20 अक्टूबर 2026 10:35 अपराह्न

‘किराए का बाप’ ही क्यों? – उपन्यास के शीर्षक पर पाठकों के सवाल का विस्तृत उत्तर

लेखक अनिल अनूप की तस्वीर के साथ 'किराए का बाप' हिंदी सामाजिक उपन्यास की लैंडस्केप फीचर इमेज, जिसमें पिता-पुत्र के भावनात्मक रिश्ते को दर्शाया गया है।

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✍️ प्रस्तुति : अंजनी कुमार त्रिपाठी

लेखक-पत्रकार अनिल अनूप की प्रकाश्य सामाजिक संवेदनाओं पर आधारित पुस्तक ‘किराए का बाप’ की एक समीक्षात्मक टिप्पणी हाल ही में जनगणदूत में प्रकाशित हुई। समीक्षा प्रकाशित होने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों से पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मिलने लगीं। इन्हीं प्रतिक्रियाओं के बीच सूरत (गुजरात) निवासी सजग पाठक सुजीत भाई देवसरे ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक प्रश्न उठाया। उनका सवाल था—

“आख़िर उपन्यास का नाम ‘किराए का बाप’ ही क्यों रखा गया? क्या इस पुस्तक का कोई दूसरा, अधिक सहज और भावनात्मक नाम नहीं हो सकता था?”

यह प्रश्न केवल शीर्षक को लेकर जिज्ञासा नहीं है, बल्कि उपन्यास की मूल संवेदना और उसके वैचारिक आधार को समझने का प्रयास भी है। किसी भी रचना का शीर्षक उसके कथ्य का पहला परिचय होता है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि पाठक उसके चयन के पीछे लेखक की सोच को जानना चाहे।

पाठक सुजीत भाई देवसरे के इसी सार्थक प्रश्न का लेखक अनिल अनूप ने विस्तार से, तर्कपूर्ण और भावनात्मक उत्तर दिया है। प्रस्तुत है लेखक का वह विशेष लेख, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि ‘किराए का बाप’ केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि पूरे उपन्यास की आत्मा और उसके केंद्रीय प्रश्न का प्रतीक है।

यह प्रश्न मुझे अनेक पाठकों ने पूछा है और सच कहूँ तो मुझे इस प्रश्न की प्रतीक्षा भी थी। क्योंकि जब मैंने अपने हिंदी उपन्यास ‘किराए का बाप’ का शीर्षक तय किया, तभी मुझे विश्वास था कि यह नाम सबसे पहले लोगों को चौंकाएगा, फिर उन्हें असहज करेगा और अंततः सोचने पर मजबूर करेगा।

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कई पाठकों ने कहा—”शीर्षक बहुत कठोर है।” कुछ ने कहा—”पिता जैसा पवित्र रिश्ता और उसके साथ ‘किराए’ जैसा शब्द अच्छा नहीं लगता।” कुछ पाठकों ने सुझाव भी दिए कि इस उपन्यास का नाम ‘पिता का साया’, ‘एक अधूरा परिवार’, ‘अनकहा रिश्ता’, ‘आरव के पापा’ या ‘विश्वास का रिश्ता’ रखा जा सकता था।

मैं इन सभी सुझावों का सम्मान करता हूँ। लेकिन किसी भी उपन्यास का शीर्षक केवल उसका नाम नहीं होता, वह उसकी वैचारिक पहचान भी होता है। ‘किराए का बाप’ ऐसा शीर्षक है जो कहानी शुरू होने से पहले ही पाठक के मन में एक प्रश्न पैदा कर देता है। यही इस शीर्षक का उद्देश्य है।

‘किराए का बाप’ शीर्षक का वास्तविक अर्थ क्या है?

सबसे पहले मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ‘किराए का बाप’ शीर्षक का उद्देश्य पिता जैसे महान रिश्ते का अपमान करना बिल्कुल नहीं है।

इस शीर्षक में प्रयुक्त ‘किराए’ शब्द किसी व्यक्ति की कीमत तय करने के लिए नहीं है। यह हमारे समय की एक सामाजिक विडंबना का प्रतीक है। यह उस मजबूरी की ओर संकेत करता है जहाँ परिस्थितियाँ मनुष्य को ऐसे निर्णय लेने के लिए विवश कर देती हैं, जिनकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होती।

यही इस हिंदी सामाजिक उपन्यास का मूल प्रश्न भी है।

क्या कोई माँ सचमुच अपने बच्चे के लिए पिता खोज सकती है?

