जब एक पूरा युग मौन हो गया : शब्दों का यायावर बल्लभ डोभाल की स्मृतियों में जीवित मनुष्यता

वरिष्ठ साहित्यकार बल्लभ डोभाल की दो तस्वीरें, पुस्तकालय की पृष्ठभूमि में बैठे हुए

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पौड़ी गढ़वाल से लाहौर, धर्मशाला और इलाहाबाद तक फैले जीवन-सफर में उन्होंने साहित्य को नौकरी नहीं, साधना माना। तीन दर्जन से अधिक पुस्तकों के रचयिता यह स्वाधीन चेतना के लेखक अंत तक मनुष्य, स्मृतियों और जीवन मूल्यों के पक्ष में खड़े रहे।

निर्मल कौतुक

29 अगस्त 2026 को हिंदी साहित्य ने अपना एक ऐसा वरिष्ठ रचनाकार खो दिया, जिसकी स्मृतियों में लगभग एक शताब्दी का भारतीय समाज सुरक्षित था। बल्लभ डोभाल उन विरल साहित्यकारों में थे जिनके लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति था। उन्होंने अपने समय को देखा ही नहीं, उसे गहराई से समझा और फिर उसे कथा, संस्मरण, कविता तथा चिंतन के रूप में शब्द दिए। उनके निधन के साथ केवल एक लेखक का जीवन समाप्त नहीं हुआ, बल्कि अनुभवों, स्मृतियों और मानवीय संवेदनाओं का एक विशाल संसार मौन हो गया।

आज जब साहित्य का बड़ा हिस्सा बाजार, प्रचार और तात्कालिक चर्चाओं के बीच अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद में दिखाई देता है, तब बल्लभ डोभाल का जीवन और लेखन हमें उस परंपरा की याद दिलाता है जिसमें साहित्य साधना था, लेखन आत्मसंवाद था और रचनाकार अपने समय का नैतिक साक्षी हुआ करता था। वे ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने अपने लिए कोई मंच निर्मित नहीं किया, कोई गुट नहीं बनाया, किसी वैचारिक खेमे का सहारा नहीं लिया; उन्होंने केवल लिखा और इतना लिखा कि उनकी रचनाएँ स्वयं उनका परिचय बन गईं।

तीन पीढ़ियों का जीवित इतिहास

वर्ष 1930 में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की पर्वतीय धरती पर जन्मे बल्लभ डोभाल का जीवन वस्तुतः तीन अलग-अलग कालखंडों से होकर गुजरा। उन्होंने उस भारत को देखा जो अभी स्वतंत्र नहीं हुआ था, उस भारत को जिया जिसने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अपने भविष्य का निर्माण शुरू किया और उस भारत के भी साक्षी बने जिसने उदारीकरण, तकनीकी क्रांति और वैश्विक संस्कृति के प्रभाव में स्वयं को बदलते हुए देखा।

उनकी शिक्षा का विस्तार भी उनके व्यक्तित्व की तरह व्यापक था। उन्होंने लाहौर, धर्मशाला और इलाहाबाद जैसे महत्वपूर्ण शैक्षिक और सांस्कृतिक केंद्रों से शिक्षा ग्रहण की। विभाजन-पूर्व लाहौर की स्मृतियाँ, हिमालयी अंचल की सांस्कृतिक चेतना और इलाहाबाद का साहित्यिक वातावरण उनके भीतर एक साथ विकसित हुआ। यही कारण है कि उनके साहित्य में क्षेत्रीयता होते हुए भी संकीर्णता नहीं दिखाई देती। वे पहाड़ के लेखक थे, लेकिन केवल पहाड़ तक सीमित नहीं थे; वे मनुष्य के लेखक थे।

उनके जीवन का सबसे बड़ा गुण यह था कि उन्होंने अनुभवों को संग्रहित नहीं किया, उन्हें जिया। इसलिए उनकी रचनाओं में घटनाएँ केवल वर्णन बनकर नहीं आतीं, वे जीवन का हिस्सा बनकर सामने उपस्थित होती हैं।

साहित्य ही आजीविका, साहित्य ही साधना

बल्लभ डोभाल का जीवन इस अर्थ में भी असाधारण था कि उन्होंने साहित्य को केवल अपने बौद्धिक या रचनात्मक संतोष का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उसी को अपनी आजीविका और जीवन साधना दोनों का आधार बनाया। हिंदी साहित्य में ऐसे लेखक बहुत कम हुए हैं जिन्होंने पूरी स्वतंत्रता के साथ फ्रीलांस लेखन को अपनाया और उसी के सहारे जीवन जिया।

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वे कभी किसी संस्थान, विश्वविद्यालय, साहित्यिक संगठन या वैचारिक समूह के स्थायी हिस्से नहीं बने। उनकी स्वतंत्र चेतना किसी प्रकार के बंधन को स्वीकार नहीं करती थी। कहा जाता है कि जीवन में उन्हें अनेक अवसर प्राप्त हुए, लेकिन उन्होंने उन अवसरों को भी अस्वीकार कर दिया जो उनकी स्वतंत्रता के मार्ग में बाधक प्रतीत होते थे। जहां लोग नौकरी पाने के लिए प्रयत्न करते हैं, वहाँ डोभाल जी कई बार उपलब्ध नौकरियों को भी छोड़ देते थे।

