जिंदगी में फेल कोई नहीं होता, हम सिर्फ परिणाम को हार समझ बैठते हैं

जिंदगी में फेल कोई नहीं होता विषय पर प्रेरक संपादकीय फीचर इमेज, जीत और सीख का संदेश

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—अनिल अनूप

किसी बच्चे की उत्तर-पुस्तिका पर लाल स्याही से लिखा एक शब्द—‘फेल’—कभी-कभी उसके पूरे आत्मविश्वास पर भारी पड़ जाता है। किसी युवक के हाथ में नौकरी न मिलने की खबर आती है तो उसे लगता है जैसे भविष्य का दरवाजा बंद हो गया। कारोबार में नुकसान होता है तो वर्षों की मेहनत को एक ही झटके में असफल घोषित कर दिया जाता है। कोई रिश्ता टूटता है तो इंसान अपने ही भीतर सवालों के कटघरे में खड़ा हो जाता है।

हमारी सबसे बड़ी भूल शायद यही है कि हमने परिणाम को व्यक्ति समझ लिया है। परीक्षा में कम अंक आए तो बच्चा फेल। नौकरी नहीं मिली तो युवक फेल। कारोबार नहीं चला तो कारोबारी फेल। सपना पूरा नहीं हुआ तो इंसान फेल। लेकिन जरा एक क्षण के लिए इस शब्द को जिंदगी की अदालत से बाहर निकालकर देखिए।

आखिर फेल किसे कहते हैं?

क्या उस व्यक्ति को जिसने कोशिश की और सफल नहीं हुआ? या उस व्यक्ति को जिसने गिरने के बाद उठना छोड़ दिया? क्या उस विद्यार्थी को जिसने एक परीक्षा में अपेक्षित अंक नहीं पाए? या उस विद्यार्थी को जिसने अपनी गलती से कुछ भी सीखने से इनकार कर दिया? क्या उस इंसान को जिसने किसी मोड़ पर गलत फैसला लिया? या उस इंसान को जिसने गलती पहचान लेने के बाद भी वही गलती दोहराते रहने का फैसला किया? यहीं जिंदगी और परीक्षा के बीच का फर्क सामने आता है।

परीक्षा का परिणाम एक तारीख पर खत्म हो जाता है, लेकिन जिंदगी का परिणाम कभी अंतिम नहीं होता।

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जिंदगी में कोई ऐसी घंटी नहीं बजती जिसके बाद कोई शिक्षक खड़ा होकर कहे—“अब तुम पास हो गए” या “अब तुम हमेशा के लिए फेल हो।” जिंदगी हर सुबह हमें एक और मौका देती है। एक और कोशिश। एक और निर्णय। एक और रास्ता। एक और सीख।

इसलिए शायद हमें अपनी भाषा ही बदलनी होगी। हमें यह कहना बंद करना होगा कि “मैं फेल हो गया।” इसके बजाय कहना चाहिए—“इस बार मैं सफल नहीं हुआ, लेकिन इस अनुभव ने मुझे कुछ सिखाया है।” यह बदलाव सुनने में छोटा है, लेकिन सोच में बहुत बड़ा है।

क्योंकि “मैं फेल हो गया” कहने वाला व्यक्ति अपनी पहचान को परिणाम से जोड़ देता है, जबकि “मैंने सीखा” कहने वाला व्यक्ति परिणाम से आगे देखने लगता है। और जिंदगी हमेशा परिणाम से आगे की कहानी है।

हम अक्सर जीत को मंजिल और हार को अंत समझ लेते हैं। जबकि कई बार जीत हमें सिर्फ खुशी देती है और हार हमें वह समझ दे जाती है, जिसकी जरूरत आगे की पूरी जिंदगी में पड़ने वाली होती है।

एक बच्चा गिरकर चलना सीखता है। वह पहली बार गिरने के बाद यह नहीं कहता कि चलना मेरे बस की बात नहीं। वह फिर उठता है। फिर गिरता है। फिर उठता है। आखिरकार चलने लगता है।

फिर बड़े होने के साथ हम इतने समझदार कैसे हो जाते हैं कि पहली ठोकर को ही अंतिम फैसला मान लेते हैं? शायद इसलिए कि बचपन में हमें गिरने पर उठना सिखाया जाता है और बड़े होने पर गिरने से शर्मिंदा होना। यही सोच बदलने की जरूरत है। जिंदगी में फेल कोई नहीं होता। कोई जीतकर आगे बढ़ता है और कोई हारकर सीखकर आगे बढ़ता है।

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फर्क केवल इतना है कि जीत का प्रमाण हमें तुरंत दिखाई देता है, जबकि सीख का मूल्य कई बार वर्षों बाद समझ में आता है। और कई बार जिस दिन हमें लगता है कि हम हार गए, उसी दिन जिंदगी चुपचाप हमारे भीतर किसी बड़ी समझ की नींव रख रही होती है।

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Author: यायावर

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