कचौड़ी गली : एक जमाना, जो स्मृतियों की गलियों में आज भी सांस लेता है
अनिल अनूप, संपादक
कोक स्टूडियो में रेखा भारद्वाज की आवाज में गूंजती भोजपुरी की ऐतिहासिक कजरी “पिया चल गईला रंगून हो…” सुनने के बाद संपादक के भीतर उस रहस्यमयी कचौड़ी गली को देखने की बेचैनी जन्म लेती है, जहाँ से इस विरह, प्रेम और पीड़ा की सांस्कृतिक स्मृति जुड़ी हुई मानी जाती है। यही बेचैनी संपादक को रेलवे स्टेशन से रिक्शा पकड़कर उन तंग गलियों तक ले जाती है, जहाँ आज भी बीता हुआ समय दीवारों, हवेलियों, बूढ़ी आंखों और कजरियों की धुन में सांस लेता महसूस होता है। यह सिर्फ एक गली का विवरण नहीं, बल्कि संपादक का वह यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें इतिहास, संगीत, अंग्रेजी दौर की क्रूरता, लोकस्मृतियाँ और बदलते समय के बीच झूलती एक सांस्कृतिक दुनिया धीरे-धीरे खुलती चली जाती है।
वाराणसी जंक्शन पर उस सुबह सूरज पूरी तरह निकला भी नहीं था, लेकिन स्टेशन पहले से जाग चुका था। प्लेटफॉर्म नंबर एक पर चाय वालों की आवाजें थीं—“चाय… बनारसी चाय…”। कहीं कुल्हड़ से उठती भाप थी, कहीं यात्रियों की हड़बड़ी। बाहर निकलते ही शहर अपनी पहली पहचान से टकराता है—भीड़, धुआँ, पसीना, पुकार और एक अनोखी आत्मीय अव्यवस्था।
संपादक ने स्टेशन के बाहर आते ही एक पुराने से रिक्शे वाले को आवाज दी— “कचौड़ी गली चलोगे?” रिक्शे वाले ने एक नजर ऊपर से नीचे तक देखा, मुस्कुराया और बोला— “घूमे खातिर जा तानी कि खोजे खातिर?”
सवाल छोटा था, मगर इस शहर में हर सवाल का अर्थ गहरा होता है। संपादक ने कहा— “सुने हैं, उ गली में एगो पुरान दर्द बसल बा… ओके खोजे जातानी।” रिक्शा शहर की तरफ बढ़ चला। रास्ते में धीरे-धीरे गलियाँ खुलती गईं। कहीं मंदिरों के शिखर थे, कहीं ठेले पर सजी लाल टमाटरों की कतार। कहीं दूध की भट्ठियों पर उबलती कड़ाही, कहीं पान की दुकानों पर सुबह से जमा लोग।
शहर के भीतर जाते-जाते सड़कें संकरी होने लगीं। मोटरसाइकिलें, गायें, साइकिलें, श्रद्धालु, विदेशी पर्यटक, पंडे, विद्यार्थी—सब एक ही धारा में बहते दिखाई देते। यही इस शहर की सबसे बड़ी पहचान है। यहाँ रास्ते कभी सीधे नहीं होते, मगर हर मोड़ किसी कथा तक जरूर पहुँचता है।
रिक्शेवाला बीच-बीच में शहर का इतिहास भी सुनाता जा रहा था— “ई शहर में हर गली के आपन राग बा बाबू। कहीं ठुमरी बसल बा, कहीं तंत्र, कहीं संस्कृत, कहीं मौत… अउर कहीं मोहब्बत।”
और फिर थोड़ी देर बाद वह रुका। “लीजिए… आ गइल कचौड़ी गली।”
पहली नजर में वह किसी आम पुरानी गली जैसी ही दिखती है। ऊपर से एक-दूसरे को छूती पुरानी बालकनियाँ। नीचे इतनी पतली राह कि दो आदमी आमने-सामने रुक जाएँ तो कंधे टकरा जाएँ। दीवारों पर समय की गर्द। बिजली के तारों का जाल। हल्दी, घी, अगरबत्ती और पुराने तेल की मिली-जुली गंध।लेकिन जैसे ही भीतर कदम पड़ता है, एहसास होता है कि यह सिर्फ गली नहीं, स्मृतियों का तहखाना है।
गली के मुहाने पर आज भी कचौड़ियाँ तल रही थीं। गर्म तेल में फूलती कचौड़ी की खुशबू पूरे वातावरण में तैर रही थी। एक बूढ़ा दुकानदार कड़ाही के पास बैठा था। माथे पर पसीना और आँखों में वर्षों पुरानी चमक।
संपादक ने पूछा— “बाबा, ई गली के नाम कचौड़ी गली काहे पड़ल?” बूढ़ा हँस पड़ा।
“बेटा, इहाँ इतिहास किताब से कम, पेट से ज्यादा निकलता है। पहिले इहाँ कचौड़ी के अइसन दुकान लगत रहे कि दूर-दूर से लोग आवत रहे। धीरे-धीरे नाम पड़ गइल—कचौड़ी गली।” फिर उसने अचानक धीमी आवाज में पूछा— “लेकिन रउआ सिर्फ कचौड़ी खातिर नइखे अइले… है न?”