उनका विश्वास था कि रचनात्मक स्वतंत्रता किसी भी सुविधा से अधिक मूल्यवान होती है। यही कारण है कि उनके लेखन में किसी विचारधारा का दबाव नहीं दिखाई देता। वे न सत्ता के लेखक थे, न विरोध के लिए विरोध करने वाले लेखक। वे जीवन के लेखक थे।

यायावर मन और संस्मरणों का अथाह संसार

बल्लभ डोभाल मूलतः यायावर थे। लंबे कद, छरहरे शरीर और जिज्ञासु स्वभाव वाले इस साहित्यकार के भीतर जीवन को जानने की एक सतत बेचैनी थी। वे लोगों से मिलते, यात्राएँ करते, अनुभवों को आत्मसात करते और फिर उन्हें शब्दों में ढाल देते।

उनके निकट आने वाला कोई भी व्यक्ति शीघ्र ही यह अनुभव कर लेता था कि वह केवल एक लेखक से नहीं, बल्कि चलते-फिरते इतिहास से संवाद कर रहा है। उनके पास घटनाओं, व्यक्तियों और समय की ऐसी स्मृतियाँ थीं जो कई पीढ़ियों को जोड़ती थीं। यही कारण था कि उन्हें संस्मरणों की जीवित खान कहा जाता था।

वे किसी प्रसंग को सुनाते समय केवल घटना का विवरण नहीं देते थे। उसके भीतर छिपे मानवीय पक्ष, सामाजिक संदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ को भी सामने ले आते थे। उनकी स्मृति केवल जानकारी का भंडार नहीं थी; वह संवेदना और अनुभव का विशाल संसार थी।

उनके भीतर का कवि भी जीवन भर सक्रिय रहा। उन्होंने लिखा—

“बुझे ये आग के शोले न जाने कब भड़क जाएं,
हुई नाकाम सी बाहें न जाने कब फड़क जाएं।”

इन पंक्तियों में उनके व्यक्तित्व की वही बेचैनी दिखाई देती है जिसने उन्हें निरंतर सक्रिय बनाए रखा। ग्रामीण पर्वतीय अंचल के लोकगीतों और लोकजीवन ने उनके भीतर संवेदना की जो भूमि तैयार की, उसी से उनके कविता संग्रह ‘सैनिक’ और ‘कदम-कदम पर’ जन्मे। वे हिंदी कविता को संस्कृत की परंपरा का उत्तराधिकारी मानते थे, लेकिन यह भी स्वीकार करते थे कि उर्दू ने उसे नई अभिव्यक्ति और नया तेवर दिया है।

‘कोलाज’ : एक जीवन नहीं, एक युग का आख्यान

बल्लभ डोभाल की साहित्यिक यात्रा का मूल्यांकन उनकी आत्मकथात्मक कृति ‘कोलाज’ के बिना अधूरा है। यह केवल एक व्यक्ति की जीवनकथा नहीं, बल्कि बीसवीं सदी के भारतीय समाज का एक जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज है।

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इस कृति में पौड़ी गढ़वाल की स्मृतियाँ हैं, धर्मशाला और शिमला का परिवेश है, इलाहाबाद की शैक्षिक चेतना है और विभाजन-पूर्व लाहौर की सांस्कृतिक धड़कन भी। पाठक को लगता है कि वह किसी लेखक की आत्मकथा नहीं, बल्कि समय के बदलते चेहरों का एक विस्तृत कोलाज देख रहा है।

‘कोलाज’ का महत्व इस बात में भी है कि उसमें विभाजन की त्रासदी केवल राजनीतिक घटना के रूप में नहीं आती, बल्कि मनुष्यों के जीवन में हुए गहरे परिवर्तनों के रूप में सामने आती है। स्मृति, विस्थापन, संबंध और समय—इन सभी को उन्होंने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है।

नारी, पर्वत और मनुष्यता का साहित्य

बल्लभ डोभाल के साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसकी मानवीय दृष्टि है। विशेष रूप से नारी के प्रति उनकी संवेदनशीलता उल्लेखनीय है। उन्होंने स्त्री को केवल पात्र के रूप में नहीं देखा, बल्कि समाज की जीवनदायिनी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया।

उनके साहित्य में पर्वतीय स्त्रियाँ विशेष रूप से उपस्थित हैं। वे श्रम करती हैं, परिवार को संभालती हैं, संस्कृति को जीवित रखती हैं और कठिन परिस्थितियों में भी जीवन को आगे बढ़ाती हैं। डोभाल जी मानते थे कि समाज का वास्तविक संतुलन स्त्री की संवेदनशीलता और दायित्वबोध पर टिका हुआ है।

उनका चर्चित उपन्यास ‘तिब्बत की बेटी’ इस दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है। धर्मशाला में शरणार्थी जीवन व्यतीत कर रही तिब्बती महिलाओं के संघर्ष, श्रम, धैर्य और आत्मबल का उसमें अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। यह केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि विस्थापन और मानवीय जिजीविषा का दस्तावेज है।

