जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस की तेज़ होती मुहिम और संसाधनों के दोहन पर उठते सवाल
क्या धारा 370 हटने के बाद बदल गया जम्मू-कश्मीर का सामाजिक और आर्थिक चरित्र?
लेखक : केवल कृष्ण पनगोत्रा
जम्मू-कश्मीर की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार द्वारा पांच अगस्त 2019 को धारा 370 और 35-ए को समाप्त किए जाने के बाद से जिस प्रकार की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां बनी हैं, वे अब खुलकर जनभावनाओं का हिस्सा बनने लगी हैं। यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी ने भी केंद्र सरकार के विरुद्ध अपने अभियान को तेज़ करना शुरू कर दिया है।
हाल ही में कठुआ जिले में आयोजित कांग्रेस की पदयात्रा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि वह जम्मू-कश्मीर के भीतर पनप रही बेचैनी, असंतोष और संसाधनों को लेकर गहराते आक्रोश की अभिव्यक्ति भी थी। इस पदयात्रा के दौरान एक प्रदर्शनकारी का यह कहना कि “हमारा रेत ले गए, हमारे पत्थर ले गए, हमारी मिट्टी के टीले ले गए यानी सब कुछ ले गए” केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि यह उस पीड़ा का प्रतीक बनकर सामने आया, जिसे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के अनेक लोग महसूस कर रहे हैं।
बाहरी राज्यों के लोगों के लिए यह कथन सामान्य प्रतीत हो सकता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के आम नागरिकों के लिए यह उनकी जमीन, संसाधनों और पहचान से जुड़े गहरे संकट का संकेत है।
कठुआ से उठी आवाज़
कांग्रेस नेता बंसी लाल कांडले के नेतृत्व में आयोजित यह पदयात्रा कठुआ जिले के चडवाल कस्बे से आरंभ हुई। यह इलाका पठानकोट-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है और रणनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पदयात्रा कई गांवों और सीमावर्ती क्षेत्रों से होकर गुज़री।
कार्यक्रम में शामिल कांग्रेस नेताओं ने जनता से संवाद करते हुए जिन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, उनमें जम्मू-कश्मीर को पुनः राज्य का दर्जा देने की मांग, बेरोजगारी, महंगाई, रसोई गैस की होम डिलीवरी तथा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन जैसे विषय प्रमुख रहे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अब जम्मू-कश्मीर में भाजपा के विरुद्ध एक व्यापक जनमत तैयार करने की कोशिश कर रही है। यही कारण है कि पार्टी लगातार धरना, प्रदर्शन और पदयात्राओं के माध्यम से जनता के बीच पहुंचने का प्रयास कर रही है।
धारा 370 हटने के बाद बदला परिदृश्य
पांच अगस्त 2019 भारतीय संघीय राजनीति का एक ऐतिहासिक दिन था। इसी दिन संसद ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 और 35-ए को समाप्त करने का निर्णय लिया। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित कर दिया गया।
केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय एकता और विकास की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। भाजपा का तर्क था कि धारा 370 जम्मू-कश्मीर के विकास में बाधा बन चुकी थी और इसे हटाने के बाद क्षेत्र में निवेश, रोजगार और विकास के नए अवसर पैदा होंगे।
लेकिन दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर के अनेक राजनीतिक दलों और स्थानीय नागरिकों का एक बड़ा वर्ग इस फैसले को अलग दृष्टि से देखता है। उनका मानना है कि इस निर्णय के बाद स्थानीय लोगों का अपने संसाधनों और अधिकारों पर नियंत्रण कमज़ोर हुआ है।
प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ती चिंता
जम्मू-कश्मीर सदियों से प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र रहा है। यहां के पहाड़, नदियां, जंगल और खनिज इस क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ माने जाते हैं। धारा 370 हटने के बाद स्थानीय लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हुई है कि अब बाहरी कंपनियों और ठेकेदारों को यहां के संसाधनों तक अधिक पहुंच मिल गई है। खासतौर पर रेत, बजरी, पत्थर और खनिजों के खनन को लेकर व्यापक असंतोष देखने को मिलता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि पहले घरेलू निर्माण कार्यों के लिए उन्हें बहुत कम कीमत पर स्थानीय स्तर पर रेत और पत्थर उपलब्ध हो जाते थे। मामूली रॉयल्टी देकर वे अपने घरों की मरम्मत या निर्माण का कार्य कर लेते थे। लेकिन अब वही सामग्री उन्हें कई गुना अधिक कीमत पर खरीदनी पड़ रही है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियों ने न केवल पर्यावरण को प्रभावित किया है, बल्कि आम आदमी की पहुंच भी संसाधनों तक सीमित कर दी है।
