सजण बिन रातां होइयां लंमियां : जब साजन के बिना रातें सचमुच लंबी हो जाती हैं

लेखक अनिल अनूप की तस्वीर के साथ ‘सजण बिन रातां होइयां लंमियां’ और ‘गीतों की साहित्यिक यात्रा’ अंक 13 की साहित्यिक फीचर इमेज

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गीतों की साहित्यिक यात्रा — अंक 13

लेख — अनिल अनूप
प्रस्तुति : अंजनी कुमार त्रिपाठी

कभी-कभी रात की घड़ी की सुइयों से नहीं, इंतज़ार की मापी हो जाती है। घड़ी की गणना दस मिनट की दूरी, आधा घंटा बीता, एक घंटा बीता की होती है, लेकिन घड़ी का मन ऐसा लगता है कि पूरी रात चली गई। जिस रात कोई अपना पास हो, वही रात हंसी, बातचीत और अपनत्व में कब चली जाती है, पता नहीं चलता। लेकिन जब वो अपना दूर हो जाए, जब उसकी आवाज न दे, जब आंख के दरवाजे की अठन्नी मांगती रहे और किसी के संदेश में अटका रहे, तब रात अचानक लंबी हो जाती है। पंजाबी सूफी काव्य की अत्यंत मार्मिक पंक्ति ‘सजन बिन रातां हो लाइजन लमियां’ इसी अनुभव को अपने में समेटे हुए है। साजन के बिना रातें लंबी हो गईं – यह केवल विवाह की याचिका नहीं है, बल्कि प्रेम के उस गहरे अनुभव की अभिव्यक्ति है जिसमें अनुपस्थित समय का अर्थ ही बदल जाता है।

‘गीतों की शास्त्रीय यात्रा’ के इस 13 वें अंक में हम इसी एक भाव की यात्रा पर निकल रहे हैं। हमारा केंद्र कोई दूसरा लोकप्रिय वाक्य या पूरा कलाम नहीं है, बल्कि वह भावना है जो ‘सजन बिन रातां हो साथी लामियां’ में धड़कती है। यहां केवल रात ही नहीं है, साजन केवल कोई व्यक्ति नहीं है और लंबाई केवल समय की लंबाई नहीं है। इन तीनों के पीछे प्रेम, श्रद्धा, स्मृति, विरह और उठती उस कमी का संसार है, जिसे मनुष्य ने शायद ही प्रेम करना, सीखने के साथ ही महसूस करना शुरू कर दिया था।

‘साजन बिन’ में छिपा है पूरा विरह

‘सजन बिन’ यानी साजन के बिना। सुनने में ये सिर्फ दो शब्द हैं, मगर साहित्य में कभी-कभी दो शब्द ही पूरे संसार रच देते हैं। यहां साजन की अनुपस्थिति को किसी भी लंबे विवरण की आवश्यकता नहीं है। वह सामने नहीं है, इसलिए रात भर लंबी है। उसके पास नहीं है, इसलिए नींद अधूरी है। उसने इरादा नहीं दिया, इंटरनेट इंजीनियरिंग की अधिकांश स्वामित्व वाली दुकानें हैं। वह इसमें दिखाई नहीं देता है, इसलिए उसकी याद में हर चीज़ दिखाई देती है।

प्रेम में किसी व्यक्ति की मित्रता धीरे-धीरे हमारे जीवन की लय का हिस्सा बन जाती है। उसकी आवाज, उसके साथ बातचीत, उसका इंतजार, उसकी मुस्कुराहट, उसकी रूठना- सब कुछ हमारी दोस्ती की ज़िंदगी में चलता है। फिर एक दिन एक व्यक्ति दूर हो जाए तो केवल एक व्यक्ति दूर नहीं होता, हमारी विशिष्टता का एक हिस्सा भी गायब हो जाता है। इसी तरह के अधूरे हिस्से को रात सबसे ज्यादा महसूस होता है।

