लेख और प्रस्तुति — अंजनी कुमार त्रिपाठी
भोजपुरी सिनेमा में कुछ फिल्में केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनतीं, बल्कि वे अपने समय के दर्शक-मिजाज, सामाजिक भावनाओं और लोकप्रिय संस्कृति की दिशा का भी संकेत देती हैं। ‘पटना से पाकिस्तान 2’ इसी श्रेणी की एक बहुप्रतीक्षित फिल्म के रूप में सामने आ रही है। साल 2015 में आई ‘पटना से पाकिस्तान’ ने भोजपुरी दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई थी। अब करीब एक दशक से अधिक समय बाद उसी नाम और लोकप्रियता को आगे बढ़ाते हुए इसका दूसरा भाग दर्शकों की उत्सुकता बढ़ा रहा है।
17 अगस्त 2026 को सरस सलिल ऑनलाइन में प्रकाशित समाचार, जिसकी स्क्रीनशॉट प्रति उपलब्ध है, में फिल्म के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जारी किए गए टीजर, दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ के बदले हुए अवतार, फिल्म की स्टारकास्ट तथा देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम की भावनाओं को प्रमुखता दिए जाने की जानकारी सामने आती है। यह खबर महज फिल्म के प्रचार की सूचना नहीं है; इसके भीतर भोजपुरी सिनेमा के बदलते तेवर को पढ़ने का अवसर भी मौजूद है।
फिल्म का निर्माण प्रेम राय और निर्देशन अनंजय रघुराज ने किया है। अप्रैल 2026 में जारी फर्स्ट लुक से भी फिल्म को बड़े कैनवास, एक्शन, भावनात्मक कथा और देशभक्ति के मिश्रण के रूप में प्रस्तुत किए जाने के संकेत मिले थे।
15 अगस्त को टीजर जारी करना भी अपने आप में एक सोची-समझी प्रचार रणनीति दिखाई देती है। स्वतंत्रता दिवस और राष्ट्रप्रेम से जुड़ी भावनाओं के बीच फिल्म की पहली झलक दर्शकों तक पहुंचाना स्वाभाविक रूप से अधिक प्रभाव पैदा करता है। लेकिन एक समीक्षात्मक नजर से सवाल यही है कि क्या ‘पटना से पाकिस्तान 2’ केवल देशभक्ति की भावनात्मक लहर पर सवार होगी, अथवा उसके पास ऐसी कहानी भी है जो दर्शकों को शुरुआत से अंत तक बांधे रख सके? यही सवाल इस फिल्म को लेकर सबसे महत्वपूर्ण है।
2015 की फिल्म से 2026 के सीक्वल तक
‘पटना से पाकिस्तान’ वर्ष 2015 में रिलीज हुई भोजपुरी एक्शन फिल्म थी, जिसका निर्देशन और लेखन संतोष मिश्रा ने किया था और निर्माण अंजय रघुराज से जुड़ा था। फिल्म में दिनेश लाल यादव, आम्रपाली दुबे, काजल राघवानी, सुशील सिंह और अशोक समर्थ प्रमुख भूमिकाओं में थे। फिल्म बिहार में जनवरी 2015 और शेष भारत में मार्च 2015 में रिलीज हुई थी।
पहली फिल्म की कथा एक ऐसे युवक कबीर के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिसका परिवार आतंकवादी हमले में मारा जाता है। न्याय की तलाश में व्यवस्था से निराश होने के बाद वह स्वयं कार्रवाई करने के रास्ते पर निकलता है और कहानी उसे पाकिस्तान तक ले जाती है।
उस समय भोजपुरी सिनेमा में इस तरह के बड़े पैमाने वाले एक्शन और राष्ट्रवादी कथानक ने दर्शकों को आकर्षित किया। फिल्म का शीर्षक ही ऐसा था जो दर्शक की जिज्ञासा पैदा करता था—एक तरफ बिहार की राजधानी पटना और दूसरी तरफ पाकिस्तान। इन दोनों भौगोलिक संकेतों को एक ही शीर्षक में रखकर फिल्म ने शुरुआत से ही अपने विषय का एक बड़ा भावनात्मक दायरा तय कर दिया था।
अब 2026 में उसी नाम का दूसरा भाग आना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज का भोजपुरी दर्शक पहले की तुलना में बहुत अधिक विकल्पों के बीच है। वह सिनेमाघर में भोजपुरी फिल्म देखने के साथ-साथ हिंदी, दक्षिण भारतीय और ओटीटी फिल्मों तथा वेब सीरीज से भी प्रभावित होता है। ऐसे में केवल पुराने नाम की लोकप्रियता से नई फिल्म की सफलता सुनिश्चित नहीं हो सकती।
सीक्वल को पुरानी यादों का लाभ तो मिलेगा, लेकिन उससे कहीं ज्यादा बड़ी चुनौती भी मिलेगी—क्या वह अपने पूर्ववर्ती की पहचान को बचाते हुए अपने समय की फिल्म बन पाएगी?
