“कचौड़ी गली सून कइलऽ बलमूं” : विरह, बनारस और अंग्रेजी दौर के दर्द की अमर दास्तान

लेखक अनिल अनूप की तस्वीर के साथ गौहर जान, बनारस घाट और कचौड़ी गली की पृष्ठभूमि पर आधारित कजरी विषयक फीचर इमेज

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लेख और व्याख्या : अनिल अनूप

बनारस। गंगा किनारे बसे बनारस की पहचान केवल घाटों, मंदिरों और आरती से नहीं बनी। इस शहर की आत्मा उसकी गलियों, संगीत, ठुमरी, कजरी और उन तवायफों में भी बसती थी, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को अपने स्वर से अमर कर दिया। उन्हीं गलियों में एक गली थी — कचौड़ी गली। यह केवल खाने-पीने का बाजार नहीं, बल्कि बनारस की सांस्कृतिक धड़कन मानी जाती थी। इसी गली से जुड़ी एक ऐसी कजरी लोक स्मृति में आज भी तैरती है, जिसे सुनते ही विरह, पीड़ा और इतिहास एक साथ जीवित हो उठते हैं—पिया चल गईला रंगून हो, कचौड़ी गली छोड़ गईलऽ बलमा…”


कचौड़ी गली : बनारस का सांस्कृतिक दरबार

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लोकमान्यता है कि इस कालजयी कजरी को अमर स्वर देने वाली थीं Gauhar Jaan। कहा जाता है कि यह गीत उनके निजी जीवन की पीड़ा से उपजा था। उनके प्रेमी एक स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया। प्रेमी के बिछोह, उसके वध और भीतर उठते प्रतिशोध ने इस कजरी को केवल लोकगीत नहीं रहने दिया, बल्कि इसे विरह और प्रतिरोध की जीवित गाथा बना दिया।

बनारस की कचौड़ी गली कभी संगीत और तहजीब की राजधानी मानी जाती थी। यहाँ रातें केवल गुजरती नहीं थीं, बल्कि गाई जाती थीं। ठुमरी, दादरा, चैती और कजरी की महफिलें सजती थीं। बड़े-बड़े जमींदार, साहित्यकार और संगीत प्रेमी इन कोठों पर कला सुनने आते थे।

आज जिस “तवायफ” शब्द को समाज संकीर्ण नजर से देखता है, उसी समाज की संगीत परंपरा को बचाने में इन स्त्रियों का सबसे बड़ा योगदान रहा। वे केवल नृत्यांगना नहीं थीं; वे भाषा, संगीत, शायरी और संस्कृति की संरक्षक थीं। कचौड़ी गली इसलिए भी खास थी क्योंकि यहाँ प्रेम केवल शरीर नहीं, आत्मा का संवाद था।

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“पिया चल गईला रंगून…” : इतिहास के भीतर छिपा दर्द

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से हजारों मजदूर और व्यापारी अंग्रेजी शासन के दौरान बर्मा यानी आज के म्यांमार भेजे जाते थे। उस समय रंगून रोजगार और व्यापार का बड़ा केंद्र था।

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मिर्जापुर उस दौर में जहाजों और व्यापारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण पड़ाव था। गंगा किनारे बसे इस शहर से मजदूरों, कारीगरों और व्यापारियों को जहाजों के जरिए रंगून भेजा जाता था। इसलिए लोकगीतों में “रंगून” केवल एक शहर नहीं, बल्कि बिछोह और परदेस का प्रतीक बन गया। जब गीत कहता है—

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“पिया चल गईला रंगून हो…”

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तो यह केवल यात्रा का वर्णन नहीं, बल्कि उस स्त्री के टूटते मन का बयान है, जिसे पता है कि उसका प्रेम अब दूर जा चुका है। आज भी उत्तर प्रदेश और बिहार के लाखों युवक रोजगार के लिए मुंबई, दिल्ली, पंजाब, दुबई और खाड़ी देशों में जाते हैं। गांवों में बूढ़े माता-पिता और प्रतीक्षा करती स्त्रियां पीछे छूट जाती हैं। समय बदला है, लेकिन विरह का दर्द नहीं बदला।

“कचौड़ी गली छोड़ गईलऽ बलमा” : एक गली नहीं, पूरा संसार उजड़ गया

यह पंक्ति बेहद गहरी है। यहाँ “कचौड़ी गली” केवल बनारस की सड़क नहीं, बल्कि प्रेमिका का पूरा संसार है। प्रेमी के चले जाने से उसे लगता है कि पूरी गली उजड़ गई। यही लोकगीतों की ताकत होती है। वे छोटी पंक्तियों में विशाल भाव छिपा देते हैं। बलमा के जाने से महफिलें सूनी हो गईं, सुर बिखर गए, रातें वीरान हो गईं। जिस गली में कभी रौनक थी, वहाँ अब सन्नाटा उतर आया।

