“पनगोत्रा की चिट्ठी” अब हमारे साप्ताहिक स्तंभ की सीमाओं से निकलकर पाठकों के बीच अपनी एक आत्मीय पहचान बनाती जा रही है। हर सप्ताह मिल रही आपकी प्रतिक्रियाएँ, टिप्पणियाँ और सुझाव इस बात का प्रमाण हैं कि केवल कृष्ण पनगोत्रा की चिट्ठियाँ केवल पढ़ी नहीं जा रहीं, बल्कि महसूस की जा रही हैं।
इस स्तंभ को दिनोंदिन लोकप्रिय बनाने के लिए हम अपने सभी सम्मानित पाठकों के प्रति हृदय से आभार और धन्यवाद व्यक्त करते हैं। विशेष रूप से उन पाठकों का, जो चिट्ठी पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया भेजते हैं और लेखक के साथ एक जीवंत संवाद कायम करते हैं। यही संवाद किसी भी साहित्यिक-सामाजिक स्तंभ की वास्तविक पूंजी होता है।
पनगोत्रा जी की लेखनी की खूबी यह है कि वे साधारण दिखाई देने वाली घटनाओं में भी असाधारण अर्थ खोज लेते हैं। कभी कोई यात्रा सवाल बन जाती है, कभी कोई व्यक्ति कहानी का केंद्र बन जाता है और कभी कोई पुराना कुआँ हमारी पूरी पीढ़ी से अपने अतीत और भविष्य का हिसाब मांगने लगता है। “पनगोत्रा की चिट्ठी–6” भी ऐसी ही एक स्मृति, एक कुएँ और उसके बहाने हमारी जल-संस्कृति तथा विरासत की चिंता को सामने रखती है।
इस चिट्ठी में एक पुराने कुएँ की कहानी है, लेकिन उसके भीतर पानी, परंपरा, पुरखों की मेहनत, सामुदायिक भावना, बदलता समय और विरासत के प्रति हमारी जिम्मेदारी जैसे कई सवाल छिपे हैं। लेखक ने अपनी स्मृतियों के सहारे जिस कुएँ को हमारे सामने जीवंत किया है, वह अंततः केवल उनके गांव का कुआँ नहीं रह जाता—वह देश के उन तमाम उपेक्षित जलस्रोतों का प्रतिनिधि बन जाता है, जो हमारी आंखों के सामने इतिहास से खंडहर में बदलते जा रहे हैं।

हमारा आग्रह है कि “पनगोत्रा की चिट्ठी” के प्रति यही स्नेह, सद्भाव और आत्मीय संवाद आगे भी बना रहे। असहमति हो तो उसे भी सम्मानपूर्वक व्यक्त करें, क्योंकि स्वस्थ असहमति ही विचारों को व्यापक बनाती है। लेखक और पाठक के बीच यह रिश्ता जितना मजबूत होगा, स्तंभ उतना ही समृद्ध होगा।
आप पढ़ते रहें, अपनी राय देते रहें और हमें इसी तरह अपना स्नेह देते रहें। आइए, अब पढ़ते हैं—“पनगोत्रा की चिट्ठी–6 : जिस कुएँ की ठन-ठन में पांच पीढ़ियाँ पलीं, आज उसकी खामोशी पूछ रही है—विरासत बचाएगा कौन?” — संपादक अनिल अनूप
अज़ीज़ पाठकों,
शायरी के सरताज साहिर लुधियानवी ने वर्ष 1965 में बनी फिल्म वक्त के लिए एक कालजयी गीत लिखा था। उस गीत में वक्त की ताकत, उसके बदलते मिजाज और इंसानी जिंदगी पर उसके असर को जिस खूबसूरती से व्यक्त किया गया, वह आज भी मन को छू जाता है—
“वक्त से दिन और रात,
वक्त से कल और आज,
वक्त की हर शय गुलाम,
वक्त का हर शय पे राज!”
वक्त सचमुच बहुत कुछ बदल देता है। कभी-कभी तो इतना बदल देता है कि इंसान को अपनी ही आंखों पर विश्वास नहीं होता। कल जहाँ खुशियों की बस्ती थी, आज वहाँ मातम की उदासी दिखाई देती है। जहाँ कभी बहार हुआ करती थी, वहाँ आज खिजां का सन्नाटा पसरा होता है। वक्त केवल चेहरे नहीं बदलता, वह जगहों की पहचान, परंपराओं की स्मृतियाँ और पीढ़ियों की विरासत तक बदल देता है। साहिर लुधियानवी ने इसी बदलते वक्त के मिजाज को गीत की इन पंक्तियों में बेहद प्रभावशाली ढंग से सामने रखा था—
“कल जहाँ बस्ती थी खुशियाँ, आज हैं मातम वहाँ!
वक़्त लाया था बहारें, वक़्त लाया है खिज़ां!!”
