कमलेश कुमार चौधरी की ग्राउंड रिपोर्ट
लखनऊ । उत्तर प्रदेश की 68,500 सहायक शिक्षक भर्ती का विवाद एक बार फिर राजधानी लखनऊ की सड़कों पर दिखाई दिया। शनिवार, 12 सितंबर 2026 की सुबह बड़ी संख्या में भर्ती अभ्यर्थी उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के आवास के बाहर पहुंच गए। करीब आधे घंटे तक नारेबाजी हुई। अभ्यर्थियों की मांग सिर्फ नियुक्ति की नहीं थी, बल्कि भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण से जुड़ी कथित विसंगतियों को दूर करने और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के आदेश के अनुपालन की भी थी। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश की, जिसके दौरान नोकझोंक और धक्का-मुक्की की स्थिति बनी। बाद में प्रदर्शनकारियों को बसों के माध्यम से ईको गार्डन भेजे जाने की खबर सामने आई।
यह दृश्य केवल एक विरोध प्रदर्शन की तस्वीर नहीं है। इसके पीछे करीब आठ वर्षों से नौकरी की प्रतीक्षा, आरक्षण के नियमों की व्याख्या, आयोगों के निर्देशों के अनुपालन और शासन स्तर पर निर्णय की प्रतीक्षा का लंबा सिलसिला है। यही वजह है कि 68,500 शिक्षक भर्ती का मुद्दा अब केवल एक भर्ती प्रक्रिया का प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकार की भर्ती नीति, आरक्षण व्यवस्था और शिकायत निवारण तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बन गया है।
उन्नाव के अभ्यर्थी का सवाल: पांच प्रतिशत छूट किसके लिए थी?
प्रदर्शन में शामिल उन्नाव के एक अभ्यर्थी ने सवाल उठाया कि भर्ती परीक्षा में पांच प्रतिशत की छूट का प्रावधान चारों संबंधित वर्गों को मिलना चाहिए था। उनका आरोप है कि ओबीसी, दिव्यांग, भूतपूर्व सैनिक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रेणी के अभ्यर्थियों को अनारक्षित श्रेणी में रखकर उनके लिए निर्धारित राहत का वास्तविक लाभ नहीं दिया गया।
यही वह बिंदु है जहां विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी और प्रशासनिक पक्ष सामने आता है। अभ्यर्थियों का कहना है कि वर्ष 2018 में विज्ञापित 68,500 सहायक शिक्षक भर्ती की मूल व्यवस्था में आरक्षित श्रेणियों के लिए परीक्षा में पांच प्रतिशत की छूट का प्रावधान था। उनके अनुसार बाद में परिणाम और चयन प्रक्रिया में इस छूट को लागू करने को लेकर गंभीर विसंगति पैदा हुई।
राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के समक्ष मामला पहुंचने के बाद अभ्यर्थियों का दावा है कि आयोग ने मामले पर सुनवाई करते हुए 150 अंकों की परीक्षा में आरक्षित वर्ग के लिए 40 प्रतिशत यानी 60 अंक के स्तर पर कटऑफ लागू करने और उसके आधार पर चयन सूची में संशोधन की बात कही थी। प्रदर्शनकारी इसी आदेश के अनुपालन को अपनी लड़ाई का प्रमुख आधार बता रहे हैं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अभ्यर्थियों के दावों और प्रशासनिक/कानूनी प्रक्रिया में अंतिम रूप से लागू किए गए निर्णय को एक ही बात मान लेना उचित नहीं होगा। असली सवाल यही है कि आयोग के निर्देशों और सरकार के स्तर पर लिए गए निर्णयों की वर्तमान कानूनी एवं प्रशासनिक स्थिति क्या है और उसके आधार पर नई चयन सूची किस सीमा तक बनाई जा सकती है।
आठ साल बाद भी क्यों कायम है विवाद?
68,500 शिक्षक भर्ती वर्ष 2018 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी है। इतने लंबे समय के बाद भी यदि अभ्यर्थी नियुक्ति या चयन सूची में सुधार की मांग को लेकर राजधानी की सड़कों पर उतर रहे हैं, तो यह अपने आप में सरकारी भर्ती तंत्र के लिए गंभीर सवाल है।
अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक अधिकारियों, मंत्रियों और शासन के विभिन्न स्तरों पर अपनी बात रखी। बैठकें हुईं, आश्वासन मिले और मामले को मुख्यमंत्री स्तर पर समाधान के लिए ले जाने की बात कही गई, लेकिन निर्णायक आदेश सामने नहीं आया। हाल की रिपोर्टों में भी यह सामने आया है कि पूर्व बैठक में अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के स्तर से होने की बात कही गई थी और बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह की ओर से भी मुख्यमंत्री से वार्ता की बात कही गई थी।
यही देरी अब आंदोलन को आक्रामक दिशा दे रही है।
प्रश्न यह नहीं है कि सरकार को हर आंदोलनकारी की मांग तुरंत स्वीकार कर लेनी चाहिए। प्रश्न यह है कि यदि किसी संवैधानिक/वैधानिक आयोग के निर्देश को लेकर वर्षों से विवाद चल रहा है तो सरकार को उसकी वर्तमान स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं करनी चाहिए?
