18 अक्टूबर 2026 4:17 पूर्वाह्न

मसूरी में दफन है झांसी की रानी का अंग्रेज वकील, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ता रहा कानूनी जंग

मसूरी के कब्रिस्तान में जॉन लैंग की कब्र, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के अंग्रेज वकील और प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार दीक्षित द्वारा कब्र की खोज से जुड़ी तस्वीरें

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नयन ज्योति की रिपोर्ट

कार्गो/मसूरी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का ज़िक्र होता है रानी लक्ष्मीबाई की अदम्य वीरता, साहस और अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ उनके संघर्ष की याद आती है। लेकिन इस ऐतिहासिक समुद्र तट का एक ऐसा अध्याय भी है, जिसके बारे में बहु

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त कम चर्चा होती है। यह कहानी एक ऐसे ब्रिटिश वकील की है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य में जन्म लेकर भारतीयों के अधिकारों और न्याय के लिए ब्रिटिश सत्ता को ही कानूनी चुनौती दी थी। यह वकील जॉन लैंग था , जिसने रानी लक्ष्मीबाई की ओर से लीगल बैटल गर्ल और अपनी पुस्तक के माध्यम से ब्रिटिश शासन की सेनाओं पर सवाल उठाए थे।

आज जॉन लैंग की कब्र उत्तराखंड के मसूरी स्थित पुराने कैमल्स बैक रोड कब्रिस्तान में बताई गई है। इतिहास के इस लगभग चित्रित पात्र को फिर से चर्चा में लाने का श्रेय देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के विधि प्रोफेसर प्रोफेसर (डॉ.) अनिल कुमार दीक्षित को दिया जाता है। उनके अनुसार, साल 2011 में उन्होंने जॉन लैंग की कब्र की खोज कर अपना लाइव वीडियो दुनिया के सामने पेश किया था। इस प्रयास में उस अंग्रेजी वकील की कहानी को फिर से लोगों के बीच की सलाह पर काम किया गया, जिसने अपने समय में भारतीय पक्ष में होने वाले साहस का प्रदर्शन किया था।

ऑस्ट्रेलिया में जन्म, भारत से बने गहरे रिश्ते

प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार दीक्षित के अनुसार, जॉन लैंग का जन्म 19 दिसंबर 1816 को सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में हुआ था। वह ऑस्ट्रेलिया के शुरुआती उपन्यासकारों में भी गिने जाते हैं। बाद में वह इंग्लैंड चले गए, जहां उन्होंने बैरिस्टर के रूप में वकालत की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वर्ष 1840 में उन्होंने भारत और पर्यटकों से अपने जीवन की दिशा बदल ली।

भारत आने के बाद जॉन लैंग ने केवल तथाकथित रूप से स्वयं को सीमित नहीं रखा। उन्होंने लेखन और पत्रकारिता को भी अपनी आवाज दी। उनके व्यक्तित्व में कानून, साहित्य और नैतिकता का अनोखा मेल दिखाई देता है। वह ब्रिटिश शासन की संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी के आलोचक बन गये, जिसका प्रभाव भारतीय जनता और स्थानीय शासकों के अधिकारों पर पड़ रहा था।

बताया जाता है कि जॉन लैंग ने न्यूयॉर्क टाइम्स से ‘एमफसिलाइट’ नाम का समाचार पत्र भी शुरू किया था। इस प्रकाशन में शासन और सेना से संबंधित विषयों के साथ-साथ राजनीतिक विचारधारा पर भी सामग्री प्रकाशित की गई थी। उनकी नैतिकता ब्रिटिश सत्ता के लिए मित्र बनाने वाली थी। इसी वजह से उन्होंने भारतीयों के बीच एक ऐसे ब्रिटिश के रूप में पहचान की, जो सत्ता की आलोचना करने से पीछे नहीं हटता था।

वर्जिन की रानी के वकील जॉन लैंग बने

जॉन लैंग का नाम भारतीय इतिहास में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने अंग्रेजी शासन की रानी लक्ष्मीबाई की ओर से कानूनी लड़ाई लड़ने वाली लड़की थी।