वक्त कितने बदलाव देखता है! जहाँ कल खूबसूरती थी, वहाँ आज बदसूरती दिखाई देती है। जहाँ खुशियों की रौनक हुआ करती थी, वहाँ आज मातम की बेरौनकी पसरी है। जिन पनघटों, कुओं और बावलियों पर कभी घड़ों, गगरियों और बाल्टियों की ठन-ठन गूंजती थी, वहाँ की नितांत खामोशी को आजकल अक्सर कौवों की कांव-कांव ही भंग करती है।
आज की “पनगोत्रा की चिट्ठी–6” में मैं अपने गांव के एक ऐसे ही ऐतिहासिक कुएँ की कहानी आपके सामने रख रहा हूँ। यह केवल एक पुराने कुएँ की कहानी नहीं है। यह उस समय की कहानी है जब पानी जीवन था, कुआँ केवल जलस्रोत नहीं बल्कि सामाजिक जीवन का केंद्र था, और किसी सार्वजनिक जलस्रोत का निर्माण पुण्य, सेवा और आने वाली पीढ़ियों के लिए अमर स्मृति छोड़ने जैसा माना जाता था।
यह उस कुएँ की कहानी है जिसकी मुंडेर के आसपास खेलते हुए पांच पीढ़ियाँ जवान हुईं, लेकिन आज वही कुआँ अपनी बर्बादी का साक्षी बना हुआ है। वक्त का पहिया घूमता रहा और इंसानी जात की बेरुखी ने जिस कुएँ पर कभी रौनक बरसाई थी, उसी पर आज खिजां का एहसास करा दिया है।
कट्टल ब्राह्मणा गांव और पानी की पुरानी कहानी
बात एक शताब्दी से भी ज्यादा पुरानी होगी। मेरे कट्टल ब्राह्मणा गांव में पानी की भरपूर किल्लत थी। जब यह कुआँ नहीं रहा होगा, तब पानी निश्चित रूप से प्राकृतिक जलस्रोतों से ही हासिल किया जाता होगा। शायद इसी वजह से हमारे गांव के पुरखों ने अपने बसेरे अपनी करीब 900 एकड़ भूमि के एक ऐसे छोर पर बनाए, जहाँ से प्राकृतिक जलस्रोत लगभग एकाध कोस की दूरी पर थे।
आज जब पानी घर के भीतर नल से मिल जाता है, मोटर चलाकर जमीन के भीतर से पानी खींच लिया जाता है और ट्यूबवेल कुछ ही समय में जल उपलब्ध करा देता है, तब शायद हम उस दौर की कठिनाइयों की कल्पना भी नहीं कर सकते।
लेकिन वह ऐसा समय था जब पानी हासिल करना अपने आप में एक श्रमसाध्य काम था। उस समय गांव की जिंदगी जलस्रोतों के आसपास ही घूमती थी। कुआँ केवल पानी लेने की जगह नहीं होता था। वह सामाजिक संपर्क का स्थान था। वहाँ लोग मिलते थे, बातचीत करते थे, परिवारों के हालचाल पूछते थे और रोजमर्रा के जीवन की अनेक गतिविधियाँ उसी के इर्द-गिर्द चलती थीं। यह वह दौर था जब कुआँ, तालाब या बावली खुदवाना अथवा राहगीरों के लिए सराय बनवाना बड़ी नेकी का काम माना जाता था।
कोई भी व्यक्ति कुआँ, तालाब या बावली खुदवा सकता था, लेकिन इतिहास का वह दौर भी था जब कोई निःसंतान महिला या पुरुष कुआँ, तालाब या बावली बनवाने को केवल पुण्य कर्म नहीं मानता था, बल्कि उसे अमरत्व प्राप्त पुत्र की प्राप्ति जैसा समझता था।
यानी जलस्रोत का निर्माण केवल मिट्टी खोदना नहीं था। वह सामाजिक जिम्मेदारी, धार्मिक आस्था, लोकविश्वास और आने वाली पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व का एक साथ निर्वाह था।
गुरकंठी की परंपरा और कुलगुरुओं की भूमिका
उन दिनों हमारे देहात में एक परंपरा ऐसी भी थी, जिसमें किसी युवा की शादी के अवसर पर कुलगुरु दूल्हे के गले में माला या धागे की कंठी डालकर उसके कान में सफल वैवाहिक और पारिवारिक जीवन का कोई मंत्ररूपी सूत्र गुप्त तरीके से देते थे। इस प्रथा को “गुरकंठी डालना” कहा जाता था।
हमारे यहां यह परंपरा मंगोत्रा जाति के ब्राह्मण निभाते थे। समय बदला। शिक्षा का प्रसार हुआ। आधुनिकता का प्रभाव बढ़ा और धीरे-धीरे गुरकंठी की वह परंपरा भी समाप्त हो गई।
एक समय ऐसा भी था जब कुलगुरु और कुलपुरोहितों की रोजी-रोटी यजमानों से प्राप्त दान-दक्षिणा से चलती थी। कुलगुरु और कुलपुरोहित केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं थे। वे अपने यजमानों के सुख-दुख में साथ खड़े होते थे और उनकी सेवा तथा सुख-सुविधाओं का भी ध्यान रखते थे।
लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध और लालच की प्रतिस्पर्धा ने जब संबंधों के अर्थ बदलने शुरू किए तो कुलगुरु और कुलपुरोहित की भूमिका भी बदलती गई। जब कुलगुरु और कुलपुरोहित व्यापारी या अधिकारी बनने लगें तो पुरानी परंपराएँ कैसे बच सकती हैं?
