दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की दस्तक के साथ ही सुल्तानपुर जिले की राजनीति में भी हलचल तेज होने लगी है. गांव की चौपालों से लेकर चाय की दुकानों और राजनीतिक गलियारों तक अब एक ही सवाल चर्चा में है कि अगले विधानसभा चुनाव में जिले की पांचों सीटों पर किस दल का दबदबा कायम होगा और किन सीटों पर सत्ता विरोधी लहर या स्थानीय समीकरण बड़ा उलटफेर कर सकते हैं.
सुल्तानपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति इसलिए भी दिलचस्प मानी जाती है क्योंकि यहां चुनाव केवल पार्टी के नाम पर नहीं लड़े जाते, बल्कि उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे, संगठन की ताकत और चुनावी रणनीति भी नतीजों को प्रभावित करती है. जिले में इसौली, सुल्तानपुर सदर, लंभुआ और कादीपुर समेत पांच विधानसभा क्षेत्र हैं, जिनका अपना अलग राजनीतिक चरित्र है.
हमारे विशेष कार्यक्रम ‘कुर्सी का काउंटडाउन’ में इस बार नजर सुल्तानपुर जिले के इन्हीं विधानसभा क्षेत्रों के बदलते राजनीतिक समीकरण पर है. खास तौर पर सुल्तानपुर सदर की वह चुनावी कहानी चर्चा में है, जिसे लेकर लंबे समय से कहा जाता रहा है कि यहां का जनादेश प्रदेश की सत्ता के रुझान का संकेत देता रहा है.
सुल्तानपुर सदर: क्या सच में यहां का जनादेश बताता है लखनऊ का रुख?
सुल्तानपुर सदर विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. परिसीमन से पहले इस क्षेत्र की राजनीतिक पहचान जयसिंहपुर विधानसभा के रूप में होती थी. वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव हुआ और वर्तमान राजनीतिक स्वरूप सामने आया.
इस सीट से जुड़ी सबसे चर्चित राजनीतिक धारणा यह रही है कि जिस दल का उम्मीदवार यहां जीत दर्ज करता है, प्रदेश की सत्ता में भी अक्सर उसी दल की सरकार बनती दिखाई दी है. हालांकि इसे कोई संवैधानिक या चुनावी नियम नहीं माना जा सकता, लेकिन कई चुनावों के परिणामों ने इस धारणा को राजनीतिक चर्चा का विषय जरूर बना दिया है.
1970 के दशक से लेकर 1990 के दशक तक इस सीट पर कांग्रेस, जनता पार्टी, जनता दल, भाजपा और समाजवादी पार्टी जैसे अलग-अलग दलों ने अपनी ताकत दिखाई. 1991 में राम मंदिर आंदोलन के दौर में भाजपा ने भी यहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. इसके बाद 1993 में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार ने जीत हासिल की.
इसके बाद बहुजन समाज पार्टी ने इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाई. 1996 में बसपा के राम रतन यादव की जीत के बाद 2002 और 2007 में ओपी सिंह की जीत ने पार्टी की स्थिति मजबूत की. लेकिन 2008 के परिसीमन के बाद राजनीतिक समीकरणों में बदलाव आया और 2012 में समाजवादी पार्टी के अरुण वर्मा ने जीत दर्ज कर बसपा के लंबे प्रभाव को चुनौती दी.
2017 में बदला समीकरण, भाजपा ने जमाया कब्जा
उत्तर प्रदेश में 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा. प्रदेश में मोदी लहर और भाजपा के मजबूत संगठन का असर सुल्तानपुर सदर पर भी दिखाई दिया.
भाजपा ने सीताराम वर्मा को मैदान में उतारा और उन्होंने बसपा के राज प्रसाद को 18 हजार से अधिक मतों के अंतर से हराकर जीत हासिल की. इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के तत्कालीन विधायक अरुण वर्मा तीसरे स्थान पर चले गए.
यह नतीजा केवल एक सीट की हार-जीत नहीं था, बल्कि सुल्तानपुर सदर की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत भी माना गया. भाजपा ने इसके बाद संगठनात्मक स्तर पर अपनी पकड़ को और मजबूत किया.