डिप्टी सीएम आवास का घेराव क्या बताता है?
किसी उपमुख्यमंत्री के आवास का घेराव सामान्य विरोध प्रदर्शन से अलग राजनीतिक संदेश देता है। इसका सीधा अर्थ है कि अभ्यर्थियों को लगता है कि सामान्य प्रशासनिक रास्तों से उनकी बात आगे नहीं बढ़ रही है।
केशव प्रसाद मौर्य का आवास चुनना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। प्रदर्शनकारियों की मांग मुख्यमंत्री तक मामला पहुंचाने और राजनीतिक स्तर पर हस्तक्षेप कराने की रही। इसलिए यह प्रदर्शन प्रशासनिक समस्या के साथ-साथ राजनीतिक जवाबदेही का सवाल भी बन गया।
हालांकि प्रदर्शन के दौरान पुलिस और अभ्यर्थियों के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति पैदा होना दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार और आंदोलनकारी दोनों के लिए बेहतर रास्ता संवाद का है। यदि प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रख रहे हैं तो उन्हें सुना जाना चाहिए और यदि कोई प्रशासनिक या सुरक्षा कारण उन्हें किसी स्थान से हटाने की मांग करता है तो उसका भी पारदर्शी आधार सामने आना चाहिए।
ईको गार्डन पहुंचा आंदोलन, लेकिन सवाल वहीं
पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को ईको गार्डन भेजे जाने के बाद आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का आंदोलन वहां भी जारी है।
इससे साफ है कि पुलिस द्वारा प्रदर्शन का स्थान बदलने से मूल समस्या समाप्त नहीं होती।
सरकार के सामने अब दो विकल्प हैं। पहला, आंदोलन को कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर केवल प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग धरना स्थलों पर भेजा जाए। दूसरा, मामले की मूल फाइल खोलकर यह सार्वजनिक किया जाए कि आयोगों के निर्देशों की कानूनी स्थिति क्या है, शासन ने अब तक क्या कार्रवाई की है और आगे क्या समयसीमा तय की गई है। दूसरा रास्ता अधिक भरोसा पैदा कर सकता है।
आरक्षण की बहस को राजनीतिक नारे से आगे ले जाने की जरूरत
शिक्षक भर्ती में आरक्षण का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है। यहां एक तरफ आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के अधिकार हैं तो दूसरी तरफ चयनित अभ्यर्थियों के अधिकार, न्यायालयों के आदेश, भर्ती नियम और प्रशासनिक निर्णय भी जुड़े होते हैं।
इसीलिए इस पूरे प्रकरण को केवल ‘आरक्षण घोटाला’ या केवल ‘अभ्यर्थियों का विरोध’ कहकर समाप्त कर देना समस्या को सरल बनाना होगा। प्रदर्शनकारी जिस आदेश का हवाला दे रहे हैं, उसकी प्रमाणित प्रति, सरकार द्वारा उस पर की गई कार्रवाई, संबंधित विभाग की आपत्तियां और यदि कोई न्यायिक रोक या अन्य कानूनी बाध्यता है तो उसकी स्थिति सार्वजनिक होनी चाहिए। यही पारदर्शिता विवाद का वास्तविक समाधान निकाल सकती है।
68,500 और 69,000 भर्ती को एक समझना बड़ी भूल
उत्तर प्रदेश की शिक्षक भर्ती से जुड़े आंदोलनों में 68,500 और 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती के मामले अक्सर एक साथ चर्चा में आ जाते हैं, जबकि दोनों अलग भर्ती प्रक्रियाएं हैं।
69,000 भर्ती में आरक्षण और चयन सूची को लेकर अलग न्यायिक विवाद रहा है और उस पर भी अभ्यर्थियों ने लंबे समय तक आंदोलन किया है। 2024 में 69,000 भर्ती की आरक्षण संबंधी विसंगतियों को लेकर लखनऊ में प्रदर्शन की रिपोर्ट भी सामने आई थी।
लेकिन वर्तमान आंदोलन 68,500 सहायक शिक्षक भर्ती से जुड़े अभ्यर्थियों का है। इसलिए सरकार को भी इस मामले का समाधान अलग फाइल और अलग कानूनी स्थिति के आधार पर करना होगा। यही पत्रकारिता और नीति-निर्माण दोनों के लिए जरूरी है।
सरकार के लिए अब क्या रास्ता बचता है?