यह सवाल केवल एक परंपरा के समाप्त होने का नहीं है। यह उस सामाजिक व्यवस्था के बदल जाने का संकेत भी है, जिसमें रिश्ते केवल धार्मिक या पारिवारिक दायित्व नहीं थे, बल्कि जीवन की सामुदायिक संरचना का हिस्सा हुआ करते थे।
गुरु मंगतराम मंगोत्रा और उस ऐतिहासिक कुएँ की शुरुआत
मेरे दादाजी ने मुझे बताया था कि उन दिनों मंगतराम मंगोत्रा हमारे गुरु थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने गांव के दक्षिणी छोर पर ग्राम देवता शंभू बाबा के देवस्थान के पास एक कुआँ खुदवाना शुरू किया। हमारे युवा पुरखों ने इस कुएँ के निर्माण में सेवा और सहायता देना शुरू कर दिया।
उस समय अनुमान था कि दस-बारह हाथ नीचे जाने पर शुद्ध पानी के पवित्र दर्शन हो जाएंगे। लेकिन धरती ने इतनी आसानी से पानी देने से इनकार कर दिया। कुआँ तीस-चालीस हाथ तक खोद दिया गया, मगर पानी नसीब नहीं हुआ।
गुरु मंगतराम बहुत दुखी हुए। उस समय की सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं ने उनके मन में एक ऐसा पापबोध पैदा कर दिया, जिसने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। वह समझ बैठे कि कुएँ में पानी नहीं आना उनके पापी होने का प्रमाण है।
उनके मन में विचार आया कि एक तरफ वह पहले ही संतान सुख से वंचित हैं और दूसरी ओर जिस कुएँ को उन्होंने समाज और पुण्य की भावना से शुरू करवाया, उसमें भी पानी नहीं निकला। यह आत्मग्लानि धीरे-धीरे इतनी गहरी होती गई कि गुरु मंगतराम मंगोत्रा मरणासन्न अवस्था में पहुँच गए।
आज हम शायद उस मानसिक स्थिति को उसी तरह न समझ पाएँ, लेकिन उस दौर में धार्मिक विश्वास और सामाजिक मान्यताएँ मनुष्य के जीवन पर बहुत गहरा असर डालती थीं।
जब पुरखों ने कहा—धरती का सीना चीर देंगे, पानी निकालकर रहेंगे
हमारे पुरखों को लगा कि यदि गुरु मंगतराम इसी पापबोध में चल बसे तो वे ब्रह्महत्या के भागी हो जाएंगे। तब उन्होंने गुरु मंगतराम को वचन दिया कि चाहे धरती का सीना क्यों न चीरना पड़े, वे कुएँ से पानी निकालकर ही दम लेंगे।
आज के दौर में मशीनें धरती के भीतर छेद करके ट्यूबवेल लगा देती हैं। उस समय न मशीनें थीं, न आधुनिक तकनीक, न जलस्तर की जांच करने वाले उपकरण। लेकिन हमारे पुरखों के पास था—हौसला, श्रम, सामूहिकता और पक्का इरादा। दादाजी ने बताया था कि उन दिनों मेरे पुरखों ने मजबूत लकड़ी को तीखा करके धरती के सीने से पानी निकालने का प्रयास किया। और आखिरकार वह दिन आया जब धरती से पानी की ऐसी धार फूटी कि उसे रोकने के लिए आटा पीसने वाली चक्की के भारी-भरकम पाट तक कुएँ में डालने पड़े।
कल्पना कीजिए उस क्षण की! जिस कुएँ को खोदते-खोदते उम्मीदें टूटने लगी थीं, उसी कुएँ में अचानक जल की ऐसी धार फूटी कि उसे संभालना मुश्किल हो गया। गांव के बड़े-बुजुर्ग कुएँ के जल का दीदार कराने के लिए पात्र में पानी लेकर गुरु मंगतराम मंगोत्रा के पास गए। गुरु ने पानी देखा। और फिर जो कहा, वह आज भी हमारी पारिवारिक स्मृति में जीवित है— “आज मुझे कुएँ के रूप में पुत्र धन प्राप्त हुआ है।” यानी जिस संतान के सुख से गुरु मंगतराम वंचित थे, उस कुएँ को उन्होंने पुत्र के समान माना।
इस तरह हमारे पुरखों ने गुरु मंगतराम मंगोत्रा को मरणासन्न अवस्था से उठाया, उन्हें जलपान करवाया और एक कुएँ को केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि जीवन, आस्था और स्मृति का प्रतीक बना दिया।
कहानी केवल एक कुएँ की नहीं है
लेकिन सवाल सिर्फ मेरे गांव के इस एक कुएँ का नहीं है। देश के न जाने कितने गांवों, कस्बों और शहरों में ऐसे कुएँ, तालाब और बावलियाँ होंगी, जिन पर वक्त और गैर-जिम्मेदारी का कहर टूट चुका है।
किसी ने शायद कभी यह सोचने की कोशिश नहीं की कि इन खंडहरों में केवल ईंट-पत्थर नहीं दबे होते। इनके भीतर हमारे पुरखों की मेहनत, जिम्मेदारी, सामूहिकता, आस्था और पक्के इरादों की विरासत भी दफन होती जा रही है।
आज हमारा राज और समाज जल निकायों के संरक्षण की दुहाई तो देता है, लेकिन धरातल पर अनेक कुओं, तालाबों और बावलियों की बरबादी किसी को दिखाई क्यों नहीं देती?
