BJP का वो सीट जहाँ टिकट के लिए 24 से ज्यादा दावेदार, लगा रहे एड़ी-चोटी का जोर

भगवंतनगर विधानसभा में BJP टिकट के लिए 24 से ज्यादा दावेदारों की सक्रियता दर्शाती फीचर इमेज, साथ में रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की भगवंतनगर विधानसभा सीट इस समय भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर टिकट की दावेदारी को लेकर सुर्खियों में है। क्षेत्र में चर्चा है कि बीजेपी के टिकट के लिए 24 से ज्यादा दावेदार अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हुए हैं। कोई जनसंपर्क अभियान के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है तो कोई धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से जनता के बीच पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है।

हालात यह हैं कि चुनावी घोषणा और टिकट की आधिकारिक प्रक्रिया से पहले ही भगवंतनगर का राजनीतिक माहौल काफी गर्म दिखाई देने लगा है। संभावित प्रत्याशियों की सक्रियता को देखकर ऐसा लगता है कि हर दावेदार खुद को पार्टी का सबसे मजबूत चेहरा साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता।

टिकट की आस में गांव-गांव सक्रिय संभावित प्रत्याशी

भगवंतनगर विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी से टिकट की उम्मीद लगाए बैठे संभावित प्रत्याशी लगातार लोगों के बीच पहुंच रहे हैं। कोई धार्मिक कार्यक्रम करा रहा है तो कोई सांस्कृतिक आयोजन के जरिए अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। कई दावेदार सम्मान समारोह आयोजित कर रहे हैं तो कुछ जरूरतमंदों की मदद और सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते दिखाई दे रहे हैं।

कहीं बड़े स्तर पर उपहार वितरण चर्चा में है तो कहीं सामाजिक सहायता के कार्यक्रमों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की जा रही हैं। इन गतिविधियों के जरिए संभावित प्रत्याशी न केवल जनता के बीच अपनी पहचान मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि पार्टी नेतृत्व तक भी अपनी सक्रियता का संदेश पहुंचाना चाहते हैं।

क्षेत्र में कई स्थानों पर दीवारें प्रचार सामग्री से रंगी दिखाई देने लगी हैं। हालांकि इनमें से कौन-सा चेहरा आखिरकार बीजेपी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरेगा, इसका फैसला पार्टी नेतृत्व ही करेगा।

चुनाव से पहले ही शुरू हुआ प्रचार का दौर

राजनीति में यह कोई नई तस्वीर नहीं है। चुनाव आने से काफी पहले संभावित उम्मीदवार अपने विधानसभा क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियां बढ़ा देते हैं। इसका उद्देश्य धीरे-धीरे लोगों के बीच पहचान बनाना और संगठन के साथ-साथ जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत करना होता है।

भगवंतनगर में भी संभावित प्रत्याशियों की सक्रियता इसी दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। क्षेत्र में होने वाले छोटे-बड़े आयोजनों में इन चेहरों की मौजूदगी बढ़ी है। गांवों में संपर्क, लोगों से मुलाकात, सार्वजनिक कार्यक्रमों में भागीदारी और सोशल मीडिया पर प्रचार के जरिए दावेदार अपने-अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

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धनबल और रुतबे से राजनीतिक पैठ बनाने की कोशिश?

संभावित प्रत्याशियों की बढ़ती सक्रियता के बीच एक सवाल आम लोगों के बीच चर्चा का विषय भी बन रहा है—इतने बड़े स्तर पर सामाजिक और जनसंपर्क गतिविधियों के लिए पैसा कहां से आ रहा है?

