चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
अयोध्या। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या इन दिनों सावन मेले की भक्ति, संगीत और सांस्कृतिक उल्लास से सराबोर है। सावन शुक्ल तृतीया से शुरू हुआ विख्यात झूलनोत्सव अब अपने पूरे शबाब पर पहुंच चुका है। मणि पर्वत पर झूलनोत्सव की शुरुआत के बाद अयोध्या के करीब पांच हजार मंदिरों में ठाकुर जी को आकर्षक ढंग से सजाए गए झूलों पर विराजमान कराया गया है। मंदिरों में भगवान राम-जानकी के विग्रहों को झुलाने के साथ भजन, कीर्तन, कजरी, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है।
सावन मेले के इस अनूठे धार्मिक-सांस्कृतिक वातावरण का आनंद लेने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अयोध्या पहुंच रहे हैं। दिनभर मंदिरों में दर्शन और पूजन का क्रम चलता है, जबकि शाम ढलते ही झूलनोत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रौनक बढ़ जाती है। देर रात तक मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है।
पांच हजार मंदिरों में सजा झूलनोत्सव
अयोध्या के मंदिरों में सावन झूलनोत्सव की परंपरा श्रद्धा और भक्ति के साथ लोक संस्कृति को भी अपने में समेटे हुए है। करीब पांच हजार मंदिरों में ठाकुर जी को झूलों पर विराजमान कराया गया है। मंदिरों में झूलों को फूलों, रंग-बिरंगे वस्त्रों और आकर्षक सजावटी सामग्री से सजाया गया है।
भगवान राम और माता जानकी के प्रति भक्ति भाव से संत-महंत तथा मंदिरों से जुड़े श्रद्धालु झूलन के पद, भजन और लोकगीत प्रस्तुत कर रहे हैं। कई स्थानों पर कलाकार भगवान के समक्ष नृत्य की प्रस्तुतियां भी दे रहे हैं। अयोध्या में इस दौरान भक्ति और श्रृंगार रस की पारंपरिक झलक देखने को मिल रही है।
‘झूला पड़ा कदम की डाली, झूले जनक दुलारी ना’ जैसे पारंपरिक झूला गीतों की गूंज मंदिरों के वातावरण को और अधिक भावपूर्ण बना रही है। कथक सहित शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुतियां भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
प्रमुख मंदिरों में देर रात तक सांस्कृतिक कार्यक्रम
सावन मेले के अवसर पर अयोध्या के प्रमुख मंदिरों में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। रंग महल, कनक भवन, दशरथ महल, रामवल्लभाकुंज, लक्ष्मण किला, नींव मंदिर, विहवती भवन, जानकी महल, लाल जी मंदिर और गोकुल भवन सहित अनेक मंदिरों में झूलनोत्सव के साथ भजन, कीर्तन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित हो रही हैं।
इन आयोजनों को देखने के लिए श्रद्धालु एक मंदिर से दूसरे मंदिर तक पहुंच रहे हैं। शाम होते ही मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है। भक्ति संगीत और झूला गीतों के बीच मंदिरों में ऐसा वातावरण बन रहा है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ अयोध्या की पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत की झलक भी दिखाई दे रही है।
रामलला के चल विग्रह का हुआ भ्रमण
अयोध्या के सावन झूलनोत्सव में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परिसर का आयोजन भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। सावन शुक्ल तृतीया के अवसर पर रामलला के चल विग्रह को पालकी में विराजमान कर मंदिर परिसर में भ्रमण कराया गया। रामलला अपने तीनों भाइयों के साथ कुबेर टीला पहुंचे, जहां झूलनोत्सव का आयोजन किया गया।
धार्मिक मान्यताओं में झूलनोत्सव का विशेष महत्व बताया गया है। पद्म पुराण में भी झूलनोत्सव की महिमा का वर्णन मिलता है। इसी धार्मिक परंपरा को अयोध्या के मंदिरों में आज भी श्रद्धा और उत्साह के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
मणि पर्वत से जुड़ी है झूलनोत्सव की परंपरा