सरकार यदि वास्तव में इस पुराने विवाद को समाप्त करना चाहती है तो उसे सबसे पहले एक स्पष्ट स्थिति-पत्र जारी करना चाहिए। उसमें यह बताया जाना चाहिए कि 68,500 भर्ती में पांच प्रतिशत छूट से संबंधित मूल नियम क्या था, परिणाम जारी करते समय उसका किस प्रकार पालन हुआ, राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने क्या निर्देश दिए, बेसिक शिक्षा विभाग ने उन पर क्या कार्रवाई की और वर्तमान में कोई न्यायिक या प्रशासनिक बाधा है या नहीं।
इसके बाद सभी संबंधित पक्षों—अभ्यर्थी प्रतिनिधियों, बेसिक शिक्षा विभाग, विधि विभाग और संबंधित आयोग—के साथ एक औपचारिक बैठक होनी चाहिए। यदि किसी आदेश का अनुपालन संभव है तो उसकी समयसीमा घोषित की जाए और यदि अनुपालन कानूनी रूप से संभव नहीं है तो उसके कारण भी लिखित रूप में बताए जाएं।
आठ साल पुराने विवाद का सबसे खराब समाधान यही है कि हर कुछ महीने में अभ्यर्थी धरना दें, अधिकारी आश्वासन दें और मामला फिर अगली बैठक तक टल जाए।
अभ्यर्थियों के लिए भी जरूरी है तथ्य और संयम
दूसरी तरफ आंदोलनकारी अभ्यर्थियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उनका संघर्ष तभी मजबूत होगा जब मांगें दस्तावेजों, नियमों और प्रमाणित आदेशों पर आधारित हों। किसी भी प्रशासनिक या राजनीतिक व्यक्ति पर व्यक्तिगत आरोप लगाने के बजाय सवाल भर्ती प्रक्रिया और निर्णयों पर केंद्रित रहना चाहिए। लोकतंत्र में आंदोलन अधिकार है, लेकिन शांतिपूर्ण आंदोलन की नैतिक ताकत तभी बढ़ती है जब उसके तथ्य स्पष्ट हों।
असली सवाल: नियुक्ति कब और किस आधार पर?
68,500 शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों का सबसे बड़ा सवाल आज भी यही है—यदि नियमों में वास्तव में आरक्षित वर्ग के लिए पांच प्रतिशत छूट का प्रावधान था और आयोग ने उसके अनुपालन को लेकर निर्देश दिए थे तो उन निर्देशों पर अंतिम फैसला कब होगा?
और यदि सरकार का मानना है कि आयोग के आदेश को उसी रूप में लागू करना संभव नहीं है तो इसकी स्पष्ट कानूनी वजह क्या है? इन दोनों सवालों का जवाब आंदोलन को समाप्त करने की दिशा में पहला कदम हो सकता है।
आज लखनऊ में नारे गूंजे, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाया और आंदोलनकारियों को ईको गार्डन भेज दिया गया। लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई से एक बात नहीं बदली—68,500 शिक्षक भर्ती का प्रश्न अभी भी सरकार के सामने खड़ा है।
यह केवल नौकरी चाहने वाले कुछ युवाओं का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जिसमें एक भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के वर्षों बाद भी अभ्यर्थियों को यह पता लगाने के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है कि उनके साथ लागू नियमों की सही व्याख्या क्या थी।
अब गेंद सरकार के पाले में है। यदि मामला नियम, आयोग और कानून के बीच उलझा है तो सरकार को दस्तावेज सामने रखने चाहिए। यदि निर्णय मुख्यमंत्री स्तर पर लंबित है तो समयसीमा बतानी चाहिए। और यदि अभ्यर्थियों की मांग में कोई कानूनी अड़चन है तो वह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए। क्योंकि आठ साल की प्रतीक्षा के बाद अब अभ्यर्थियों को एक और आश्वासन नहीं, स्पष्ट निर्णय और उसकी वजह चाहिए।

