संपादक मुस्कुराया। “गौहरजान के कजरी खोजे आइल बानी।” बूढ़े के चेहरे पर एकाएक गंभीरता उतर आई। “अच्छा… तब त सही जगह बइठल बानी।” उसने दुकान के पीछे रखी लकड़ी की बेंच की तरफ इशारा किया।
“बैठीं… ई गली के असली कहानी भूख से नहीं, विरह से शुरू होला।”
गली के भीतर थोड़ा और आगे बढ़ने पर एक पुराना हवेलीनुमा मकान दिखाई दिया। झुकी हुई खिड़कियाँ, टूटा हुआ जंगला, दीवारों पर उखड़ा चूना। वहीं बाहर चार-पाँच बुजुर्ग बैठे बतिया रहे थे।
जब बातचीत शुरू हुई और गौहरजान का नाम आया तो उनमें से एक बुजुर्ग धीरे से बोले— “आज के लड़िका लोग कचौड़ी गली के बस नाश्ता समझेला। लेकिन ई गली कभी संगीत के नस रही।”
उन्होंने बताया कि इस शहर की गलियों में सिर्फ धर्म नहीं बसता था, संगीत भी बसता था। ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती—ये सिर्फ गीत नहीं थे, शहर की सांस थे। “गौहरजान जब गावत रहलीं न…” उन्होंने आँखें बंद कर लीं— “लोग रो पड़त रहे।”
संपादक ने पूछा— “का सच में ई कजरी में अंग्रेजों के जुल्म के दर्द बा?”
बुजुर्ग ने लंबी सांस ली। “अंग्रेज सिर्फ जमीन पर कब्जा नहीं करत रहे, दिल पर भी करत रहे। प्रेम छीना गइल, लोग फाँसी पर चढ़ा दिहल गइल। कलाकार लोग सीधे विद्रोह ना कर सकत रहे, त उ लोग गीत में रोवत रहे।”
गली के ऊपर से एक पतंग कटकर नीचे आई। कुछ बच्चे भागते हुए उसके पीछे निकल गए। उसी शोर के बीच बुजुर्ग ने धीरे से कजरी की पंक्ति गुनगुनाई— “पिया चल गईला रंगून हो…” और अचानक पूरी गली जैसे कुछ पल के लिए ठहर गई।
संपादक आगे बढ़ा। एक मोड़ पर एक छोटा-सा घर था, जहाँ से हारमोनियम की आवाज आ रही थी। भीतर एक शास्त्रीय संगीत प्रेमी बैठे रियाज कर रहे थे। कमरे में तानपुरा टंगा था, दीवार पर पुराने संगीतकारों की तस्वीरें थीं।
उन्होंने बातचीत में कहा— “कचौड़ी गली को सिर्फ भौगोलिक जगह समझना भूल होगी। यह एक सांस्कृतिक स्मृति है। यहाँ की हवा में संगीत की परतें हैं।” उन्होंने बताया कि भोजपुरी की कजरियाँ सिर्फ मौसम का गीत नहीं थीं। उनमें राजनीति भी थी, प्रेम भी, विद्रोह भी और स्त्री का मौन प्रतिरोध भी।
“गौहरजान की आवाज में जो पीड़ा सुनाई देती है, वह सिर्फ प्रेमिका का दुख नहीं। वह उस पूरे समाज का दर्द है, जो औपनिवेशिक हिंसा के नीचे दबा था।” उन्होंने हारमोनियम पर वही धुन छेड़ी। कमरा अचानक किसी पुराने समय में बदल गया।
संपादक को लगा जैसे बाहर की गली अब वर्तमान में नहीं, किसी बीते हुए युग में पहुँच गई हो। कहीं से घुंघरुओं की आवाज आ रही है। कहीं पालकी गुजर रही है। कहीं कोई तवायफ रियाज कर रही है। और दूर किसी अंग्रेज अफसर की घोड़ा-गाड़ी धूल उड़ाती निकल रही है। इस शहर की सबसे बड़ी विशेषता यही है—यह समय को एक साथ बचाकर रखता है।
