सवाल पर बवाल : महिला पत्रकार के आरोपों से गरमाई यूपी की सियासत, वायरल वीडियो ने खड़े किए बड़े सवाल

लखनऊ प्रेस वार्ता विवाद में महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव, योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव और कमलेश कुमार चौधरी

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कमलेश कुमार चौधरी 

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेस वार्ता के दौरान सामने आए एक वायरल वीडियो ने प्रदेश की सियासत से लेकर पत्रकारिता जगत तक हलचल पैदा कर दी है. वीडियो में एक महिला पत्रकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछने की कोशिश करती दिखाई देती हैं. इसी दौरान मुख्यमंत्री उन्हें हाथ के इशारे से आगे बढ़ते हुए दिखाई देते हैं और मंच पर मौजूद भाजपा के अन्य नेता भी उनके साथ वहां से चले जाते हैं. देखते ही देखते यह वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया.

इस पूरे घटनाक्रम ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता में पत्रकारों को सवाल पूछने की अनुमति थी? यदि सवाल-जवाब का सत्र निर्धारित नहीं था तो महिला पत्रकार ने सवाल पूछने की कोशिश क्यों की? सवाल पूछने के बाद उनके साथ कथित अभद्रता और धमकी का क्या सच है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछने वाले पत्रकार की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

वायरल वीडियो में दिखाई देने वाली महिला पत्रकार की पहचान दिव्या श्रीवास्तव के तौर पर हुई है. दिव्या ने एक यूट्यूब चैनल से बातचीत में दावा किया है कि मुख्यमंत्री से सवाल पूछने की कोशिश के बाद कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और उनके साथ कथित तौर पर अभद्रता की. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें घर पर बुलडोजर चलाने जैसी धमकियां तक दी गईं.

इन आरोपों ने मामले को महज एक वायरल वीडियो से आगे बढ़ाकर पत्रकार की सुरक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता और सत्ता से सवाल पूछने के अधिकार से जुड़ा बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है.

वायरल वीडियो में आखिर हुआ क्या?

सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रेस वार्ता के बाद आगे बढ़ते नजर आते हैं. इसी दौरान महिला पत्रकार उनसे सवाल पूछने की कोशिश करती दिखाई देती हैं. वीडियो में मुख्यमंत्री की ओर से हाथ के इशारे का दृश्य भी दिखाई देता है, जिसके बाद वह आगे बढ़ जाते हैं.

मंच पर मौजूद भाजपा के अन्य नेता भी मुख्यमंत्री के साथ वहां से निकल जाते हैं.

वीडियो छोटा है और पूरे घटनाक्रम का हर पहलू उसमें दिखाई नहीं देता. इसलिए वीडियो के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ कथित अभद्रता या धमकी की पूरी पुष्टि करना संभव नहीं है. लेकिन वीडियो ने उस सवाल को जरूर जन्म दिया है कि पत्रकार को सवाल पूछने का अवसर क्यों नहीं मिला और उसके बाद क्या परिस्थितियां बनीं.

यही वजह है कि मामला सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया और राजनीतिक दलों ने भी इस पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया.

दिव्या श्रीवास्तव का क्या आरोप है?

दिव्या श्रीवास्तव के मुताबिक वह स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर काम करती हैं और इससे पहले भी भाजपा की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाती रही हैं. उनका कहना है कि वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उत्तर प्रदेश में बारिश के बाद पैदा हुई जलभराव की समस्या और एक्सप्रेस-वे से जुड़ी सामने आ रही परेशानियों को लेकर सवाल पूछना चाहती थीं.

दिव्या के अनुसार मुख्यमंत्री करीब आधे घंटे तक कार्यक्रम में बोलते रहे. जब मुख्यमंत्री वहां से जाने लगे तो उन्होंने उनसे सवाल पूछने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सवाल पूछने का अवसर नहीं मिला.

दिव्या का दावा है कि इसके बाद सोशल मीडिया पर उनके वीडियो को लेकर उन्हें निशाना बनाया जाने लगा और कथित रूप से डराने-धमकाने की कोशिशें भी हुईं.

उन्होंने यह भी कहा कि वह लखनऊ में अकेली रहती हैं और इस कारण उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर डर महसूस हो रहा है.