हम जल संरक्षण की बातें करते हैं। वर्षा जल संचयन की योजनाएँ बनाते हैं। भूजल बचाने की अपीलें करते हैं। लेकिन क्या हमने अपने आसपास मौजूद पुराने जलस्रोतों की सुध ली?
कितने कुएँ कूड़े से भर गए? कितने तालाब अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए? कितनी बावलियाँ केवल तस्वीरों और इतिहास की किताबों में बची हैं? और कितने ऐसे जलस्रोत हैं, जिनके बारे में अगली पीढ़ी को यह भी मालूम नहीं होगा कि कभी वहाँ से पूरा गांव अपनी प्यास बुझाता था?
आधुनिक विकास और पुरखों की विरासत
इंसानी उजरत यानी मेहनत की बेजोड़ निशानियों को आधुनिक विकास से पैदा हुई सुख-सुविधाओं ने निगल लिया है। देखते ही देखते कितने कुओं, तालाबों और बावलियों का गौरवशाली अतीत समाप्त होता जा रहा है।
निश्चित रूप से आधुनिक तकनीक ने जीवन आसान बनाया है। नल, मोटर, ट्यूबवेल और पाइपलाइन ने पानी तक हमारी पहुंच सरल की है। लेकिन सुविधा का अर्थ यह नहीं कि हम उस विरासत को ही भूल जाएँ जिसने हमारे पूर्वजों को कठिन परिस्थितियों में जीना सिखाया।
विकास का अर्थ अतीत को मिटा देना नहीं, बल्कि अतीत की उपयोगी विरासत को साथ लेकर आगे बढ़ना होना चाहिए।
मेरे गांव के ऐतिहासिक कुएँ का गौरवशाली अतीत भी धीरे-धीरे भुलाया जा रहा है। जिस कुएँ की मुंडेर के आसपास खेलकर पांच पीढ़ियाँ जवान हुईं, आज उसकी बर्बादी खलती है।
दो प्राचीन पेड़ आज भी इतिहास के प्रहरी हैं
इस कुएँ की उम्र के दो प्राचीन पेड़ आज भी खड़े हैं। एक पीपल है और दूसरा पलाख। दोनों विशालकाय पेड़ लगभग दो सौ साल की ऐतिहासिक अकड़ लिए हुए हमारे गांव की पुरातन परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
उनके तनों में समय की लकीरें हैं। उनकी शाखाओं में कई पीढ़ियों की स्मृतियाँ हैं। वे शायद उन दिनों के मूक गवाह हैं, जब गांव की महिलाएँ घड़े लेकर कुएँ पर आती रही होंगी, बच्चे आसपास खेलते रहे होंगे और बुजुर्ग उसकी मुंडेर पर बैठकर गांव-जवार की बातें करते रहे होंगे।
कुएँ के पास ही ग्राम देवता शंभू बाबा का देवस्थान है। वहां वर्ष में दो बार—रबी और खरीफ की फसल के बाद—गांव के सहयोग से छमाही भंडारा लगाया जाता है। पास ही सरकारी मिडिल स्कूल है।
इस कुएँ ने अपने आसपास धार्मिक और भौतिक विकास को परवान चढ़ते देखा है। उसने गांव को बदलते देखा है। उसने पीढ़ियों को आते-जाते देखा है। उसने बैलगाड़ियों का दौर देखा होगा, फिर साइकिलें, मोटरसाइकिलें और अब आधुनिक वाहनों का समय भी देख रहा है। मगर दुर्भाग्य की बात यह है कि पिछले पचास सालों से यह कुआँ स्वयं अपनी बर्बादी का साक्षी बना हुआ है।
नानकशाही ईंटों में दर्ज है इतिहास
देखा जाए तो एक शताब्दी से भी ज्यादा समय का मानवीय और भावनात्मक इतिहास इस कुएँ की ईंटों में समाया हुआ है। इसकी तामीर में लगी हुई नानकशाही ईंटें यह बताती हैं कि इसका निर्माण संभवतः उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में हुआ होगा।
लेकिन क्या केवल ईंटें इतिहास बचा सकती हैं? क्या केवल यह कहना पर्याप्त है कि हमारे गांव में एक पुराना कुआँ हुआ करता था? नहीं। इतिहास तभी जीवित रहता है जब उसकी निशानियों को बचाया जाए, उनकी कहानियाँ अगली पीढ़ी को सुनाई जाएँ और उन स्थानों को सम्मान दिया जाए जिनसे हमारी सामूहिक स्मृति जुड़ी है।
