रिपोर्टर शाहीन
लाहौर की हीरामंडी का नाम लेते ही आज के समय में लोगों के मन में एक खास तरह की छवि उभरती है. लेकिन इतिहास की परतें हटाकर देखें तो हीरामंडी केवल तवायफों की बस्ती नहीं थी. यह कभी संगीत, नृत्य, शायरी, अदब और तहजीब की ऐसी दुनिया थी, जहां सुरों की साधना करने वाली महिलाओं ने उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया.
इन महिलाओं को इतिहास ने अलग-अलग नामों से पुकारा. कहीं वे दरबारी कलाकार थीं, कहीं गायिका, कहीं नर्तकी और कहीं तवायफ. मगर उनकी कला की दुनिया आज के संकुचित अर्थों से कहीं बड़ी थी. अनेक कलाकारों को शास्त्रीय संगीत, ठुमरी, दादरा, गजल, कथक, उर्दू शायरी और महफिल की परंपराओं की बाकायदा शिक्षा मिलती थी.
यही वह दौर था जब लाहौर, अमृतसर, दिल्ली, लखनऊ, बनारस और आगरा जैसे शहर संगीत की साझा दुनिया से जुड़े हुए थे. 1947 में देश का विभाजन हुआ तो भूगोल बदल गया, मगर इन कलाकारों के सुरों की विरासत दोनों देशों में आगे बढ़ती रही.
हीरामंडी आखिर थी क्या?
हीरामंडी का इतिहास मुगल और सिख काल से जुड़ी उस शहरी संस्कृति से भी संबंधित है, जिसमें संगीत और नृत्य की महफिलों को संरक्षण मिलता था. समय के साथ यहां रहने और प्रस्तुति देने वाली महिला कलाकारों की सामाजिक पहचान तवायफ के रूप में स्थापित हुई.
तवायफ शब्द को आज अक्सर केवल देह व्यापार के अर्थ में इस्तेमाल कर दिया जाता है, लेकिन ऐतिहासिक संदर्भ में यह तस्वीर पूरी नहीं है. कई तवायफ उच्च स्तर की संगीत और नृत्य शिक्षा प्राप्त कलाकार थीं. वे दरबारों और निजी महफिलों में प्रस्तुति देती थीं तथा कई बार कविता, संगीत और भाषा की समझ में अपने समय के पुरुष कलाकारों से भी आगे होती थीं.
उनकी महफिलें केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थीं. वहां संगीत सीखा जाता था, शायरी पर चर्चा होती थी और नए गीतों तथा बंदिशों की प्रस्तुति होती थी.
समय के साथ सामाजिक परिस्थितियां बदलीं. औपनिवेशिक शासन और विक्टोरियन नैतिकता के प्रभाव, सामाजिक सुधार आंदोलनों तथा बदलती मध्यवर्गीय मानसिकता ने तवायफ संस्कृति की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुंचाया. लेकिन इसी बीच ग्रामोफोन, रेडियो और सिनेमा जैसे नए माध्यम सामने आए और कुछ कलाकारों को अपनी कला के लिए नया मंच मिल गया.
मुख्तार बेगम : अमृतसर से पाकिस्तान तक पहुंची वह आवाज
इस साझा सांस्कृतिक इतिहास की सबसे दिलचस्प शख्सियतों में मुख्तार बेगम का नाम आता है. मुख्तार बेगम का जन्म 1901 में अमृतसर में हुआ था. उस समय भारत और पाकिस्तान जैसी अलग-अलग राष्ट्रीय सीमाएं अस्तित्व में नहीं थीं. उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा हासिल की और ठुमरी, दादरा तथा गजल गायन में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई.
उनकी प्रतिभा ने उन्हें सामान्य महफिलों से उठाकर बड़े राजदरबारों तक पहुंचाया. उन्होंने हैदराबाद के निजाम के दरबार में भी प्रस्तुति दी. उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि उन्हें संगीत की महारानी जैसे सम्मानसूचक नामों से याद किया गया.
