रिपोर्ट: इरफान अली लारी
देवरिया, भाटपाररानी। बेलपार पंडित स्थित शौर्य हॉस्पिटल परिसर में महान शिक्षक एवं शिक्षाविद् स्वर्गीय डॉ. राजकिशोर दुबे की द्वितीय पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, शैक्षिक योगदान तथा सामाजिक सरोकारों को याद किया। वक्ताओं ने कहा कि डॉ. दुबे ने अपने जीवन को शिक्षा, संस्कार, अनुशासन और सेवा के लिए समर्पित किया। उनके द्वारा विद्यार्थियों को दिया गया मार्गदर्शन आज भी उनके शिष्यों के जीवन में प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
शिक्षा को जीवन निर्माण का माध्यम मानते थे डॉ. राजकिशोर दुबे
श्रद्धांजलि सभा के मुख्य अतिथि जेआरएचयू चित्रकूट के पूर्व रजिस्ट्रार एवं शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय लखनऊ के प्रोफेसर अवनीश मिश्र ने स्वर्गीय डॉ. राजकिशोर दुबे के व्यक्तित्व और कृतित्व को स्मरण करते हुए कहा कि यह धरती सदैव प्रतिभाओं को जन्म देने और उन्हें वटवृक्ष के रूप में विकसित करने वाली रही है। डॉ. दुबे इसी परंपरा के प्रमुख संवाहकों में शामिल थे।
उन्होंने कहा कि डॉ. राजकिशोर दुबे ने केवल विषयगत ज्ञान देने वाले शिक्षक की भूमिका तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उन्होंने विद्यार्थियों के जीवन में ज्ञान के साथ संस्कार, अनुशासन और सकारात्मक सोच का संचार किया। उनके मार्गदर्शन से अनेक विद्यार्थियों को अपने जीवन की दिशा निर्धारित करने में सहायता मिली। यही किसी शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है कि उसके विद्यार्थी उसके विचारों और संस्कारों को आगे लेकर चलें।
प्रोफेसर अवनीश मिश्र ने कहा कि एक शिक्षक का प्रभाव उसके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहता। शिक्षक द्वारा दिए गए ज्ञान, संस्कार और जीवन-मूल्य आने वाली पीढ़ियों में भी जीवित रहते हैं। डॉ. दुबे ने शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान दिया, उसकी सार्थकता इसी बात में है कि उनके शिष्य आज भी उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करते हैं।
चरित्र निर्माण को शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य माना
मठलार डिग्री कॉलेज के प्रवक्ता डॉ. संजयन त्रिपाठी ने कहा कि स्वर्गीय डॉ. राजकिशोर दुबे शिक्षा को महज रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानते थे। उनके लिए शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र का निर्माण, उसके भीतर सामाजिक जिम्मेदारी की भावना पैदा करना और उसे एक बेहतर नागरिक बनाना था।
उन्होंने कहा कि डॉ. दुबे का मानना था कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह व्यक्ति के व्यवहार और जीवन में दिखाई दे। इसी सोच के कारण उन्होंने अपने विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम की शिक्षा के साथ जीवन के मूल्यों से भी जोड़ने का प्रयास किया। उनके व्यक्तित्व में शिक्षक की गंभीरता, मार्गदर्शक की संवेदनशीलता और समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक की प्रतिबद्धता दिखाई देती थी।
डॉ. संजयन त्रिपाठी ने कहा कि आज जब शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं, ऐसे समय में डॉ. दुबे के आदर्श और विचार और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। विद्यार्थियों को केवल सफल बनाने के बजाय उन्हें जिम्मेदार, अनुशासित और संस्कारित नागरिक बनाने की उनकी सोच समाज के लिए प्रेरणादायी है।
विद्यार्थियों के जीवन में छोड़ी अमिट छाप
