कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के हाथरस की वह घटना छह साल बाद भी एक दलित परिवार की जिंदगी से बाहर नहीं निकल सकी है। 14 सितंबर 2020 की तारीख इस परिवार के लिए सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि ऐसा जख्म है जिसकी टीस आज भी रोजमर्रा की जिंदगी में महसूस होती है। 19 वर्षीय दलित युवती के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म और उसके बाद हुई मौत ने पूरे देश का ध्यान हाथरस की ओर खींचा था। मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने की और मुकदमा अदालत तक पहुंचा।
अदालत में चार आरोपियों में से तीन को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया, जबकि संदीप सिसोदिया को गैर-इरादतन हत्या और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई। इस न्यायिक स्थिति के बावजूद पीड़ित परिवार की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं।
छह साल बीत चुके हैं, लेकिन परिवार के घर के बाहर आज भी सीआरपीएफ के जवान तैनात हैं। जिस सुरक्षा को परिवार की हिफाजत के लिए जरूरी समझा गया था, वही सुरक्षा अब परिवार के सदस्यों के लिए बंदिश जैसी महसूस होती है। घर से बाहर निकलना, रोजगार करना, सामाजिक रिश्ते बनाना और बच्चों का सामान्य जीवन—इन सब पर सुरक्षा व्यवस्था का असर पड़ा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस परिवार को घटना के बाद सरकार की ओर से आर्थिक सहायता के साथ नौकरी और आवास देने का भरोसा दिया गया था, उसे छह साल बाद भी इन वादों के पूरे होने का इंतजार क्यों करना पड़ रहा है?
छह साल बाद भी घर के बाहर पहरा
घटना के बाद परिवार की सुरक्षा को लेकर सीआरपीएफ की तैनाती की गई थी। परिवार के सदस्यों का कहना है कि सुरक्षा के बीच रहने से उनकी जिंदगी सामान्य नहीं रह गई है। घर के बाहर जवानों की मौजूदगी और निगरानी के कारण परिवार का हर सदस्य लगातार एक सीमित दायरे में रहने को मजबूर है।
परिवार की एक महिला सदस्य का कहना है कि सुरक्षा की वजह से बच्चे भी घर से बाहर निकलने से डरते हैं। परिवार में छोटी बच्चियों के मन में घटना की ऐसी छाप है कि उन्हें लगता है कि बाहर जाने पर उनके साथ भी कोई अनहोनी हो सकती है।
परिवार की भाभी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सवाल करते हुए कहा कि वह अलीगढ़ आए, लेकिन हाथरस के इस परिवार से मिलने नहीं पहुंचे। उनका सवाल था कि क्या उनका परिवार इंसान नहीं था और क्या उनके साथ जातीय भेदभाव हुआ?
यह सवाल केवल एक परिवार की नाराजगी नहीं, बल्कि उस मानसिक और सामाजिक दूरी की ओर भी इशारा करता है जिसे परिवार पिछले छह वर्षों से महसूस करने का दावा करता रहा है।
घटना के बाद दिल्ली में हुई युवती की मौत
14 सितंबर 2020 को 19 वर्षीय युवती के साथ कथित घटना के बाद उसका इलाज कराया गया। करीब 16 दिनों तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद 29 सितंबर 2020 को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उसकी मौत हो गई।
मौत के बाद मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बहस को जन्म दिया। युवती की मौत के बाद मुकदमे में हत्या से संबंधित आरोप भी शामिल हुए और जांच सीबीआई को सौंपी गई।
परिवार का आरोप रहा कि युवती के शव का रात में अंतिम संस्कार उसकी इच्छा के विरुद्ध और परिजनों की मौजूदगी के बिना कराया गया। इस मामले को लेकर भी कानूनी कार्यवाही हुई और मामला अदालत में विचाराधीन रहा।
इस पूरे घटनाक्रम ने हाथरस के उस गांव को देश की निगाहों में ला दिया, लेकिन छह साल बाद गांव में घटना का असर अभी भी सामाजिक संबंधों और परिवार की जिंदगी में दिखाई देता है।