उनकी रचनाओं में धर्म, अध्यात्म और दर्शन भी उपस्थित हैं, लेकिन वे कभी अमूर्त नहीं होते। वे हमेशा मनुष्य और उसके जीवन से जुड़े रहते हैं। उनकी पुस्तक ‘चिंतन की नई दिशाएँ’ इसी व्यापक दृष्टि का प्रमाण है।

आधुनिक समय से उनका संवाद और असहमति

जीवन के अंतिम वर्षों में बल्लभ डोभाल आधुनिक समाज की दिशा को लेकर चिंतित रहते थे। उन्हें लगता था कि तकनीकी प्रगति के साथ मनुष्य का आंतरिक संसार सिकुड़ता जा रहा है। संचार के साधनों की वृद्धि के बावजूद संवाद कम हुआ है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संवेदनशीलता घटती जा रही है।

विशेष रूप से पर्वतीय समाज के आत्मनिर्भर जीवन को बाजारवाद के प्रभाव में टूटते हुए देखकर उन्हें पीड़ा होती थी। वे मानते थे कि विकास आवश्यक है, लेकिन यदि वह मनुष्य को उसकी जड़ों से काट दे तो उसका मूल्यांकन पुनः किया जाना चाहिए।

उनकी चिंता किसी अतीत-मोह से नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के क्षरण से जुड़ी हुई थी। वे चाहते थे कि आधुनिकता आए, लेकिन मनुष्य की करुणा, संवेदना और आत्मीयता को नष्ट किए बिना।

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स्मृतियों के सहारे जीने वाला मनुष्य

जीवन के अंतिम चरण में परिस्थितियों ने उन्हें अपेक्षाकृत एकांत में रहने को विवश किया। उनका एक पुत्र धर्मशाला में और दूसरा दिल्ली के नजफगढ़ क्षेत्र में रहता है। किंतु उन्होंने कभी अपने अकेलेपन को शिकायत का विषय नहीं बनाया।

जब उनसे पूछा जाता कि वे अकेले कैसे रहते हैं, तो वे मुस्कुराकर कहते कि उनके साथ उनके दादा-दादी, माता-पिता, पत्नी, मित्र और असंख्य आत्मीय जनों की स्मृतियाँ हैं। वे मानते थे कि मनुष्य तब तक नहीं मरता जब तक उसकी स्मृति किसी के भीतर जीवित रहती है।

उनका यह विश्वास केवल एक भावुक कथन नहीं था। वह उनके जीवन-दर्शन का हिस्सा था। शायद यही कारण है कि वे स्मृतियों को जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति मानते थे।

एक लेखक नहीं, एक साहित्यिक आदर्श

बल्लभ डोभाल अपने पीछे तीन दर्जन से अधिक पुस्तकों की समृद्ध विरासत छोड़ गए हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी धरोहर उनकी पुस्तकें नहीं, बल्कि वह जीवन-दृष्टि है जिसमें आत्मसम्मान, स्वतंत्रता, संवेदनशीलता और मनुष्यता सर्वोपरि हैं।

यह हमारे समय का दुर्भाग्य है कि इतने बड़े साहित्यकार को वह व्यापक राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। किंतु शायद उन्हें स्वयं इसकी कोई विशेष चिंता नहीं थी। उन्होंने जीवन भर सम्मान की अपेक्षा सृजन को महत्व दिया।

आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं तो केवल एक लेखक को श्रद्धांजलि नहीं दे रहे होते, बल्कि उस स्वतंत्र चेतना को नमन कर रहे होते हैं जिसने साहित्य को जीवन का पर्याय बना दिया। उन्होंने शब्दों को केवल लिखा नहीं, उन्हें जिया।

वे आज भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनकी रचनाएँ, उनकी स्मृतियाँ और उनकी मानवीय दृष्टि आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी। हिंदी साहित्य के इतिहास में उनका नाम एक ऐसे स्वाधीन रचनाकार के रूप में दर्ज रहेगा जिसने जीवन को समझने, मनुष्य को पहचानने और संवेदना को बचाए रखने का आजीवन प्रयास किया।

शायद यही किसी साहित्यकार की सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे स्थायी अमरता होती है।

आज बल्लभ डोभाल हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएँ अभी भी जीवित संवाद की तरह हमारे सामने उपस्थित हैं। उन्होंने साहित्य को किसी आंदोलन, पुरस्कार या प्रतिष्ठा का साधन नहीं बनाया; वह उनके लिए मनुष्य और समाज को समझने का माध्यम था। इसलिए उनकी स्मृति केवल पुस्तकों के पन्नों में नहीं, उन पाठकों के भीतर भी जीवित रहेगी जो साहित्य में जीवन की सच्ची धड़कन तलाशते हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास में उनका नाम एक ऐसे स्वाधीन रचनाकार के रूप में दर्ज रहेगा जिसने शब्दों से पहले जीवन को जिया और फिर उसे साहित्य में रूपांतरित किया।

(लेखक : निर्मल कौतुक)

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