जनता की पीड़ा बनाम राजनीतिक विमर्श
यह कहना गलत नहीं होगा कि जम्मू-कश्मीर में धारा 370 का मुद्दा केवल संवैधानिक बहस तक सीमित नहीं रहा। यह अब आम आदमी के जीवन, रोजगार, संसाधनों और पहचान से जुड़ा विषय बन चुका है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसी भावनात्मक और सामाजिक असंतोष को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भाजपा सरकार ने विकास के बड़े-बड़े दावे किए, लेकिन जमीनी स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई और संसाधनों की कमी बढ़ी है।
हालांकि भाजपा इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करती है। पार्टी का दावा है कि जम्मू-कश्मीर में अब विकास की नई धारा बह रही है, पर्यटन बढ़ा है, निवेश आया है और आतंकवाद में कमी आई है। लेकिन वास्तविकता यह भी है कि जम्मू-कश्मीर की राजनीति अभी भी संक्रमण के दौर से गुजर रही है। यहां जनता का एक बड़ा वर्ग अभी भी अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर संवेदनशील है।
शेख अब्दुल्ला का सपना और वर्तमान हालात
जम्मू-कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री और बाद में मुख्यमंत्री रहे शेख मोहम्मद अब्दुल्ला इस क्षेत्र को “भारत का स्विट्जरलैंड” बनाना चाहते थे। उनका मानना था कि प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन क्षमता के बल पर जम्मू-कश्मीर दुनिया के सबसे समृद्ध पर्यटन क्षेत्रों में शामिल हो सकता है।
उनकी सोच केवल कश्मीर घाटी तक सीमित नहीं थी। जम्मू क्षेत्र और लद्दाख की संभावनाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण थीं। हालांकि आलोचक यह भी कहते हैं कि बाद के दशकों में जम्मू क्षेत्र के पर्यटन विकास को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की सरकारों पर भी यह आरोप लगता रहा कि उन्होंने जम्मू क्षेत्र की संभावनाओं का पर्याप्त उपयोग नहीं किया।
फिर भी यह सच है कि जम्मू-कश्मीर आज भी पर्यटन, बागवानी, कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर आर्थिक रूप से अत्यंत सक्षम क्षेत्र बन सकता है—यदि विकास और संसाधनों के उपयोग में स्थानीय जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
कांग्रेस की रणनीति क्या है?
जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस फिलहाल एक बहुस्तरीय राजनीतिक रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। पार्टी केवल धारा 370 की बहाली की बात नहीं कर रही, बल्कि वह जनता के रोजमर्रा के मुद्दों को भी अपने आंदोलन का हिस्सा बना रही है।
स्टेटहुड यानी पूर्ण राज्य का दर्जा कांग्रेस की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। पार्टी लगातार यह आरोप लगा रही है कि केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित कर दिया है। इसके साथ-साथ बेरोजगारी भी बड़ा मुद्दा है। युवाओं में सरकारी नौकरियों की कमी और निजी निवेश के अपेक्षित स्तर तक न पहुंच पाने को लेकर निराशा है।
महंगाई और रसोई गैस की कीमतों को लेकर भी कांग्रेस लगातार केंद्र सरकार को घेर रही है। सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में गैस सिलेंडर की होम डिलीवरी की समस्या भी लोगों की नाराज़गी का कारण बनी हुई है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस अब केवल पारंपरिक राजनीतिक नारों तक सीमित नहीं रहना चाहती। वह स्थानीय असंतोष को सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से जोड़कर भाजपा के खिलाफ व्यापक माहौल बनाने की कोशिश कर रही है।
भाजपा की चुनौती
भाजपा के लिए जम्मू-कश्मीर हमेशा से राजनीतिक और वैचारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। धारा 370 हटाना भाजपा के सबसे बड़े वैचारिक एजेंडों में शामिल था। भाजपा यह मानती है कि इस फैसले ने जम्मू-कश्मीर को मुख्यधारा से जोड़ा और अलगाववाद की राजनीति को कमजोर किया। पार्टी यह भी दावा करती है कि अब यहां लोकतांत्रिक संस्थाएं अधिक मज़बूत हो रही हैं।