श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि स्वर्गीय डॉ. राजकिशोर दुबे का जीवन शिक्षा के प्रति समर्पण का उदाहरण रहा। उन्होंने अपने विद्यार्थियों को हमेशा आगे बढ़ने, कठिन परिस्थितियों का सामना करने और अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहने की प्रेरणा दी।
उनसे शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए उनका व्यक्तित्व केवल एक शिक्षक तक सीमित नहीं था। वे जरूरत पड़ने पर मार्गदर्शक, सलाहकार और अभिभावक की भूमिका भी निभाते थे। यही कारण है कि उनके निधन के दो वर्ष बाद भी उनके शिष्यों, सहयोगियों और शुभचिंतकों के मन में उनके प्रति सम्मान और आत्मीयता बनी हुई है।
वक्ताओं ने कहा कि किसी शिक्षक की सच्ची विरासत उसके द्वारा अर्जित संपत्ति या पद नहीं, बल्कि उसके विद्यार्थियों के व्यक्तित्व में दिखाई देने वाले संस्कार होते हैं। इस दृष्टि से डॉ. दुबे ने समाज को ऐसी अमूल्य विरासत दी है, जिसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहेगा।
श्रद्धांजलि के साथ आदर्शों पर चलने का संकल्प
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों ने स्वर्गीय डॉ. राजकिशोर दुबे के चित्र पर पुष्प अर्पित किए और उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी। श्रद्धांजलि सभा का वातावरण पूरी तरह भावुक और आत्मीय रहा। उपस्थित लोगों ने उनके साथ बिताए समय और उनके व्यक्तित्व से जुड़ी स्मृतियों को भी याद किया।
सभी ने उनके आदर्शों और विचारों को अपने जीवन में आत्मसात करने तथा नई पीढ़ी तक उनके शैक्षिक एवं सामाजिक मूल्यों को पहुंचाने का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि डॉ. दुबे की स्मृति को जीवित रखने का सबसे बेहतर माध्यम यही होगा कि उनके बताए रास्ते पर चलकर समाज में शिक्षा, संस्कार और सेवा की भावना को मजबूत किया जाए।
आयोजन समिति ने जताया आभार
कार्यक्रम के आयोजक लोकेश दुबे ने श्रद्धांजलि सभा में शामिल होने वाले सभी अतिथियों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शुभचिंतकों और क्षेत्र के गणमान्य लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि स्वर्गीय डॉ. राजकिशोर दुबे को याद करना केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उनके विचारों और जीवन-मूल्यों को आगे बढ़ाने का अवसर भी है।
उन्होंने कहा कि डॉ. दुबे ने अपने कर्मों से जो पहचान बनाई, वह उनके परिवार तक सीमित नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े अनेक लोग और उनके शिष्य आज भी उनके योगदान को सम्मान के साथ याद करते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित यह सभा उनके प्रति समाज की कृतज्ञता और सम्मान की अभिव्यक्ति है।
बड़ी संख्या में लोग रहे मौजूद
श्रद्धांजलि सभा में देव बंधु महाविद्यालय के प्रबंधक गंगेश्वर मणि तिवारी, महुआ पाटन इंटर कॉलेज के पूर्व प्राचार्य गोविंद त्रिपाठी, डॉ. अमित मणि, विजेंद्र पांडेय, अजय मिश्रा, सुशील मिश्रा, मानवेंद्र तिवारी, बालमुकुंद मिश्र, अंजू सिंह, अरुण पांडेय, विनय पांडेय, राजेश पांडेय, हेमंत तिवारी, अनिल मिश्रा, बृजेश दुबे, राममूर्ति सिंह, सत्येंद्र पांडेय, संजय मणि त्रिपाठी सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।
सभी ने स्वर्गीय डॉ. राजकिशोर दुबे को श्रद्धापूर्वक याद करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रतिबद्धता दोहराई। कार्यक्रम के अंत में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को नमन करते हुए उनकी स्मृतियों को सदैव जीवित रखने का संकल्प लिया गया।

