गली में आगे कुछ नौजवान मोबाइल पर रील बना रहे थे। संपादक ने उनसे पूछा— “तुम लोग जानते हो गौहरजान कौन थीं?” एक लड़का बोला— “हाँ, कोक स्टूडियो वाला गाना सुने हैं। बड़ा दर्द है उसमें।” दूसरा बोला— “लेकिन सच बताएं तो हम लोग पहले नहीं जानते थे। सोशल मीडिया से पता चला।”
फिर थोड़ी देर बाद वही लड़का गंभीर होकर बोला— “अजीब बात है न सर… हम लोग उसी गली में रहते हैं, लेकिन उसका इतिहास बाहर वाले बताते हैं।” उस वाक्य में पूरा वर्तमान छिपा था।
आज की कचौड़ी गली में इतिहास और बाजार साथ-साथ चलते हैं। एक तरफ पुरानी हवेलियाँ गिर रही हैं, दूसरी तरफ आधुनिक कैफे खुल रहे हैं। कहीं संस्कृत की चर्चा है, कहीं इंस्टाग्राम रील। कहीं बूढ़े अब भी राग काफ़ी पर बहस करते हैं, तो कहीं युवा ब्लूटूथ स्पीकर पर रैप चला रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच गली अब भी अपने भीतर कुछ बचाकर रखे हुए है।
एक बुजुर्ग महिला, जो दरवाजे पर तुलसी में पानी डाल रही थीं, उन्होंने बातचीत में कहा— “बाबू, ई गली रोअत भी है अउर हँसत भी। यहाँ सब कुछ जल्दी खत्म नहीं होता।” उन्होंने बताया कि पहले यहाँ रातें अलग होती थीं। सावन आते ही कजरियों की महफिलें जमती थीं। औरतें छतों पर गाती थीं। पुरुष तबले पर साथ देते थे। पूरी गली संगीत में भीग जाती थी। “अब सब मोबाइल में सिमट गइल…” उन्होंने उदासी से कहा।
दोपहर चढ़ने लगी थी। ऊपर से धूप तारों के बीच छनकर नीचे गिर रही थी। गली के भीतर एक जगह दीवार पर पुराने अक्षरों में फीका पड़ा विज्ञापन दिखाई दिया—“संगीत शिक्षा केंद्र”। शायद वर्षों पुराना। संपादक कुछ देर वहीं खड़ा रहा। उसे लगा जैसे शहर खुद अपने इतिहास को धीरे-धीरे खोता जा रहा है। लेकिन तभी सामने से एक किशोर लड़का साइकिल पर गुजरता हुआ वही कजरी गुनगुनाने लगा— “कचौड़ी गली सून कइल बलमू…” और संपादक को लगा—स्मृतियाँ इतनी आसानी से नहीं मरतीं।
शाम ढलने लगी थी। गली की दुकानों पर पीली रोशनी जल उठी। गरम कचौड़ियों की खुशबू फिर से हवा में फैल गई। कहीं घंटियाँ बज रही थीं। कहीं अज़ान की धीमी आवाज तैर रही थी। यही इस शहर की खूबसूरती है—जहाँ विरोध भी साथ रहता है और विरासत भी। संपादक गली के आखिरी छोर तक गया। वहाँ से गंगा की तरफ जाती एक पतली राह थी। दूर कहीं आरती की ध्वनि सुनाई दे रही थी। उसने पीछे मुड़कर पूरी गली को देखा।
यह सिर्फ एक जगह नहीं थी। यह प्रेम का शोकगीत भी थी। औपनिवेशिक क्रूरता की सांस्कृतिक गवाही भी। भोजपुरी लोक-स्मृति का जीवित संग्रहालय भी। और उस आत्मा का हिस्सा भी, जो टूटती तो है, मिटती नहीं। वापस लौटते समय रिक्शेवाला फिर मिल गया। उसने पूछा— “मिल गइल कचौड़ी गली?” संपादक मुस्कुराया। “गली से ज्यादा… एक जमाना मिल गया।” रिक्शा धीरे-धीरे स्टेशन की तरफ लौट चला। पीछे छूटती गलियों में अब भी जीवन बह रहा था।
कचौड़ी गली की उस सांगीतिक और स्मृतियों से भरी यात्रा में अब शाम पूरी तरह उतर चुकी थी। ऊपर टंगे बल्बों की पीली रोशनी पुरानी दीवारों पर फैल रही थी। दिनभर की चहल-पहल के बाद भी गली थकी हुई नहीं लग रही थी। ऐसा महसूस हो रहा था जैसे यह गली रात में और ज्यादा जागती है।