लेकिन कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के आंदोलनों से यह स्पष्ट है कि जमीन पर असंतोष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। विशेष रूप से प्राकृतिक संसाधनों और राज्य के दर्जे को लेकर जनता के भीतर सवाल बने हुए हैं। यही कारण है कि कांग्रेस जैसे दल इन मुद्दों को बार-बार उठा रहे हैं।
सीमावर्ती क्षेत्रों की अलग पीड़ा
भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांवों की समस्याएं हमेशा से अलग रही हैं। यहां रहने वाले लोग सुरक्षा चुनौतियों, सीमित सुविधाओं और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हैं। कांग्रेस की हालिया पदयात्रा भी ऐसे ही क्षेत्रों तक पहुंची। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी उन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, जहां जनता खुद को राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस करती है।
इन सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों की शिकायत है कि विकास योजनाओं की घोषणाएं तो बहुत होती हैं, लेकिन उनका लाभ वास्तविक रूप से जमीन तक नहीं पहुंच पाता।
क्या बदलेगा राजनीतिक समीकरण?
जम्मू-कश्मीर की राजनीति लंबे समय से अस्थिरता और बदलाव के दौर से गुजर रही है। नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार नए स्वरूप लेती रही है।
अब कांग्रेस जिस प्रकार लगातार आंदोलनों और जनसंपर्क अभियानों के माध्यम से सक्रिय हो रही है, उससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि पार्टी आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगी।
हालांकि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि इससे भाजपा को कितना राजनीतिक नुकसान होगा, लेकिन इतना तय है कि राज्य का दर्जा, संसाधनों का दोहन और बेरोजगारी जैसे मुद्दे आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर की राजनीति के केंद्र में रहने वाले हैं।
जनता की उम्मीदें क्या हैं?
जम्मू-कश्मीर की आम जनता की सबसे बड़ी अपेक्षा शांति, सम्मान और स्थायी विकास है। लोग चाहते हैं कि उन्हें अपने संसाधनों पर न्यायसंगत अधिकार मिले, युवाओं को रोजगार मिले और लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत हो।
राजनीतिक दल चाहे किसी भी विचारधारा के हों, लेकिन यदि वे जनता की इन मूलभूत अपेक्षाओं को समझने में असफल रहते हैं तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
कांग्रेस की पदयात्रा ने कम से कम इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक बहस अब केवल सुरक्षा और राष्ट्रवाद तक सीमित नहीं रहेगी। अब रोजगार, संसाधन, पर्यावरण, राज्य का दर्जा और आम नागरिक की जिंदगी भी उतने ही महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे बन चुके हैं।
कठुआ में कांग्रेस की पदयात्रा और उसमें उठी आवाज़ें जम्मू-कश्मीर की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक मनःस्थिति को समझने का महत्वपूर्ण संकेत देती हैं। “हमारा रेत ले गए, हमारे पत्थर ले गए, हमारी मिट्टी के टीले ले गए” जैसे वाक्य केवल नाराजगी नहीं, बल्कि उस गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति हैं, जो स्थानीय जनता के एक वर्ग के भीतर धीरे-धीरे आकार ले रहा है।
धारा 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में बदलाव तो निश्चित रूप से आए हैं, लेकिन इन बदलावों को लेकर जनता की राय एक समान नहीं है। जहां भाजपा इसे विकास और एकीकरण का ऐतिहासिक कदम मानती है, वहीं विपक्ष और स्थानीय नागरिकों का एक बड़ा वर्ग इसे संसाधनों और अधिकारों के ह्रास के रूप में देख रहा है।
आने वाले समय में यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं रहेगा, बल्कि यह पहचान, संसाधनों और अधिकारों की बहस के रूप में और अधिक गहराई से सामने आ सकता है। जम्मू-कश्मीर की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां जनता की आवाज़ और स्थानीय मुद्दे फिर से केंद्र में लौटते दिखाई दे रहे हैं।