बाद में उन्होंने रंगमंच और फिल्मों में भी काम किया. इस तरह वह कलाकारों की उस पीढ़ी का हिस्सा बनीं जिसने पारंपरिक महफिल से आधुनिक मनोरंजन माध्यमों तक संक्रमण देखा. 1947 के बाद मुख्तार बेगम पाकिस्तान में रहीं. 1982 में कराची में उनका निधन हुआ.
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि विभाजन से पहले की सांस्कृतिक दुनिया को आज की भारत-पाकिस्तान सीमा के चश्मे से पूरी तरह समझना संभव नहीं है. अमृतसर में जन्मी एक कलाकार बाद में पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन गईं.
जीनत बेगम : तवायफ परंपरा से रेडियो और फिल्मों तक
जीनत बेगम का नाम भी इस परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी है. उनका जन्म मालेरकोटला में हुआ था. उन्होंने शास्त्रीय संगीत और गायन की दुनिया में पहचान बनाई और बाद में पाकिस्तान के फिल्म तथा रेडियो जगत से जुड़ीं.
जीनत बेगम का जीवन उस परिवर्तन को दिखाता है जब पारंपरिक महफिलों की कलाकारों के लिए ग्रामोफोन, रेडियो और सिनेमा नए अवसर लेकर आए.
पहले किसी कलाकार की प्रसिद्धि कुछ शहरों या महफिलों तक सीमित हो सकती थी. रिकॉर्डिंग तकनीक और रेडियो ने उस आवाज को हजारों-लाखों श्रोताओं तक पहुंचाने का रास्ता खोल दिया.
यही कारण है कि तवायफ परंपरा से जुड़ी कई कलाकारों की अगली पीढ़ी केवल किसी कोठे या महफिल की कलाकार नहीं रही. वह रिकॉर्डिंग स्टूडियो, रंगमंच, रेडियो स्टेशन और फिल्म सेट तक पहुंची.
तवायफ से कलाकार तक: समाज का बदलता नजरिया
भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत इतिहास का यह सबसे जटिल प्रश्न है कि जिन महिलाओं की कला को कभी नवाबों और राजाओं का संरक्षण प्राप्त था, वही महिलाएं बाद में सामाजिक तिरस्कार का शिकार क्यों हुईं? इसका उत्तर केवल नैतिकता में नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बदलावों में छिपा है.
औपनिवेशिक दौर में भारतीय समाज में एक नया मध्यवर्ग विकसित हुआ. परिवार, स्त्री की सामाजिक भूमिका और सार्वजनिक नैतिकता को लेकर नई धारणाएं बनीं. तवायफ संस्कृति को धीरे-धीरे पिछड़े और अनैतिक संसार के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा. इसका असर संगीत पर भी पड़ा.
कई कलाकारों की कला को अपनाया गया, लेकिन कलाकार की सामाजिक पहचान को स्वीकार नहीं किया गया. ठुमरी, दादरा, गजल और कथक जैसी विधाएं आगे बढ़ीं, लेकिन उन विधाओं को पीढ़ियों तक जीवित रखने वाली महिलाओं का इतिहास अक्सर पीछे छूट गया.
बेगम अख्तर : एक अलग कहानी, लेकिन उसी विरासत की गूंज
तवायफ परंपरा और आधुनिक भारतीय संगीत के संबंध को समझने के लिए बेगम अख्तर का नाम अनिवार्य रूप से सामने आता है.
उनका शुरुआती नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था. उनकी मां मुश्तरी बाई स्वयं तवायफ थीं. अख्तरी बाई ने संगीत की कठोर साधना की और आगे चलकर गजल, ठुमरी तथा दादरा को ऐसी ऊंचाई दी कि उन्हें “मल्लिका-ए-गजल” कहा जाने लगा.
