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देहरादून। उच्च शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक जिम्मेदारियों को समझने की प्रक्रिया भी है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लॉ में दीक्षारंभ-2026 कार्यक्रम के अंतर्गत नवप्रवेशित विद्यार्थियों के लिए एंटी-रैगिंग जागरूकता व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी एवं संयुक्त राष्ट्र शांति दल (यूएन पीस मिशन) के पूर्व सदस्य रोशन लाल शर्मा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए स्पष्ट कहा कि कॉलेज या स्कूल में छात्रों के साथ किया जाने वाला शारीरिक, मानसिक अथवा मौखिक दुर्व्यवहार केवल रैगिंग नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध है, जिसके कानूनी और सामाजिक परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपने शैक्षणिक जीवन की शुरुआत सकारात्मक सोच, अनुशासन और मानवीय मूल्यों के साथ करें तथा ऐसा वातावरण तैयार करें, जहां हर छात्र स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे।
अच्छा इंसान बने बिना अच्छा विधिवेत्ता बनना संभव नहीं
अपने संबोधन में रोशन लाल शर्मा ने कहा कि कानून की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों की जिम्मेदारी सामान्य छात्रों की तुलना में कहीं अधिक होती है। उनका कहना था कि एक सफल वकील या न्यायाधीश बनने से पहले एक संवेदनशील और अच्छा इंसान बनना आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति में मानवता, सहानुभूति और दूसरों के सम्मान की भावना नहीं है, तो वह न्याय के वास्तविक उद्देश्य को कभी नहीं समझ सकता।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का दायित्व केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भी विकसित करना है।
रैगिंग कानून की नजर में गंभीर अपराध
रोशन लाल शर्मा ने विद्यार्थियों को रैगिंग से जुड़े कानूनी प्रावधानों की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रैगिंग किसी प्रकार का मनोरंजन या परंपरा नहीं है, बल्कि यह कानून की दृष्टि में दंडनीय अपराध है। यदि कोई छात्र रैगिंग में शामिल पाया जाता है तो उसके विरुद्ध संस्थागत कार्रवाई के साथ-साथ कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में विद्यार्थियों को निलंबन, निष्कासन, छात्रवृत्ति समाप्त होने जैसी शैक्षणिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त पुलिस मामला दर्ज होने की स्थिति में भविष्य की नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाओं और सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
रैगिंग के विभिन्न स्वरूपों को समझना जरूरी
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने रैगिंग के विभिन्न प्रकारों की विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि कई बार छात्र यह समझ ही नहीं पाते कि उनका व्यवहार भी रैगिंग की श्रेणी में आ सकता है।
उन्होंने बताया कि शारीरिक रैगिंग के अंतर्गत किसी छात्र के साथ मारपीट करना, उसे जबरन कोई कार्य करने के लिए मजबूर करना, अनावश्यक शारीरिक श्रम कराना या उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना शामिल है।
वहीं मानसिक और मौखिक उत्पीड़न में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करना, गाली देना, सार्वजनिक रूप से बेइज्जत करना, डराना-धमकाना या मानसिक दबाव बनाना भी रैगिंग का ही रूप है।
इसके अलावा सामाजिक उत्पीड़न के अंतर्गत किसी छात्र की जाति, भाषा, रंग, पहनावे, शारीरिक बनावट या अन्य व्यक्तिगत विशेषताओं का मजाक उड़ाना भी गंभीर अपराध माना जाता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का व्यवहार किसी व्यक्ति के आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुंचा सकता है और उसके मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
नए विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित और सकारात्मक माहौल जरूरी
रोशन लाल शर्मा ने कहा कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान की पहचान उसकी शैक्षणिक गुणवत्ता के साथ-साथ वहां के सुरक्षित और सौहार्दपूर्ण वातावरण से भी होती है। यदि नए विद्यार्थी भय और असुरक्षा के माहौल में अपनी पढ़ाई शुरू करेंगे तो उनका आत्मविश्वास प्रभावित होगा और वे अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे।
उन्होंने वरिष्ठ विद्यार्थियों से अपील की कि वे नए छात्रों का स्वागत मित्रवत व्यवहार से करें, उनका मार्गदर्शन करें और उन्हें संस्थान की संस्कृति तथा शैक्षणिक गतिविधियों से परिचित कराएं। यही स्वस्थ परंपरा भविष्य में बेहतर शैक्षणिक वातावरण का निर्माण करती है।
कानून के विद्यार्थियों की विशेष जिम्मेदारी
उन्होंने कहा कि स्कूल ऑफ लॉ के विद्यार्थियों से समाज को विशेष अपेक्षाएं रहती हैं क्योंकि भविष्य में यही विद्यार्थी न्याय व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे। ऐसे में उनके आचरण में संवेदनशीलता, अनुशासन और कानून के प्रति सम्मान स्पष्ट दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि यदि कहीं भी रैगिंग जैसी घटना दिखाई दे तो उसे नजरअंदाज न करें, बल्कि संस्थान के एंटी-रैगिंग तंत्र अथवा संबंधित अधिकारियों को तत्काल सूचना दें ताकि समय रहते आवश्यक कार्रवाई की जा सके।
शिक्षकों ने भी दिया सकारात्मक संदेश
कार्यक्रम में स्कूल ऑफ लॉ के डीन प्रो. (डॉ.) अनिल कुमार दीक्षित ने मुख्य अतिथि का परिचय कराते हुए कहा कि विद्यार्थियों में कानूनी जागरूकता और नैतिक मूल्यों का विकास संस्थान की प्राथमिकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के जागरूकता कार्यक्रम विद्यार्थियों को जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में प्रेरित करेंगे।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. विनोद जोशी ने मुख्य अतिथि सहित सभी उपस्थितजनों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर डॉ. राजन धांडा, श्रीमती नीलम सिंह, श्रीमती शिवांगी पाठक, सुश्री आकांक्षा भट्ट, सुश्री स्माइल गोयल तथा श्री हिमांशु जखमोला सहित संकाय सदस्य और बड़ी संख्या में नवप्रवेशित विद्यार्थी उपस्थित रहे।
जागरूकता ही रैगिंग रोकने का सबसे प्रभावी उपाय
कार्यक्रम का मुख्य संदेश यही रहा कि रैगिंग किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। स्वस्थ शैक्षणिक वातावरण तभी संभव है, जब सभी विद्यार्थी एक-दूसरे के सम्मान, समानता और गरिमा का ध्यान रखें। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, संवेदनशीलता और कानून का प्रभावी पालन ही रैगिंग जैसी सामाजिक बुराई को समाप्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इस प्रकार के जागरूकता कार्यक्रम विद्यार्थियों को न केवल उनके अधिकारों और कर्तव्यों से परिचित कराते हैं, बल्कि उन्हें जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनने की प्रेरणा भी देते हैं।

























