कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
एक बुजुर्ग के लिए जिंदगी के आखिरी पड़ाव में सबसे बड़ी जरूरत होती है अपनापन और सम्मान। लेकिन जब परिवार का सहारा छूट जाए और व्यवस्था भी अंतिम समय में साथ न दे, तो जीवन की पीड़ा मौत के बाद भी खत्म नहीं होती। ऐसा ही एक मार्मिक मामला सामने आया, जहां वृद्धाश्रम में रहने वाले 70 वर्षीय बुजुर्ग की मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार के लिए करीब 19 घंटे तक इंतजार करना पड़ा। अंतिम संस्कार के लिए निर्धारित धनराशि समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण शव को एक स्थान से वापस वृद्धाश्रम लाना पड़ा।
मामला मेरठ-करनाल हाईवे स्थित झिंझाना के वृद्धाश्रम का है। यहां रहने वाले चरण सिंह की रविवार शाम करीब सात बजे मृत्यु हो गई थी। इसके बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया तत्काल पूरी नहीं हो सकी। बताया गया कि संस्था की ओर से अंतिम संस्कार के लिए मिलने वाली धनराशि उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में केयर टेकर को पहले अपने खर्च से शव को शामली ले जाना पड़ा, लेकिन वहां भी आवश्यक राशि उपलब्ध नहीं हो सकी। मजबूरी में शव को वापस वृद्धाश्रम लाना पड़ा।
अगले दिन सोमवार दोपहर जब संस्था की ओर से अंतिम संस्कार की धनराशि केयर टेकर के खाते में भेजी गई, तब दोबारा शव को शामली ले जाकर अंतिम संस्कार कराया गया।
मौत के बाद शुरू हुआ इंतजार
केयर टेकर दीपक कुमार के मुताबिक, चरण सिंह को वर्ष 2023 में शामली रेलवे स्टेशन से वृद्धाश्रम लाया गया था। उस समय उन्होंने अपने नाम के अलावा अपने निवास स्थान या परिवार से संबंधित कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी थी। इसके बाद से वह वृद्धाश्रम में ही रह रहे थे।
रविवार दोपहर अचानक उनकी तबीयत खराब हुई। हालत बिगड़ने पर उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार करने के बाद उन्हें वृद्धाश्रम वापस भेज दिया। आश्रम लौटने के कुछ घंटे बाद रविवार शाम करीब सात बजे उनकी मृत्यु हो गई।
बुजुर्ग की मौत के बाद केयर टेकर ने अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू की। बताया गया कि शव को शामली ले जाने के लिए उन्होंने अपने स्तर पर वाहन की व्यवस्था की और अपने खर्च से शव को शामली पहुंचाया। लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक धनराशि उपलब्ध नहीं हो सकी।
ऐसे में वह शव को लेकर वापस वृद्धाश्रम लौट आए।
अपने खर्च पर शव ले गए, फिर लौटना पड़ा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे पीड़ादायक पहलू यह रहा कि जिस बुजुर्ग का अंतिम संस्कार उनकी मृत्यु के तुरंत बाद होना चाहिए था, उनके शव को पहले शामली ले जाया गया और फिर धनराशि नहीं मिलने के कारण वापस वृद्धाश्रम लाना पड़ा।
परिजनों का कोई पता नहीं होने के कारण चरण सिंह की देखभाल और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संस्था की ही थी। लेकिन धनराशि के इंतजार ने इस प्रक्रिया को करीब 19 घंटे तक रोक दिया।
सोमवार दोपहर के समय जब अंतिम संस्कार की धनराशि केयर टेकर के बैंक खाते में पहुंची, तब अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आगे बढ़ सकी। इसके बाद शव को दोबारा शामली ले जाया गया और वहां अंतिम संस्कार कराया गया।
यह घटना वृद्धाश्रमों में रहने वाले उन बुजुर्गों की स्थिति पर भी सवाल खड़े करती है, जिनके पास न परिवार का सहारा होता है और न ही अपने अंतिम समय की व्यवस्था करने का कोई साधन।
एक ही दिन दो बुजुर्गों की मौत
वृद्धाश्रम की संचालिका बेबी रानी ने बताया कि वह छुट्टी पर अपने घर गई हुई थीं। उनके अनुसार रविवार को आश्रम में दो वृद्धों की मौत हुई थी।
इनमें सुक्कन वर्मा की मृत्यु रविवार दोपहर हुई थी और उनका अंतिम संस्कार उसी दिन करा दिया गया। इसके बाद दूसरे वृद्ध चरण सिंह की रविवार शाम करीब सात बजे मृत्यु हुई। संस्था की ओर से अंतिम संस्कार के लिए धनराशि मिलने में कुछ समय की देरी हुई, जिसके चलते उनके अंतिम संस्कार में विलंब हुआ।
संचालिका का कहना है कि धनराशि प्राप्त होने के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।
वर्ष 2017 से चल रहा है वृद्धाश्रम