गांव में अब भी घटना की अलग-अलग व्याख्या
गांव की ओर जाने वाली सड़क के दोनों तरफ खेत दिखाई देते हैं। सुबह के समय किसान अपने काम में लगे नजर आते हैं, लेकिन जैसे ही हाथरस की उस घटना का जिक्र होता है, बातचीत का माहौल बदल जाता है।
गांव के कुछ लोग आरोपियों को निर्दोष मानते हैं। खेत में चारा काट रहे किसान विष्णु शर्मा ने घटना के बारे में अपनी राय रखते हुए कहा कि उनके अनुसार कुछ लोगों को गलत तरीके से फंसाया गया था। उनका कहना था कि तीन लोग जेल से बाहर आ चुके हैं और चौथा भी बाहर आ जाएगा।
गांव के प्रधान नरेंद्र सिसोदिया ने भी आरोपियों को निर्दोष बताया। उनका कहना था कि मामला मीडिया में अत्यधिक चर्चा में आने की वजह से बड़ा बन गया।
हालांकि सीबीआई की जांच में पीड़ित परिवार के किसी सदस्य को आरोपी नहीं बनाया गया था। इसलिए गांव में सुनाई देने वाली स्थानीय धारणाओं और जांच एजेंसी की कार्रवाई को अलग-अलग समझना जरूरी है।
गांव से अलग-थलग पड़ा परिवार
परिवार का घर गांव के एक छोर पर स्थित है। बाहर सुरक्षा बलों की मौजूदगी देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह वही परिवार है जिसके घर के आसपास छह वर्षों से सुरक्षा व्यवस्था कायम है।
परिवार का कहना है कि घटना के बाद उनके सामाजिक रिश्ते लगभग खत्म हो गए। परिवार के सदस्यों के अनुसार जाति के कारण भी उन्हें अलगाव का सामना करना पड़ा।
युवती का परिवार वाल्मीकि समुदाय से है। गांव में इस समुदाय के केवल कुछ परिवार हैं, जबकि ठाकुर और ब्राह्मण समुदाय की संख्या अधिक बताई जाती है।
युवती के बड़े भाई ने आरोप लगाया कि गांव में जातिगत छुआछूत आज भी मौजूद है। उनका कहना है कि पहले गांव में लोग एक-दूसरे के साथ सामान्य संबंध रखते थे, लेकिन घटना के बाद उनके परिवार से दूरी बढ़ गई।
परिवार के एक पड़ोसी राधेश्याम पचौरी ने भी सामाजिक दूरी की बात स्वीकार करते हुए कहा कि उनके यहां होने वाले कार्यक्रमों में परिवार को बुलाया जाता है, लेकिन अलग बैठाकर भोजन कराया जाता है।
इन बयानों से साफ होता है कि मामला सिर्फ अदालत में चल रहे मुकदमे तक सीमित नहीं है। इसका असर परिवार के सामाजिक जीवन पर भी पड़ा है।
आरोपियों के बाहर आने के बाद बढ़ी परिवार की चिंता
परिवार के सदस्यों का कहना है कि जिन लोगों को अदालत से राहत मिली, उनके गांव लौटने के बाद उनकी चिंता और बढ़ गई। परिवार का आरोप है कि आरोपियों के लौटने पर उनके समर्थन में लोग एकत्र हुए और उत्सव जैसा माहौल बना।
पीड़ित परिवार के छोटे भाई का कहना है कि घटना के बाद गांव के किसी व्यक्ति ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि उनके परिवार पर क्या बीत रही है। उनका दावा है कि जब आरोपी बाहर आए तो बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने पहुंचे।
परिवार के मुताबिक ऐसी परिस्थितियों ने उनके भीतर असुरक्षा की भावना और गहरी कर दी।
सुरक्षा बनी रोजगार में सबसे बड़ी बाधा
घटना से पहले परिवार खेती और मजदूरी से अपनी आजीविका चलाता था। घर में कई भैंसें थीं और दूध बेचकर भी आमदनी होती थी। परिवार के पिता सफाईकर्मी का काम करते थे। परिवार का एक सदस्य दिल्ली की निजी कंपनी में भी काम करता था।
लेकिन घटना के बाद परिवार का जीवन पूरी तरह बदल गया।
बड़े भाई के मुताबिक अब वह सामान्य तरीके से मजदूरी या नौकरी नहीं कर सकते। उनका कहना है कि यदि वे बाहर काम करने जाएं तो सुरक्षा में तैनात जवानों की मौजूदगी भी उनके साथ रहती है। ऐसी स्थिति में उन्हें मजदूरी के लिए बुलाने वाले लोग भी पीछे हटते हैं।
परिवार के पास आजीविका के साधन लगातार कम होते गए। कभी घर में सात भैंसें थीं, जिनसे दूध का कारोबार चलता था। अब तीन भैंसों में से दो बेची जा चुकी हैं और तीसरी भी बिकने की स्थिति में है।