महंगाई के इस दौर में जहां आम परिवार के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना चुनौतीपूर्ण है, वहीं कुछ संभावित राजनीतिक दावेदार बड़े पैमाने पर सामाजिक कार्यक्रमों और जनसंपर्क गतिविधियों पर खर्च करते नजर आते हैं।

हालांकि किसी व्यक्ति द्वारा किया गया सामाजिक खर्च अपने आप में गलत या चुनावी खर्च साबित नहीं करता। फिर भी जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक बड़े स्तर पर सार्वजनिक गतिविधियों में धन खर्च करता है तो स्वाभाविक रूप से उसके संसाधनों और खर्च की क्षमता को लेकर सवाल उठते हैं।

जनता के बीच यह चर्चा भी होती है कि क्या यह पैसा निजी कमाई से आ रहा है, व्यवसाय से अर्जित किया गया है या इसके पीछे कोई अन्य आर्थिक स्रोत है। इन सवालों का वास्तविक जवाब संबंधित व्यक्ति ही दे सकता है। लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन में आने वाले लोगों की आर्थिक पारदर्शिता पर चर्चा होना भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा है।

गांव-गांव में बन रहे प्रभावशाली समीकरण

चुनावी राजनीति में गांवों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले लोगों और सामाजिक समूहों का समर्थन किसी भी उम्मीदवार की चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकता है।

समाजसेवी और राजनीति की समझ रखने वाले सेवानिवृत्त अध्यापक भगवती सिंह का कहना है कि रुतबा और पैसा युवा मतदाताओं के एक वर्ग को प्रभावित कर सकता है। लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो केवल धन और प्रभाव देखकर अपना निर्णय नहीं करता।

भगवती सिंह के मुताबिक गांव-गांव में अब ऐसे लोग सक्रिय हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर पर वोट के प्रभावशाली चेहरे के रूप में देखा जाता है। हालांकि उनका कहना है कि मतदाता पहले की तुलना में अधिक जागरूक हुआ है और हर व्यक्ति किसी के प्रभाव या दबाव में आकर मतदान करेगा, ऐसा जरूरी नहीं है।

सोशल मीडिया पर दिख रही दावेदारों की ताकत

आज की राजनीति में सोशल मीडिया संभावित प्रत्याशियों के लिए बड़ा माध्यम बन चुका है। भगवंतनगर में भी दावेदारों की सामाजिक गतिविधियों को सोशल मीडिया पर प्रमुखता से प्रचारित किए जाने की चर्चा है।

किसी कार्यक्रम में भागीदारी हो, किसी जरूरतमंद की सहायता हो, किसी बुजुर्ग का सम्मान हो या किसी धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन में उपस्थिति—इन सभी गतिविधियों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे हैं।

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इससे दावेदारों को एक साथ दो फायदे मिलते हैं। पहला, वे जनता के बीच अपनी सक्रियता दिखाते हैं और दूसरा, पार्टी संगठन के सामने अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराते हैं।

हालांकि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली लोकप्रियता को वास्तविक जनसमर्थन का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। चुनावी मैदान में मतदाता का वास्तविक फैसला ही किसी दावेदार की ताकत तय करता है।

राजनीति अब सेवा कम, निवेश ज्यादा?

वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र सिंह राजनीति में बढ़ते आर्थिक प्रभाव को लेकर कहते हैं कि आज राजनीति में सेवा की भावना के साथ निवेश की प्रवृत्ति भी दिखाई देने लगी है। चुनाव से पहले जनता के बीच किया जाने वाला खर्च कई बार चुनाव के बाद किसी न किसी रूप में वापस हासिल करने की मानसिकता से जुड़ा हो सकता है।

उनका कहना है कि लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक है। यदि मतदाता लालच और व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर उम्मीदवार के काम, विचार, व्यवहार और क्षेत्र के प्रति उसकी सोच को देखकर फैसला करे तो राजनीति में धनबल का प्रभाव अपने आप कम हो सकता है।

ज्ञानेंद्र सिंह के मुताबिक जिस दिन मतदाता यह तय कर लेगा कि चुनाव सेवा का माध्यम है, निवेश का कारोबार नहीं, उसी दिन लोकतंत्र की असली ताकत सामने आएगी। उनके अनुसार चुनाव लोकतंत्र का पर्व होना चाहिए, व्यापार नहीं।

बीजेपी के टिकट पर नजर, लेकिन मैदान में उतर पाएगा सिर्फ एक

भगवंतनगर में बीजेपी से टिकट की दावेदारी कर रहे 24 से ज्यादा चेहरों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी आखिर किसे अपना उम्मीदवार बनाएगी।