अयोध्या में झूलनोत्सव की शुरुआत के प्रमुख केंद्र के रूप में मणि पर्वत को विशेष महत्व प्राप्त है। यहां भगवान के विग्रहों को आकर्षक ढंग से सजाए गए झूलों पर विराजमान कराया गया। संतों और श्रद्धालुओं ने भजन, कीर्तन तथा झूलन के पारंपरिक पदों के माध्यम से उत्सव का उल्लास बढ़ाया।
मणि पर्वत पर आयोजित कार्यक्रमों में धार्मिक आस्था के साथ लोक संगीत और सांस्कृतिक परंपराओं का भी सुंदर समागम देखने को मिला। यही कारण है कि यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर झूलनोत्सव का आनंद ले रहे हैं।
‘मणि महोत्सव’ में भजन और कजरी ने बांधा समां
सावन मेले के बीच आयोजित मणि महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या भी श्रद्धालुओं और संगीत प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण रही। भजन, राष्ट्रगीत और कजरी की प्रस्तुतियों ने देर शाम तक वातावरण को भक्ति और संगीत से सराबोर रखा।
कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि महापौर महंत गिरीशपति त्रिपाठी और विशिष्ट अतिथि नगर आयुक्त जयेन्द्र कुमार ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इसके बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ।
शास्त्रीय गायक पंडित सत्यप्रकाश मिश्र ने राष्ट्रगीत की प्रस्तुति से सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत की। उनकी प्रस्तुति ने उपस्थित श्रोताओं में देशभक्ति का भाव जगाया। इसके बाद उन्होंने विभिन्न भजनों की प्रस्तुति देकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
गायक दीपक शुक्ल ने भगवान शिव की स्तुति से जुड़े भजन की प्रस्तुति दी। ‘शंकर तेरी जटा से बहती है गंगधारा’ भजन ने श्रोताओं को शिव भक्ति के रंग में रंग दिया। इसके बाद बृजमोहन तिवारी ने अपनी सुमधुर आवाज में प्रसिद्ध कजरी ‘कैसे खेले जयबू सावन मां कजरिया’ प्रस्तुत की। कजरी की प्रस्तुति पर श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं और सावन की लोक-सांस्कृतिक छटा जीवंत हो उठी।
चंद्रशेखर तिवारी ने राम भजनों की प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। एक के बाद एक प्रस्तुतियों ने पूरी सांस्कृतिक संध्या को यादगार बना दिया।

सुरक्षा व्यवस्था के भी व्यापक इंतजाम
सावन मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मेला क्षेत्र को अलग-अलग जोन और सेक्टर में बांटकर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है।
भीड़ को नियंत्रित करने और श्रद्धालुओं की सुगम आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए रूट डायवर्जन प्लान भी लागू किया गया है। प्रमुख मंदिरों, मेला क्षेत्रों और श्रद्धालुओं की अधिक आवाजाही वाले स्थानों पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है।
भक्ति, संगीत और लोक संस्कृति का संगम बना अयोध्या
अयोध्या का सावन मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध लोक एवं सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत उत्सव भी है। झूलों पर विराजमान ठाकुर जी, मंदिरों में गूंजते भजन, कजरी और झूला गीत तथा शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुतियां इस उत्सव को विशिष्ट स्वरूप प्रदान कर रही हैं।
देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालु मंदिरों में दर्शन के साथ इन सांस्कृतिक आयोजनों का आनंद भी ले रहे हैं। सावन की हरियाली, झूलों की सजावट, भक्ति संगीत और मंदिरों की रोशनी ने अयोध्या के वातावरण को उत्सवमय बना दिया है। देर रात तक चल रहे कार्यक्रमों के बीच श्रद्धालुओं की आस्था और उल्लास देखते ही बन रहा है।
इस तरह अयोध्या का सावन मेला इस वर्ष भी धार्मिक श्रद्धा, लोक संस्कृति, संगीत और भक्ति का अद्भुत संगम प्रस्तुत कर रहा है। मणि पर्वत से लेकर शहर के हजारों मंदिरों तक झूलनोत्सव की परंपरा श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर रही है और अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक समृद्ध कर रही है।

