परिवार के लिए यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं है। छह वर्षों तक रोजगार से दूर रहने का अर्थ है कि उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक गतिशीलता दोनों प्रभावित हुई हैं।
बच्चों की पढ़ाई भी सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित
परिवार में छोटी बच्चियों की शिक्षा पर भी घटना का असर पड़ा। सुरक्षा कारणों से वे लंबे समय तक नियमित रूप से स्कूल नहीं जा सकीं।
परिवार की महिला सदस्य बताती हैं कि उनकी तीन बेटियां हैं। बड़ी बेटी को घटना के बाद ननिहाल भेज दिया गया ताकि वह अपनी पढ़ाई जारी रख सके। वहीं दो बेटियां परिवार के साथ रहती रहीं और लंबे समय तक घर से बाहर निकलने से डरती रहीं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद जुलाई 2026 से दोनों बच्चियों को सीआरपीएफ सुरक्षा में हाथरस के एक स्कूल में भेजा जा रहा है।
बच्चियों की मां का कहना है कि उन्हें आज भी डर लगता है और घर के बाहर खेलने के लिए उनके पास सामान्य सामाजिक माहौल नहीं है। सुरक्षा में तैनात जवानों के साथ ही उनका संपर्क अधिक रहता है।
यह स्थिति बताती है कि किसी गंभीर अपराध के बाद सुरक्षा देना जरूरी हो सकता है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाली सुरक्षा व्यवस्था परिवार के सामान्य जीवन को भी प्रभावित कर सकती है।
नौकरी और मकान के सरकारी वादे का इंतजार
29 सितंबर 2020 को युवती की मौत के अगले दिन उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से परिवार को 25 लाख रुपये की आर्थिक सहायता, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और आवास देने का आश्वासन दिया गया था।
परिवार का कहना है कि 25 लाख रुपये की घोषित सहायता उन्हें मिल गई, लेकिन नौकरी और मकान का वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ।
परिवार के छोटे भाई का कहना है कि यदि परिवार के किसी सदस्य को नौकरी मिल जाती तो वह पिछले छह वर्षों में अपनी आर्थिक स्थिति को काफी हद तक संभाल सकते थे। उनका कहना है कि रोजगार नहीं मिलने से परिवार ने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष खो दिए।
हाथरस के जिलाधिकारी अतुल वत्स से इस संबंध में सवाल किए जाने पर उन्होंने मामला अदालत में विचाराधीन होने का हवाला देते हुए टिप्पणी करने से इनकार किया।
हाई कोर्ट के आदेश के बाद फिर उठी पुनर्वास की उम्मीद
पीड़ित परिवार को गांव से बाहर बसाने का मुद्दा लंबे समय से अदालतों के सामने रहा है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने वर्ष 2022 में परिवार को गांव से बाहर कहीं और बसाने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद परिवार का कहना है कि पुनर्वास की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, जहां उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी हुआ। परिवार की ओर से उत्तर प्रदेश से बाहर बसाने की मांग भी की गई थी।
अब 24 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को परिवार के पुनर्वास के संबंध में कड़ा निर्देश दिया है। अदालत ने तीन महीने के भीतर परिवार को गांव से बाहर बसाने को कहा है।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा पहले दिए गए आदेशों के अनुपालन में अनावश्यक रुकावट दिखाई दे रही है। हाई कोर्ट ने सरकार को परिवार को गाजियाबाद या नोएडा में बसाने और वहां रहने की सुविधा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
यह आदेश परिवार के लिए लंबे समय से चली आ रही प्रतीक्षा के बीच एक महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम है।
परिवार के लिए सुरक्षा या कैद?
