20 अक्टूबर 2026 4:40 पूर्वाह्न

जिले की चिट्ठी ; पाठा की पगडंडियों पर विकास की असली परीक्षा, नदियां चढ़ती हैं, रास्ते डूबते हैं, उम्मीद फिर भी चलती है

जिले की चिट्ठी के फीचर ग्राफिक में चित्रकूट के पाठा क्षेत्र का ग्रामीण जीवन, नदी-घाट, पहाड़, खेती और पत्रकार संजय सिंह राणा की तस्वीर

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-संजय सिंह राणा 

राम-राम साब, संपादक जी,

बहुत दिन से मन में था कि इस बार की चिट्ठी किसी दफ्तर, किसी सरकारी बैठक या किसी बड़ी घोषणा से शुरू न करूं। सोचा, क्यों न सीधे चित्रकूट की मिट्टी में बैठकर आपसे बतियाया जाए। वैसे भी चित्रकूट को समझना हो तो सरकारी फाइलों से ज्यादा जरूरी है उसकी पगडंडियों पर चलना, मंदाकिनी के किनारे थोड़ी देर बइठना और पाठा के किसी गांव में चूल्हे की गरम चाय के साथ वहां के आदमी की बात सुनना। वहां बात शुरू होती है बड़े सहज ढंग से—“राम-राम साब, कइसे आए?” और फिर धीरे-धीरे पता चलता है कि इस छोटे-से अभिवादन के भीतर एक पूरा गांव सांस ले रहा है। कोई सड़क की बात करता है, कोई पानी की, कोई लरिका की पढ़ाई की, तो कोई बरखा में चढ़ जाने वाली नदी का किस्सा सुनाने लगता है।

चित्रकूट का नाम लेते ही मन में सबसे पहले रामघाट की आरती, मंदाकिनी की शांत धारा और कामदगिरि की परिक्रमा घूम जाती है। देश के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं, माथा टेकते हैं, दीप जलाते हैं और अपने भीतर कुछ शांति लेकर लौटते हैं। मगर साब, चित्रकूट की असली कहानी केवल रामघाट तक नहीं जाती। वह मानिकपुर पार करके उन पहाड़ियों और जंगलों में उतरती है, जिन्हें हम पाठा के नाम से जानते हैं। वहां पहुंचते ही चित्रकूट का एक दूसरा चेहरा सामने आता है—थोड़ा कठोर, थोड़ा जिद्दी, मगर बहुत आत्मीय। वहां का आदमी अभाव में भी हंस लेता है और अपनी बोली में कह देता है—“कछु नाहीं साब, जिंदगी है, चलत रहत है।” शायद यही पाठा की सबसे बड़ी ताकत है।

आप कहेंगे कि चित्रकूट पर तो बहुत कुछ लिखा जा चुका है। सही बात है। धर्म, इतिहास, रामायण, कामदगिरि, मंदाकिनी, पर्यटन—सब पर लिखा गया है। लेकिन चिट्ठी में जरा-सी गुंजाइश होती है कि उन बातों को भी जगह मिले जो खबर की सुर्खी नहीं बन पातीं। मसलन, उस गांव की चिंता जहां बरसात में नदी चढ़ते ही रास्ता बंद हो जाता है; उस बच्चे की इच्छा जो आगे पढ़ना चाहता है लेकिन स्कूल दूर है; उस किसान की बेचैनी जिसे फसल तो मिल गई, पर बाजार और सही दाम की चिंता बाकी है। यही वे छोटी बातें हैं जो मिलकर किसी जिले की बड़ी तस्वीर बनाती हैं।