यह कुआँ केवल मेरे परिवार या मेरे गांव का नहीं है। यह उस दौर की सामुदायिक भावना का दस्तावेज़ है, जब लोग मिलकर जलस्रोत बनाते थे और उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाते थे। आज हमें फिर उसी भावना की आवश्यकता है।
कल हमारी विरासत भी किसी खंडहर में न बदल जाए
आज अगर हमारे पुरखों की विरासत खंडहर हो रही है तो कल हमारी तामीर के गिरे हुए पत्थरों को भी हमारी नस्लें अपने पैरों तले रौंदकर निकल जाएँगी। हम जिस आधुनिक दुनिया को अपनी उपलब्धि समझ रहे हैं, वह भी एक दिन पुरानी होगी।
हमारी बनाई इमारतें, सड़कें, पुल और संस्थान भी किसी आने वाले समय में इतिहास का हिस्सा बनेंगे। तब हमारी आने वाली पीढ़ियाँ हमें किस नजर से देखेंगी? क्या वे कहेंगी कि हमने अपने पुरखों की विरासत बचाई थी? या यह कहेंगी कि जिन लोगों को अपने अतीत की कद्र नहीं थी, उनसे भविष्य की उम्मीद करना ही बेकार था? मेरे गांव का वह कुआँ आज मुझसे यही सवाल करता है।
उसकी सूनी मुंडेर, उसके आसपास उगे पेड़, उसकी पुरानी नानकशाही ईंटें और उसके पास स्थित शंभू बाबा का देवस्थान जैसे मिलकर कह रहे हैं— जिस पानी ने पीढ़ियों को जीवन दिया, क्या उसकी स्मृति को भी यूँ ही मर जाने दिया जाएगा? यह सवाल केवल मेरे गांव का नहीं है। यह देश के उन सभी पुराने कुओं, तालाबों, बावलियों और पारंपरिक जलस्रोतों का सवाल है, जो कभी हमारी सभ्यता और सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा थे।
वक्त से डरकर रहना होगा
वक्त बदलता है। वक्त किसी का इंतजार नहीं करता। लेकिन इंसान के पास विवेक है, स्मृति है और अपनी विरासत को बचाने की क्षमता भी है।
अगर हमने समय रहते अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, जलस्रोतों और सामाजिक परंपराओं की सुध नहीं ली तो वक्त की ठोकर केवल पुरानी ईंटों को नहीं गिराएगी, वह हमारी स्मृतियों को भी मिटा देगी। साहिर लुधियानवी ठीक ही कह गए हैं—
“आदमी को चाहिए,
वक्त से डर कर रहे!
वक्त की ठोकर में है,
क्या हुकूमत क्या समाज!”
इसलिए इस चिट्ठी का सवाल बहुत सीधा है— क्या हम अपने पुरखों की मेहनत से बनी जल विरासत को बचा पाएँगे? क्या किसी पुराने कुएँ को केवल इसलिए मरने दिया जाएगा कि अब उसके पानी की जरूरत नहीं रही? क्या किसी तालाब की कीमत केवल उसके पानी से तय होगी? क्या किसी बावली की उपयोगिता खत्म हो जाने के साथ उसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी खत्म हो जाएगा? मेरी नजर में उत्तर नहीं होना चाहिए। क्योंकि पानी खत्म होने के बाद भी कुआँ इतिहास बचा सकता है। और पानी से ज्यादा जरूरी कभी-कभी वह स्मृति होती है, जो हमें बताती है कि हमारे पुरखों ने कठिन समय में कैसे जीवन बनाया था।
मेरे गांव का यह कुआँ आज भी खड़ा है। शायद कमजोर है। शायद उपेक्षित है। शायद बर्बादी के अंतिम दौर में है।
लेकिन उसकी ईंटों में हमारे पुरखों की मेहनत है, उसकी मुंडेर पर पांच पीढ़ियों की हँसी है, उसके जल में एक गुरु की आस्था है, उसके आसपास खड़े पीपल और पलाख में दो शताब्दियों की सांसें हैं और उसकी खामोशी में आज की पीढ़ी से पूछा गया एक सवाल है— “क्या तुम अपनी विरासत बचाओगे?” अगले हफ्ते किसी नई बात के साथ फिर मिलूँगा। तब तक प्यारी-सी अलविदा!