निरहुआ का बदला हुआ अवतार सबसे बड़ा आकर्षण
‘पटना से पाकिस्तान 2’ के टीजर और पहले लुक की चर्चा में सबसे आगे दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ का नया रूप है। लंबे बाल, बड़ी दाढ़ी, गंभीर चेहरा और बदली हुई शारीरिक भाषा उनके पारंपरिक स्टार इमेज से अलग दिखाई देती है। अप्रैल में जारी पोस्टर में उनके हाथों में हथकड़ी दिखाई गई थी, जिसने कहानी को लेकर कई सवाल खड़े किए।
अभिनेता के लुक में बदलाव निश्चित रूप से दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाता है। लेकिन सिनेमा में लुक तभी सार्थक होता है जब वह चरित्र की कहानी का हिस्सा हो।
अगर लंबे बाल और दाढ़ी सिर्फ पोस्टर को आकर्षक बनाने के लिए हैं तो इसका प्रभाव कुछ समय तक ही रहेगा। लेकिन यदि यह रूप किसी कठिन मानसिक और शारीरिक संघर्ष, कैद, प्रताड़ना, मिशन या भावनात्मक परिवर्तन की कहानी कहता है, तो यही बदलाव निरहुआ के किरदार को अधिक गहराई दे सकता है।
निरहुआ भोजपुरी सिनेमा में एक स्थापित स्टार हैं। इसलिए उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपनी लोकप्रिय छवि को बरकरार रखते हुए चरित्र की गंभीरता को कितना विश्वसनीय बनाते हैं। दर्शक उन्हें एक परिचित अंदाज में देखने का आदी है, लेकिन एक सफल सीक्वल उससे आगे जाने का साहस मांगता है।
‘पटना से पाकिस्तान 2’ में उनका नया रूप इस संभावना का संकेत जरूर देता है कि निर्माता केवल पुराने फॉर्मूले को दोहराने के बजाय किरदार को अलग परिस्थिति में रखने की कोशिश कर रहे हैं।
देशभक्ति—कहानी की आत्मा या प्रचार का औजार?
फिल्म के टीजर को स्वतंत्रता दिवस पर जारी किया गया और समाचारों में देशभक्ति तथा राष्ट्रप्रेम को इसकी प्रमुख थीम के रूप में रेखांकित किया गया है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि फिल्म के शीर्षक और विषयवस्तु में भारत-पाकिस्तान संबंधों की पृष्ठभूमि का संकेत मौजूद है।
लेकिन देशभक्ति को लेकर सिनेमा में एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है—देशभक्ति और राष्ट्रवादी नारे एक ही चीज नहीं हैं।
एक फिल्म में तिरंगा, सीमा, सैनिक, बंदूक, दुश्मन और जोशीले संवाद हो सकते हैं; फिर भी जरूरी नहीं कि वह गहरी देशभक्ति की फिल्म बन जाए। दूसरी तरफ कोई कहानी बिना लगातार भाषण दिए भी देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना पैदा कर सकती है।
इसलिए ‘पटना से पाकिस्तान 2’ की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि फिल्म देशभक्ति को कितनी संवेदनशीलता और कहानी की स्वाभाविकता के साथ प्रस्तुत करती है।
यदि राष्ट्रप्रेम केवल संवादों में है, तो वह प्रचार बन जाएगा। यदि राष्ट्रप्रेम किरदारों के संघर्ष, त्याग, रिश्तों और फैसलों में दिखाई देता है, तो वह कथा का हिस्सा बन सकता है। यह फर्क मामूली नहीं है।
आज दर्शक भावनात्मक सामग्री चाहता है, लेकिन वह यह भी देखना चाहता है कि फिल्म उसे क्या नया कह रही है। केवल यह कहना कि ‘देश सबसे ऊपर है’ पर्याप्त नहीं; सवाल यह है कि देश के लिए व्यक्तिगत स्तर पर कीमत कौन चुका रहा है, क्यों चुका रहा है और उसके संघर्ष का मानवीय पक्ष क्या है?