2022 में भाजपा ने दोहराया प्रदर्शन
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सुल्तानपुर सदर सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा. पार्टी के राज प्रसाद उपाध्याय ने 85,249 वोट हासिल करते हुए समाजवादी पार्टी के आलोक वर्मा को 15,754 मतों से पराजित किया. समाजवादी पार्टी को 69,495 वोट मिले, जबकि बसपा के ओपी सिंह करीब 39,920 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे.
इस परिणाम ने साफ कर दिया कि भाजपा के लिए सुल्तानपुर सदर केवल 2017 की लहर का परिणाम नहीं रह गया था. पार्टी ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल कर यहां अपना मजबूत चुनावी आधार तैयार कर लिया.
अब 2027 में भाजपा के सामने इस प्रदर्शन को लगातार तीसरी जीत में बदलने की चुनौती होगी. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के लिए यह सीट अपनी राजनीतिक वापसी का महत्वपूर्ण मैदान होगी.
इसौली: दो दशक से सपा का मजबूत किला
सुल्तानपुर जिले की इसौली विधानसभा सीट का राजनीतिक मिजाज सदर से बिल्कुल अलग दिखाई देता है. जहां सदर में पिछले दो चुनावों में भाजपा ने अपना प्रभाव कायम किया, वहीं इसौली लंबे समय से समाजवादी पार्टी के मजबूत गढ़ के रूप में सामने आती रही है.
2002 से 2022 तक लगातार पांच विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर जीत हासिल की. इस लिहाज से प्रदेश की राजनीति में इसौली को सपा के उन क्षेत्रों में गिना जाता है जहां पार्टी का संगठन और सामाजिक आधार लंबे समय से प्रभावी रहा है.
इस विजयी क्रम की शुरुआत 2002 में चंद्रभद्र सिंह ‘सोनू’ की जीत से हुई. 2007 में भी उन्होंने सपा के टिकट पर जीत दोहराई. इसके बाद 2012 और 2017 में अबरार अहमद ने पार्टी का झंडा बुलंद रखा. 2022 में सपा ने मोहम्मद ताहिर खान को मैदान में उतारा और उन्होंने भी जीत का सिलसिला टूटने नहीं दिया.
2022 में महज 269 वोटों ने बढ़ाई भाजपा की उम्मीद
इसौली में 2022 का चुनाव बेहद रोमांचक रहा. समाजवादी पार्टी के मोहम्मद ताहिर खान ने भाजपा के ओम प्रकाश पांडे ‘बजरंगी’ को केवल 269 वोटों के अंतर से पराजित किया.
यह मामूली अंतर इस बात का संकेत था कि सपा का गढ़ अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता. भाजपा ने इस सीट पर जिस तरह अपना वोट आधार बढ़ाया, उससे 2027 का मुकाबला और अधिक दिलचस्प हो गया है.
इसौली में मुस्लिम और यादव मतदाताओं को समाजवादी पार्टी का मजबूत आधार माना जाता है. दूसरी ओर भाजपा की रणनीति ब्राह्मण, क्षत्रिय और गैर-यादव पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को एकजुट करने की रही है. बसपा का पारंपरिक दलित वोट भी यहां चुनावी गणित को प्रभावित करने की क्षमता रखता है.
स्थानीय स्तर पर चंद्रभद्र सिंह ‘सोनू’ और यशभद्र सिंह ‘मोनू’ जैसे प्रभावशाली राजनीतिक चेहरों की व्यक्तिगत पकड़ भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है.
2027 में भाजपा की सबसे बड़ी कोशिश होगी कि 2022 के 269 वोटों वाले अंतर को अपने पक्ष में बदला जाए. वहीं समाजवादी पार्टी के सामने अपना दो दशक पुराना किला बचाने की चुनौती होगी.
लंभुआ: यहां मतदाता किसी एक दल के साथ स्थायी नहीं
सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट का राजनीतिक चरित्र दोनों प्रमुख सीटों से अलग है. परिसीमन से पहले यह क्षेत्र चांदा विधानसभा के नाम से जाना जाता था. 2008 के परिसीमन के बाद वर्तमान लंभुआ विधानसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया.