छह साल से सीआरपीएफ सुरक्षा में रहने वाले परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल अब सुरक्षा की अवधि का है।
परिवार के सदस्य कहते हैं कि उन्हें सुरक्षा चाहिए, लेकिन ऐसी सुरक्षा नहीं जो उनकी पूरी जिंदगी को घर की चारदीवारी तक सीमित कर दे।
बड़े भाई का कहना है कि वे स्वतंत्र रूप से बाहर नहीं निकल सकते। रोजगार के अवसर सीमित हो गए हैं और सामाजिक रिश्ते टूट गए हैं।
परिवार की मां अपने छोटे बेटे की शादी को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि कई वर्षों से कोई रिश्ता नहीं आया। परिवार की लगातार सुरक्षा व्यवस्था देखकर लोग दूरी बनाते हैं। उनका मानना है कि यदि सुरक्षा व्यवस्था हट जाए और परिवार को सुरक्षित तरीके से कहीं नया घर मिल जाए तो बच्चों की जिंदगी फिर सामान्य हो सकती है।
इस तरह सुरक्षा, रोजगार, पुनर्वास और सामाजिक जीवन—चारों सवाल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
जातिगत भेदभाव के आरोपों के बीच बड़ी तस्वीर
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2024 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ अपराध के 14,642 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2025 के आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं।
हाथरस का यह मामला इसी व्यापक सामाजिक संदर्भ में भी देखा जाता है। हालांकि किसी एक मामले से पूरे समाज के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन पीड़ित परिवार द्वारा बताए गए अनुभव जातिगत दूरी और सामाजिक बहिष्कार जैसे सवालों को जरूर सामने लाते हैं।
परिवार का कहना है कि छह साल में उनका सामाजिक जीवन लगभग समाप्त हो गया है। दूसरी ओर गांव के कुछ लोग आरोपियों को निर्दोष मानते हैं। ऐसे परस्पर विरोधी दावों के बीच अदालतों के फैसले और आधिकारिक जांच के निष्कर्ष तथ्यात्मक आधार प्रदान करते हैं।
न्याय में देरी पर प्रशांत भूषण ने उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने परिवार की स्थिति को न्याय में देरी से जोड़ते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
उनका कहना है कि परिवार को सुरक्षा देते-देते स्थिति ऐसी हो गई है कि परिवार खुद अपनी जिंदगी को जेल जैसा महसूस कर रहा है। उन्होंने परिवार के पुनर्वास और रोजगार से जुड़े पूर्व आदेशों का भी उल्लेख किया।
न्यायिक प्रक्रिया में देरी पर उन्होंने कहा कि भारत में मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने से पीड़ित परिवारों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है। उनके अनुसार इस मामले में भी परिवार अदालतों तक पहुंचा, लेकिन आदेशों के बावजूद समाधान में लंबा समय लगा।
छह साल बाद परिवार की मांग क्या है?
छह साल पहले जिस परिवार की जिंदगी एक भयावह घटना के बाद बदल गई थी, आज उसकी मांग केवल मुकदमे के परिणाम तक सीमित नहीं है।
परिवार सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन चाहता है। वह रोजगार चाहता है, बच्चों की पढ़ाई चाहता है, सामाजिक रिश्तों की वापसी चाहता है और सबसे बढ़कर ऐसी जगह रहना चाहता है जहां सुरक्षा के नाम पर उसकी स्वतंत्रता खत्म न हो।
24 अगस्त 2026 के इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब सरकार के सामने पुनर्वास की समयसीमा भी निर्धारित है। अगले तीन महीने इस परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
छह वर्षों से सीआरपीएफ के सुरक्षा घेरे में जी रहा यह परिवार अब यही सवाल पूछ रहा है—सुरक्षा कब सामान्य जिंदगी में बदलेगी? नौकरी और आवास का वादा कब पूरा होगा? और क्या अदालत के नए आदेश के बाद वह दिन आएगा जब इस परिवार को पहरे के बीच नहीं, बल्कि स्वतंत्र और सुरक्षित माहौल में जीवन जीने का अवसर मिलेगा?
हाथरस की घटना भले ही छह वर्ष पुरानी हो चुकी है, लेकिन इस परिवार के लिए इसकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अदालत के फैसले, सरकारी वादे, पुनर्वास के आदेश और सुरक्षा व्यवस्था—इन सबके बीच परिवार आज भी उस सामान्य जिंदगी का इंतजार कर रहा है, जो घटना से पहले उसकी अपनी थी।

























