विचार

‘कॉकरोच’ नहीं, सपनों से भरे विद्यार्थी हैं वे : परीक्षा व्यवस्था, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी पर एक गंभीर विमर्श

लेखक: बल्लभ लखेश्री

भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल परीक्षा नहीं होतीं, बल्कि लाखों परिवारों के सपनों, संघर्षों और भविष्य का आधार बन जाती हैं। विशेषकर NEET, JEE तथा अन्य राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। अनेक छात्र-छात्राएं एक-दो नहीं, बल्कि कई बार प्रयास करते हैं। वे असफल होते हैं, टूटते हैं, फिर स्वयं को संभालकर दोबारा उठ खड़े होते हैं। यही जिजीविषा किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होती है।

लेकिन जब ऐसे संघर्षशील विद्यार्थियों के लिए “कॉकरोच” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, तब यह केवल एक उपमा नहीं रही, बल्कि लाखों युवाओं और उनके अभिभावकों के आत्मसम्मान पर चोट के रूप में महसूस की गई। यह विवाद केवल एक शब्द का नहीं था; यह उस मानसिकता पर प्रश्नचिह्न था जो संघर्षरत विद्यार्थियों को संवेदनशील मनुष्य के बजाय एक प्रतीक या मजाक का विषय मान बैठती है।

शब्द केवल शब्द नहीं होते

कहा जाता है कि तलवार का घाव भर जाता है, लेकिन शब्दों का घाव लंबे समय तक मन में बना रहता है। “कॉकरोच” एक ऐसा शब्द है जिसका सामान्य अर्थ दुनिया के सबसे पुराने जीवों में से एक कीड़े से जुड़ा है। इसे ऐसे जीव के रूप में देखा जाता है जो कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहता है, जिसे समाप्त करना आसान नहीं होता और जो गंदगी से जुड़ा माना जाता है।

सामान्य बोलचाल में इस शब्द का प्रयोग अक्सर किसी का उपहास उड़ाने, तंज कसने या अपमानित करने के लिए किया जाता रहा है। ऐसे में यदि यही शब्द उन विद्यार्थियों के लिए प्रयोग किया जाए जो लगातार असफलताओं के बावजूद फिर से परीक्षा देने का साहस जुटाते हैं, तो स्वाभाविक है कि इसे सकारात्मक प्रेरणा के बजाय अपमान के रूप में लिया जाएगा।

संभव है कि कुछ लोगों का उद्देश्य विद्यार्थियों की जुझारू प्रवृत्ति की प्रशंसा करना रहा हो, लेकिन भाषा का प्रभाव केवल वक्ता की मंशा से तय नहीं होता, बल्कि उसे सुनने वाले की संवेदना भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि लाखों विद्यार्थियों को यह शब्द अपमानजनक लगा, तो उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

संघर्ष को सम्मान चाहिए, उपमा नहीं

एक विद्यार्थी जो लगातार दो, तीन या चार वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है, वह केवल किताबें नहीं पढ़ता। वह अपने जीवन का सबसे सुंदर समय दांव पर लगाता है। उसके दिन कोचिंग, टेस्ट, नोट्स और मॉक परीक्षाओं में गुजरते हैं। परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करता है। माता-पिता अपनी इच्छाएं त्याग देते हैं ताकि बच्चे का सपना पूरा हो सके।

ऐसे में असफलता केवल अंक कम आने का नाम नहीं होती। वह आत्मविश्वास को झकझोर देती है। समाज के सवाल, रिश्तेदारों की टिप्पणियां, मित्रों की सफलता और भविष्य की अनिश्चितता—ये सब मिलकर विद्यार्थी पर भारी मानसिक दबाव डालते हैं।

इस परिस्थिति में यदि उसे किसी कीड़े से तुलना कर दी जाए, तो यह घाव पर नमक छिड़कने जैसा महसूस होना स्वाभाविक है।

विरोध केवल एक शब्द का नहीं था

देश के अनेक हिस्सों में विद्यार्थियों और अभिभावकों ने इस शब्द के प्रयोग का विरोध किया। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक नाराजगी दिखाई दी। जिन लोगों ने यह शब्द प्रयोग किया, उन्हें सार्वजनिक रूप से सफाई देनी पड़ी, खेद व्यक्त करना पड़ा और भविष्य में ऐसी भाषा का प्रयोग न करने का आश्वासन देना पड़ा।

यह घटना एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि आज का विद्यार्थी केवल सफलता के लिए नहीं, बल्कि अपने सम्मान के लिए भी सजग है। वह चाहता है कि उसके संघर्ष को समझा जाए, उसका मजाक न बनाया जाए।