उस समय लॉर्ड डलहौजी की ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ के तहत ब्रिटिश शासन की विस्तारवादी नीति यानि कि हार्डवेयर नीति लागू की जा रही थी। इस नीति के तहत ऐसे रियासतों को ब्रिटिश शासन में मिलाने की कोशिश की गई थी, जहां अंग्रेजी सत्ता के अनुसार कोई प्राकृतिक प्राकृतिक प्रतिस्थापन नहीं था।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने पति महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी बनाया था। लेकिन ब्रिटिश शासन ने उनके दत्तक उत्तराधिकारी को मान्यता नहीं दी। इसके बाद झांसी के अधिकार और उत्तराधिकार का प्रश्न गंभीर राजनीतिक विवाद बन गया।

इसी संघर्ष के दौरान जॉन लैंग ने रानी लक्ष्मीबाई की ओर से कानूनी पक्ष रखा। एक अंग्रेज होकर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध खड़े होना उस दौर में सामान्य बात नहीं थी। जॉन लैंग ने रानी की ओर से कानूनी तर्क प्रस्तुत किए और ब्रिटिश शासन की नीति पर प्रश्न खड़े किए।

भले ही यह कानूनी संघर्ष झांसी के पक्ष में निर्णायक परिणाम हासिल नहीं कर सका, लेकिन जॉन लैंग का यह कदम इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने सत्ता के बजाय न्याय के पक्ष में खड़े होने का प्रयास किया।

पर्दे के पीछे से देखी थी रानी लक्ष्मीबाई की झलक

जॉन लैंग ने अपनी लेखनी में झांसी की रानी से हुई मुलाकात का उल्लेख भी किया है। उनके विवरण के अनुसार, रानी से बातचीत के दौरान दोनों के बीच पर्दा था। इसी दौरान रानी के दत्तक पुत्र ने अचानक पर्दा हटा दिया और जॉन लैंग को रानी लक्ष्मीबाई की झलक देखने का अवसर मिला।

जॉन लैंग के वर्णन में रानी की सुंदरता के साथ उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता और साहस का भी उल्लेख मिलता है। यह विवरण इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह झांसी की रानी के जीवन और व्यक्तित्व को देखने वाले एक समकालीन व्यक्ति की दृष्टि प्रस्तुत करता है।

रानी लक्ष्मीबाई के संबंध में लिखे गए अनेक ऐतिहासिक विवरणों में उनके युद्ध कौशल और साहस का उल्लेख मिलता है, लेकिन जॉन लैंग का विवरण उस समय के उनके व्यक्तित्व की एक अलग तस्वीर सामने लाता है।

पत्रकारिता के जरिए भी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती

जॉन लैंग की भूमिका केवल झांसी की रानी के वकील तक सीमित नहीं थी। वह ब्रिटिश शासन की नीतियों के आलोचक पत्रकार भी थे। उन्होंने अपने समाचार पत्र और लेखन के माध्यम से प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।

उनका लेखन ब्रिटिश शासन के लिए इसलिए असुविधाजनक था क्योंकि वह स्वयं ब्रिटिश पृष्ठभूमि से आते थे और कानून की बारीकियों को समझते थे। वह जानते थे कि औपनिवेशिक शासन किस प्रकार कानून और प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल कर भारतीय रियासतों और जनता पर नियंत्रण कायम कर रहा था।

बताया जाता है कि उन्हें अपने लेखन और विचारों के कारण धमकियों का सामना भी करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने भारतीयों की आवाज उठाना जारी रखा। यही वजह है कि जॉन लैंग को भारतीय इतिहास में एक ऐसे अंग्रेज के रूप में देखा जाता है, जिसने अपने समय की औपनिवेशिक सत्ता के भीतर रहते हुए उसके अन्यायपूर्ण रवैये का विरोध किया।

रानी की मृत्यु के बाद भी उठाया पक्ष

जॉन लैंग और झांसी की रानी का संबंध केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं बताया जाता। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु के बाद भी उनसे जुड़े कानूनी मामले में जॉन लैंग ने उनका पक्ष रखने का प्रयास किया।