और चित्रकूट की इस तस्वीर में पाठा को अलग करके देखना संभव ही नहीं। यहां पहाड़ हैं, जंगल हैं, बरसाती नाले हैं, नदी की धाराएं हैं और उनके बीच बसे गांव हैं। गर्मी में पानी की चिंता, बरसात में रास्ते की चिंता और बाकी मौसम में रोजी-रोटी की चिंता—जिंदगी का हिसाब कुछ ऐसा ही चलता है। फिर भी इन गांवों में जीवन रुका नहीं है। सुबह होते ही खेत की ओर निकलता आदमी, स्कूल की तरफ जाते बच्चे, जंगल की राह पकड़ती महिलाएं और बाजार की ओर बढ़ते छोटे दुकानदार बताते हैं कि पाठा केवल समस्याओं का भूगोल नहीं है, बल्कि मेहनत और उम्मीद का भी भूगोल है।

यही तो वजह है साब कि आज की चिट्ठी में चित्रकूट से बात करते हुए मैं उसकी भाषा भी साथ रखना चाहता हूं। यहां बुंदेली का अपना ठाठ है, अवधी की मिठास है और सीमावर्ती गांवों में दोनों के शब्द ऐसे घुलते हैं जैसे एक ही हांडी में दो स्वाद मिल गए हों। कहीं “काए” सुनाई देता है, कहीं “काहे”, कहीं “तुमई” और कहीं “तुम्हार”; कहीं आदमी कहता है “जाइबो”, तो कहीं “जइहौ”। भाषा की यह आवाजाही केवल शब्दों का खेल नहीं है, यह बताती है कि चित्रकूट कितनी संस्कृतियों और ग्रामांचलिक बोलियों के बीच सांस लेता है।

सो साब, आज की चिट्ठी रामघाट की घंटियों से शुरू होकर पाठा की पगडंडी तक जाएगी। बात मंदिर की भी होगी और मजदूर की भी, नदी की भी होगी और किसान की भी, बड़े विकास की भी होगी और उस छोटी-सी सड़क की भी जिस पर किसी गांव का भविष्य रोज स्कूल जाता है। क्योंकि चित्रकूट को अगर सच में समझना है तो उसे केवल तीर्थराज की आंख से नहीं, पाठा के उस आदमी की आंख से भी देखना होगा जो अपनी मिट्टी से जुड़कर कहता है—“हमार गांव भी बदलै, बस रास्ता खुला रहै।” बस साब, इसी बात से आज की चिट्ठी शुरू करते हैं…

राम-राम चित्रकूट!

बहुत दिन से मन में था कि तुमसे बतियाया जाए। अखबारों की खबरों में तुम्हें लिखते-लिखते लगा कि तुम्हारे बारे में खबर तो बहुत लिखी जाती है, लेकिन तुमसे बतियाने वाली चिट्ठी शायद कम लिखी जाती है। सो आज कागज-कलम लेकर बैठ गया हूं। तुम्हें लिखते हुए सबसे पहले कामदगिरि की परिक्रमा आंखों के सामने आती है, मंदाकिनी की धारा दिखाई देती है, रामघाट की आरती की घंटियां सुनाई देती हैं और फिर अचानक मन उन पगडंडियों की ओर मुड़ जाता है जो मानिकपुर पार करके पाठा के जंगलों और पहाड़ियों में उतरती चली जाती हैं। वही पाठा, जिसके लिए शहर में बैठे आदमी के पास कई किस्से हैं, लेकिन जिसकी असली कहानी वहीं के आदमी की आंखों में दिखाई देती है। कोई कहता है, “साहब, अब सड़क बन गइ है”, तो दूसरा उसी सांस में जोड़ देता है, “पर बरखा मा नदी चढ़ गई तो कउन जइहै?” यही तो तुम्हारी कहानी है चित्रकूट—आस्था के बड़े उजाले के बीच रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-बड़ी चिंताओं का अपना अंधेरा और अपनी उम्मीद।