मानसिक स्वास्थ्य: सबसे बड़ी चुनौती

भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। लाखों विद्यार्थी सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। सफलता का प्रतिशत बहुत कम होता है, जबकि अपेक्षाएं बहुत अधिक।

इसी कारण मानसिक तनाव, अवसाद, चिंता और आत्मग्लानि जैसी समस्याएं तेजी से सामने आ रही हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में 14,488 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। इसका अर्थ है कि प्रतिदिन औसतन लगभग 40 विद्यार्थियों ने अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ली। यह केवल एक संख्या नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के बिखर जाने की कहानी है।

हर ऐसी घटना के बाद कुछ दिनों तक चर्चा होती है, संवेदनाएं व्यक्त की जाती हैं, जिम्मेदारी तय करने की मांग उठती है, लेकिन फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। सबसे बड़ा प्रश्न वही रह जाता है—क्या हम अगली घटना रोक पाएंगे?

क्या केवल विद्यार्थी जिम्मेदार हैं?

अक्सर असफलता का पूरा बोझ विद्यार्थी के कंधों पर डाल दिया जाता है। लेकिन क्या वास्तव में सारी जिम्मेदारी उसी की है? इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से “नहीं” है। जिम्मेदारी कई स्तरों पर बंटी हुई है—

  • शिक्षा व्यवस्था की,
  • परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की,
  • कोचिंग उद्योग की,
  • अभिभावकों की,
  • समाज की,
  • और नीति निर्माताओं की।

जब तक इन सभी पक्षों की सामूहिक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक केवल विद्यार्थियों को सलाह देकर समस्या का समाधान संभव नहीं है।

कोचिंग संस्कृति का बढ़ता प्रभाव

देश के अनेक शहर आज “कोचिंग हब” बन चुके हैं। यहां लाखों विद्यार्थी अपने घर-परिवार से दूर रहकर तैयारी करते हैं।

कोचिंग संस्थानों ने शिक्षा को व्यवस्थित बनाने में निश्चित रूप से योगदान दिया है, लेकिन इसके साथ-साथ अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, रैंक आधारित प्रचार, सफलता के व्यावसायिक प्रदर्शन और लगातार प्रदर्शन के दबाव ने विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है।

हर छात्र टॉपर नहीं बन सकता। लेकिन हर छात्र सम्मान का अधिकारी अवश्य है। यदि किसी विद्यार्थी का चयन नहीं होता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका जीवन समाप्त हो गया।

पेपर लीक और अविश्वास

पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, अनियमितताओं और पारदर्शिता पर उठे सवालों ने विद्यार्थियों का विश्वास कमजोर किया है।

जब कोई छात्र वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा देता है और बाद में परीक्षा रद्द हो जाती है या पेपर लीक की खबर आती है, तब उसकी मानसिक स्थिति की कल्पना करना भी कठिन है। ऐसी घटनाएं केवल परीक्षा नहीं बिगाड़तीं, बल्कि पूरी पीढ़ी का विश्वास भी कमजोर करती हैं।

इसलिए परीक्षा प्रणाली को पूर्णतः पारदर्शी, तकनीकी रूप से सुरक्षित और जवाबदेह बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

अभिभावकों की भूमिका

हर माता-पिता अपने बच्चे को सफल देखना चाहते हैं। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन कई बार अपेक्षाएं इतनी अधिक हो जाती हैं कि बच्चा स्वयं को केवल अंक और रैंक तक सीमित समझने लगता है। बच्चों को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि उनका मूल्य केवल परीक्षा परिणाम से तय नहीं होता। यदि परिवार हर परिस्थिति में साथ खड़ा रहेगा, तो विद्यार्थी असफलता को भी सीख में बदल सकेगा।

समाज को भी बदलनी होगी सोच

हमारे समाज में आज भी प्रतियोगी परीक्षा में चयन को ही सफलता का अंतिम पैमाना माना जाता है।जिस छात्र का चयन हो गया, वह प्रतिभाशाली। जिसका नहीं हुआ, वह असफल। यह सोच बदलनी होगी।

देश को केवल डॉक्टर और इंजीनियर ही नहीं चाहिए। उसे शोधकर्ता, शिक्षक, उद्यमी, कलाकार, लेखक, वैज्ञानिक, तकनीशियन और अनेक अन्य क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रतिभाओं की भी आवश्यकता है। हर विद्यार्थी का अपना अलग सामर्थ्य होता है।

संवेदनशील भाषा की आवश्यकता

शिक्षक, मोटिवेशनल स्पीकर, यूट्यूबर, कोचिंग संचालक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े सभी लोगों की जिम्मेदारी अधिक होती है क्योंकि उनके शब्द लाखों लोग सुनते हैं। प्रेरणा देने के लिए अपमानजनक या विवादास्पद उपमाओं की आवश्यकता नहीं होती।

यदि किसी विद्यार्थी को प्रेरित करना है तो उसके संघर्ष की सराहना कीजिए, उसकी मेहनत को सम्मान दीजिए, उसकी असफलता को सीख में बदलने की प्रेरणा दीजिए। सम्मानजनक भाषा स्वयं सबसे बड़ी प्रेरणा होती है।

समाधान क्या हो सकते हैं?

