राम मंदिर दानपात्र चोरी मामला : चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे से 81 लाख की बरामदगी का खुलासा

अयोध्या राम मंदिर दानपात्र चोरी मामले पर फीचर इमेज, जिसमें राम मंदिर, रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला और 81 लाख रुपये की बरामदगी से जुड़ी विशेष रिपोर्ट दर्शाई गई है।

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार मामला राम मंदिर के दानपात्र से कथित तौर पर 81 लाख रुपये की चोरी, उसकी बरामदगी और ट्रस्ट के दो वरिष्ठ पदाधिकारियों के इस्तीफे से जुड़ा है। ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा द्वारा ट्रस्ट अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष को सौंपे गए संयुक्त इस्तीफे के पत्र ने पूरे घटनाक्रम को नई दिशा दे दी है। पत्र में यह उल्लेख किया गया है कि दानपात्र से चोरी की गई पूरी 81 लाख रुपये की राशि आरोपितों से वापस जमा करवा ली गई थी। इसके बाद से ट्रस्ट की कार्यप्रणाली, मामले के निस्तारण और जांच प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं।

इस्तीफा पत्र से सामने आए महत्वपूर्ण तथ्य

संयुक्त इस्तीफे के पत्र में कहा गया है कि दानपात्र में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई राशि की गणना के दौरान वित्तीय गड़बड़ी का संदेह हुआ। इसके बाद 5 जून को मंदिर परिसर के सीसीटीवी फुटेज की जांच की गई, जिसमें कुछ संदिग्ध व्यक्तियों की गतिविधियां सामने आईं। ट्रस्ट ने पहले अपने स्तर पर इन लोगों से पूछताछ की। पूछताछ के दौरान कथित रूप से आरोपियों ने चोरी की बात स्वीकार कर ली और उनके परिजनों के साथ मिलकर 81 लाख रुपये की पूरी राशि ट्रस्ट में वापस जमा करा दी। साथ ही लिखित स्वीकारोक्ति भी दी गई।

इस्तीफा पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराने से पहले धनराशि की बरामदगी और स्वीकारोक्ति की प्रक्रिया पूरी की गई। यही तथ्य अब पूरे मामले में सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

एफआईआर दर्ज करने में देरी पर उठे सवाल

मामले के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध गतिविधियां दिखाई दे गई थीं तो तत्काल पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी गई। बताया जा रहा है कि 5 जून से 8 जून के बीच ट्रस्ट ने पहले अपने स्तर पर पूछताछ और धनराशि की वापसी की प्रक्रिया पूरी की, जबकि पुलिस में प्राथमिकी बाद में दर्ज कराई गई।

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कानूनी जानकारों का मानना है कि सार्वजनिक आस्था और करोड़ों रुपये के दान से जुड़े मामलों में प्रत्येक कार्रवाई पूरी पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। हालांकि ट्रस्ट का पक्ष यह रहा कि उसकी प्राथमिकता चोरी गई राशि की सुरक्षित बरामदगी और श्रद्धालुओं के विश्वास को बनाए रखना था।

मीडिया में मामला आने के बाद बढ़ा दबाव

जैसे ही यह मामला सार्वजनिक हुआ, इसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई। पारदर्शी जांच की मांग उठने लगी। इसके बाद ट्रस्ट की ओर से उत्तर प्रदेश सरकार से विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का अनुरोध किया गया।

इस्तीफा पत्र में कहा गया कि श्रद्धालुओं की आस्था और ट्रस्ट की साख को सर्वोपरि मानते हुए चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा देने का निर्णय लिया। ट्रस्ट की 6 जुलाई को हुई बैठक में दोनों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद एसआईटी का पुनर्गठन

मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में कदम उठाए गए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने एसआईटी का पुनर्गठन किया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के 13 जुलाई के आदेश के अनुसार नई जांच टीम का गठन किया गया।

नई एसआईटी में लखनऊ रेंज की आईजी किरण एस को जांच का प्रमुख बनाया गया है। अयोध्या के डीआईजी सोमेन वर्मा और एसएसपी डॉ. गौरव ग्रोवर को टीम का सदस्य बनाया गया है। जांच एजेंसी अब पूरे घटनाक्रम के प्रत्येक पहलू की जांच कर रही है।

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क्या केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित रहेगी कार्रवाई?

अयोध्या और आसपास के क्षेत्रों में इस पूरे मामले को लेकर विभिन्न प्रकार की चर्चाएं चल रही हैं। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि अब तक कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक ही सीमित क्यों दिखाई दे रही है। लोगों का कहना है कि यदि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और व्यापक होगी तो जिम्मेदारी तय करने के लिए सभी संबंधित पक्षों से समान रूप से पूछताछ की जानी चाहिए।

हालांकि जांच एजेंसियों की ओर से अब तक किसी भी वरिष्ठ पदाधिकारी के खिलाफ आधिकारिक रूप से कोई निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे में अंतिम स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

ट्रस्ट में प्रशासनिक बदलाव की शुरुआत

दानपात्र चोरी प्रकरण के बाद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में प्रशासनिक स्तर पर भी बड़े बदलाव शुरू कर दिए गए हैं। ट्रस्ट ने पहली बार सचिव पद का गठन करते हुए जगदीश आफले को इसकी जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक में संचालित खातों के संचालन के लिए अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता भी बनाया गया है।

जगदीश आफले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई से बीटेक और एमटेक की पढ़ाई कर चुके हैं। वे लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं। अमेरिका और यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्य करने के बाद उन्होंने बिना किसी पारिश्रमिक के राम मंदिर निर्माण परियोजना में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं।

पहले सीईओ की नियुक्ति की प्रक्रिया तेज

ट्रस्ट अब अपने पहले मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति की प्रक्रिया भी पूरी कर रहा है। इस पद के लिए देशभर से लगभग 5,200 आवेदन प्राप्त हुए हैं। सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रमोद कोहली की अध्यक्षता वाली चयन समिति इन आवेदनों की जांच कर रही है।

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बताया गया है कि ट्रस्ट के सचिव, प्रवक्ता और पहले सीईओ के नामों की आधिकारिक घोषणा 2 सितंबर को प्रस्तावित ट्रस्ट की बैठक में की जाएगी। माना जा रहा है कि इन नियुक्तियों के बाद ट्रस्ट की प्रशासनिक व्यवस्था को और अधिक व्यवस्थित तथा जवाबदेह बनाया जाएगा।

श्रद्धालुओं की आस्था बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती

राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में दानपात्र से जुड़ी किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को प्रभावित करती है। यही कारण है कि श्रद्धालु चाहते हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच हो तथा दोषी पाए जाने वाले सभी लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

वहीं ट्रस्ट के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती अपनी विश्वसनीयता और श्रद्धालुओं के विश्वास को पहले की तरह मजबूत बनाए रखने की है। प्रशासनिक बदलाव, नई नियुक्तियां और एसआईटी जांच को इसी दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

राम मंदिर दानपात्र से कथित 81 लाख रुपये की चोरी का मामला अब केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ट्रस्ट की प्रशासनिक कार्यप्रणाली, जवाबदेही और पारदर्शिता की भी परीक्षा बन गया है। संयुक्त इस्तीफे के पत्र से सामने आए तथ्यों ने कई नए प्रश्न खड़े किए हैं, वहीं एसआईटी जांच से पूरे मामले की सच्चाई सामने आने की उम्मीद जताई जा रही है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और ट्रस्ट द्वारा किए जा रहे प्रशासनिक सुधार इस बहुचर्चित प्रकरण की दिशा तय करेंगे।

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Author: यायावर

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