एक विधानसभा सीट से पार्टी का टिकट एक ही व्यक्ति को मिलना है। ऐसे में टिकट की दौड़ में शामिल बाकी दावेदारों के सामने पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी के साथ खड़े होने और संगठन के फैसले को स्वीकार करने की चुनौती होगी।

फिलहाल लगभग हर सक्रिय दावेदार और उसके समर्थकों को उम्मीद है कि पार्टी नेतृत्व उसी के पक्ष में फैसला करेगा। अपने-अपने स्तर पर सभी संभावित प्रत्याशी खुद को मजबूत, लोकप्रिय और चुनाव जिताऊ चेहरा साबित करने में जुटे हुए हैं।

हर दावेदार को जीत का भरोसा

भगवंतनगर में टिकट के लिए सक्रिय संभावित प्रत्याशियों की गतिविधियों को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि इनमें से कौन कमजोर है और कौन मजबूत। लगभग हर दावेदार के समर्थक अपने नेता को सबसे उपयुक्त उम्मीदवार बता रहे हैं।

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किसी के पास संगठन से जुड़े होने का दावा है, किसी के पास सामाजिक प्रभाव का आधार है तो कोई लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय होने को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रहा है। कुछ चेहरे अपने जनसंपर्क और सामाजिक गतिविधियों को टिकट के लिए सबसे बड़ा आधार मान रहे हैं।

लेकिन अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व के हाथ में होगा। टिकट मिलने के बाद ही वास्तविक चुनावी मुकाबले की तस्वीर साफ होगी।

टिकट नहीं मिला तो क्या करेंगे दावेदार?

24 से ज्यादा दावेदारों की सक्रियता के बीच यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि बीजेपी का टिकट किसी एक चेहरे को मिलने के बाद बाकी संभावित प्रत्याशी क्या रणनीति अपनाएंगे।

क्या वे पार्टी के फैसले को स्वीकार करते हुए अधिकृत उम्मीदवार के साथ मजबूती से खड़े होंगे? क्या उनके समर्थक भी संगठन के निर्णय के अनुरूप काम करेंगे? या टिकट से वंचित होने वाले कुछ चेहरे अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव करेंगे?

इन सवालों का जवाब आने वाले समय में सामने आएगा। फिलहाल सभी दावेदार अपनी राजनीतिक गतिविधियों को तेज किए हुए हैं और पार्टी नेतृत्व का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं।

जनता के फैसले पर टिकी होगी असली तस्वीर

भगवंतनगर में बीजेपी टिकट की दौड़ भले ही अभी से तेज दिखाई दे रही हो, लेकिन चुनावी राजनीति में अंतिम फैसला जनता करती है। बड़े आयोजन, प्रचार, सोशल मीडिया की सक्रियता, आर्थिक संसाधन और राजनीतिक रुतबा किसी उम्मीदवार की दृश्यता बढ़ा सकते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं का भरोसा जरूरी होता है।

जनता के सामने क्षेत्र के विकास, सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याओं और स्थानीय मुद्दों जैसे सवाल भी होंगे। इसलिए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि टिकट की दौड़ में शामिल संभावित प्रत्याशी इन वास्तविक मुद्दों को कितना महत्व देते हैं।

फिलहाल भगवंतनगर विधानसभा सीट बीजेपी के टिकट की होड़ के कारण राजनीतिक रूप से बेहद सक्रिय दिखाई दे रही है। 24 से ज्यादा दावेदार एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। कोई सामाजिक सेवा के जरिए पहचान बना रहा है, कोई धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से जनता के बीच पहुंच रहा है तो कोई सोशल मीडिया को अपनी ताकत बना रहा है।

लेकिन टिकट की यह लंबी दौड़ आखिर किस मोड़ पर जाकर रुकेगी, यह बीजेपी के फैसले के बाद ही साफ होगा। एक बात जरूर तय है कि टिकट की घोषणा तक भगवंतनगर में दावेदारों की सक्रियता और राजनीतिक सरगर्मी और बढ़ सकती है।

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Author: यायावर

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