हर घर तिरंगा ने बदली गरीब परिवारों की तकदीर, देशभक्ति के साथ चला रोजगार

हर घर तिरंगा अभियान के लिए सड़क किनारे बांस से तिरंगे के डंडे तैयार करते गरीब परिवार और तिरंगा बेचते विक्रेता

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अंजनी कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट

स्वतंत्रता दिवस की तैयारियां जैसे-जैसे तेज हो रही हैं, वैसे-वैसे देशभर में तिरंगे की मांग भी बढ़ती जा रही है। बाजारों, दुकानों, प्रतिष्ठानों और घरों में राष्ट्रीय ध्वज लगाने को लेकर लोगों में उत्साह दिखाई दे रहा है। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान ने देशभक्ति की भावना को नई ऊर्जा देने के साथ ही समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए रोजगार का एक अवसर भी पैदा किया है। जिन परिवारों के सामने सामान्य दिनों में दो जून की रोटी जुटाना चुनौती बना रहता है, उनके लिए स्वतंत्रता दिवस से पहले के ये दिन अतिरिक्त आमदनी लेकर आए हैं।

सड़क किनारे, फुटपाथों और छोटे-छोटे अस्थायी ठिकानों पर रहने वाले अनेक परिवार इन दिनों तिरंगे के डंडे तैयार करने और झंडों को बिक्री के लिए तैयार करने में जुटे हैं। सुबह की पहली किरण के साथ शुरू होने वाला काम देर शाम तक चलता है। परिवार के छोटे-बड़े सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार इस काम में हाथ बंटा रहे हैं। किसी के हाथ में बांस की लकड़ी है तो कोई उसे नापकर काट रहा है। कोई डंडे को आकार दे रहा है तो कोई तैयार झंडों को व्यवस्थित कर रहा है।

स्वतंत्रता दिवस बना कमाई का बड़ा अवसर

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए स्वतंत्रता दिवस केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि कुछ दिनों की अतिरिक्त कमाई का अवसर भी बनकर सामने आया है। साल के अधिकांश दिनों में अस्थायी मजदूरी, छोटे-मोटे काम या फुटपाथ पर सामान बेचकर परिवार का खर्च चलाने वाले लोगों को अगस्त के दिनों में तिरंगे की बढ़ती मांग से काम मिल रहा है।

इन परिवारों का कहना है कि रोजाना की मेहनत के बावजूद आमदनी इतनी नहीं हो पाती कि परिवार की सभी जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें। ऐसे में स्वतंत्रता दिवस के आसपास तिरंगे और उनके डंडों की मांग बढ़ने से उन्हें अपेक्षाकृत अधिक काम मिलता है। कुछ दिनों की यह अतिरिक्त कमाई उनके लिए राशन, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की दूसरी आवश्यकताओं को पूरा करने में मददगार साबित होती है।

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तिरंगे की बिक्री बढ़ने के साथ ही उससे जुड़े छोटे कारोबारियों और कारीगरों को भी लगातार काम मिल रहा है। राष्ट्रीय पर्व की तैयारियों ने बाजार में हलचल बढ़ा दी है और इसका सीधा लाभ उन लोगों तक भी पहुंच रहा है जो बड़े कारोबारी नहीं, बल्कि छोटे स्तर पर अपना परिवार चलाने के लिए मेहनत करते हैं।

बांस की लकड़ी से तैयार हो रहे तिरंगे के डंडे

तिरंगे के साथ इस्तेमाल होने वाले डंडों को तैयार करने का काम देखने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे परिवारों की कई घंटे की मेहनत छिपी है। बांस की लकड़ियों को पहले आवश्यक लंबाई में काटा जाता है। इसके बाद उन्हें उपयोग के अनुरूप तैयार किया जाता है। कई स्थानों पर परिवार के सदस्य सामूहिक रूप से इस काम को पूरा करते हैं।

एक व्यक्ति बांस काटता है, दूसरा उसे साफ करता है और तीसरा तैयार डंडों को अलग-अलग आकार में व्यवस्थित करता है। इस तरह घर के कई सदस्यों की मेहनत एक छोटे से रोजगार को पारिवारिक आय के साधन में बदल देती है।

बांस आसानी से उपलब्ध होने वाली सामग्री है और उससे तैयार होने वाले डंडों की मांग स्वतंत्रता दिवस के समय तेजी से बढ़ जाती है। यही कारण है कि छोटे कारीगर और जरूरतमंद परिवार इस मौसम का इंतजार करते हैं।

आम लोगों में भी तिरंगा खरीदने का उत्साह

इस बार तिरंगे की मांग केवल राजनीतिक दलों या सामाजिक संगठनों तक सीमित नहीं है। आम नागरिक भी अपने घरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों पर राष्ट्रीय ध्वज लगाने के लिए तिरंगे खरीद रहे हैं। बच्चों और युवाओं में भी स्वतंत्रता दिवस को लेकर विशेष उत्साह देखा जा रहा है।

