संपादकीय भूमिका
‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ के सातवें अंक में लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा ने नैतिकता, आचरण, दीन-धर्म और सामाजिक पाखंड जैसे गंभीर विषयों पर विचारोत्तेजक प्रश्न उठाए हैं। यह लेख प्रश्नों के माध्यम से आत्ममंथन और सामाजिक विमर्श का आमंत्रण देता है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, वर्ग या संस्था पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों पर विचार करना है। इस अंक में प्रस्तुत विचार पाठकों को सहमत या असहमत होने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं से संवाद करने और अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं।
अज़ीज़ पाठकों,
तुर्की की एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है— “अगर आप लोमड़ी से दीन सीखेंगे, तो धीरे-धीरे आपको मुर्गियाँ चुराना भी नेकी लगने लगेगा।”
पहली नज़र में यह एक साधारण कहावत लगती है, लेकिन यदि इसके भीतर उतरकर देखा जाए तो यह मनुष्य की सोच, उसके संस्कार और उसके मार्गदर्शकों पर बहुत गहरी चोट करती है।
मनुष्य जन्म से न तो अच्छा होता है और न बुरा। वह जैसा वातावरण पाता है, जैसी संगति में रहता है और जिन लोगों को अपना आदर्श मानता है, धीरे-धीरे वैसा ही बनता चला जाता है। यही कारण है कि हमारे यहाँ सदियों से कहा गया है— “जैसी संगत, वैसी रंगत।”
अगर शिक्षक ईमानदार होगा तो शिष्य भी ईमानदारी सीखेगा। अगर गुरु का आचरण निर्मल होगा तो उसके उपदेशों का प्रभाव भी निर्मल होगा। लेकिन यदि मार्गदर्शन किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में हो जिसकी बुनियाद ही छल, स्वार्थ और पाखंड पर टिकी हो, तो फिर गलत काम भी धीरे-धीरे सही दिखाई देने लगता है। यही बात उस तुर्की कहावत का सार है।
हम अपने जीवन में हर दिन छोटे-बड़े निर्णय लेते हैं। सामान्यतः हम उन्हें दो हिस्सों में बाँट देते हैं— नेकी और बदी, सही और गलत, पाप और पुण्य। लेकिन जीवन की सच्चाई इतनी सीधी नहीं होती। अनेक बार परिस्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं जहाँ सही और गलत के बीच की रेखा धुँधली पड़ जाती है।
राजनीति में ऐसा होता है। समाज में भी होता है। परिवारों में तो यह स्थिति और अधिक दिखाई देती है। कई बार एक ही घटना को देखने वाले दो व्यक्ति बिल्कुल अलग निष्कर्ष निकालते हैं और दोनों अपने-अपने तर्कों के साथ स्वयं को सही साबित करने में लगे रहते हैं।
यहीं से मनुष्य के भीतर प्रश्न जन्म लेते हैं। क्या हर सच बोलना उचित है? क्या हर झूठ बुरा होता है? क्या हर नियम हर परिस्थिति में लागू किया जा सकता है? और क्या केवल सिद्धांतों के सहारे जीवन जिया जा सकता है?
इन प्रश्नों के उत्तर जितने सरल दिखाई देते हैं, वास्तव में उतने हैं नहीं। यही कारण है कि बड़े-बड़े दार्शनिक, धर्माचार्य और विद्वान भी इन प्रश्नों पर सदियों से विचार करते आए हैं।
दुविधा मनुष्य की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी चेतना का प्रमाण है। जिस व्यक्ति के भीतर कोई प्रश्न नहीं उठता, वह सीख भी नहीं सकता। जिज्ञासा ही ज्ञान का पहला द्वार है। इसी संदर्भ में एक पुरानी दंतकथा याद आती है।
एक शिकारी जंगल में हिरण का पीछा कर रहा था। हिरण अपनी जान बचाने के लिए पूरी ताकत से भाग रहा था। भागते-भागते वह एक साधु की कुटिया के पीछे झाड़ियों में छिप गया। साधु ने यह सब अपनी आँखों से देखा।
कुछ ही क्षण बाद शिकारी भी वहाँ पहुँच गया। उसके हाथ में धनुष-बाण था। उसने साधु से पूछा— “महात्मा जी, क्या आपने एक हिरण को इधर से भागते देखा है? वह किस दिशा में गया?”