बेगम अख्तर पाकिस्तान की गायिका नहीं थीं. वे स्वतंत्र भारत की महान कलाकार थीं. लेकिन उनकी कहानी यह बताने के लिए महत्वपूर्ण है कि तवायफ परंपरा से आने वाली महिला को उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से आगे बढ़कर उसकी कला के आधार पर भी देखा जा सकता है.
उनकी आवाज ने गजल को आम श्रोता के घर तक पहुंचाया. उनकी गायकी में दर्द, ठहराव और शब्दों की गहरी समझ दिखाई देती थी.
भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बावजूद उनकी लोकप्रियता दोनों तरफ बनी रही. संगीत की दुनिया में उनकी पहचान किसी सीमा की मोहताज नहीं रही.
हीरामंडी और सिनेमा का रिश्ता
जब भारतीय सिनेमा में संगीत का महत्व बढ़ा तो पारंपरिक गायिकाओं और नर्तकियों के लिए एक नया संसार खुला. शुरुआती फिल्मों में प्रशिक्षित गायिकाओं और रंगमंच से जुड़ी महिलाओं की बड़ी भूमिका रही. उस समय फिल्मी गीतों में शास्त्रीय संगीत, ठुमरी, दादरा और गजल की छाप स्पष्ट दिखाई देती थी.
कई ऐसी महिलाएं, जिन्हें समाज ने “तवायफ” कहकर अलग कर दिया था, फिल्मों में कलाकार के रूप में स्वीकार की गईं.
यह इतिहास का एक दिलचस्प विरोधाभास है. महफिल में जिस महिला को सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिलती थी, वही महिला पर्दे पर दिखाई देने के बाद लाखों लोगों की पसंद बन सकती थी.
सिनेमा ने महिला कलाकारों की दुनिया बदली, लेकिन साथ ही उनकी पुरानी पहचान को मिटाने की कोशिश भी की. धीरे-धीरे पारंपरिक तवायफ संस्कृति का स्वरूप कमजोर होता गया.
फरीदा खानम : विरासत का नया अध्याय
मुख्तार बेगम की छोटी बहन फरीदा खानम ने बाद में पाकिस्तान की गजल गायकी में अपनी अलग पहचान बनाई. फरीदा खानम की प्रसिद्धि यह बताती है कि परिवार और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से संगीत की विरासत किस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंची.
पाकिस्तान में गजल को लोकप्रिय बनाने वाली प्रमुख आवाजों में उनका नाम लिया जाता है. उनकी गायकी में शास्त्रीय प्रशिक्षण और उर्दू शायरी की नफासत का मेल दिखाई देता है.
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. तवायफ परंपरा का इतिहास केवल कोठों का इतिहास नहीं है. यह संगीत शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और महिला कलाकारों के संघर्ष का इतिहास भी है.
लाहौर की गलियों से रेडियो पाकिस्तान तक
विभाजन के बाद पाकिस्तान में रेडियो ने संगीत की नई दुनिया तैयार की. लाहौर संगीत का एक बड़ा केंद्र बना. पारंपरिक गायकों और गायिकाओं को रेडियो ने व्यापक श्रोता वर्ग दिया. जो आवाज पहले किसी खास महफिल तक सीमित रहती थी, वह रेडियो के माध्यम से पूरे देश में सुनी जाने लगी.
इसी दौर में गजल, ठुमरी, लोकगीत और शास्त्रीय संगीत को नए श्रोताओं तक पहुंचाने का काम हुआ. पुराने उस्तादों की परंपरा और नई रिकॉर्डिंग तकनीक का मेल हुआ.
हीरामंडी की पुरानी सांस्कृतिक दुनिया धीरे-धीरे बदल रही थी, लेकिन वहां से निकली कला की कई धाराएं पाकिस्तान के संगीत में जीवित रहीं.
क्या हर तवायफ गायिका थी?
यह सवाल आज भी महत्वपूर्ण है. इसका उत्तर है—नहीं.