— केवल कृष्ण पनगोत्रा
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार, जम्मू-कश्मीर


























8 Responses
श्रद्धेय संपादक अनिल अनूप जी,
सादर नमन
“पनगोत्रा की चिट्ठी-6” पढ़कर मन देर तक उसी ऐतिहासिक कुएँ की मुंडेर पर बैठा रहा, जहाँ कभी घड़ों की ठन-ठन जीवन का संगीत हुआ करती थी। पनगोत्रा जी ने जिस आत्मीयता से अपने गांव, अपने पुरखों और जल विरासत की स्मृतियों को शब्द दिए हैं, वह केवल संस्मरण नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना को झकझोरने वाला दस्तावेज़ है।
इस चिट्ठी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखक अतीत का गुणगान भर नहीं करता, बल्कि वर्तमान से सवाल पूछता है और भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी तय करता है। एक पुराने कुएँ की कथा के माध्यम से उन्होंने जल संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत और मानवीय मूल्यों को जिस सहजता से जोड़ा है, वह इस स्तंभ को विशिष्ट बनाता है।
संपादक अनिल अनूप जी का भी विशेष अभिनंदन, जिन्होंने लेखक की मूल संवेदना को अक्षुण्ण रखते हुए उसे ऐसी संपादकीय गरिमा प्रदान की है कि रचना का प्रभाव कई गुना बढ़ गया है। शब्दों की मर्यादा, प्रस्तुति का संतुलन और भावों की स्वाभाविकता—यही कुशल संपादन की पहचान है, जिसका सुखद अनुभव इस चिट्ठी में भी मिलता है।
केवल कृष्ण पनगोत्रा जी को इस सार्थक और विचारोत्तेजक चिट्ठी के लिए हार्दिक बधाई। विश्वास है कि “पनगोत्रा की चिट्ठी” पाठकों के मन में इसी तरह संवेदना, संवाद और सामाजिक चेतना के नए दीप जलाती रहेगी।
“पनगोत्रा की चिट्ठी-6” पढ़ते हुए बार-बार लगा कि यह किसी एक गांव के कुएँ की कहानी नहीं, बल्कि पूरे भारत की उस सांस्कृतिक स्मृति का दस्तावेज़ है, जिसे आधुनिकता की दौड़ में हम धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। केवल कृष्ण पनगोत्रा जी ने जिस सहजता और आत्मीयता से अपने पुरखों, जल विरासत और सामाजिक उत्तरदायित्व को एक सूत्र में पिरोया है, वह इस चिट्ठी को सामान्य संस्मरण से कहीं ऊपर ले जाता है।
लेख की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें उपदेश नहीं, अनुभव बोलते हैं। एक पुराने कुएँ की खामोशी के माध्यम से लेखक ने समय, समाज और हमारी बदलती संवेदनाओं पर जो प्रश्न खड़े किए हैं, वे हर पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करते हैं। साहिर लुधियानवी के गीत से आरंभ होकर विरासत बचाने की चिंता तक पहुँचने वाली यह रचना साहित्य और सामाजिक चेतना का सुंदर संगम है।
संपादक अनिल अनूप जी की संपादकीय दृष्टि भी विशेष प्रशंसा की पात्र है। लेखक की मौलिक शैली को अक्षुण्ण रखते हुए भाषा को अधिक प्रभावी, प्रवाहपूर्ण और पाठक-केंद्रित बनाना कुशल संपादन का प्रमाण है। यही कारण है कि “पनगोत्रा की चिट्ठी” केवल एक स्तंभ नहीं, बल्कि हर सप्ताह विचार और संवेदना का इंतज़ार बनती जा रही है।
केवल कृष्ण पनगोत्रा जी को इस सार्थक चिट्ठी के लिए हार्दिक बधाई। आशा है कि यह स्तंभ आने वाले समय में भी हमारी सांस्कृतिक विरासत, मानवीय मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों पर इसी तरह गंभीर संवाद कायम रखेगा।
अरे भइया, “पनगोत्रा की चिट्ठी-6” पढ़के तो मन एकदम अपने गाँव की गलियन में पहुँच गया। बचपन में हम भी रोज कुएँ से पानी भरत लोगन को देखत रहे। घड़ों की छन-छन, औरतों की हँसी-ठिठोली अउर कुएँ की जगत पर बैठके बतियावत बुजुर्ग—सब कुछ आँखिन के आगे घूम गवा।
पनगोत्रा जी ने खाली एक कुआँ नहीं लिखा, बल्कि हम सबके गाँव-घर की याद लिख डारी। आज न कुएँ बचे, न वो अपनापन, न वैसी बैठकी। पढ़ते-पढ़ते कई बार लगा कि हम अपनी ही कहानी पढ़ रहे हैं। यही तो असली लेखन होता है, जो सीधे दिल में उतर जाए।
एक बात अउर कहब। संपादक अनिल अनूप जी का भी धन्यवाद बनत है। लेखक की बोली, भावना अउर अपनापन जस का तस रखते हुए रचना को ऐसा सँवारा है कि पढ़ने वाला आख़िर तक बँधा रहता है। यही बढ़िया संपादन की पहचान है।