पाकिस्तान का चित्रण भी होगी बड़ी परीक्षा
‘पटना से पाकिस्तान 2’ के शीर्षक में पाकिस्तान सीधे तौर पर मौजूद है। इसलिए फिल्म के लिए यह भी चुनौती होगी कि वह पड़ोसी देश को किस तरह चित्रित करती है।
एक्शन फिल्मों में खलनायक को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना कहानी को आसान बनाता है। लेकिन यदि किसी पूरे देश या समाज को एक ही रंग में प्रस्तुत कर दिया जाए तो कहानी की जटिलता कम हो सकती है।
यहां फिल्मकारों के पास एक अवसर भी है। वे आतंकवाद और सामान्य नागरिक के बीच अंतर को कहानी का हिस्सा बना सकते हैं। दुश्मनी और इंसानियत के बीच अंतर दिखाया जा सकता है। संघर्ष को केवल दो देशों के बीच टकराव के रूप में नहीं, बल्कि आतंकवाद और मानवता के बीच संघर्ष के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है। ऐसा दृष्टिकोण फिल्म को महज एक पारंपरिक एक्शन कथा से ऊपर उठा सकता है।
हालांकि टीजर से पूरी कहानी का अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी। उपलब्ध समाचारों में भी फिल्म की पूरी कहानी का खुलासा नहीं किया गया है। इसलिए इस स्तर पर किसी निश्चित निष्कर्ष के बजाय संभावनाओं की बात करना अधिक उचित है।
बड़ा कैनवास, बड़ी जिम्मेदारी
फिल्म के निर्माता और टीम की ओर से इसे पहले भाग से बड़ा और बेहतर बनाने की बात कही गई है। अप्रैल 2026 में जारी रिपोर्टों में कहानी, तकनीक, प्रस्तुति और एक्शन पर विशेष ध्यान दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। यह भोजपुरी सिनेमा के लिए सकारात्मक संकेत है।
भोजपुरी फिल्मों को लंबे समय तक सीमित बजट और सीमित तकनीकी संसाधनों वाली फिल्मों की धारणा से जूझना पड़ा है। पिछले वर्षों में दर्शकों की अपेक्षाएं बदली हैं। अब वह अच्छी सिनेमैटोग्राफी, बेहतर लोकेशन, प्रभावशाली एक्शन, मजबूत बैकग्राउंड स्कोर और बड़े स्तर की प्रस्तुति चाहता है। इस लिहाज से बड़े कैनवास पर फिल्म बनाना स्वागतयोग्य है।
लेकिन बड़े कैनवास का अर्थ केवल महंगे सेट, हेलीकॉप्टर, विस्फोट या लड़ाई के दृश्य नहीं होना चाहिए। यदि कहानी कमजोर है तो भव्यता केवल बाहरी सजावट बनकर रह जाती है। सिनेमा का असली पैमाना कहानी है।
दर्शक यह महसूस करना चाहता है कि हर एक्शन दृश्य कहानी को आगे बढ़ा रहा है। हर संघर्ष का कोई कारण है। हर चरित्र का कोई उद्देश्य है। हर भावनात्मक दृश्य केवल अगले एक्शन सीन की भूमिका नहीं है। यही वह जगह है जहां ‘पटना से पाकिस्तान 2’ को अपनी वास्तविक परीक्षा देनी होगी।
बड़ी स्टारकास्ट: ताकत भी, चुनौती भी
फिल्म में निरहुआ के साथ सेजल साहू, सपना चौहान, मीर सरवर, सुशील सिंह, मनोज टाइगर, संजय पांडेय, अमित शुक्ला, साहिल सिद्दीकी, विकास मेहता, भूपेंद्र सिंह, शंभू राणा और धामा वर्मा जैसे कलाकारों के नाम सामने आए हैं। इतनी बड़ी स्टारकास्ट भोजपुरी दर्शकों के लिए आकर्षण पैदा करती है।
