17 अक्टूबर 2026 9:28 अपराह्न

जिद ऐसी कि सात साल के बेटे ने दिव्यांग पिता पर गड़ासे से कर दिया हमला, घटना ने झकझोर दिया

रिपोर्टर चुन्नीलाल प्रधान की तस्वीर के साथ गोंडा कोतवाली देहात थाना भवन और संवेदनशील पारिवारिक घटना पर आधारित फीचर इमेज।

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रिपोर्टर चुन्नीलाल प्रधान

गोंडा। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले से सामने आई एक घटना ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और खेल-कूद की दुनिया में खोए रहते हैं, उसी उम्र के एक सात वर्षीय बालक पर अपने ही दिव्यांग पिता पर गड़ासे से हमला करने का आरोप लगा है। बताया जा रहा है कि जम्मू जाने की जिद पूरी न होने से नाराज बच्चे ने खेत में आराम कर रहे पिता पर अचानक ताबड़तोड़ वार कर दिए। गंभीर रूप से घायल पिता को तत्काल मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहां उनका उपचार जारी है।

यह घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि बदलते पारिवारिक माहौल, बच्चों की मानसिक स्थिति और सामाजिक परिवेश पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

खेत में आराम कर रहे पिता पर अचानक हमला

जानकारी के अनुसार घटना देहात कोतवाली क्षेत्र के बेसियाचैन गांव की है। रविवार दोपहर दिव्यांग पिता खेत में आम के पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे। इसी दौरान उनका सात वर्षीय बेटा घर से गड़ासा लेकर वहां पहुंचा और बिना किसी चेतावनी के पिता पर लगातार वार करने लगा।

अचानक हुए हमले से घायल पिता की चीख-पुकार सुनकर आसपास खेतों में काम कर रहे ग्रामीण दौड़ पड़े। ग्रामीणों ने किसी तरह बच्चे के हाथ से गड़ासा छीना और घायल को तत्काल अस्पताल पहुंचाया। चिकित्सकों के अनुसार घायल के शरीर पर कई गंभीर चोटें आई हैं और उनका इलाज मेडिकल कॉलेज में चल रहा है।

जम्मू जाने की जिद बनी हमले की वजह

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि बच्चे के चाचा और चाची जम्मू में मजदूरी करते हैं। बच्चा भी उनके साथ जम्मू जाने की जिद कर रहा था। लेकिन पिता ने उसकी कम उम्र और सुरक्षा को देखते हुए उसे भेजने से इनकार कर दिया।

बताया जाता है कि पिता के मना करने के बाद बच्चा काफी नाराज हो गया था। इसी नाराजगी ने इतना खतरनाक रूप ले लिया कि उसने अपने ही पिता पर जानलेवा हमला कर दिया। हालांकि सात वर्ष की आयु में किसी बच्चे द्वारा इस तरह की हिंसक प्रतिक्रिया ने ग्रामीणों के साथ-साथ प्रशासन को भी हैरान कर दिया है।

मां के जाने के बाद पिता ने अकेले संभाली थी जिम्मेदारी

ग्रामीणों और परिजनों के अनुसार पीड़ित का पारिवारिक जीवन पहले से ही कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। करीब चार वर्ष पहले उनकी पत्नी दोनों बेटों को छोड़कर कहीं चली गई थी। उस समय छोटा बेटा मात्र तीन वर्ष का था।

पत्नी के चले जाने के बाद दिव्यांग पिता ने ही दोनों बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उठाई। आर्थिक और शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने बच्चों को अपने से अलग नहीं होने दिया। गांव के लोगों का कहना है कि पिता अपने दोनों बेटों की देखभाल पूरी लगन से करते थे। ऐसे में उसी बेटे द्वारा पिता पर हमला कर देना पूरे गांव के लिए अविश्वसनीय घटना बन गया।

ग्रामीण भी रह गए स्तब्ध

घटना के बाद गांव में सन्नाटा पसरा रहा। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इतना छोटा बच्चा इतनी गंभीर हिंसक हरकत कर सकता है। कई लोगों का मानना है कि बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलाव, मोबाइल और बाहरी वातावरण का असर भी गंभीरता से समझने की जरूरत है।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी कम उम्र के बच्चों के व्यवहार को केवल अपराध की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। यह उनके मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक वातावरण का भी परिणाम हो सकता है। ऐसे मामलों में मनोवैज्ञानिक परामर्श और परिवार की परिस्थितियों का मूल्यांकन भी महत्वपूर्ण होता है।

पुलिस ने शुरू की जांच

देहात कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक शमशेर बहादुर सिंह ने बताया कि घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी गई है। घायल का इलाज कराया जा रहा है तथा सभी पहलुओं की जांच के बाद नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

चूंकि घटना में शामिल बच्चा बेहद कम उम्र का है, इसलिए जांच के दौरान उसकी मानसिक स्थिति और पारिवारिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाएगा।

समाज के लिए बड़ा संदेश

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी भी है। बच्चों के मन में पैदा होने वाली जिद, गुस्सा और असंतोष यदि समय रहते समझा और संभाला न जाए तो उसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों के साथ संवाद, धैर्य और भावनात्मक जुड़ाव अत्यंत आवश्यक है। माता-पिता, अभिभावकों और समाज को यह समझना होगा कि छोटी-सी जिद कब मानसिक तनाव में बदल जाए और कब वह हिंसक व्यवहार का रूप ले ले, इसका अनुमान हमेशा आसान नहीं होता।

गोंडा की यह घटना कई सवाल छोड़ जाती है। एक दिव्यांग पिता, जिसने विपरीत परिस्थितियों में अपने बच्चों का पालन-पोषण किया, उसी पर उसके सात वर्षीय बेटे द्वारा किया गया हमला मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देता है। यह समय केवल घटना पर चर्चा करने का नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक विकास, पारिवारिक संवाद और सामाजिक जिम्मेदारी पर गंभीरता से विचार करने का भी है। उम्मीद है कि जांच के बाद पूरे मामले के सभी तथ्य सामने आएंगे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए समाज आवश्यक सीख लेगा।

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