मेरठ-करनाल हाईवे पर स्थित यह वृद्धाश्रम वर्ष 2017 से संचालित बताया गया है। वर्तमान में यहां करीब 48 महिला और पुरुष बुजुर्ग रह रहे हैं। इनमें ऐसे बुजुर्ग भी हैं जिनके परिवार से संपर्क नहीं है या जिनके पास रहने के लिए कोई दूसरा सुरक्षित ठिकाना नहीं है।
केयर टेकर के अनुसार, संस्था की ओर से एक वृद्ध के लिए प्रतिदिन 112 रुपये का बजट मिलता है। इसके अलावा इलाज के लिए प्रत्येक वृद्ध के लिए प्रतिमाह 200 रुपये दिए जाने की व्यवस्था है।
वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के भोजन, रहने और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के साथ-साथ मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी संस्था की जिम्मेदारी बताई गई है।
अंतिम संस्कार के लिए भी धनराशि पर निर्भरता
इस घटना ने वृद्धाश्रमों में सरकारी अथवा संस्थागत सहायता की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। यदि किसी बुजुर्ग की मृत्यु हो जाए और उसके अंतिम संस्कार के लिए मिलने वाली धनराशि समय पर उपलब्ध न हो, तो ऐसी स्थिति में व्यवस्था किस तरह तत्काल सक्रिय होगी, यह सवाल इस मामले के बाद चर्चा में है।
मृत्यु के बाद शव को सुरक्षित रखना, वाहन की व्यवस्था करना और अंतिम संस्कार तक आवश्यक प्रक्रियाओं को पूरा करना तत्काल कार्रवाई की मांग करता है। ऐसे मामलों में धनराशि के हस्तांतरण में होने वाली देरी संवेदनशील स्थिति को और कठिन बना सकती है।
चरण सिंह के मामले में भी यही हुआ। रविवार शाम उनकी मृत्यु के बाद सोमवार दोपहर तक अंतिम संस्कार नहीं हो सका। इस दौरान शव को लेकर दो बार शामली तक की यात्रा करनी पड़ी।
संस्था पदाधिकारियों ने दी सफाई
संस्था के सचिव दिनेश कुमार और अध्यक्ष विनोद कुमार बताए गए हैं। संस्था के मालिक हरिकिशन सूर्यवंशी हैं। अध्यक्ष विनोद कुमार ने बताया कि जैसे ही उन्हें मामले की जानकारी मिली, उन्होंने तत्काल अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक धनराशि खाते में भेज दी थी।
संस्था की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि अंतिम संस्कार की व्यवस्था संस्था द्वारा ही की जाती है और धनराशि उपलब्ध होने के बाद प्रक्रिया पूरी करा दी गई।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि भविष्य में किसी बुजुर्ग की मौत होने पर अंतिम संस्कार में किसी तरह की आर्थिक बाधा न आए, इसके लिए क्या तत्काल व्यवस्था मौजूद है।
बुजुर्गों के सम्मानजनक अंतिम सफर का सवाल
वृद्धाश्रमों में रहने वाले बुजुर्ग अक्सर अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में संस्था पर निर्भर होते हैं। जिन लोगों के परिवार उनके साथ नहीं हैं, उनके लिए वृद्धाश्रम ही उनका घर और वहां के कर्मचारी ही आखिरी सहारा बन जाते हैं।
ऐसे में मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार में देरी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय नहीं रह जाती, बल्कि यह मानवीय संवेदनशीलता से भी जुड़ा सवाल बन जाती है।
चरण सिंह के मामले में करीब 19 घंटे तक अंतिम संस्कार के लिए इंतजार होना इसी पीड़ा को सामने लाता है। जीवन में अपनों का साथ न मिलने के बाद कम से कम मृत्यु के बाद उन्हें सम्मानजनक विदाई मिलनी चाहिए। लेकिन जब अंतिम विदाई भी धनराशि के इंतजार में अटक जाए, तो यह व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त है।
इस घटना ने यह भी दिखाया कि वृद्धाश्रमों में रहने वाले निराश्रित बुजुर्गों के लिए केवल भोजन और रहने की व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं है। उनके इलाज, आपातकालीन जरूरतों और मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था के लिए ऐसी प्रणाली जरूरी है, जिसमें किसी भी परिस्थिति में देरी न हो।
चरण सिंह को आखिरकार अंतिम विदाई मिल गई, लेकिन उनके अंतिम सफर से पहले बीते करीब 19 घंटे कई असहज सवाल छोड़ गए—क्या किसी बेसहारा बुजुर्ग की मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार के लिए भी धनराशि का इंतजार होना चाहिए? और क्या ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए कि मृत्यु के बाद किसी शव को केवल पैसों की कमी के कारण वापस न लौटाना पड़े?
