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यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल एक प्रेस वार्ता में सवाल न पूछ पाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पत्रकार की व्यक्तिगत सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर विषय बन जाएगा.

‘बुलडोजर’ की धमकी का आरोप क्यों गंभीर?

दिव्या श्रीवास्तव ने बातचीत में आरोप लगाया कि कुछ लोगों की ओर से उन्हें उनके घर पर बुलडोजर चलाने जैसी धमकी भी दी गई.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘बुलडोजर’ शब्द पिछले कुछ वर्षों में खास राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतीक बन चुका है. ऐसे में किसी पत्रकार को कथित तौर पर बुलडोजर की धमकी दिए जाने का आरोप अपने आप में गंभीर है.

हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है. यदि किसी व्यक्ति को वास्तव में ऐसी धमकी मिली है तो उसके स्रोत, सोशल मीडिया पोस्ट, कॉल, संदेश या अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की जानी चाहिए. साथ ही पत्रकार की ओर से पुलिस में शिकायत किए जाने की स्थिति में पुलिस की कार्रवाई भी सार्वजनिक होनी चाहिए.

लोकतंत्र में आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना दो अलग बातें हैं. इसलिए इस मामले में निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि धमकी दी गई थी या नहीं और यदि दी गई तो उसके पीछे कौन लोग थे.

भाजपा ने आरोपों पर क्या कहा?

भाजपा ने महिला पत्रकार के आरोपों को खारिज किया है.

भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा कि संबंधित प्रेस कॉन्फ्रेंस भाजपा के ‘सेवा संकल्प अभियान’ के बारे में जानकारी देने के लिए आयोजित की गई थी और उसमें सवाल-जवाब का सत्र रखा ही नहीं गया था.

उनके मुताबिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मॉडरेटर यह तय करता है कि सवाल-जवाब होंगे या नहीं.

भाजपा प्रवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के जाने के बाद महिला पत्रकार ने वीडियो बनाने के उद्देश्य से इस तरह की बातें कहीं.

उन्होंने पत्रकार की पत्रकारिता से जुड़ी पहचान पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें नहीं पता कि वह किस संस्थान से जुड़ी हैं.

लेकिन राकेश त्रिपाठी ने साथ ही यह भी कहा कि यदि किसी पत्रकार या महिला को सोशल मीडिया पर धमकी मिलती है तो उसे पुलिस में शिकायत करनी चाहिए और पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए.

यानी भाजपा ने एक तरफ प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल-जवाब का सत्र होने से इनकार किया, वहीं दूसरी तरफ पत्रकार को कथित धमकियों के मामले में पुलिस से शिकायत करने की सलाह दी है.

सवाल यह नहीं कि पत्रकार किस संस्थान से जुड़ी हैं, सवाल यह भी कि उन्हें सवाल पूछने का अधिकार था या नहीं

इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू पत्रकार की संस्थागत पहचान को लेकर उठाए गए सवाल से भी जुड़ा है.

यदि कोई पत्रकार किसी बड़े मीडिया संस्थान से जुड़ा नहीं है और स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करता है, तो क्या इससे उसके सवाल पूछने का अधिकार कम हो जाता है?

पत्रकारिता का मूल कार्य सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछना है. हालांकि हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछने का अवसर मिलना अनिवार्य नहीं होता और आयोजक कार्यक्रम की प्रक्रिया तय कर सकते हैं. लेकिन सवाल पूछने की कोशिश करने वाले पत्रकार के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, यह लोकतांत्रिक माहौल की एक महत्वपूर्ण कसौटी जरूर बन जाता है.

इसी बिंदु पर इस पूरे विवाद की असली बहस खड़ी होती है.

बारिश, जलभराव और एक्सप्रेस-वे पर सवाल क्यों उठाना चाहती थीं दिव्या?

दिव्या श्रीवास्तव के अनुसार उनका सवाल उत्तर प्रदेश में बारिश के बाद पैदा हुई समस्याओं से जुड़ा था.

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लखनऊ समेत प्रदेश के कई हिस्सों में बारिश के दौरान जलभराव, सड़क, यातायात और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं समय-समय पर चर्चा में आती रही हैं. इसी तरह एक्सप्रेस-वे को लेकर भी यात्रियों और स्थानीय स्तर पर अलग-अलग तरह की शिकायतें सामने आती रही हैं.