दिन में दुनिया में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिनसे मन को कुछ देर के लिए भटकाया जा सकता है। काम है, लोग हैं, आवाज़ें हैं, बाज़ार है, सड़क है, मोबाइल है, बातचीत है। लेकिन रात इन सबके बीच धीरे-धीरे-धीरा पीछे चला जाता है। जब चारों ओर से संदिग्ध उतरता है तो मन अपने सबसे करीब आ जाता है। और अगर मन में किसी की कमी हो, तो रात को उस कमी को कई गुना बड़ा कर दीजिए।

रात छोटी नहीं होती, इंतज़ार बड़ा हो जाता है

‘सजन बिन रातां हो अन्य लंमियां’ का सबसे पवित्र शास्त्री पक्ष यही है कि इसमें रात की लंबाई का कारण रात नहीं है, इंतजार करें। प्रकृति की दृष्टि से रात जितनी थी, वैसी ही रहती है। सूरज एक ही समय डूबता है, चाँद अपने समय पर नक्षत्र है और सुबह भी अपने समय पर आती है। लेकिन प्रेमी के लिए समय की गणना बदल दी जाती है।

जिस शख्स का इंतजार होता है, उसका एक-एक अहम हिस्सा होता है। दरवाजे पर हवा से हुई आवाज भी कुछ क्षणों के लिए उम्मीद जगाती है। मोबाइल की स्क्रीन चमकती है तो दिल एक पल को लगता है कि शायद मैसेज आया होगा। दूर से किसी वाहन की आवाज उठाई गई दुकान है तो मन अनायास अनुमान लगाया जाता है। छोटी सी संभावना में भी बड़ी आशा बन जाती है।

इसीलिए कहा जा सकता है कि रात लंबी नहीं होती, इंतजार लंबा हो जाता है। समय अपनी गति से चलता रहता है, लेकिन मन अपनी गति से। घड़ी के लिए एक घंटा केवल एक घंटा है, मगर प्रतीक्षा कर रहे व्यक्ति के लिए वही एक घंटा कई सवालों, कई स्मृतियों और कई उम्मीदों से भरा हुआ हो सकता है।

‘रातां जो गिण-गिण के’ और प्रतीक्षा की पीड़ा

इस भाव को आगे बढ़ाने वाली पंक्ति ‘रातां जो गिण-गिण के’ विरह को और गहरा कर देती है। रातों को गिनना केवल कैलेंडर के दिन गिनना नहीं है। यह दरअसल बीतते समय के साथ बढ़ती प्रतीक्षा को गिनना है।

एक रात बीती तो लगा शायद अगली रात साजन आएगा। अगली रात भी बीत गई तो उम्मीद ने फिर अगले दिन का हाथ पकड़ लिया। इस तरह रातें बढ़ती जाती हैं और इंतजार भी। हर बीती रात अपने साथ एक अधूरी उम्मीद छोड़ जाती है। यही कारण है कि विरह का साहित्य केवल दुख का साहित्य नहीं है। उसमें उम्मीद की लौ भी लगातार जलती रहती है।

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अगर उम्मीद बिल्कुल समाप्त हो जाए तो इंतजार भी समाप्त हो जाता है। कोई उसी व्यक्ति की राह क्यों देखेगा जिसके लौटने की संभावना उसे बिल्कुल दिखाई नहीं देती? इसलिए विरह में छिपी पीड़ा के साथ एक अदृश्य आशा भी रहती है। यही आशा प्रेम को जीवित रखती है और रात को रात से कहीं अधिक बना देती है।

विरह: प्रेम का दूसरा चेहरा

प्रेम की चर्चा अक्सर मिलन के संदर्भ में होती है। प्रेमी मिले, साथ चले, साथ हंसे, साथ जीवन बिताया—इन दृश्यों में प्रेम आसानी से दिखाई देता है। लेकिन प्रेम की गहराई कई बार तब दिखाई देती है जब प्रिय सामने नहीं होता।

