पनगोत्रा की चिट्ठी – चौथा अंक ; क्या मर्द को दर्द नहीं होता? मर्दानगी की घातक जकड़न में पुरुष
समाज में पुरुषों को अक्सर शक्ति, धैर्य और कठोरता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन क्या यह अपेक्षा उनके भीतर पल रहे दर्द, तनाव और भावनात्मक संघर्ष को अनदेखा नहीं कर देती? जनगणदूत के साप्ताहिक स्तंभ “पनगोत्रा की चिट्ठी” के चौथे अंक में वरिष्ठ लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा इसी संवेदनशील विषय को उठाते हैं। यह लेख किसी एक वर्ग के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि समाज द्वारा गढ़ी गई उन धारणाओं पर विचार करने का आग्रह करता है जो पुरुषों और महिलाओं—दोनों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। लेखक की मूल भावना और दृष्टिकोण को बिना किसी परिवर्तन के, केवल डिजिटल प्रकाशन और SEO के अनुरूप प्रस्तुत किया जा रहा है।-संपादक
लेखक : केवल कृष्ण पनगोत्रा (जम्मू-कश्मीर)
प्रिय पाठकों,
हरिशंकर परसाई ने कहा है—
“पुरुष रोता नहीं है, पर जब वह रोता है तो रोम-रोम से रोता है। उसकी व्यथा पत्थर में दरार कर सकती है।”
मैं सोचता हूँ कि आखिर पुरुष को रोना क्यों नहीं चाहिए? क्या उसकी काया हाड़-मांस के बजाय फौलाद की बनी है? बड़े-बड़े वली रोए हैं। भीष्म पितामह रोए हैं, रघुवंशी दशरथ रोए हैं। जो रोता नहीं, वह मर्द भी नहीं। फिर भी समाज कहता है—“आखिर मर्द हो, रोते क्यों हो?”
क्या सचमुच मर्द को दर्द नहीं होता?
सामाजिक मान्यताओं ने पुरुष के लिए कुछ निश्चित प्रतिमान बना दिए हैं। यदि वह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाए और उसकी आँखों से आँसू निकल आएँ, तो अक्सर उसे यह कहकर टोका जाता है—“मर्द होकर औरतों की तरह आँसू बहा रहे हो?”
निस्संदेह प्रकृति ने पुरुष को शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली बनाया है, लेकिन मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दृष्टि से वह भी उतना ही संवेदनशील है। उसे भी पीड़ा होती है, उसे भी टूटन महसूस होती है।
यदि पुरुषों में आत्महत्या की बात करें तो अक्सर इसके पीछे निराशा, अवसाद, द्विध्रुवीय विकार, मानसिक रोग, शराब या नशे की लत जैसे कारण गिनाए जाते हैं। इसके अलावा आर्थिक संकट, पारिवारिक तनाव और वैवाहिक संबंधों में उत्पन्न समस्याएँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पिछले दिनों एक युवा न्यायाधीश अमन कुमार शर्मा की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। उपलब्ध समाचारों के अनुसार, इस दुखद घटना के पीछे घरेलू कलह, वैवाहिक विवाद और गंभीर मानसिक तनाव जैसे पहलुओं की जाँच की जा रही है। उनके पिता ने उनकी पत्नी और साली पर मानसिक प्रताड़ना तथा आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, घटना वाली रात परिवार में तीखी बहस और तनावपूर्ण माहौल था। यह मामला फिलहाल जाँच के अधीन है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष संबंधित एजेंसियों की जाँच के बाद ही स्पष्ट होंगे।
समाचारों के अनुसार, पिछले कुछ समय से वे वैवाहिक विवाद के कारण अत्यधिक मानसिक तनाव और अवसाद से गुजर रहे थे।
निस्संदेह आत्महत्या केवल पुरुष ही नहीं, महिलाएँ भी करती हैं। महिलाओं में गंभीर अवसाद आत्महत्या का एक बड़ा कारण माना जाता है। एक डेनिश अध्ययन के अनुसार महिलाओं में गंभीर अवसाद की दर पुरुषों की तुलना में अधिक पाई गई है और अनेक आत्महत्याओं से इसका संबंध भी देखा गया है। फिर भी आँकड़े बताते हैं कि आत्महत्या की घटनाओं में पुरुषों की संख्या अधिक है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की वर्ष 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 30 से 45 वर्ष आयु वर्ग में आत्महत्या के मामले सबसे अधिक दर्ज हुए। महिलाओं की तुलना में लगभग तीन गुना पुरुषों ने आत्महत्या की। वैश्विक स्तर पर भी अधिकांश देशों में पुरुषों की आत्महत्या दर महिलाओं से कहीं अधिक दर्ज की गई है। एक सामान्य उदाहरण देखिए।
यदि किसी परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए, तो घर के वरिष्ठ पुरुष से अक्सर कहा जाता है—“यदि आप रोने लगेंगे तो बाकी परिवार को कौन संभालेगा?”