वर्ष 1860 में रानी के संबंध में चलाए गए एक मामले में उनके पक्ष को प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख मिलता है। इस प्रसंग के अनुसार, जॉन लैंग ने रानी को निर्दोष साबित करने के लिए कानूनी तर्क दिए और ब्रिटिश प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए।

इस घटना से यह संकेत मिलता है कि जॉन लैंग के लिए रानी लक्ष्मीबाई का मामला केवल पेशेवर वकालत नहीं था। वह इसे न्याय और अधिकार के प्रश्न के रूप में देखते थे।

मसूरी में रहस्यमयी मौत और कैमल्स बैक रोड की कब्र

जॉन लैंग के जीवन का अंतिम अध्याय भी रहस्यमयी तरीके से बताया गया है। वर्ष 1864 मसूरी में उनकी मृत्यु हुई। उनकी मौत को लेकर संदेह और तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। हत्या के खतरे का भी उल्लेख किया गया है, हालांकि इस संबंध में अस्थिरता और सर्वमान्य ऐतिहासिक साक्ष्य सामने नहीं आए हैं।

उनकी मृत्यु के बाद मसूरी के पुराने कैमल्स बैक रोड कब्रिस्तान में उन्हें दफनाया गया। आज इस स्थान के इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए विशेष महत्व है, क्योंकि यहां उस व्यक्ति की कब्र बताई गई है जो भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज, कानूनी और नैतिकता के स्तर पर रहता था।

प्रोफेसर अनिल कुमार दीक्षित ने फिर दुनिया की एक सच्ची कहानी बताई

देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के विधि प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने जॉन लैंग की कब्र की खोज और सार्वजनिक रूप से अपने प्रयास का ऐतिहासिक महत्व बताया है। वर्ष 2011 में उन्होंने कैमल्स बैक रोड स्थित कब्रिस्तान में जॉन लैंग की कब्र को खोजा और लाइव वीडियो के माध्यम से उनके बारे में जानकारी साझा की।

उनके इस प्रयास से जॉन लैंग का नाम एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा में आया। इतिहास के विघटन में यह चरित्र आधुनिक पीढ़ी के सामने मौजूद है, इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें स्वतंत्रता और न्याय की लड़ाई का सवाल उठाया गया है, जो केवल किसी एक समुदाय, जाति या देश के लोगों की कहानी नहीं है। कभी-कभी सत्ता के अंदर से भी ऐसे लोग सामने आ जाते हैं, जो अन्याय के खिलाफ होने का जोखिम उठाते हैं।

जॉन लैंग का जीवन इसी विरोधाभास का उदाहरण है। जन्म से वह ब्रिटिश उपनिवेश का व्यक्ति था, लेकिन भारत आने के बाद उसने भारतीयों का पक्ष ले लिया, औपनिवेशिक सत्ता की संस्थाओं से प्रभावित हो रहे थे। वह विचारधारा की, पत्रकारिता की और लिखित—और इन तीन माध्यमों से ब्रिटिश शासन की समितियों पर प्रश्नचिह्न।

मसूरी की मस्जिदों में मौजूद उनकी कब्रें एक कब्र नहीं हैं, बल्कि औपनिवेशिक भारत के उस जटिल इतिहास की निशानी हैं, जिसमें कुछ ब्रिटिश भारत पर शासन करने वाली व्यवस्था का हिस्सा भी शामिल है, जो व्यवस्था के अन्याय के खिलाफ है। वयोवृद्ध की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष से स्लीप जॉन लैंग का नाम इसी कारण इतिहास में एक अलग स्थान है, जिसमें समय के साथ भय दिया गया था।

आज जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा है, तब रानी लक्ष्मीबाई की तलवारें और वीरता के साथ उस ब्रिटिश वकील को भी याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने अपने अधिकार के लिए अदालत में आवाज उठाई थी। मसूरी के कैमल्स बैक रोड कब्रिस्तान में मौजूद जॉन लैंग की कब्र और ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास के उस अध्याय का मौन गवाह है, जहां एक ब्रिटिश ने भारतीयों के लिए न्याय की आवाज उठाने का प्रयास किया था।

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