इस सीट के राजनीतिक इतिहास में किसी एक दल का लंबे समय तक एकछत्र वर्चस्व नहीं रहा. यहां अलग-अलग समय में कांग्रेस, जनसंघ, जनता पार्टी, जनता दल, बसपा, सपा और भाजपा ने जीत हासिल की है.
1974 से 2022 तक के चुनावी इतिहास को देखें तो क्षत्रिय और ब्राह्मण नेताओं का प्रभाव खास तौर पर दिखाई देता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अन्य सामाजिक समूहों की भूमिका कम है. यादव, वर्मा और दलित मतदाता भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहे हैं.
2012 से 2022 तक तीन चुनाव, तीन अलग तस्वीरें
2012 में समाजवादी पार्टी के संतोष पांडे ने 74,352 वोट हासिल कर बसपा के विनोद सिंह को 17,372 मतों से पराजित किया था.
2017 में राजनीतिक हवा बदली और भाजपा के देवमणि द्विवेदी ने 78,627 वोट हासिल करते हुए बसपा के विनोद सिंह को 12,903 वोटों से हराया. समाजवादी पार्टी इस चुनाव में तीसरे स्थान पर चली गई.
2022 में भाजपा ने प्रत्याशी बदलते हुए सीताराम वर्मा को मैदान में उतारा. उन्होंने 82,999 वोट हासिल कर समाजवादी पार्टी के संतोष पांडे को 9,533 मतों से पराजित किया.
इन तीन चुनावों के नतीजे बताते हैं कि लंभुआ को किसी एक दल की स्थायी जागीर मानना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा होगा.
2027 में भाजपा अपनी स्थिति मजबूत रखने की कोशिश करेगी, जबकि समाजवादी पार्टी पिछड़े वर्गों और अपने पारंपरिक मतदाताओं को एकजुट करके वापसी की रणनीति पर काम कर सकती है. बसपा का वोट आधार कितना बचता है और वह किस दिशा में जाता है, यह भी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है.
कादीपुर: कभी बसपा का मजबूत किला, अब भाजपा की चुनौतीपूर्ण दीवार
कादीपुर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है और यही इसकी राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है. यहां दलित मतदाताओं की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण रहती है. इसके अलावा मौर्य, यादव, निषाद और कुर्मी जैसे सामाजिक समूह भी चुनावी परिणामों पर प्रभाव डालते हैं.
कादीपुर का राजनीतिक इतिहास भी लगातार बदलते समीकरणों का गवाह रहा है. एक दौर में बहुजन समाज पार्टी ने यहां मजबूत पकड़ बनाई. 1990 के दशक से लेकर 2000 के दशक तक बसपा का प्रभाव दिखाई दिया. भगेलू राम जैसे नेताओं ने पार्टी को मजबूत आधार दिया.
2012 में समाजवादी पार्टी के रामचंद्र चौधरी ने बड़ी जीत दर्ज की. उन्हें 97,283 वोट मिले और उन्होंने बसपा के भगेलू राम को पराजित किया.
लेकिन 2017 में परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं. भाजपा ने राजेश कुमार गौतम को मैदान में उतारा और उन्होंने 87,353 वोट हासिल कर भगेलू राम को 26,604 मतों से हराया.
2022 में भाजपा ने लगातार दूसरी जीत दर्ज की
2022 में भाजपा ने राजेश कुमार गौतम पर दोबारा भरोसा जताया. दूसरी ओर भगेलू राम इस बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे.
राजेश गौतम को 96,405 वोट मिले और उन्होंने भगेलू राम को 25,723 मतों से शिकस्त दी. इस तरह भाजपा ने कादीपुर में लगातार दूसरी बार जीत हासिल कर अपना मजबूत आधार साबित किया.
अब 2027 में भाजपा के सामने इस जीत की हैट्रिक लगाने की चुनौती होगी. समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती और बड़ी है क्योंकि उसे भाजपा के मजबूत संगठन के सामने अपने PDA समीकरण को जमीन पर प्रभावी बनाना होगा.
2024 के लोकसभा चुनाव ने बढ़ाई 2027 की दिलचस्पी
सुल्तानपुर की विधानसभा राजनीति को 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणामों से अलग करके देखना आसान नहीं होगा. सुल्तानपुर लोकसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के रामभुआल निषाद की जीत ने भाजपा के लिए नई चुनौती पैदा की.