यहीं से उसके कंधों पर केवल जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि भावनाओं को दबाने का बोझ भी लाद दिया जाता है। महिलाएँ खुलकर रो लेती हैं, लेकिन पुरुष अपनी पीड़ा भीतर ही भीतर दबाता रहता है। यही दबाव धीरे-धीरे मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की समस्याओं का कारण बन सकता है।
समाज की सामान्य धारणा यह रही है कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक भावुक और संवेदनशील होती हैं, जबकि पुरुष मजबूत और स्थिर होते हैं। किंतु बदलते सामाजिक परिदृश्य में अनेक घटनाएँ हमारी स्थापित धारणाओं को चुनौती देती दिखाई देती हैं—प्रेम संबंधों के चलते पति की हत्या, मंगेतर की हत्या, पारिवारिक विवादों में हिंसा अथवा अन्य आपराधिक घटनाएँ समय-समय पर समाचारों में सामने आती रहती हैं। ऐसे उदाहरण यह संकेत देते हैं कि जटिल मानवीय व्यवहार को केवल स्त्री या पुरुष की भावनात्मक प्रकृति के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
सदियों से सामाजिक और सांस्कृतिक सोच ने पुरुष को शक्तिशाली, पीड़ाविहीन और कभी-कभी क्रूर तक मान लिया। इस सोच ने उससे अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का अधिकार ही छीन लिया। परिणामस्वरूप पुरुष को ऐसा मनुष्य मान लिया गया जिसे दर्द, हार और निराशा को चुपचाप सहना चाहिए। यानी पुरुष को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी पीड़ा छिपाने के लिए मजबूर किया जाता है।
शायद इसी कारण दुनिया भर में अब यह समझ विकसित हो रही है कि पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीरता से विचार किया जाए। सामाजिक और सांस्कृतिक रूढ़ियों के कारण उनकी भावनात्मक आवश्यकताओं की लगातार अनदेखी होती रही है। तनाव, हताशा और अकेलेपन के बीच कई पुरुष अंततः आत्महत्या जैसा कठोर निर्णय लेने तक पहुँच जाते हैं।
दरअसल, पुरुष वर्ग कई बार ‘मर्दानगी’ की उसी घातक जकड़न में कैद हो जाता है जिसे समाज उसकी पहचान मानता है। विभिन्न शोध और आँकड़े भी इस ओर संकेत करते हैं।
वैश्विक आँकड़ों के अनुसार पुरुषों में आत्महत्या का अनुपात महिलाओं की तुलना में अधिक है। भारत में भी उपलब्ध आँकड़े इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार भारत में महिलाओं की आत्महत्या दर लगभग 16.4 प्रति एक लाख तथा पुरुषों की 25.8 प्रति एक लाख दर्ज की गई है।
समाजशास्त्री रॉब व्हिटली अपनी पुस्तक “Men’s Issues and Men’s Health: An Introductory Primer” में लिखते हैं—
“यदि पुरुष, पुरुषत्व की घातक जकड़न से मुक्त नहीं होंगे, तो उनके लिए मानसिक स्वास्थ्य एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगा।”
सकारात्मक बात यह है कि अब दुनिया के कई हिस्सों में पुरुषों की भावनात्मक जरूरतों को समझने के प्रयास शुरू हो चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया में “Men’s Table” जैसी पहल इसी सोच के साथ शुरू की गई कि पुरुषों को भी बिना झिझक अपनी भावनाएँ साझा करने का अवसर मिलना चाहिए। उन पर यह रूढ़िवादी अपेक्षा नहीं थोपी जानी चाहिए कि वे दर्द से परे, भावनाशून्य और हमेशा मजबूत बने रहें।
आखिर पुरुष के आँसुओं को “मर्दानगी” का ताना देकर रोक देना और उसकी भावनात्मक अभिव्यक्ति का अधिकार छीन लेना क्या मानवता है?
क्या सचमुच मर्द को दर्द नहीं होता?
अगले हफ्ते फिर मिलेंगे।
आपका,
केवल कृष्ण पनगोत्रा
(जम्मू-कश्मीर)
अस्वीकरण: यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है। इसमें उल्लिखित घटनाओं और उदाहरणों का उद्देश्य सामाजिक विमर्श को आगे बढ़ाना है। किसी भी प्रकरण में कानूनी स्थिति संबंधित जाँच और न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार ही अंतिम मानी जाएगी।









“केवल कृष्ण पनगोत्रा का यह लेख समाज के उस पक्ष को सामने लाता है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। एक चिकित्सक के रूप में मेरा मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य स्त्री और पुरुष—दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। पुरुषों से हर परिस्थिति में मजबूत बने रहने की अपेक्षा कई बार उन्हें अपनी भावनाएँ व्यक्त करने से रोक देती है, जिसका प्रभाव उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। यह लेख किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करता, बल्कि संवेदनशील संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यदि परिवार और समाज पुरुषों तथा महिलाओं—दोनों की भावनाओं को समान सम्मान दें, तो अनेक मानसिक तनावों और दुखद घटनाओं को रोका जा सकता है। यह विचारोत्तेजक लेख पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।”
“‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का यह अंक एक ऐसे सामाजिक विषय को केंद्र में लाता है, जिस पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए मैंने देखा है कि पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक दबावों का प्रभाव पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहराई से पड़ता है, लेकिन वे अक्सर अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर पाते। लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा ने संवेदनशीलता और संतुलन के साथ इस मौन पीड़ा को शब्द दिए हैं। यह लेख किसी पक्ष का समर्थन या विरोध नहीं करता, बल्कि समाज से आग्रह करता है कि मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक अभिव्यक्ति को स्त्री-पुरुष के भेद से ऊपर उठकर देखा जाए। मेरा मानना है कि ऐसा चिंतन समाज में अधिक संवाद, सहानुभूति और पारिवारिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देगा।”
“जनगणदूत में प्रकाशित ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का चौथा अंक पढ़कर लगा कि यह केवल एक लेख नहीं, बल्कि समाज के सामने रखा गया एक गंभीर प्रश्न है। लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा ने पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक अभिव्यक्ति जैसे संवेदनशील विषय को तथ्य, अनुभव और मानवीय दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया है। लेखन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहज भाषा, तार्किक प्रवाह और पाठक को अंत तक बाँधे रखने वाली शैली है।
प्रस्तुति की दृष्टि से शीर्षक, उपशीर्षक, फीचर इमेज और समग्र लेआउट विषय की गंभीरता के अनुरूप प्रभावशाली हैं। डिजिटल माध्यम के अनुरूप इसका संयोजन इसे और अधिक आकर्षक तथा पठनीय बनाता है।
संपादन की दृष्टि से भी यह अंक संतुलित दिखाई देता है। संपादकीय टिप्पणी पाठक को विषय की पृष्ठभूमि समझाती है, वहीं लेखक की मूल भावना को बिना प्रभावित किए लेख को व्यवस्थित, पठनीय और समसामयिक स्वरूप दिया गया है।
एक शिक्षिका होने के नाते मेरा मानना है कि ऐसे लेख विद्यालयों, महाविद्यालयों और परिवारों में संवाद का विषय बनने चाहिए। समाज तभी संवेदनशील बनेगा, जब हम स्त्री और पुरुष—दोनों की भावनाओं को समान सम्मान देना सीखेंगे।
‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का यह अंक लेखन, संपादन और प्रस्तुति—तीनों स्तरों पर एक गंभीर एवं प्रशंसनीय प्रयास है।”
सम्माननीय डॉ. निर्मला पुरोहित जी एवं सुरेंद्र कौशल जी,
सादर नमस्कार!
स्तंभ ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ भाग -४ पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक धन्यवाद। आशा है आप आने वाले अंकों को भी पढ़ेंगे।
केवल कृष्ण पनगोत्रा जम्मू-कश्मीर