यदि मुख्यमंत्री के सामने ऐसे मुद्दों पर सवाल रखा जाता तो सरकार की ओर से उनका जवाब जनता तक पहुंच सकता था.

यही पत्रकारिता का मूल उद्देश्य भी है—जनता की समस्या को सत्ता के सामने रखना और सत्ता के जवाब को जनता तक पहुंचाना.

लेकिन इस मामले में सवाल पूछे जाने से पहले ही घटनाक्रम विवाद में बदल गया.

विपक्ष को मिला सरकार पर हमला करने का मौका

वायरल वीडियो और दिव्या श्रीवास्तव के आरोपों के बाद विपक्षी दलों ने योगी सरकार को घेरना शुरू कर दिया.

समाजवादी पार्टी प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते हुए कहा कि मुख्यमंत्री प्रेस वार्ता बुलाते हैं, लेकिन सवालों के जवाब नहीं दे पाते. उन्होंने इसे चुनाव में जनता के सवालों से जोड़ते हुए सरकार पर राजनीतिक हमला किया.

आम आदमी पार्टी ने भी सोशल मीडिया के जरिए भाजपा पर सवालों से बचने का आरोप लगाया. पार्टी ने दावा किया कि महिला पत्रकार के सवाल का सामना करने की हिम्मत नहीं हुई और मुख्यमंत्री वहां से चले गए.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने भी दिव्या श्रीवास्तव के समर्थन में बयान जारी किया. कांग्रेस की ओर से कहा गया कि पत्रकार का काम सत्ता से सवाल पूछना है और सवाल पूछने पर धमकी देना लोकतंत्र का अपमान है.

महिला कांग्रेस की ओर से भी इसी तरह पत्रकार के समर्थन में आवाज उठाई गई.

हालांकि विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं भी राजनीतिक संदर्भ में आई हैं. इसलिए उनके बयानों को आरोप और राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में ही देखा जाना चाहिए.

क्या यूपी में पत्रकार सवाल पूछने से डर रहे हैं?

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक और बहस छिड़ गई है—क्या उत्तर प्रदेश में पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने में डरने लगे हैं?

यह सवाल केवल इस एक वीडियो से तय नहीं किया जा सकता. लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि यदि किसी पत्रकार को सवाल पूछने के बाद कथित धमकी मिलती है और वह अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित महसूस करता है तो यह बेहद गंभीर स्थिति है.

पत्रकारिता का अर्थ सरकार का विरोध करना नहीं है. उसी तरह पत्रकारिता का अर्थ सरकार का समर्थन करना भी नहीं है. पत्रकार का काम सवाल पूछना, तथ्य सामने रखना और जनता के पक्ष से सत्ता की जवाबदेही तय करना है.

सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक दल सत्ता में आते-जाते रहते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं में सवाल पूछने की परंपरा बनी रहनी चाहिए.

अब पुलिस जांच से साफ हो सकता है पूरा मामला

इस विवाद का सबसे उचित रास्ता आरोप-प्रत्यारोप नहीं बल्कि निष्पक्ष जांच है.

यदि दिव्या श्रीवास्तव को सोशल मीडिया पर धमकियां मिली हैं तो संबंधित पोस्ट, संदेश, कॉल रिकॉर्ड या अन्य उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की जांच की जानी चाहिए. यदि किसी व्यक्ति ने उन्हें कथित रूप से धमकाया है तो उसकी पहचान और कानूनी कार्रवाई की जानकारी सामने आनी चाहिए.

इसी तरह वायरल वीडियो का पूरा और मूल संस्करण सामने आना भी जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि प्रेस वार्ता के दौरान वास्तव में क्या हुआ था और वीडियो में दिखाई देने वाले घटनाक्रम से पहले और बाद में क्या परिस्थितियां थीं.

भाजपा का यह दावा भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए कि कार्यक्रम में सवाल-जवाब का सत्र क्यों नहीं था और क्या पत्रकारों को पहले से इसकी जानकारी दी गई थी.

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दूसरी तरफ पत्रकार की ओर से लगाए गए आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है.