समस्या जितनी बड़ी है, समाधान भी उतने ही व्यापक होने चाहिए। सबसे पहले परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाया जाए। पेपर लीक जैसे अपराधों पर कठोर और त्वरित दंड सुनिश्चित हो।

डिजिटल सुरक्षा, एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र, मजबूत निगरानी तंत्र और विशेष टास्क फोर्स जैसी व्यवस्थाएं प्रभावी ढंग से लागू की जाएं। विद्यार्थियों के लिए प्रत्येक प्रमुख परीक्षा से पहले और बाद में निःशुल्क मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराया जाए।

ड्रॉप लेने वाले विद्यार्थियों को सामाजिक रूप से कलंकित करने के बजाय उनके लिए सकारात्मक मार्गदर्शन की व्यवस्था हो। परीक्षा में अवसरों की संख्या और समय सीमा पर भी व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाए ताकि किसी एक असफलता से पूरा भविष्य प्रभावित न हो।

आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को तैयारी के लिए पर्याप्त सहायता मिले। सरकारी और निजी संस्थानों के बीच गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अंतर कम किया जाए। विद्यालय स्तर से ही जीवन कौशल, तनाव प्रबंधन और भावनात्मक संतुलन को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।

संवाद ही सबसे बड़ा रास्ता

सरकार, परीक्षा एजेंसियों, शिक्षकों, कोचिंग संस्थानों, अभिभावकों और विद्यार्थियों के बीच नियमित संवाद आवश्यक है। जब तक सभी पक्ष एक-दूसरे की समस्याओं को नहीं समझेंगे, तब तक समाधान अधूरा रहेगा। विद्यार्थियों को केवल आदेश नहीं, विश्वास चाहिए। केवल अनुशासन नहीं, सहारा चाहिए। केवल परिणाम नहीं, अवसर चाहिए।

परीक्षा जीवन नहीं है

हमें यह स्वीकार करना होगा कि परीक्षा जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन पूरा जीवन नहीं। यदि किसी विद्यार्थी का चयन नहीं होता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसके सपने समाप्त हो गए। अनेक सफल व्यक्तियों ने जीवन में कई बार असफलता का सामना किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

इसलिए विद्यार्थियों को यह संदेश लगातार दिया जाना चाहिए कि उनका अस्तित्व किसी एक परीक्षा परिणाम से कहीं बड़ा है।

“कॉकरोच” शब्द को लेकर उठा विवाद केवल भाषा का विवाद नहीं था। उसने हमारी शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव, मानसिक स्वास्थ्य, कोचिंग संस्कृति, सामाजिक अपेक्षाओं और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने ला दिया।

आज आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। विद्यार्थियों को अपमानजनक उपमाओं से नहीं, सम्मानजनक व्यवहार से प्रेरित किया जा सकता है। जो युवा बार-बार गिरकर फिर खड़े होते हैं, वे किसी उपहास के पात्र नहीं, बल्कि साहस और धैर्य के प्रतीक हैं।

यदि परीक्षा व्यवस्था निष्पक्ष होगी, पेपर लीक पर कठोर नियंत्रण होगा, मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिलेगी, कोचिंग संस्कृति अधिक उत्तरदायी बनेगी, परिवार अपेक्षाओं के साथ संवेदनाएं भी देगा और समाज सफलता की परिभाषा को व्यापक बनाएगा, तो न केवल विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा बल्कि आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं में भी कमी लाई जा सकेगी।

हर विद्यार्थी एक सपना है। हर सपना सम्मान का अधिकारी है। इसलिए हमारी शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल योग्य उम्मीदवार चुनना नहीं, बल्कि ऐसे वातावरण का निर्माण करना भी होना चाहिए जहाँ कोई भी युवा स्वयं को अकेला, अपमानित या निराश महसूस न करे।

परीक्षा भय का नहीं, अवसर का माध्यम बने। असफलता अंत नहीं, अगली शुरुआत बने। और सबसे महत्वपूर्ण—हम अपने विद्यार्थियों को किसी भी उपमा से पहले एक संवेदनशील, संघर्षशील और सम्मानित इंसान के रूप में देखना सीखें। यही किसी भी सभ्य और प्रगतिशील समाज की वास्तविक पहचान होगी।

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