तुम्हारी पहचान बहुत बड़ी है चित्रकूट। देश के कोने-कोने से लोग तुम्हें राम की तपोभूमि कहकर आते हैं। कामदगिरि की परिक्रमा करते हैं, मंदाकिनी में आस्था की डुबकी लगाते हैं, रामघाट पर दीप जलाते हैं और फिर लौटते समय कहते हैं कि चित्रकूट में कुछ अलग ही शांति है। सच कहते हैं वे। तुम्हारी मिट्टी में कुछ ऐसा है जो आदमी को भीतर तक छूता है। मगर तुमसे मेरी शिकायत भी है—तुम्हारी यह बड़ी पहचान कभी-कभी तुम्हारी छोटी-छोटी तकलीफों को ढक देती है। शहर में तुम्हारे मंदिर दिखते हैं, घाट दिखते हैं, पर्यटन दिखता है, पर पाठा के उस गांव का रास्ता कम दिखाई देता है जहां बरसात में नदी के चढ़ जाने से स्कूल, बाजार और अस्पताल का रास्ता अचानक लंबा हो जाता है।

चित्रकूट का यह दोहरा चेहरा मुझे हमेशा सोचने पर मजबूर करता है। एक ओर करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र और दूसरी ओर मानिकपुर-पाठा के दूरस्थ गांवों की रोजमर्रा की जद्दोजहद। जिला प्रशासन के आंकड़ों में तुम्हारे 653 गांव दर्ज हैं और पांच विकासखंडों का बड़ा भूगोल है। यह कोई छोटा इलाका नहीं। हर गांव की अपनी जरूरत है, अपनी बोली है, अपना मौसम है और अपना दुख-सुख है। लेकिन सरकारी नक्शे पर खिंची रेखाओं से गांव की असली दूरी नहीं समझी जा सकती। वहां की दूरी तब समझ आती है जब कोई बुजुर्ग मरीज खाट पर लेटकर चार लोगों के कंधों पर अस्पताल की ओर निकलता है या कोई बच्चा बरसाती नाले के पानी को ताकता हुआ सोचता है कि आज स्कूल जाना संभव होगा या नहीं।

तुम्हारे पाठा की बात चली है तो उसकी बोली भी सुननी चाहिए। चित्रकूट की भाषा केवल एक किताब में दर्ज भाषा नहीं है। यहां बुंदेली का अपना ठाठ है, अवधी का असर है और सीमावर्ती इलाकों में बोलचाल का रंग बदलता दिखाई देता है। भाषावैज्ञानिक स्रोत भी बताते हैं कि बुंदेली क्षेत्र की सीमाओं पर दूसरी बोलियों का प्रभाव पड़ता है और चित्रकूट की बुंदेली का अपना अलग शब्द-संसार है। इसीलिए किसी गांव में बैठो तो कोई कह देगा, “काए भैया, इत्ते दूर से आए हो?” और थोड़ी देर बाद दूसरा आदमी कहेगा, “हमरे गांव मा आइके चाय पियो।” दोनों वाक्य एक ही मिट्टी से निकले लगते हैं, फिर भी उनके सुर में फर्क महसूस होता है। यही फर्क चित्रकूट को भाषायी रूप से सुंदर बनाता है।

मानिकपुर की तरफ बढ़ो तो पाठा की आवाज कुछ और गहरी हो जाती है। कोल समाज की बस्तियों से लेकर जंगल किनारे बसे गांवों तक जीवन का अपना अनुशासन है। यहां आदमी सूरज के साथ उठता है और मौसम की चाल देखकर दिन का हिसाब लगाता है। बरसात ज्यादा हो जाए तो नदी चिंता बन जाती है और बारिश कम हो तो पानी चिंता बन जाता है। यही विडंबना है कि पानी यहां कभी वरदान बनकर आता है और कभी रास्ता रोककर सवाल बन जाता है। हाल की बारिश में बरदहा नदी के उफान ने कई गांवों और मजरों का संपर्क प्रभावित किया। स्वास्थ्य टीमों को भी प्रभावित बस्तियों तक पहुंचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ा। यह दृश्य किसी एक दिन की खबर नहीं, बल्कि पाठा की भौगोलिक चुनौती का आईना है।