मुख्यमंत्री की चुप्पी से बड़ा सवाल प्रेस की संस्कृति का है

इस पूरे विवाद को केवल ‘योगी ने सवाल नहीं लिया’ बनाम ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल होने ही नहीं थे’ के रूप में देखना शायद अधूरा होगा.

असली सवाल यह है कि सत्ता और मीडिया के बीच संवाद की संस्कृति कैसी होनी चाहिए?

एक मुख्यमंत्री से हर सवाल का जवाब उसी क्षण मिलना जरूरी नहीं. लेकिन लोकतंत्र में जनता के सवालों को सामने रखने की जगह जरूर होनी चाहिए. यदि किसी कार्यक्रम में सवाल-जवाब नहीं हैं तो आयोजक पहले ही स्पष्ट कर सकते हैं कि कार्यक्रम केवल संबोधन तक सीमित रहेगा.

इससे पत्रकार और सरकार दोनों के बीच अनावश्यक विवाद से बचा जा सकता है.

लेकिन यदि सवाल पूछने की कोशिश करने वाले पत्रकार को बाद में धमकाया जाता है, तो यह पूरी तरह अलग और कहीं अधिक गंभीर मामला होगा.

‘सवाल से डर’ या ‘कार्यक्रम की मर्यादा’? फैसला तथ्यों से होना चाहिए

सोशल मीडिया पर इस समय दो तरह की तस्वीरें दिखाई दे रही हैं. एक पक्ष इसे मुख्यमंत्री द्वारा सवालों से बचने के रूप में देख रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे एक ऐसे कार्यक्रम के रूप में बता रहा है जिसमें सवाल-जवाब का सत्र था ही नहीं.

इन दोनों दावों के बीच वास्तविक सच्चाई जानने के लिए कार्यक्रम की आधिकारिक रिकॉर्डिंग, पूरा वीडियो, आयोजकों की जानकारी, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और यदि कोई शिकायत हुई है तो उसकी पुलिस जांच महत्वपूर्ण होगी.

यही वह बिंदु है जहां पत्रकारिता को सोशल मीडिया की उत्तेजना से अलग होकर तथ्यों की ओर लौटना होगा.

जनगणदूत का सवाल: पत्रकार सवाल पूछे तो जवाब मिलेगा या रास्ता?

लखनऊ की इस घटना ने उत्तर प्रदेश की सत्ता और मीडिया के रिश्ते पर बहस फिर से तेज कर दी है.

एक महिला पत्रकार का मुख्यमंत्री से सवाल पूछने की कोशिश करना अपने आप में कोई असाधारण घटना नहीं होनी चाहिए. लेकिन उसके बाद कथित अभद्रता और धमकी के आरोप सामने आना मामले को गंभीर बना देता है.

यदि आरोप गलत हैं तो जांच के जरिए यह बात स्पष्ट होनी चाहिए. यदि आरोप सही हैं तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए.

और यदि प्रेस वार्ता में सवाल-जवाब का सत्र था ही नहीं, तो यह भी साफ तौर पर बताया जाना चाहिए कि पत्रकारों को इस संबंध में क्या जानकारी दी गई थी.

लोकतंत्र में सत्ता की ताकत जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण है उससे सवाल पूछने की स्वतंत्रता. पत्रकार को सवाल पूछने का अवसर मिले या न मिले, लेकिन सवाल पूछने के कारण डर का माहौल पैदा होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय जरूर है.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार लगातार कानून-व्यवस्था और सुशासन को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करती रही है. ऐसे में यदि एक महिला पत्रकार सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक रूप से चिंता जताती है तो प्रशासन के लिए यह महज राजनीतिक बयानबाजी का विषय नहीं होना चाहिए.

जरूरत इस बात की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, धमकी के आरोपों की सत्यता सामने आए और यह स्पष्ट हो कि लखनऊ की उस प्रेस वार्ता में आखिर हुआ क्या था.

क्योंकि लोकतंत्र में असली सवाल यही है—सवाल पूछने वाले की आवाज सुनी जाएगी, या सवाल पूछने से पहले ही उसे खामोश कर दिया जाएगा?

कमलेश कुमार चौधरी
रिपोर्टर, जनगणदूत

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Author: यायावर

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