ज़रा एक पल रुककर सोचिए। क्या कोई माँ कभी अपने बच्चे के लिए अखबार में “पिता चाहिए” का विज्ञापन देना चाहेगी? शायद नहीं। लेकिन यदि उसका बच्चा हर दिन पूछे— “मेरे पापा कहाँ हैं?” यदि स्कूल में हर कार्यक्रम में उसे पिता की कमी महसूस हो… यदि समाज हर कदम पर उस बच्चे को यह एहसास दिलाए कि उसके जीवन में कोई खाली जगह है… तो एक माँ क्या करेगी?

यहीं से ‘किराए का बाप’ उपन्यास शुरू होता है।

यह किसी पिता को किराए पर लेने की कहानी नहीं है, बल्कि उस समाज की कहानी है जहाँ भावनात्मक रिक्तता को भरने के लिए लोग असंभव लगने वाले रास्तों पर चलने को मजबूर हो जाते हैं।

‘किराए का बाप’ शीर्षक के दो अर्थ

इस शीर्षक का पहला अर्थ वही है जो पहली नज़र में दिखाई देता है। मानो कोई व्यक्ति कुछ समय के लिए पिता की भूमिका निभाने आया हो। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, पाठक समझने लगता है कि वास्तविक अर्थ बिल्कुल अलग है।

जो व्यक्ति शुरुआत में “किराए का बाप” लगता है, वही धीरे-धीरे बच्चे के जीवन का सबसे विश्वसनीय सहारा बन जाता है। उस समय “किराया” समाप्त हो जाता है। केवल “पिता” बच जाता है। यही इस उपन्यास के शीर्षक की सबसे बड़ी शक्ति है।

दूसरा नाम क्यों नहीं रखा गया?

निश्चित रूप से रखा जा सकता था। मैं इसका नाम ‘पिता का साया’, ‘एक अधूरा परिवार’, ‘विश्वास का रिश्ता’ या कोई और भावनात्मक शीर्षक भी रख सकता था।

ऐसे शीर्षक मधुर लगते। वे किसी को चौंकाते नहीं। लेकिन वे उस प्रश्न को जन्म भी नहीं देते, जिसे मैं पाठकों के सामने रखना चाहता था।

एक लेखक के रूप में मेरा विश्वास है कि साहित्य का उद्देश्य केवल सुंदर शब्द चुनना नहीं होता, बल्कि समाज के कठिन प्रश्नों को सामने रखना भी होता है। इसी कारण मैंने ऐसा शीर्षक चुना जो पढ़ने से पहले ही पाठक को सोचने पर मजबूर कर दे।

साहित्य में चौंकाने वाले शीर्षकों की परंपरा

हिंदी साहित्य में ऐसे अनेक शीर्षक हैं जो पहली नज़र में असहज करते हैं, लेकिन पूरी रचना पढ़ने के बाद उनका अर्थ बदल जाता है। शीर्षक का उद्देश्य केवल आकर्षण पैदा करना नहीं होता। वह पूरी रचना का वैचारिक प्रवेश-द्वार होता है।

‘किराए का बाप’ भी उसी परंपरा का शीर्षक है। यह किसी रिश्ते का अपमान नहीं करता। यह समाज से एक असुविधाजनक प्रश्न पूछता है।

इस उपन्यास का सबसे बड़ा प्रश्न क्या है?

असल प्रश्न यह नहीं है कि कोई व्यक्ति किराए पर आया या नहीं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है— “पिता आखिर होता कौन है?” क्या केवल वही जो जन्म देता है? या वह भी जो किसी बच्चे का हाथ पकड़ता है… उसकी बातें सुनता है… उसकी असफलताओं में साथ खड़ा रहता है… उसे आत्मविश्वास देता है… और बिना किसी स्वार्थ के उसके जीवन का हिस्सा बन जाता है?