लेकिन बड़ी स्टारकास्ट का दूसरा पहलू भी है। यदि इतने सारे कलाकार केवल नायक के आसपास खड़े होकर संवाद बोलते नजर आएं, तो उनकी संख्या फिल्म की गुणवत्ता नहीं बढ़ाएगी। अच्छी फिल्म वह होगी जिसमें सहायक कलाकारों के किरदार भी कथा में उपयोगी भूमिका निभाएं।
मनोज टाइगर जैसे कलाकारों से हास्य और मानवीयता की उम्मीद की जा सकती है, जबकि संजय पांडेय, सुशील सिंह और मीर सरवर जैसे कलाकार गंभीर या विरोधी भूमिकाओं में कहानी को अलग वजन दे सकते हैं। लेकिन अंतिम मूल्यांकन फिल्म देखने के बाद ही संभव होगा।
कहानी के स्तर पर सीक्वल की सबसे बड़ी चुनौती
सीक्वल बनाना आसान नहीं होता। पहली फिल्म की सफलता के बाद दर्शक दो चीजें एक साथ चाहता है—पहले भाग जैसा रोमांच और उससे बिल्कुल अलग नया अनुभव।
अगर फिल्म पूरी तरह नई कहानी कहती है, तो पुराने प्रशंसक पूछ सकते हैं कि इसका पहले भाग से रिश्ता क्या है? और यदि वह पहले भाग को ही दोहराती है, तो दर्शक कह सकता है कि नया क्या है? ‘पटना से पाकिस्तान 2’ को इसी विरोधाभास से निकलना होगा।
पहली फिल्म का मूल भाव बदला और आतंकवाद से जुड़ा था। दूसरे भाग को उसी भावना को दोहराने के बजाय उसके विस्तार की जरूरत होगी। नायक का संघर्ष अधिक व्यक्तिगत हो सकता है, राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं, या कहानी में ऐसा नया संकट आ सकता है जो पुराने किरदारों को अलग परिस्थितियों में ला दे।
फिल्म की उपलब्ध जानकारी से अभी कहानी का पूरा ढांचा स्पष्ट नहीं है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि फिल्म किस दिशा में जाएगी। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि सीक्वल की सफलता का पहला पैमाना उसकी मौलिकता होगी।
क्या भोजपुरी सिनेमा बदल रहा है?
‘पटना से पाकिस्तान 2’ को केवल एक फिल्म के रूप में देखना भी अधूरा होगा। यह भोजपुरी सिनेमा में हो रहे एक बड़े बदलाव का संकेत भी है। अब निर्माता यह समझ रहे हैं कि दर्शक स्थानीय भाषा में भी बड़े स्तर का मनोरंजन चाहता है।
भोजपुरी भाषा की ताकत उसके लोक जीवन, भावनाओं, हास्य, संगीत और संवादों में है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भोजपुरी फिल्में केवल पारंपरिक विषयों तक सीमित रहें।
देशभक्ति, एक्शन, सामाजिक मुद्दे, ऐतिहासिक कथाएं और बड़े स्तर की थ्रिलर कहानियां भोजपुरी में भी बनाई जा सकती हैं।
‘पटना से पाकिस्तान 2’ यदि तकनीकी स्तर और कहानी दोनों में संतुलन स्थापित कर पाती है, तो यह इस बदलाव को मजबूत कर सकती है।
क्या नाम ही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है?