सवाल बहुत छोटा था, लेकिन उत्तर उतना ही कठिन। साधु जानते थे कि यदि सच बता देंगे तो हिरण मारा जाएगा। यदि झूठ बोलेंगे तो सत्य का पालन नहीं कर पाएँगे। उनके सामने दो मूल्य खड़े थे— सत्य और करुणा। एक ओर सत्य बोलने का धर्म था, दूसरी ओर एक निर्दोष प्राणी के प्राण बचाने का धर्म।
ऐसी स्थिति में कौन-सा धर्म बड़ा है? यही जीवन की सबसे कठिन परीक्षा है। संभव है कोई व्यक्ति कहे कि हर हाल में सच बोलना चाहिए। दूसरा कहे कि किसी निर्दोष की रक्षा करना अधिक बड़ा धर्म है। दोनों के पास अपने-अपने तर्क होंगे। यानी एक प्रश्न और अनेक उत्तर।
यही कारण है कि केवल नियमों से जीवन नहीं चलता। नियमों के साथ विवेक भी चाहिए। और विवेक केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि चरित्र से पैदा होता है। अब एक दूसरा उदाहरण देखिए।
मैंने एक ऐसी महिला को देखा है जिसने अपना अधिकांश जीवन अपने पति से झगड़ते हुए बिताया। छोटी-छोटी बातों पर घर छोड़ देना, महीनों मायके में रहना, पति को अपमानित करना— यह सब उसके लिए सामान्य बात थी।
लेकिन जब वही महिला अपने मायके जाती तो उसकी भूमिका बदल जाती। वहाँ वह अपनी भाभी को पत्नी धर्म का उपदेश देती। वह कहती— “औरत का पहला कर्तव्य अपने पति को प्रसन्न रखना है। यदि पत्नी अपना धर्म नहीं निभाएगी तो पति बिगड़ जाएगा, शराब पीने लगेगा या गलत रास्ते पर चला जाएगा।”
सुनने में उसकी बातें बड़ी आदर्श लगती थीं। लेकिन जब बात उसके अपने भाई की आती, तो उसकी भाषा पूरी तरह बदल जाती। वह भाई से कहती— “बीवी को ज़्यादा सिर पर मत चढ़ाओ। मर्द हो, मर्द की तरह रहो। उसे काबू में रखो, नहीं तो वह तुम्हें ही नचाएगी।”
ध्यान दीजिए। भाभी के लिए अलग नैतिकता। भाई के लिए अलग नैतिकता। और स्वयं अपने जीवन में बिल्कुल अलग आचरण। यानी उपदेश दूसरों के लिए, छूट अपने लिए। यही दोहरा चरित्र समाज में सबसे अधिक भ्रम पैदा करता है।
जब बच्चों के सामने ऐसे उदाहरण आते हैं तो वे उपदेशों से नहीं, व्यवहार से सीखते हैं। फिर धीरे-धीरे उनके मन में भी यही बैठने लगता है कि नैतिकता कोई स्थायी चीज़ नहीं, बल्कि सुविधा के अनुसार बदली जा सकने वाली व्यवस्था है।
यहीं से समाज में पाखंड जन्म लेता है। हम दूसरों के लिए कठोर नियम बनाते हैं और अपने लिए अपवाद खोज लेते हैं। दूसरों की गलती हमें अपराध लगती है, अपनी गलती परिस्थिति का परिणाम। दूसरों का स्वार्थ हमें बुरा लगता है, अपना स्वार्थ हमें विवेकपूर्ण निर्णय दिखाई देता है।
यहीं तुर्की की वह कहावत फिर सामने खड़ी हो जाती है। यदि लोमड़ी ही नैतिकता पढ़ाएगी, तो वह चोरी को भी बुद्धिमानी बताएगी। यदि स्वार्थी व्यक्ति धर्म का अर्थ समझाएगा, तो वह अपने स्वार्थ को ही धर्म घोषित कर देगा। यदि पाखंडी व्यक्ति आदर्शों की बातें करेगा, तो उसके आदर्श भी अंततः पाखंड की ही रक्षा करेंगे।
यही कारण है कि हमारे पूर्वज केवल यह नहीं कहते थे कि क्या सीखो, बल्कि यह भी कहते थे कि किससे सीखो। ज्ञान का मूल्य केवल उसके शब्दों में नहीं होता, बल्कि उसे कहने वाले के जीवन में होता है। जिस व्यक्ति का आचरण उसके शब्दों से मेल नहीं खाता, उसके सबसे सुंदर उपदेश भी अंततः समाज को भ्रमित ही करते हैं।
यहीं से अगला प्रश्न जन्म लेता है— जब समाज में उपदेश देने वाले बहुत हों, लेकिन आचरण वाले कम हों, तब सच्चे धर्म और दिखावे के धर्म में अंतर कैसे पहचाना जाए? यही प्रश्न आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है।
ज्ञान का संकट कभी नहीं रहा। किताबें पहले भी थीं और आज तो एक क्लिक पर पूरी दुनिया का ज्ञान उपलब्ध है। संकट ज्ञान का नहीं, बल्कि विश्वसनीयता का है। कौन सच बोल रहा है? कौन अपने स्वार्थ के लिए नैतिकता का चोला ओढ़े हुए है? और कौन वास्तव में अपने जीवन से वह साबित करता है, जिसकी शिक्षा देता है?
