन की स्मृतियों का होना स्वाभाविक था। कार्यक्रम में प्रस्तुत गीतों और कजरी ने इसी सावनी वातावरण को और गहरा कर दिया। जब शब्दों के साथ संगीत की धुनें जुड़ीं तो सभागार में एक अलग ही भावलोक निर्मित हो गया।

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कजरी की मधुरता में जहां लोकजीवन की मिट्टी की महक थी, वहीं गीतों में परिवार और रिश्तों की आत्मीयता सुनाई दी। श्रोताओं ने इन प्रस्तुतियों को विशेष सराहना दी। कविता और संगीत का यह मेल आयोजन को एक सामान्य साहित्यिक गोष्ठी से आगे ले जाकर सांस्कृतिक संध्या का रूप देता दिखाई दिया।

वरिष्ठ और युवा रचनाकारों ने साझा किया मंच

कार्यक्रम में विभिन्न पीढ़ियों और अलग-अलग साहित्यिक अनुभवों के रचनाकारों की सहभागिता देखने को मिली। खारघर, नवी मुंबई से आए वरिष्ठ कवि कुलदीप सिंह कलसी, लखनऊ से पधारे युवा शायर रविकांत पांडेय, कवि सुनील शर्मा, बहुभाषी शायर नवीन सी. चतुर्वेदी और देवमणि पांडेय ने भी अपनी रचनाओं का पाठ किया।

वरिष्ठता और नवोदित ऊर्जा का यह संगम आयोजन की महत्वपूर्ण विशेषताओं में रहा। एक ओर अनुभवी रचनाकारों की प्रस्तुति में जीवनानुभव की गहराई थी, वहीं युवा शायरों और कवियों के शब्दों में समकालीन संवेदनाओं की ताजगी दिखाई दी।

साहित्य और सिनेमा की हस्तियों की मौजूदगी

समारोह में साहित्य और सिनेमा जगत से जुड़े कई प्रतिष्ठित लोगों की उपस्थिति रही। प्रतिष्ठित शायर एवं सिने गीतकार मनजीत सिंह कोहली, रंगकर्मी राजीव रोहित, राजभाषा अधिकारी अवधेश यादव, अभिनेता सोनू पाहुजा, वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत जोशी और फिल्म पत्रकार शामी एम. इरफ़ान की मौजूदगी ने रचनाकारों का उत्साह बढ़ाया।

चित्रनगरी संवाद मंच की विशेषता ही यह है कि यहां साहित्य और सिनेमा के बीच संवाद की संभावनाएं बनी रहती हैं। इस आयोजन में भी यही साझा सांस्कृतिक परिवेश दिखाई दिया, जहां कविता लिखने वाले, उसे सुनने वाले, अभिनय और संगीत से जुड़े कलाकार तथा पत्रकार एक ही छत के नीचे एक-दूसरे की रचनात्मक ऊर्जा के सहभागी बने।

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रिश्तों की गरमाहट से देर तक महकता रहा सभागार

पूरे कार्यक्रम में रक्षाबंधन के पारिवारिक भावों के साथ सावन और भाई की स्मृतियां बार-बार रचनाओं में लौटती रहीं। कई प्रस्तुतियों में बीते हुए बचपन की तस्वीरें थीं तो कहीं समय के साथ बदलते रिश्तों की चिंता और उन्हें बचाए रखने की पुकार सुनाई दी।

दरअसल, साहित्य की खूबसूरती यही है कि वह किसी एक पर्व को भी व्यापक मानवीय अनुभव में बदल देता है। ‘राखी के रंग, कविता के संग’ में भी राखी का एक धागा कविता के माध्यम से स्मृति, संवेदना, प्रेम और सामाजिक समरसता की अनेक परतों में खुलता चला गया।

पारंपरिक परिधानों में पहुंचीं कवयित्रियों और रचनाकारों की उपस्थिति ने समारोह को उत्सवी आभा दी। गीतों, कविताओं, ग़ज़लों, नज़्मों और कजरी के बीच श्रोता कभी मुस्कुराए, कभी पुरानी स्मृतियों में लौटे और कभी भावुक भी हुए।

अंततः यह सांस्कृतिक संध्या केवल रक्षाबंधन के अवसर पर आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम बनकर नहीं रही, बल्कि उसने यह याद दिलाया कि रिश्तों की असली खूबसूरती उन भावनाओं में है जिन्हें शब्द, सुर और स्मृतियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखती हैं। मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच साहित्य ने एक शाम के लिए लोगों को ठहरने, सुनने और अपने रिश्तों को फिर से महसूस करने का अवसर दिया।

‘राखी के रंग, कविता के संग’ की यही सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि सभागार से लौटते समय श्रोताओं के साथ केवल कार्यक्रम की प्रस्तुतियां नहीं थीं, बल्कि अपनेपन की वह अनुभूति भी थी, जो राखी के एक छोटे से धागे को जीवनभर के रिश्ते में बदल देती है।

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Author: यायावर

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