‘पटना से पाकिस्तान’ नाम का अपना एक ब्रांड प्रभाव है। पहली फिल्म से जुड़े दर्शकों के लिए यह नाम परिचित है। यही वजह है कि सीक्वल की घोषणा के साथ ही उत्सुकता पैदा होना स्वाभाविक है।
लेकिन ब्रांड नाम दोधारी तलवार होता है। यह शुरुआत में दर्शक को आकर्षित करता है, मगर साथ ही तुलना भी करवाता है।
पहली फिल्म की स्मृतियां नई फिल्म के हर दृश्य के साथ तुलना करेंगी। निरहुआ का अभिनय, संवाद, एक्शन, संगीत, खलनायक, कहानी और यहां तक कि फिल्म का भावनात्मक प्रभाव भी पुराने भाग के संदर्भ में देखा जाएगा।
इसलिए दूसरे भाग के लिए सबसे जरूरी है कि वह केवल ‘पहली फिल्म का अगला अध्याय’ न रह जाए, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए।
टीजर ने सवाल पैदा किए हैं, जवाब फिल्म देगी
टीजर की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने फिल्म को लेकर चर्चा पैदा की है। निरहुआ का अलग अवतार, देशभक्ति की पृष्ठभूमि और बड़ी स्टारकास्ट दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ाते हैं। 15 अगस्त जैसे अवसर पर टीजर जारी होने से इसकी थीम और प्रचार के बीच भी स्वाभाविक सामंजस्य बना।
लेकिन टीजर के आधार पर फिल्म को ‘बेहतरीन’, ‘ब्लॉकबस्टर’ या ‘ऐतिहासिक’ घोषित करना समीक्षात्मक दृष्टि से जल्दबाजी होगी। फिल्म की वास्तविक गुणवत्ता का निर्णय उसके ट्रेलर और फिर पूरी फिल्म से होगा।
खासकर ट्रेलर में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या फिल्म कहानी का कोई स्पष्ट संकेत देती है या केवल एक्शन और जोशीले संवादों पर निर्भर करती है।
दर्शक अब सिर्फ तालियां नहीं, कहानी भी चाहता है
भोजपुरी सिनेमा के दर्शक को अक्सर केवल मनोरंजन पसंद करने वाला दर्शक मान लिया जाता है। यह धारणा अब बदलनी चाहिए।
भोजपुरी दर्शक भी मजबूत कहानी, अच्छे कलाकार, बेहतर तकनीक और भावनात्मक गहराई चाहता है। वह मनोरंजन जरूर चाहता है, लेकिन उसके मनोरंजन का स्तर भी लगातार बदल रहा है।
आज मोबाइल स्क्रीन पर दुनिया भर का कंटेंट उपलब्ध है। ऐसे में सिनेमाघर तक दर्शक को खींचने के लिए सिर्फ स्टार का नाम पर्याप्त नहीं है। उसे ऐसा अनुभव चाहिए जो बड़े पर्दे पर देखने लायक हो।
‘पटना से पाकिस्तान 2’ के सामने यही अवसर है। यदि फिल्म अपने एक्शन को कहानी से जोड़ती है, देशभक्ति को संवेदना से जोड़ती है और निरहुआ की लोकप्रियता को एक मजबूत किरदार से जोड़ती है, तो यह भोजपुरी सिनेमा के लिए उल्लेखनीय उपलब्धि बन सकती है।
महिला किरदारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी
फिल्म की घोषित स्टारकास्ट में सेजल साहू और सपना चौहान जैसे नाम भी हैं। ऐसे बड़े एक्शन और राष्ट्रवादी कथानक में महिला किरदारों को केवल गीत, प्रेम प्रसंग या नायक की भावनात्मक पृष्ठभूमि तक सीमित कर देना आज के दर्शक के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
यदि महिला पात्र कहानी के संघर्ष में सक्रिय भागीदार हों, अपने निर्णय लें और कथा को आगे बढ़ाएं, तो फिल्म की दुनिया अधिक विश्वसनीय बनेगी। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म में महिला पात्रों को कितनी स्वतंत्रता और कथा-स्थान मिलता है।
संवाद और संगीत भी बनाएंगे फर्क
भोजपुरी सिनेमा की एक बड़ी शक्ति उसके संवाद और संगीत रहे हैं। ‘पटना से पाकिस्तान’ जैसी फिल्म में एक्शन और देशभक्ति के साथ संवादों की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण होगी। लेकिन जोशीले संवाद और प्रभावशाली संवाद में फर्क होता है।
बहुत अधिक नारेबाजी संवाद को कृत्रिम बना सकती है। वहीं परिस्थिति के अनुरूप लिखा गया संवाद दर्शक के मन में लंबे समय तक रह सकता है।
संगीत के स्तर पर भी यही बात लागू होती है। फिल्म यदि केवल कहानी के बीच गीत डालने के बजाय संगीत को कथा की गति और भावनाओं से जोड़ती है, तो उसका प्रभाव अधिक मजबूत होगा।
सबसे बड़ा सवाल—क्या ‘पटना से पाकिस्तान 2’ समय की फिल्म है?