यहीं से दीन-धर्म का प्रश्न शुरू होता है। धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना था। उसका काम मनुष्य के भीतर करुणा, सत्य, न्याय, संयम और परिश्रम के संस्कार जगाना था। लेकिन जब धर्म साधना से अधिक प्रदर्शन का विषय बन जाता है, तब उसका स्वरूप बदलने लगता है।
आज चारों ओर धार्मिक आयोजन हैं, विशाल भवन हैं, चकाचौंध है, भव्य मंच हैं और करोड़ों रुपये का प्रबंधन है। यह कहना उचित नहीं होगा कि हर संस्था गलत है या हर धार्मिक कार्य दिखावा है। समाज में आज भी अनेक ऐसे संत, विद्वान और संस्थाएँ हैं जो निस्वार्थ भाव से सेवा कर रही हैं। उनका सम्मान होना चाहिए।
लेकिन इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सच है कि धर्म के नाम पर व्यापार, प्रभाव और प्रतिष्ठा अर्जित करने वालों की संख्या भी कम नहीं है। समस्या यहीं पैदा होती है।
जब धर्म साधना से अधिक संसाधनों पर निर्भर दिखाई देने लगे, जब सेवा से अधिक प्रचार महत्वपूर्ण हो जाए और जब विनम्रता से अधिक प्रदर्शन आकर्षित करने लगे, तब सामान्य व्यक्ति भ्रमित हो जाता है।
दान देने वालों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं। चढ़ावे के बड़े-बड़े आँकड़े सुनाई देते हैं। लेकिन बहुत कम लोग यह पूछते हैं कि यह धन किस रास्ते से आया है। धन स्वयं न अच्छा होता है, न बुरा। उसका चरित्र उसकी कमाई तय करती है।
इसी संदर्भ में गुरु नानक देव जी का एक प्रसिद्ध प्रसंग आज भी हमें सोचने पर मजबूर करता है। कहा जाता है कि उन्होंने मेहनत की कमाई से बनी रोटी और अन्याय से कमाए गए धन की रोटी के बीच का अंतर समझाया था। संदेश स्पष्ट था— ईश्वर को धन का आकार नहीं, उसकी पवित्रता अधिक प्रिय है। यही कारण है कि सदियों बाद भी उनके विचार जीवित हैं।
अब ज़रा और पीछे चलिए। यह वह समय नहीं है जब सप्तऋषि जंगलों की कुटियाओं में रहते थे। वे राजमहलों की सुविधा से दूर रहते हुए ज्ञान की साधना करते थे। उनका जीवन सादगी, अनुशासन और तपस्या का उदाहरण था। उन्होंने समाज को केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि अपने जीवन से यह दिखाया कि ज्ञान का पहला प्रमाण स्वयं का आचरण होता है। आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं।
भौतिक सुविधाएँ बढ़ी हैं, विज्ञान ने जीवन को आसान बनाया है और संसाधनों का विस्तार हुआ है। यह प्रगति स्वागत योग्य है। समस्या प्रगति से नहीं, बल्कि तब शुरू होती है जब सुविधा को ही आध्यात्मिकता का प्रमाण मान लिया जाता है।
कई बार हम किसी व्यक्ति की लोकप्रियता, उसके अनुयायियों की संख्या, उसके विशाल आयोजनों या उसकी आर्थिक शक्ति को देखकर उसे स्वतः महान मान लेते हैं। जबकि इतिहास हमें बार-बार सिखाता है कि सत्य का संबंध भीड़ से नहीं, चरित्र से होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम व्यक्ति के शब्दों से पहले उसके जीवन को पढ़ें। जो दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है, क्या