पनगोत्रा जी, ऐसे ही गाँव, समाज अउर अपनी जड़ों की बात लिखत रहिए। शहर की चमक-दमक तो बहुत लोग लिख रहे हैं, लेकिन गाँव की मिट्टी की खुशबू सबके बस की बात नहीं। आपकी यह चिट्ठी पढ़कर मन कह उठा—पुरखों की छोड़ी विरासत बची रहे, तभी आने वाली पीढ़ियाँ अपनी पहचान बचा पाएँगी।
राम-राम! 🌿
अरे वाह, “पनगोत्रा की चिट्ठी-6″ तो पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे मैं किसी कहानी की किताब नहीं, बल्कि दादाजी की गोद में बैठकर गाँव का इतिहास सुन रही हूँ। कुएँ की मुंडेर, पुरखों की मेहनत, पानी की कीमत और समय की मार—सब कुछ इतने अपनापे से लिखा गया है कि एक बार पढ़ना शुरू किया तो अंत तक रुकने का मन ही नहीं हुआ।
पनगोत्रा जी की सबसे प्यारी बात यह लगी कि वे बड़ी-बड़ी बातें भी बिल्कुल सहज अंदाज़ में कह देते हैं। एक पुराने कुएँ की कहानी सुनाते-सुनाते उन्होंने हमारी पूरी पीढ़ी से पूछ लिया—”विरासत बचाओगे या सिर्फ़ तस्वीरें देखकर अफ़सोस करोगे?” यही सवाल देर तक मन में गूंजता रहा।
और हाँ, संपादक अनिल अनूप जी को भी खूब-खूब बधाई। उनकी संपादकीय छुअन ने चिट्ठी को ऐसा सजा दिया है कि भाषा का सौंदर्य भी बना रहा और लेखक की आत्मीयता भी ज्यों की त्यों पाठकों तक पहुँच गई। सच कहूँ तो यह स्तंभ अब हर हफ्ते मिलने वाले किसी अपने के ख़त जैसा लगने लगा है।
पनगोत्रा जी, अगली चिट्ठी का इंतज़ार अभी से शुरू हो गया है। बस एक गुज़ारिश है—ऐसी ही मिट्टी की खुशबू, ऐसे ही पुरखों की यादें और ऐसे ही दिल को छू लेने वाले सवाल हर सप्ताह हमारे हिस्से आते रहें। 🌿💚
“पनगोत्रा की चिट्ठी-6” केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण संस्कृति, जल परंपरा और सामाजिक स्मृतियों का अत्यंत संवेदनशील दस्तावेज़ है। केवल कृष्ण पनगोत्रा जी ने अपने गांव के एक पुराने कुएँ की कथा के माध्यम से जिस तरह समय, समाज और मनुष्य के बदलते संबंधों को रेखांकित किया है, वह पाठक को भीतर तक सोचने के लिए विवश करता है।
इस चिट्ठी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अतीत के प्रति भावुकता है, लेकिन अतीतजीविता नहीं। लेखक पुरखों की विरासत का सम्मान करते हुए वर्तमान समाज से यह प्रश्न भी पूछता है कि क्या विकास का अर्थ अपनी जड़ों को भुला देना है? “जिस कुएँ ने पाँच पीढ़ियों की प्यास बुझाई, क्या उसकी स्मृति भी हमारे लिए बेकार हो गई?” यह प्रश्न पूरी रचना का प्राण है।
साहिर लुधियानवी के कालजयी गीत से आरंभ होकर एक ऐतिहासिक कुएँ की कथा तक पहुँचने वाली यह चिट्ठी साहित्य, इतिहास और सामाजिक चेतना का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। भाषा सहज है, शैली आत्मीय है और विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं।
इस अवसर पर संपादक अनिल अनूप जी को भी साधुवाद देना चाहूँगा। उनकी संपादकीय दृष्टि हर रचना को एक संतुलित, परिष्कृत और प्रभावी स्वरूप प्रदान करती है। लेखक की मूल संवेदना को अक्षुण्ण रखते हुए भाषा को अधिक पठनीय बनाना उनकी संपादन-कला की विशेषता है। यही कारण है कि जनगणदूत का प्रत्येक स्तंभ केवल प्रकाशित नहीं होता, बल्कि पाठकों के मन में स्थान भी बना लेता है।
पनगोत्रा जी को इस उत्कृष्ट चिट्ठी के लिए हार्दिक बधाई। आशा है कि उनकी कलम आगे भी समाज, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जुड़े ऐसे ही सार्थक प्रश्न हमारे सामने रखती रहेगी।
“पनगोत्रा की चिट्ठी-6” पढ़कर ऐसा लगा कि लेखक ने केवल अपने गांव के एक पुराने कुएँ की कहानी नहीं सुनाई, बल्कि हम सबको अपनी जड़ों की ओर देखने के लिए मजबूर किया है। आज जब नई-नई सुविधाओं के बीच हम पुराने जलस्रोतों और अपनी विरासत को भूलते जा रहे हैं, तब यह चिट्ठी हमें सोचने पर विवश करती है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए हम क्या छोड़कर जा रहे हैं।
मुझे इस लेख की सबसे अच्छी बात यह लगी कि इसमें किसी पर आरोप नहीं लगाया गया, बल्कि बहुत सादगी से समाज के सामने एक बड़ा सवाल रखा गया है। गुरु मंगतराम मंगोत्रा की कथा हो या ऐतिहासिक कुएँ का प्रसंग, हर बात दिल को छूती है और यह एहसास कराती है कि हमारे पुरखों ने जो धरोहर हमें सौंपी थी, उसकी रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