हर तवायफ शास्त्रीय गायिका नहीं थी और हर गायिका तवायफ नहीं थी. इसी तरह किसी महिला कलाकार को केवल उसके सामाजिक या पारिवारिक संबंधों के आधार पर “तवायफ” कहना भी उचित नहीं है. इतिहास को समझते समय शब्दों के उस समय के अर्थ और आज के अर्थ में अंतर करना जरूरी है.
तवायफ परंपरा में प्रशिक्षित कलाकारों ने संगीत और नृत्य की अनेक विधाओं को आगे बढ़ाया, लेकिन उनकी सामाजिक दुनिया एक जैसी नहीं थी. किसी ने दरबार में स्थान बनाया, किसी ने महफिलों में, किसी ने रंगमंच पर और किसी ने फिल्मों तथा रेडियो में. इसलिए इस इतिहास को केवल सनसनी के नजरिए से देखना उस कला की वास्तविक महत्ता को कम कर देता है.
भारत-पाकिस्तान की साझा संगीत विरासत
1947 ने उपमहाद्वीप की राजनीति बदल दी, लेकिन संगीत की जड़ें नहीं काट सका. आज भी भारत में पाकिस्तान की पुरानी गजलें सुनी जाती हैं और पाकिस्तान में भारतीय शास्त्रीय संगीत तथा पुराने फिल्मी गीतों के श्रोता हैं. लता मंगेशकर, आशा भोसले, बेगम अख्तर, मेहदी हसन, गुलाम अली, फरीदा खानम और अनेक अन्य कलाकारों की लोकप्रियता ने यह साबित किया कि संगीत राजनीतिक सीमाओं से कहीं आगे जाता है. हीरामंडी की तवायफों से लेकर आधुनिक गजल गायिकाओं तक की कहानी इसी साझा विरासत का हिस्सा है.
इतिहास का वह अध्याय जिसे फिर पढ़ने की जरूरत है
आज जब हीरामंडी का नाम लोकप्रिय संस्कृति में फिर चर्चा में है, तब उसके इतिहास को केवल ग्लैमर या विवाद की नजर से देखना पर्याप्त नहीं.
हीरामंडी के अतीत में उन महिलाओं की मेहनत भी छिपी है जिन्होंने संगीत सीखा, रियाज किया, महफिलों में गाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए कला की परंपरा छोड़ी.
मुख्तार बेगम की अमृतसर से पाकिस्तान तक की यात्रा, जीनत बेगम की संगीत से रेडियो और फिल्मों तक की कहानी तथा बेगम अख्तर की तवायफ परिवार से निकलकर भारतीय संगीत की महान हस्ती बनने की यात्रा—इन सबमें एक साझा सूत्र दिखाई देता है. वह सूत्र है कला का संघर्ष और सामाजिक पहचान से मुक्ति की कोशिश.
तवायफों की दुनिया को केवल देह और बाजार की कहानी मानना इतिहास के साथ अन्याय होगा. उस दुनिया में संगीत की कठोर साधना भी थी, भाषा और शायरी की समझ भी थी, आर्थिक स्वतंत्रता की कोशिश भी थी और सामाजिक विरोधाभास भी.
शायद इसीलिए इन कलाकारों को याद करते समय सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होना चाहिए कि वे किस बस्ती में रहती थीं, बल्कि यह होना चाहिए कि उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत को क्या दिया. सरहदें बनीं, शहर अलग हुए, राज बदले और समाज की धारणाएं बदल गईं. लेकिन वे सुर आज भी सुनाई देते हैं.
कभी लाहौर की किसी पुरानी गली से, कभी अमृतसर की स्मृतियों से, कभी लखनऊ की महफिलों से और कभी रेडियो पर बजती किसी पुरानी गजल से.
हीरामंडी का इतिहास इसलिए केवल तवायफों का इतिहास नहीं है. यह उन स्त्रियों की कहानी भी है जिन्होंने सुरों को अपना जीवन बनाया और जिनकी कला ने सरहदों से पहले एक साझा हिंदुस्तानी दिल पर राज किया.
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