तुम्हें शायद याद हो चित्रकूट, बरदहा नदी के किनारे बैठे एक ग्रामीण ने कभी बड़े सहज ढंग से कहा था—“नदी तो हर साल चढ़त है, साहब, हमई लोगन का रास्ता हर साल डूबत है।” इस एक वाक्य में पूरी कहानी समा जाती है। नदी को दोष नहीं दिया जा सकता। पहाड़ और बारिश को भी नहीं। सवाल यह है कि क्या हम उस भूगोल को समझकर ऐसी सड़क और पुल बना पाए हैं जो मौसम की मार सह सकें? अगर कोई गांव बरसात में टापू बन जाता है तो वहां केवल नाव भेज देना पर्याप्त नहीं है। वहां स्थायी पुल, मजबूत संपर्क मार्ग और आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था भी चाहिए।

और हां, चित्रकूट, तुम्हारे विकास की खबरें भी अच्छी हैं। जुलाई में लगभग 950 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास हुआ। सड़क, पुल, शिक्षा, सिंचाई और पर्यटन से जुड़ी योजनाओं का विस्तार निश्चित रूप से उम्मीद पैदा करता है। लेकिन चिट्ठी है, इसलिए मीठी बात के साथ थोड़ी खरी बात भी होगी। शिलान्यास का पत्थर गांव वाले के लिए तभी खुशी का कारण बनता है जब उसके बाद काम पूरा होकर उसके जीवन में सुविधा बनकर दिखाई दे। गांव का आदमी अब केवल घोषणा से खुश नहीं होता। वह पूछता है—“काम कब शुरू होइहै? सड़क कब बनिहै? पानी कब आई?” यह सवाल विकास की आलोचना नहीं, बल्कि विकास से पैदा हुई नई जागरूकता का संकेत है।

शिक्षा की बात करूं तो मन और भी गंभीर हो जाता है। पाठा के बच्चे किसी भी शहर के बच्चे से कम प्रतिभाशाली नहीं हैं। फर्क बस इतना है कि उन्हें अवसर बराबर नहीं मिलते। कहीं माध्यमिक शिक्षा के लिए दूरी है, कहीं शिक्षक और संसाधनों की कमी की शिकायत है, कहीं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मार्गदर्शन नहीं। अप्रैल में भी पाठा क्षेत्र में शिक्षा और किसानों की समस्याओं को लेकर आवाज उठी थी। यह बताता है कि सवाल पुराने हैं, लेकिन उनका समाधान अभी अधूरा है। गांव के किसी पिता से पूछो तो वह बड़ी सीधी बात कहेगा—“हम चाहित हैं लरिका पढ़ै, हमसे जेतना बनत है करित हैं, पर आगे पढ़ाई खातिर साधन चाही।” इस एक वाक्य को किसी भी शिक्षा नीति के केंद्र में रखा जाना चाहिए।

तुम्हारे किसान की हालत भी समझनी होगी चित्रकूट। बुंदेलखंड की जमीन ने सदियों से कम पानी में जीना सीखा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसान हमेशा अभाव में ही जिए। खेत में मेहनत करने वाला आदमी अपनी फसल के लिए बारिश की तरफ देखता है, फिर बाजार की तरफ। फसल निकल आई तो उचित मूल्य की चिंता, पानी कम पड़ा तो उत्पादन की चिंता और मंडी दूर हुई तो परिवहन की चिंता। यदि सिंचाई के छोटे-छोटे स्थायी साधन, खेत-तालाब, जलसंचयन, चेकडैम और स्थानीय कृषि प्रसंस्करण को मजबूत किया जाए तो किसान की आमदनी बढ़ सकती है। खेती को केवल फसल तक सीमित रखने के बजाय उससे जुड़े छोटे उद्योग और स्थानीय बाजार भी विकसित करने होंगे।