संपादक अनिल अनूप जी का भी विशेष धन्यवाद, जिन्होंने इस चिट्ठी को उसकी मूल आत्मा के साथ पाठकों तक पहुँचाया। भाषा का प्रवाह, भावों का संतुलन और प्रस्तुति की गरिमा पूरे लेख को और अधिक प्रभावशाली बना देती है।
केवल कृष्ण पनगोत्रा जी को इस सार्थक और विचारोत्तेजक चिट्ठी के लिए हार्दिक बधाई। उम्मीद है कि उनकी कलम आगे भी समाज, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जुड़े ऐसे ही गंभीर विषयों पर पाठकों का मार्गदर्शन करती रहेगी।
“पनगोत्रा की चिट्ठी-6″ पढ़ते हुए मैं हजारों किलोमीटर दूर मक्का-मदीना में था, लेकिन मेरा दिल बार-बार अपने हिंदुस्तान के उस पुराने गाँव में पहुँच जाता रहा, जहाँ किसी कुएँ की मुंडेर पर बैठकर लोग दुख-सुख बाँटते होंगे। सच कहूँ तो यह चिट्ठी पढ़ते समय कई बार आँखें नम हो गईं। इसलिए नहीं कि इसमें कोई दुखद घटना है, बल्कि इसलिए कि इसमें अपनी मिट्टी की वह खुशबू है, जिसे परदेस में रहकर इंसान सबसे ज्यादा याद करता है।
परदेस में रहकर आदमी समझता है कि इमारतें, सड़कें और दौलत इंसान को सुविधाएँ तो दे सकती हैं, लेकिन अपनी मिट्टी, अपने पुरखों और अपनी यादों का कोई विकल्प नहीं होता। पनगोत्रा साहब ने जिस पुराने कुएँ की बात की है, वह मुझे अपने गाँव के उन सभी निशानों की याद दिला गया, जो आज शायद मिट चुके हैं, लेकिन दिल से कभी नहीं मिटते।
गुरु मंगतराम मंगोत्रा की कथा पढ़ते हुए लगा कि हमारे बुज़ुर्ग केवल घर नहीं बनाते थे, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए दुआएँ भी छोड़ जाते थे। आज हम विरासत की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन उसे बचाने की जिम्मेदारी निभाने में कहीं न कहीं पीछे रह गए हैं। यह चिट्ठी उसी जिम्मेदारी का एहसास कराती है।
मैं संपादक अनिल अनूप जी को भी दिल से मुबारकबाद देना चाहता हूँ। उन्होंने इस चिट्ठी को जिस संवेदनशीलता और संतुलन के साथ पाठकों तक पहुँचाया है, उससे इसकी आत्मा और भी निखरकर सामने आई है। एक अच्छे संपादक की पहचान यही होती है कि वह लेखक की आवाज़ को दबाता नहीं, बल्कि उसे और स्पष्ट तथा प्रभावशाली बना देता है।
पनगोत्रा साहब, आपकी यह चिट्ठी पढ़कर मुझे अपने वालिद की एक बात याद आ गई। वे कहा करते थे—”जिस कौम को अपनी जड़ों से मोहब्बत होती है, उसका भविष्य कभी सूखा नहीं करता।” आज आपने एक पुराने कुएँ के बहाने उसी मोहब्बत को फिर से ज़िंदा कर दिया।
अल्लाह तआला आपको सलामत रखे और आपकी कलम को इसी तरह इंसानियत, मोहब्बत और अपनी मिट्टी की खुशबू बिखेरने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
प्रिय पाठकों,
जनगनदूत पोर्टल पर मेरे साप्ताहिक स्तम्भ ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ को आप पढ़ते हैं और पसंद भी करते हैं, यह एक लेखक के लिए इतना ही जरूरी है जितना कि एक दीपक के लिए तेल जरूरी होता है। अगर आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते तो मुझे लगता कि मेरा प्रयास सफल नहीं हो रहा। अपनी बेशकीमती प्रतिक्रियाओं से आप सिर्फ मेरा हौसला ही नहीं बढ़ा रहे अपितु दिशा भी दे रहे हैं।
यह एक तरह से पाठकों के प्यार का ही कमाल है कि मैं चिट्ठी दर चिट्ठी जेहनी तौर पर आपके नजदीक आता जा रहा हूं।
प्यारे पाठको, एक साधारण सी काया को अगर सजाया-संवारा न जाए तो आकर्षित नहीं करती। मुझे संवारने का काम मेरे ‘मेकअप मैन’ अनिल अनूप जी करते हैं।
आपकी इतनी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं कि अपनी घरेलू और सामाजिक जिम्मेदारियों की मसरूफियत में सबका अलग-अलग धन्यवाद करना मुश्किल हो रहा है। इसलिए संयुक्त रूप से आपसे रूबरू होना पड़ रहा है। मुझे आशा है कि आप दिल से नहीं लेंगे।
मेरे लिए इससे बड़ा इनाम और क्या हो सकता है कि मुझे अपने घर (जम्मू-कश्मीर से लेकर विदेश, जैसे सउदी अरब, से भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। एक बार फिर हार्दिक धन्यवाद
आपका अपना,
केवल कृष्ण पनगोत्रा
स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर से