150–200 वर्ष पुराना ऐतिहासिक खिरनी का पेड़ आंधी में धराशायी, 1850 में स्थापित संस्कृत महाविद्यालय की इमारत को भारी नुकसान

आजमगढ़ के श्री सांगवेद महाविद्यालय हनुमानगढ़ी में आंधी-तूफान से 150–200 वर्ष पुराना खिरनी का पेड़ गिरने के बाद क्षतिग्रस्त भवन और रिपोर्टर जगदंबा उपाध्याय।

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जगदंबा उपाध्याय की रिपोर्ट 

आजमगढ़ जनपद के अनंतपुरा कटरा स्थित श्री सांगवेद महाविद्यालय, हनुमानगढ़ी में प्रकृति का ऐसा कहर देखने को मिला, जिसने क्षेत्र की ऐतिहासिक और शैक्षणिक धरोहर को गहरा नुकसान पहुंचाया है। हाल ही में आए तेज आंधी-तूफान के दौरान परिसर में स्थित लगभग 150 से 200 वर्ष पुराना ऐतिहासिक खिरनी का विशाल वृक्ष अचानक धराशायी हो गया। पेड़ सीधे महाविद्यालय की इमारत पर गिर पड़ा, जिससे भवन के विभिन्न हिस्सों को गंभीर क्षति पहुंची है। इस घटना के बाद विद्यालय में नियमित पठन-पाठन पूरी तरह प्रभावित हो गया है और परिसर में कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों का प्रवेश भी जोखिम भरा माना जा रहा है।

ऐतिहासिक धरोहर रहा खिरनी का विशाल वृक्ष

महाविद्यालय परिसर में मौजूद यह खिरनी का पेड़ केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक माना जाता था। स्थानीय लोगों के अनुसार यह पेड़ करीब डेढ़ से दो सौ वर्ष पुराना था और कई पीढ़ियों का साक्षी रहा। वर्षों से यह विशाल वृक्ष विद्यार्थियों, शिक्षकों और आसपास के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ था।

तेज आंधी और तूफान के दौरान इसकी जड़ें कमजोर पड़ गईं और पूरा पेड़ अचानक विद्यालय भवन पर गिर गया। पेड़ का आकार अत्यधिक बड़ा होने के कारण भवन के कई हिस्सों को नुकसान पहुंचा है, जिससे परिसर में सुरक्षा संबंधी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है।

विद्यालय भवन को पहुंचा भारी नुकसान

पेड़ गिरने के कारण विद्यालय की छत, दीवारों और अन्य संरचनाओं को काफी क्षति हुई है। परिसर में कई स्थानों पर मलबा और पेड़ की विशाल शाखाएं फैली हुई हैं। इसके चलते विद्यालय परिसर में सामान्य आवागमन भी पूरी तरह बाधित हो गया है।

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विद्यालय प्रशासन का कहना है कि जब तक पेड़ को सुरक्षित तरीके से हटाकर भवन की तकनीकी जांच नहीं करा ली जाती, तब तक परिसर में कर्मचारियों और विद्यार्थियों का रहना सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

पठन-पाठन की व्यवस्था हुई प्रभावित

घटना के बाद महाविद्यालय में नियमित शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित हो गई हैं। कर्मचारियों के लिए भी कार्यालय में बैठकर कार्य करना जोखिमपूर्ण हो गया है। भवन की स्थिति को देखते हुए फिलहाल सामान्य शिक्षण कार्य संचालित करना संभव नहीं है।

विद्यालय प्रशासन ने सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए संबंधित अधिकारियों को पूरे मामले की जानकारी दे दी है। प्राचार्य द्वारा जिला विद्यालय निरीक्षक को लिखित सूचना भेजकर तत्काल निरीक्षण एवं आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने की मांग की गई है।

1850 में रखी गई थी महाविद्यालय की नींव

श्री सांगवेद महाविद्यालय का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना वर्ष 1850 में की गई थी। बाद में वर्ष 1929 में इसका विधिवत पंजीकरण कराया गया।

इसके पश्चात 1940-42 के दौरान महाविद्यालय को आचार्य स्तर तक की मान्यता प्राप्त हुई, जिसके बाद यह संस्थान निरंतर संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। वर्षों से यहां हजारों विद्यार्थियों ने शिक्षा प्राप्त कर विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है। कई पूर्व छात्र आज विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों में उच्च पदों पर कार्यरत हैं।

आज भी संचालित हो रहा है संस्कृत शिक्षा का केंद्र

इतिहास और परंपरा से जुड़े इस महाविद्यालय में आज भी नियमित रूप से संस्कृत शिक्षा का संचालन किया जाता है। वर्तमान में यहां पांच कर्मचारी कार्यरत हैं, जो संस्थान की शैक्षणिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था संभाल रहे हैं।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि यह विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में भवन को हुए नुकसान की शीघ्र मरम्मत और परिसर को सुरक्षित बनाना आवश्यक है, ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित न हो।

परिसर में प्रवेश करना फिलहाल खतरे से खाली नहीं

पेड़ गिरने के बाद विद्यालय परिसर का बड़ा हिस्सा अवरुद्ध हो गया है। विशाल तना और फैली हुई शाखाओं के कारण मुख्य मार्ग भी प्रभावित हुआ है। भवन की क्षतिग्रस्त स्थिति को देखते हुए कर्मचारियों और स्थानीय लोगों को फिलहाल परिसर में अनावश्यक प्रवेश न करने की सलाह दी जा रही है।

विद्यालय प्रशासन ने संबंधित विभागों से जल्द से जल्द पेड़ हटाने, भवन का निरीक्षण कराने और आवश्यक मरम्मत कार्य शुरू कराने की मांग की है ताकि विद्यालय में पुनः सामान्य शैक्षणिक गतिविधियां शुरू हो सकें।

प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की उम्मीद

स्थानीय नागरिकों और शिक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि ऐतिहासिक महत्व रखने वाले इस संस्कृत महाविद्यालय की सुरक्षा और संरक्षण के लिए प्रशासन को प्राथमिकता के आधार पर कदम उठाने चाहिए। भवन की तकनीकी जांच, क्षति का आकलन, पेड़ हटाने की व्यवस्था तथा आवश्यक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराकर जल्द से जल्द पठन-पाठन बहाल किया जाना आवश्यक है।

इस घटना ने एक ओर जहां क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर रहे खिरनी के विशाल वृक्ष को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया, वहीं दूसरी ओर लगभग डेढ़ शताब्दी से अधिक पुराने इस प्रतिष्ठित संस्कृत महाविद्यालय के सामने भी गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। अब सभी की निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं कि कब परिसर को सुरक्षित बनाकर विद्यार्थियों के लिए फिर से शिक्षा के द्वार खोले जाएंगे।

यायावर
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Author: यायावर

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