पानी पर तुम्हारी कहानी कुछ अजीब है चित्रकूट। बरसात में नदी-नाले उफनते हैं और गर्मियों में गांव पानी को तरसते हैं। इसका मतलब साफ है कि समस्या पानी की मात्रा से ज्यादा उसके प्रबंधन की है। बरसात का पानी अगर गांव में रुक जाए, जमीन में उतर जाए, तालाब और कुएं भर जाएं और खेत तक पहुंच जाए तो वही पानी गर्मी में जीवन बचा सकता है। पाठा में जल संरक्षण को केवल सरकारी योजना की फाइल न बनाकर गांव की सामुदायिक परंपरा से जोड़ना होगा। बुजुर्गों को पुराने तालाबों की जानकारी है, चरवाहों को पानी की धाराओं का ज्ञान है और किसानों को जमीन का स्वभाव पता है। विकास की आधुनिक तकनीक अगर इस स्थानीय ज्ञान के साथ चले तो परिणाम कहीं बेहतर हो सकते हैं।

स्वास्थ्य का सवाल भी इसी चिट्ठी में लिखना जरूरी है। रामघाट पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन पाठा के दूरस्थ गांव का मरीज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। गर्भवती महिला को समय पर अस्पताल पहुंचना हो, किसी बच्चे को तेज बुखार हो या किसी बुजुर्ग को अचानक सांस लेने में दिक्कत हो जाए, तब सड़क की वास्तविक कीमत समझ आती है। अस्पताल की दूरी केवल किलोमीटर में नहीं नापी जाती; उसे समय में नापना चाहिए। अगर मरीज को अस्पताल पहुंचने में दो घंटे लगते हैं तो वह दूरी प्रशासनिक नक्शे में चाहे जितनी कम क्यों न हो, परिवार के लिए बहुत बड़ी है।

चित्रकूट की एक और ताकत है—पर्यटन। यहां आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक केवल दर्शन करके लौट जाएं, इससे कहीं अधिक बड़ा अवसर यहां पैदा किया जा सकता है। स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प, लोकगीत, बुंदेली संस्कृति, ग्रामीण जीवन और पाठा की प्राकृतिक सुंदरता को जिम्मेदार ग्रामीण पर्यटन से जोड़ा जा सकता है। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल सकता है। जिस युवक को आज नौकरी के लिए प्रयागराज, कानपुर, लखनऊ या दिल्ली जाना पड़ता है, वही यदि अपने गांव में पर्यटन से जुड़ा छोटा व्यवसाय चला सके तो उसके लिए गांव छोड़ना मजबूरी नहीं रहेगा।

लेकिन पर्यटन का मतलब यह नहीं कि हर खाली जगह पर सीमेंट खड़ा कर दिया जाए। चित्रकूट की असली सुंदरता उसके जंगल, पहाड़, मंदाकिनी, घाट, आश्रम, लोकविश्वास और गांवों में है। यदि प्रकृति बची रहेगी तो पर्यटन भी बचा रहेगा। मंदाकिनी की स्वच्छता, जंगलों का संरक्षण और प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण जैसे सवालों को पर्यटन विकास के साथ-साथ चलाना होगा। राम की तपोभूमि को केवल सुंदर बनाना पर्याप्त नहीं; उसे स्वच्छ, शांत और प्राकृतिक भी बनाए रखना होगा।

चित्रकूट, तुम्हारे यहां बोली का रंग भी कम सुंदर नहीं। बुंदेली की अपनी ठसक है, अवधी का अपनापन है और गांवों की रोजमर्रा की भाषा में दोनों का मिलना किसी लोकगीत की तरह लगता है। भाषाओं और बोलियों की सीमाएं नक्शे पर जितनी साफ दिखाई देती हैं, जमीन पर उतनी ही घुली हुई होती हैं। इसी घुलावट में लोकसंस्कृति जन्म लेती है। इसलिए जब कोई बुजुर्ग कहता है, “हमाओ गांव छोड़िके कहां जइहौ?” तो वह केवल भाषा नहीं बोल रहा होता, वह अपनी मिट्टी से रिश्ता बोल रहा होता है। और जब कोई महिला कहती है, “आओ, पहिले पानी पी लओ,” तो उस छोटे से आग्रह में चित्रकूट की सदियों पुरानी अतिथि-संस्कृति दिखाई देती है।