संपादक धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। अब उसकी निगाह सिर्फ इतिहास पर नहीं, वर्तमान पर भी टिकने लगी थी। आखिर कोई भी गली सिर्फ अपने अतीत से नहीं जीती, उसे वर्तमान की कठोर सच्चाइयों से भी गुजरना पड़ता है।
गली के भीतर थोड़ी दूर जाते ही अचानक ऊपर लटकते बिजली के तारों का जाल दिखाई दिया। इतने तार कि आसमान जैसे उनमें उलझ गया हो। कुछ जगह तार खुले हुए थे, कहीं जोड़ पर कपड़ा बंधा था, कहीं प्लास्टिक की थैलियां उड़कर अटक गई थीं। संपादक ने पास खड़े एक युवक से पूछा— “यहाँ बिजली की व्यवस्था कैसी है?” युवक हँस पड़ा।
“व्यवस्था? बाबू, यहाँ बिजली भगवान भरोसे चलती है। गर्मी में ट्रांसफार्मर बैठ जाए तो पूरी गली रातभर पसीने में डूब जाती है।” पास खड़े एक बुजुर्ग बोले— “पहिले लालटेन रहत रहे, तब अंधेरा साफ दिखत रहे। अब बिजली है, मगर डर हर समय बना रहता है कि कब चिंगारी निकल जाए।”संपादक ने देखा, कई पुराने मकानों की दीवारें सीलन से काली पड़ चुकी थीं। बारिश में शायद हालात और मुश्किल हो जाते होंगे। थोड़ा आगे बढ़ने पर एक सार्वजनिक नल दिखा, जिसके पास दो महिलाएँ बाल्टी लेकर खड़ी थीं। बातचीत में पता चला कि कई घरों में पानी अब भी नियमित नहीं आता।
एक महिला बोली— “सुबह पानी आया त ठीक, नहीं तो मोटर चलाओ। बिजली गई तो पानी भी गया। पुराने घर हैं, पाइपलाइन भी आधी जगह टूटी पड़ी है।” दूसरी महिला ने धीरे से कहा— “पर बाहर वालों को बस यही दिखता है कि यह ऐतिहासिक गली है। कोई यह नहीं पूछता कि यहाँ रहने वाले लोग कैसे जीते हैं।” उस एक वाक्य में कचौड़ी गली का वर्तमान छिपा था। जिस गली को लोग संस्कृति और विरासत के प्रतीक की तरह देखते हैं, वहाँ रोजमर्रा की जिंदगी आज भी संघर्षों से भरी है।
गली के बीचोंबीच एक छोटा-सा दवा दुकान था। बाहर कुछ लोग बैठे थे। बातचीत में पता चला कि आसपास बड़े अस्पताल नहीं हैं। गंभीर हालत होने पर लोगों को दूर जाना पड़ता है। दवा दुकानदार बोला— “बुजुर्ग लोग ज्यादा हैं यहाँ। पुरानी आबादी है। लेकिन स्वास्थ्य सुविधाएँ उसी हिसाब से नहीं बढ़ीं। संकरी गलियों में एंबुलेंस तक आसानी से नहीं पहुँच पाती।” संपादक ने गौर किया कि कई मकानों में बहुत बूढ़े लोग अकेले बैठे थे। उनके बच्चे शायद नौकरी या पढ़ाई के लिए बाहर चले गए थे।
एक बुजुर्ग महिला ने कहा— “हम लोग गली नहीं छोड़ पाए। लेकिन नई पीढ़ी रुकना नहीं चाहती। उन्हें खुली सड़क चाहिए, पार्क चाहिए, नई जिंदगी चाहिए।”वह कुछ पल चुप रहीं, फिर मुस्कुराईं— “लेकिन सावन में जब कजरी बजती है न… तब सबको यही गली याद आती है।”
गली के एक मोड़ पर कुछ बच्चे स्कूल ड्रेस में खेल रहे थे। पास ही एक छोटा-सा कोचिंग सेंटर था। दीवार पर लिखा था—“इंग्लिश स्पीकिंग क्लास”। संपादक ने एक किशोर से पूछा— “यहाँ पढ़ाई का माहौल कैसा है?”