आज के दौर में भी यही स्थिति दिखाई देती है। शहर चमक रहे हैं, बाजार आबाद हैं, लेकिन इंसान भीतर से अकेला होता जा रहा है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ ने रिश्तों की आत्मीयता को कमजोर कर दिया है।

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“सेजिया पे लोटे काला नाग…” : विरह की सबसे मार्मिक अभिव्यक्ति

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यह पूरी कजरी की सबसे पीड़ादायक पंक्ति मानी जाती है। यहाँ “काला नाग” कोई वास्तविक सांप नहीं है। यह मृत्यु, भय, अकेलेपन और भीतर फैलते जहर का प्रतीक है। जिस सेज पर कभी प्रेम और मिलन था, अब वहाँ विरह और भय लोट रहा है।

“सेजिया पे लोटे काला नाग हो…”

लोककथाओं के अनुसार जब गौहर जान को यह समाचार मिला कि उनके प्रेमी को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया है, तब उनका व्यक्तिगत दुख प्रतिशोध में बदल गया। इसीलिए इस कजरी में केवल रोना नहीं है, बल्कि अंग्रेजी शासन के प्रति एक मौन आक्रोश भी महसूस होता है।

“मिर्जापुर कइल गुलजार हो…” : विकास और उजड़ती संवेदनाओं की विडंबना

“मिर्जापुर कइल गुलजार हो…”

यह पंक्ति सामाजिक विडंबना को सामने लाती है। मिर्जापुर व्यापार और आवाजाही से गुलजार हो गया। जहाज चले, कारोबार बढ़ा, बाजार आबाद हुए। लेकिन किसी स्त्री की दुनिया उजड़ गई। यही आधुनिक समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास है। आज भी महानगरों की चमक गांवों के खाली होते आंगनों पर खड़ी है। विकास के आंकड़े बढ़ते हैं, लेकिन रिश्तों की गर्माहट कम होती जाती है।

गौहर जान : केवल गायिका नहीं, भारतीय संगीत की पहली सुपरस्टार

Gauhar Jaan भारतीय संगीत इतिहास का वह नाम हैं, जिन्होंने ग्रामोफोन युग में गायन को नई पहचान दी। कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग खत्म होने पर उनका प्रसिद्ध वाक्य होता था—

“माय नेम इज गौहर जान!”

वे केवल गायिका नहीं थीं; वे उस दौर की सांस्कृतिक क्रांति थीं। ठुमरी, दादरा, कजरी और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को उन्होंने आम जनता तक पहुंचाया। उनकी आवाज में बनारस, कोलकाता, अवध और हिंदुस्तानी तहजीब की मिली-जुली आत्मा सुनाई देती थी।

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तवायफ संस्कृति को समाज ने गलत समझा

भारतीय समाज ने लंबे समय तक तवायफों को केवल देह से जोड़कर देखा, जबकि सच यह है कि वे कला की सबसे बड़ी संरक्षक थीं। कई तवायफें संस्कृत, फारसी, उर्दू और हिंदी साहित्य में पारंगत थीं। वे संगीत की विदुषी थीं। उन्होंने भारतीय संगीत की अनेक विधाओं को बचाकर रखा। यह कजरी उसी संवेदनशील दुनिया का दस्तावेज है, जहाँ प्रेम पूजा था और प्रतीक्षा तपस्या।

आज क्यों सूनी लगती है कचौड़ी गली?

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आज कचौड़ी गली में भीड़ है, दुकानें हैं, पर्यटक हैं, लेकिन वह सांस्कृतिक आत्मा धीरे-धीरे खोती हुई महसूस होती है। जहाँ कभी रातभर ठुमरी गूंजती थी, वहाँ अब मोबाइल कैमरों का शोर है। जहाँ कभी रूहानी प्रेम था, वहाँ अब जल्दबाजी है। जहाँ कभी विरह कविता बनता था, वहाँ अब भावनाओं के लिए समय कम पड़ता है।

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यह केवल कचौड़ी गली की कहानी नहीं, पूरे आधुनिक समाज की कहानी है।विरह से प्रतिरोध तक की अमर लोकगाथा,  “पिया चल गईला रंगून…” इसलिए अमर है क्योंकि यह केवल प्रेमगीत नहीं है।

यह उस दौर का सामाजिक दस्तावेज है, जब अंग्रेजी शासन ने लाखों लोगों को विस्थापन, मजदूरी और पीड़ा दी। यह एक स्त्री के टूटे हुए हृदय की चीख भी है और सांस्कृतिक प्रतिरोध का स्वर भी। इस गीत में प्रेम है, इतिहास है, बनारस है, मिर्जापुर है, रंगून है और सबसे बढ़कर भारतीय लोक आत्मा की वह गहराई है, जिसे समय भी मिटा नहीं पाया।

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कचौड़ी गली आज भी बनारस में मौजूद है, लेकिन उसकी असली धड़कन शायद अब केवल इस कजरी में बची हुई है।

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Author: यायावर

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