वह स्वयं ईमानदार है? जो त्याग की बात करता है, क्या उसके जीवन में त्याग दिखाई देता है? जो न्याय की शिक्षा देता है, क्या उसका व्यवहार सबके प्रति समान है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं, तो केवल भाषणों से समाज का भला नहीं हो सकता। इसी संदर्भ में भ्रष्टाचार पर कही गई एक पंक्ति आज के दौर का सटीक चित्र प्रस्तुत करती है— “एक भ्रष्टाचारी दूसरे भ्रष्टाचारी को गाली देता है, एक भ्रष्टाचारी दूसरे भ्रष्टाचारी की जाँच करता है और अंत में एक भ्रष्टाचारी ही दूसरे भ्रष्टाचारी को निर्दोष घोषित कर देता है।”
यह वाक्य केवल शासन व्यवस्था पर व्यंग्य नहीं है। यह हमारे पूरे सामाजिक चरित्र पर प्रश्नचिह्न है। जब गलत लोग सही का प्रमाणपत्र बाँटने लगें, तब सही और गलत की पहचान और कठिन हो जाती है। इसीलिए तुर्की की वह कहावत आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक लगती है— “अगर आप लोमड़ी से दीन सीखेंगे, तो धीरे-धीरे आपको मुर्गियाँ चुराना भी नेकी लगने लगेगा।”
इसका अर्थ किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या धर्म पर आरोप लगाना नहीं है। इसका वास्तविक संदेश इससे कहीं व्यापक है। यह हमें सावधान करती है कि किसी भी विचार को स्वीकार करने से पहले उसके स्रोत को परखिए। केवल शब्दों पर मत जाइए, चरित्र को भी देखिए। क्योंकि मनुष्य वही बनता है, जिसकी वह लगातार संगति करता है। हमारे घरों में भी यही बात लागू होती है।
बच्चे हमारे भाषण नहीं, हमारा व्यवहार सीखते हैं। यदि हम उन्हें सत्य का पाठ पढ़ाएँ और स्वयं झूठ बोलें, तो वे हमारी बात नहीं, हमारा आचरण अपनाएँगे। यदि हम ईमानदारी की शिक्षा दें और अवसर मिलने पर बेईमानी कर लें, तो अगली पीढ़ी ईमानदारी पर नहीं, हमारी सुविधा पर विश्वास करेगी।
यही कारण है कि समाज की सबसे बड़ी पाठशाला आज भी परिवार है और सबसे प्रभावशाली पुस्तक आज भी मनुष्य का अपना चरित्र। इसलिए समय की माँग यह नहीं है कि हम अधिक उपदेश दें। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन को थोड़ा अधिक ईमानदार बनाएँ। शायद समाज की अनेक समस्याओं का समाधान यहीं से शुरू होता है। अंत में फिर वही बात, जिससे यह चिट्ठी शुरू हुई थी—
यदि गुरु सही होगा, तो रास्ता भी सही होगा। लेकिन यदि मार्गदर्शक ही छल को नीति और स्वार्थ को धर्म बताने लगे, तो धीरे-धीरे समाज को भी वही सच लगने लगेगा।
इसलिए विचारों को अपनाने से पहले व्यक्ति को परखिए, शब्दों से पहले चरित्र को देखिए और भीड़ से पहले अपने विवेक की आवाज़ सुनिए। हो सकता है यही छोटी-सी सावधानी हमें उस अंधेरी कोठरी तक पहुँचने से बचा ले, जिसकी चेतावनी तुर्की की वह पुरानी कहावत सदियों पहले दे चुकी है।
अगले सप्ताह फिर किसी नए विषय, नए प्रश्न और नए चिंतन के साथ आपसे मुलाकात होगी।
जय हिन्द!
— केवल कृष्ण पनगोत्रा
स्वतंत्र लेखक-पत्रकार, जम्मू-कश्मीर
Author: यायावर
यायावर

