लोकसभा चुनाव के इस परिणाम ने जिले की विधानसभा सीटों पर भी संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर बहस तेज कर दी है. समाजवादी पार्टी के लिए यह परिणाम उत्साह बढ़ाने वाला है, जबकि भाजपा के सामने अपने विधानसभा स्तर के संगठन और सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दे में बदलने की चुनौती है.
2027 में मुद्दे बनाम जातीय समीकरण
सुल्तानपुर की पांचों विधानसभा सीटों का चुनाव केवल जातीय समीकरणों से तय होगा, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी. बेरोजगारी, महंगाई, सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था, किसानों की समस्याएं, सरकारी योजनाओं का लाभ, स्थानीय विकास और उम्मीदवार की छवि जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं.
भाजपा अपने संगठन, सरकार की योजनाओं और विकास कार्यों को आधार बनाकर चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी करेगी. समाजवादी पार्टी भाजपा सरकार के खिलाफ स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को उठाकर अपना आधार मजबूत करने की कोशिश करेगी.
बसपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपने परंपरागत दलित मतदाताओं को फिर से एकजुट कर सके. यदि त्रिकोणीय मुकाबला मजबूत होता है तो कई सीटों पर कम अंतर से जीत-हार की स्थिति बन सकती है.
सुल्तानपुर में 2027 का असली मुकाबला किस बात पर होगा?
सुल्तानपुर की राजनीति को समझने के लिए केवल पिछले चुनावों के आंकड़े देखना पर्याप्त नहीं है. यहां उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता, स्थानीय संगठन, बूथ प्रबंधन और सामाजिक समीकरण का संतुलन चुनावी नतीजे बदल सकता है.
सदर में भाजपा लगातार दो जीत के बाद मजबूत स्थिति में है, लेकिन सपा वापसी के लिए जमीन तलाश रही है. इसौली में सपा का दो दशक पुराना किला भाजपा के निशाने पर है. लंभुआ में मतदाताओं की बदलती पसंद किसी भी दल को चौंका सकती है. कादीपुर में भाजपा लगातार दो जीत के बाद हैट्रिक की तैयारी में होगी, जबकि सपा PDA समीकरण के सहारे चुनौती पेश करने की कोशिश करेगी.
यानी सुल्तानपुर में 2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम सपा की सीधी लड़ाई नहीं होगा. हर सीट का अपना सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दा है. यही कारण है कि जिले की पांचों विधानसभा सीटों को एक ही राजनीतिक चश्मे से देखना मुश्किल है.
सुल्तानपुर की पांच सीटें, पांच अलग राजनीतिक कहानियां
सुल्तानपुर विधानसभा चुनाव 2027 में पूर्वांचल और अवध की राजनीति के बीच एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेतक के रूप में देखा जा सकता है. पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि जिले में मतदाताओं का रुझान स्थायी नहीं है. कहीं भाजपा मजबूत हुई है, कहीं समाजवादी पार्टी ने अपना किला बचाए रखा है और कहीं मतदाताओं ने लगातार अलग-अलग दलों को मौका दिया है.
सुल्तानपुर सदर की लगातार दो भाजपा जीत, इसौली में सपा का दो दशक पुराना प्रभुत्व, लंभुआ की बदलती राजनीतिक पसंद और कादीपुर में भाजपा का मजबूत होता आधार—ये सभी समीकरण 2027 की तस्वीर को बेहद रोचक बनाते हैं.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा सुल्तानपुर में अपनी मौजूदा बढ़त को और मजबूत कर पाएगी? क्या समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव 2024 के बाद बने माहौल को विधानसभा स्तर तक ले जाने में सफल होगी? क्या बसपा अपने परंपरागत मतदाताओं को फिर से मजबूती से अपने साथ जोड़ पाएगी?
इन सवालों का जवाब 2027 के चुनाव में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि सुल्तानपुर की पांच विधानसभा सीटों पर इस बार मुकाबला केवल उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि संगठन, सामाजिक समीकरण, स्थानीय मुद्दों और राजनीतिक रणनीति का भी होगा.

