उसने कहा— “सर, पढ़ाई तो सब करना चाहते हैं। लेकिन जगह छोटी है, संसाधन कम हैं। ज्यादातर लोग चाहते हैं कि बच्चे बाहर जाकर पढ़ें।”फिर वह थोड़ा रुककर बोला— “लेकिन इतिहास कोई नहीं पढ़ाता। हम लोग उसी गली में रहते हैं, जिसकी कहानी पूरी दुनिया सुनती है।”
यह पीढ़ियों के बीच का अंतर था। बुजुर्ग स्मृतियों में जी रहे थे। युवा भविष्य की तलाश में थे। राजनीति की चर्चा छिड़ी तो एक पान की दुकान पर बैठे लोगों का स्वर अचानक तेज हो गया। एक आदमी बोला—
“चुनाव के समय सब नेता आते हैं। कहते हैं—विरासत बचाएंगे, पर्यटन बढ़ाएंगे। लेकिन यहाँ रहने वालों की परेशानी कौन देखता है?”दूसरे ने कहा— “सड़क ठीक हो जाए, सीवर बन जाए, पानी आ जाए, यही बहुत है। हमें भाषण नहीं, सुविधा चाहिए।” फिर तीसरा आदमी धीरे से बोला— “लेकिन सच कहें बाबू, अगर यह गली इतनी मशहूर न होती, तो शायद सरकारें इसे कब का भूल चुकी होतीं।”
संपादक को लगा कि कचौड़ी गली दो दुनिया के बीच फंसी हुई है। एक दुनिया उसे विरासत मानती है। दूसरी दुनिया उसे रोजमर्रा की कठिन जिंदगी की तरह जीती है।
गली में सुरक्षा का सवाल भी लोगों की बातचीत में बार-बार उभर रहा था। संकरी गलियाँ, भीड़, पुराने मकान, रात में आने-जाने वाले पर्यटक—इन सबके बीच स्थानीय लोग एक अनकहे डर में भी जीते हैं। एक दुकानदार बोला— “रात में बाहर से बहुत लोग आते हैं। पुलिस गश्त होती है, लेकिन कई बार झगड़े भी हो जाते हैं। पुरानी आबादी है, जगह कम है, तनाव जल्दी बढ़ जाता है।”
हालाँकि उसी समय सामने से गुजरते कुछ युवकों ने मुस्कुराकर कहा— “लेकिन बाबू, यह गली अब भी दिल वाली है। यहाँ लोग एक-दूसरे को जानते हैं। कोई अकेला नहीं पड़ता।” यह बात सच भी लगती थी। संकरी गलियों के भीतर रिश्ते अब भी चौड़े थे।
रात अब गहरी होने लगी थी। ऊपर छतों पर लोग टहल रहे थे। कहीं रेडियो पर पुराना गीत बज रहा था। कहीं प्रेशर कुकर की सीटी सुनाई दे रही थी। कहीं कोई बच्चा होमवर्क कर रहा था। और इसी रोजमर्रा की जिंदगी के बीच अचानक दूर कहीं से वही कजरी फिर सुनाई दी— “पिया चल गईला रंगून हो…”
संपादक कुछ पल के लिए रुक गया। उसे लगा कि कचौड़ी गली का सबसे बड़ा सच यही है— यह गली सिर्फ इतिहास नहीं है। यह वर्तमान भी है। यह संघर्ष भी है। यह टूटते पुराने घरों, जर्जर तारों, पानी की लाइन, राजनीति की उपेक्षा और नई पीढ़ी की बेचैनी के बीच भी अपनी सांस्कृतिक सांस बचाए हुए है। यहाँ विरासत सिर्फ दीवारों में नहीं रहती, लोगों के स्वभाव में भी रहती है।
कचौड़ी गली अब सिर्फ एक सांगीतिक स्मृति नहीं, बल्कि बदलते भारत का जीवित दस्तावेज लगने लगी थी—जहाँ अतीत की रागिनी और वर्तमान की कठिनाइयाँ एक साथ चलती हैं।
संपादक जब वापस लौटने लगा तो उसने आखिरी बार पीछे मुड़कर उस गली को देखा। ऊपर पीली रोशनी थी। नीचे नमी से भीगी पुरानी ईंटें थीं। कहीं कचौड़ी तल रही थी। कहीं बच्चे हँस रहे थे। कहीं बुजुर्ग चुप बैठे थे। और कहीं इतिहास अब भी धीरे-धीरे सांस ले रहा था। कहीं कोई बूढ़ा राग छेड़ रहा था। कहीं कोई बच्चा पतंग उड़ा रहा था। कहीं कोई लड़की बालकनी से नीचे झांक रही थी। और कहीं बहुत भीतर, इतिहास अब भी गा रहा था— “पिया चल गईला रंगून हो…”