लोगों का कहना है कि राष्ट्रीय ध्वज देश की आन, बान और शान का प्रतीक है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर घर और दुकान पर तिरंगा लगाना उनके लिए गर्व की बात है। यही भावना बाजार में तिरंगे की मांग बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

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जब कोई व्यक्ति एक छोटा सा तिरंगा खरीदता है, तो उसके पीछे केवल एक राष्ट्रीय प्रतीक की खरीद नहीं होती। उस खरीद से झंडा तैयार करने वाले कारीगर, बांस उपलब्ध कराने वाले छोटे विक्रेता और उसे बाजार तक पहुंचाने वाले लोगों की रोजी-रोटी भी जुड़ी होती है।

देशभक्ति के साथ आत्मनिर्भरता की तस्वीर

‘हर घर तिरंगा’ अभियान की सबसे खूबसूरत तस्वीर उन मेहनतकश हाथों में दिखाई देती है, जो आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने में जुटे हैं। उनके पास आधुनिक संसाधन भले ही न हों, लेकिन मेहनत करने का जज्बा कम नहीं है।

सड़क किनारे बैठकर तिरंगे के डंडे तैयार करने वाला परिवार भले ही आर्थिक रूप से कमजोर हो, लेकिन उसके हाथों से निकलने वाला तिरंगा देश की स्वतंत्रता और गौरव का संदेश लेकर लोगों के घरों तक पहुंचता है। यही वजह है कि इस छोटे से काम में देशभक्ति और आत्मनिर्भरता दोनों की तस्वीर दिखाई देती है।

इन परिवारों के लिए तिरंगे की बिक्री से होने वाली आमदनी कुछ दिनों की राहत जरूर देती है। यह कमाई उनके लिए केवल पैसे का साधन नहीं, बल्कि इस बात का भरोसा भी है कि मेहनत करने पर अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक जुटे काम में

तिरंगा तैयार करने वाले कई परिवारों में घर के लगभग सभी सदस्य अपनी भूमिका निभाते नजर आते हैं। कोई बांस की लकड़ी संभालता है, कोई तैयार डंडों को गिनता है और कोई उन्हें बिक्री के लिए पैक करता है। परिवार के बड़े सदस्य काम की निगरानी करते हैं, जबकि युवा सदस्य अधिक शारीरिक मेहनत वाले कार्यों में सहयोग करते हैं।

इस सामूहिक मेहनत से परिवार की आमदनी बढ़ती है और काम भी तेजी से पूरा होता है। स्वतंत्रता दिवस नजदीक आने के साथ ऑर्डर बढ़ने पर इन परिवारों की व्यस्तता भी बढ़ जाती है।

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‘हर घर तिरंगा’ से जुड़ी उम्मीद

देश में राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर स्थानीय स्तर पर बनने वाले ऐसे छोटे रोजगार कई परिवारों के लिए महत्वपूर्ण साबित होते हैं। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान ने तिरंगे को जन-जन तक पहुंचाने की मुहिम के साथ छोटे स्तर के विक्रेताओं और कारीगरों के लिए बाजार भी तैयार किया है।

जरूरतमंद परिवारों के लिए यह अवसर भले ही कुछ दिनों का हो, लेकिन इससे मिलने वाली अतिरिक्त आमदनी उनके घरेलू बजट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उनके चेहरे पर दिखाई देने वाली खुशी इस बात का संकेत है कि देशभक्ति का यह पर्व उनके लिए आर्थिक उम्मीद भी लेकर आया है।

तिरंगे में दिख रही मेहनत और उम्मीद

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब घरों और प्रतिष्ठानों पर तिरंगा लहराएगा, तब उसके पीछे उन मेहनतकश परिवारों की मेहनत को भी याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने इसे तैयार करने में अपना समय और श्रम लगाया है। उनके लिए तिरंगा केवल बिक्री की वस्तु नहीं है, बल्कि वह उनके श्रम, सम्मान और आजीविका से भी जुड़ गया है।

‘हर घर तिरंगा’ अभियान ने इस बार देशभक्ति के रंग को रोजगार और आत्मनिर्भरता के रंग से भी जोड़ दिया है। सड़क किनारे बांस की लकड़ियों से तिरंगे के डंडे तैयार करते मेहनतकश हाथ इस बात की जीवंत मिसाल हैं कि राष्ट्रीय पर्व समाज के कमजोर वर्ग के लिए भी उम्मीद और अवसर लेकर आ सकते हैं।

स्वतंत्रता दिवस की खुशी जब हर घर तक पहुंचेगी और तिरंगा आसमान में लहराएगा, तब उसमें उन गरीब परिवारों की मेहनत भी शामिल होगी, जिन्होंने अपनी आजीविका चलाने के लिए दिन-रात परिश्रम करते हुए देश की आन-बान-शान के प्रतीक को लोगों तक पहुंचाने में योगदान दिया है।

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Author: यायावर

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