यही कारण है कि पाठा को केवल पिछड़े इलाके की तरह देखना ठीक नहीं होगा। वहां कठिनाइयां जरूर हैं, मगर वहां आत्मसम्मान भी है, मेहनत भी है और अपने बच्चों को आगे बढ़ाने की बेचैनी भी है। किसी भी विकास योजना को इस स्वाभिमान के साथ चलना होगा। गांव वाले को लाभार्थी भर समझने के बजाय योजना का भागीदार बनाना होगा। सड़क कहां बने, पुल कहां जरूरी है, पानी का स्रोत कहां है, किस स्कूल में किस तरह की जरूरत है—इन सवालों का जवाब स्थानीय समाज से बेहतर कौन दे सकता है?

चित्रकूट, तुमसे एक और बात कहनी है। शहर और पाठा के बीच दूरी केवल किलोमीटर की नहीं होनी चाहिए। अगर रामघाट की रोशनी पाठा के गांव तक नहीं पहुंचती तो पर्यटन अधूरा है। अगर बड़े विकास प्रोजेक्टों की चमक गांव के किसान की आमदनी नहीं बढ़ाती तो विकास अधूरा है। अगर विद्यालय की इमारत खड़ी है लेकिन बच्चे शिक्षक और संसाधन के इंतजार में हैं तो शिक्षा अधूरी है। और अगर बरसात आते ही कोई गांव मुख्यधारा से कट जाता है तो सड़क और पुल का काम भी अधूरा है। विकास की पूर्णता इसी में है कि शहर और गांव दोनों को साथ लेकर चला जाए।

मुझे उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में चित्रकूट की कहानी केवल “कितने श्रद्धालु आए” से नहीं लिखी जाएगी। यह भी लिखा जाएगा कि कितने गांवों तक बारहमासी सड़क पहुंची, कितने बच्चों ने उच्च शिक्षा पाई, कितने युवाओं को स्थानीय रोजगार मिला, कितने खेतों में सिंचाई पहुंची, कितने गांवों को सुरक्षित पेयजल मिला और बरसात में कितने गांव ऐसे रहे जिनका संपर्क नहीं टूटा। यही वे आंकड़े होंगे जो तुम्हारे विकास की असली तस्वीर बताएंगे।

तो चित्रकूट, आज की चिट्ठी यहीं रोकता हूं। बहुत कुछ बाकी है। पाठा की पहाड़ियों से लेकर मंदाकिनी के घाट तक, मानिकपुर की बस्तियों से लेकर धर्मनगरी की गलियों तक, तुम्हारे पास कहने को बहुत कुछ है। तुमसे मिलना भी दरअसल एक ही जिले से मिलना नहीं, बल्कि कई चित्रकूटों से मिलना है। एक चित्रकूट वह है जिसे दुनिया तीर्थ के रूप में जानती है और दूसरा वह है जो रोज सुबह उठकर अपने खेत, जंगल, दुकान, स्कूल और मजदूरी के साथ जिंदगी को आगे बढ़ाता है। मेरी इच्छा है कि दोनों चित्रकूटों के बीच की दूरी धीरे-धीरे मिटे।

और हां, अगली बार पाठा की तरफ आऊंगा तो किसी बड़े होटल में बैठकर तुम्हारी कहानी नहीं लिखूंगा। किसी गांव के बाहर पीपल की छांव में बइठेंगे, चूल्हे की चाय पीएंगे और वहीं किसी बुजुर्ग से पूछेंगे—“काए दद्दा, अबकी बरखा कैसी रही?” वह शायद हंसकर कहेगा, “बरखा तो अच्छी रही बेटा, बस रस्ता बचा रहै।” बस, चित्रकूट, तुम्हारी पूरी विकास कहानी शायद इसी एक वाक्य में छिपी है— बरखा अच्छी रहे, खेत हरे रहें, नदी अपनी राह बहे और आदमी का रास्ता कभी न रुके।

यह चिट्ठी यहीं रख रहा हूं। बाकी बात फिर कभी।

तुम्हारा ही,
संजय सिंह राणा

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