यदि केवल जन्म देना ही पिता होने की पहचान है, तो अनेक बच्चों को पिता होते हुए भी पिता का स्नेह नहीं मिलता और यदि प्रेम, जिम्मेदारी और विश्वास पिता होने की पहचान हैं, तो अनेक लोग बिना रक्त-संबंध के भी किसी बच्चे के जीवन में पिता जैसी भूमिका निभाते हैं।

यही ‘किराए का बाप’ उपन्यास का केंद्रीय विचार है।

‘किराए’ शब्द क्यों आवश्यक था?

कई पाठकों ने कहा कि “किराया” बाज़ार का शब्द है और “पिता” संबंध का। मैंने यही विरोधाभास जानबूझकर चुना। क्योंकि यही विरोधाभास इस उपन्यास का मूल है।

जब तक पाठक भीतर से विचलित नहीं होगा, तब तक वह कहानी के प्रश्न को गंभीरता से नहीं समझेगा। यह शीर्षक पाठक को झकझोरता है। और फिर धीरे-धीरे उसी शीर्षक का अर्थ बदल देता है।

अंतिम बात – यही शीर्षक क्यों रहेगा?

यदि कोई पाठक पुस्तक का पहला पृष्ठ पढ़कर कहे— “यह शीर्षक बहुत कठोर है।” तो मैं उसकी बात समझ सकता हूँ। लेकिन यदि वही पाठक अंतिम पृष्ठ तक पहुँचकर कहे— “अब समझ में आया कि इसका नाम ‘किराए का बाप’ ही क्यों है।” तो मुझे लगेगा कि मेरा लेखक होना सार्थक हुआ। क्योंकि यह उपन्यास किसी किराए के रिश्ते की कहानी नहीं है।

यह रिश्तों के वास्तविक अर्थ की खोज है। यह अनुबंध से अपनत्व तक की यात्रा है। यह औपचारिक भूमिका से आत्मीय संबंध तक पहुँचने की कहानी है। और अंततः यही स्थापित करती है कि— पिता कभी किराए का नहीं हो सकता।

जो व्यक्ति सचमुच पिता बन जाता है, वह किसी अनुबंध, किसी भुगतान और किसी सामाजिक परिभाषा से बहुत बड़ा हो जाता है। इसीलिए इस उपन्यास का शीर्षक ‘किराए का बाप’ है। यह शीर्षक किसी पिता का अपमान नहीं, बल्कि हमारे समय से पूछा गया एक गंभीर प्रश्न है। और इस प्रश्न का उत्तर पूरा उपन्यास स्वयं देता है।

पिता वही बनता है जो अपने हिस्से का प्रेम, समय, विश्वास और जिम्मेदारी किसी बच्चे के जीवन में निस्वार्थ भाव से निवेश करता है।

यदि मेरा शीर्षक पाठकों को सोचने के लिए विवश करता है, यदि वह चर्चा का विषय बनता है, यदि लोग उसके पक्ष और विपक्ष में तर्क देते हैं, तो मैं इसे अपनी रचना की सफलता मानता हूँ। क्योंकि साहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह पढ़े जाने के बाद भी पाठक के भीतर संवाद करता रहे।

अंत में केवल इतना कहना चाहूँगा—

“किराए का बाप” शीर्षक किसी पिता का अपमान नहीं है; यह उस समाज से पूछा गया एक असहज प्रश्न है जहाँ कुछ बच्चों को पिता का स्नेह पाने के लिए भी परिस्थितियों से लड़ना पड़ता है।

और जब आप पूरा उपन्यास पढ़ लेंगे, तो शायद आप पाएँगे कि यह कहानी “किराए के बाप” की नहीं, बल्कि “पिता होने के वास्तविक अर्थ” की कहानी है।

एक बुज़ुर्ग व्यक्ति बच्चे को स्नेहपूर्वक गले लगाए हुए है। फीचर इमेज पर "किराए का बाप" शीर्षक के साथ लेखक पत्रकार अनिल अनूप की मार्मिक सामाजिक कहानी को दर्शाया गया है।
“किराए का बाप”— लेखक पत्रकार अनिल अनूप की संवेदनशील कहानी, जो बताती है कि पिता का रिश्ता केवल जन्म से नहीं, बल्कि प्रेम, जिम्मेदारी और अपनत्व से बनता है।

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