यही शायद इस फिल्म की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी है। 2015 का भारत और 2026 का भारत एक जैसा दर्शक नहीं रखता। डिजिटल मीडिया, ओटीटी, सोशल मीडिया और बड़े पैमाने की फिल्मों ने दर्शकों की सिनेमाई भाषा बदल दी है। भोजपुरी सिनेमा भी इसी बदलाव से गुजर रहा है।
इसलिए 2026 की ‘पटना से पाकिस्तान 2’ यदि 2015 के फॉर्मूले को केवल नए कैमरे और नए पोस्टर के साथ दोहराती है, तो वह पीछे छूट सकती है।
लेकिन यदि वह उसी भावनात्मक आधार को लेकर आज की तकनीक, आज के सामाजिक संदर्भ और आज की दर्शक अपेक्षाओं के साथ नई कथा गढ़ती है, तो इसका प्रभाव कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है।
उम्मीद बड़ी है, परीक्षा उससे भी बड़ी
सरस सलिल ऑनलाइन में 17 अगस्त को प्रकाशित समाचार ने जिस फिल्म की नई चर्चा को सामने रखा है, वह केवल एक सीक्वल की सूचना नहीं बल्कि भोजपुरी सिनेमा की बढ़ती महत्वाकांक्षा की झलक भी है।
‘पटना से पाकिस्तान 2’ के पास कई मजबूत आधार हैं—पहली फिल्म की पहचान, निरहुआ का स्थापित स्टारडम, बदला हुआ और आकर्षक लुक, बड़ी स्टारकास्ट, देशभक्ति की भावभूमि तथा बड़े कैनवास पर फिल्म प्रस्तुत करने का दावा। अप्रैल 2026 में जारी फर्स्ट लुक से लेकर स्वतंत्रता दिवस पर आए टीजर तक फिल्म ने चरणबद्ध तरीके से दर्शकों की उत्सुकता बनाए रखी है। लेकिन असली फिल्म अभी पर्दे पर आनी बाकी है।
‘पटना से पाकिस्तान 2’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह देशभक्ति को शोर नहीं, संवेदना बनाए; एक्शन को तमाशा नहीं, कहानी का हिस्सा बनाए; निरहुआ के नए लुक को केवल आकर्षण नहीं, मजबूत चरित्र में बदले और बड़ी स्टारकास्ट को केवल संख्या नहीं, कथा की ताकत बनाए।
यदि ऐसा होता है तो फिल्म भोजपुरी सिनेमा के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकती है। और यदि कहानी कमजोर पड़ती है, तो भव्यता, स्टारडम और देशभक्ति का आवरण भी उसे लंबे समय तक नहीं बचा पाएगा।
फिलहाल टीजर ने उत्सुकता पैदा कर दी है। अब दर्शक यह जानना चाहता है कि पटना से पाकिस्तान तक की यह दूसरी सिनेमाई यात्रा आखिर उसे केवल तालियां देगी या कोई ऐसी कहानी भी देगी जिसे सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद याद रखा जा सके। यही वह सवाल है जिसका जवाब ‘पटना से पाकिस्तान 2’ की वास्तविक रिलीज के बाद मिलेगा।
नोट: यह आलेख हमारी संपादकीय टीम द्वारा संपादित संस्करण है।

