मिलन में व्यक्ति प्रिय को देख सकता है, उसकी आवाज सुन सकता है और उसकी उपस्थिति को महसूस कर सकता है। विरह में इन सबकी जगह स्मृति ले लेती है। यही स्मृति कभी सहारा देती है और कभी पीड़ा बढ़ाती है। किसी की हंसी याद आती है तो आंखें भर सकती हैं। किसी की कही छोटी-सी बात अचानक बहुत बड़ी लगने लगती है। साथ बिताया गया कोई सामान्य दिन स्मृति में जीवन का सबसे अनमोल दिन बन जाता है।

विरह इसलिए प्रेम का विरोध नहीं है। वह प्रेम का दूसरा चेहरा है। मिलन बताता है कि दो लोग साथ हैं, विरह बताता है कि एक व्यक्ति की अनुपस्थिति दूसरे के जीवन में कितनी बड़ी जगह बना चुकी है।

पंजाबी लोकजीवन में विरह की आवाज

पंजाबी लोकसाहित्य में प्रेम और विरह का रिश्ता बहुत पुराना और गहरा है। लोककथाओं और लोकगीतों में प्रेमी-प्रेमिका की दूरी, परदेश गए प्रिय की प्रतीक्षा, बिछड़ने की पीड़ा और लौटने की उम्मीद बार-बार दिखाई देती है।

पंजाब की प्रसिद्ध प्रेमकथाओं में भी दूरी केवल बाधा नहीं, कथा की आत्मा का हिस्सा बन जाती है। प्रेम जितना मिलन की ओर बढ़ता है, उतना ही परिस्थितियों से टकराता है। यही टकराव विरह को जन्म देता है और विरह गीत को।

लोकगीतों की शक्ति यह है कि वे जटिल भावनाओं को बहुत सरल शब्दों में कह देते हैं। किसी गांव की स्त्री अपने परदेश गए प्रिय को याद करती है तो उसका गीत साहित्य का गंभीर दस्तावेज बन जाता है। किसी मां को दूर गए बेटे की याद आती है तो उसकी पुकार लोक-स्मृति का हिस्सा बन जाती है। किसी प्रेमी को प्रिय की प्रतीक्षा होती है तो उसकी रात व्यक्तिगत दुख से निकलकर सामूहिक अनुभव बन जाती है।

रात साहित्य का इतना बड़ा प्रतीक क्यों है?

रात साहित्यकारों को हमेशा आकर्षित करती रही है। दिन में मनुष्य बाहरी दुनिया के साथ व्यस्त रहता है, लेकिन रात उसे अपने भीतर लौटाती है। अंधकार बाहर फैलता है तो भीतर की आवाजें अधिक स्पष्ट सुनाई देने लगती हैं।

विरह में रात की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। दिन किसी तरह बीत जाता है, लेकिन रात प्रश्न पूछती है। प्रिय कहां है? कब आएगा? क्या उसे भी मेरी याद आती होगी? क्या वह भी जाग रहा होगा? क्या वह लौटेगा? ऐसे प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर नहीं होता, इसलिए रात और लंबी लगती है।

इसीलिए भारतीय साहित्य में विरहिणी नायिका चंद्रमा से बात करती दिखाई देती है, तारों को गिनती है, हवा से संदेश भेजती है और रात को अपनी साथी बना लेती है। पंजाबी सूफी काव्य में भी रात इसी भावभूमि का हिस्सा बनती है।

जब साजन सांसारिक से रूहानी हो जाता है

‘सजण बिन रातां होइयां लंमियां’ को केवल सांसारिक प्रेम के स्तर पर पढ़ना भी पूरी तरह संभव है। लेकिन सूफी काव्य इसकी एक और गहराई सामने रखता है। सूफी परंपरा में ‘साजन’ या ‘प्रियतम’ कई बार परम सत्ता का प्रतीक बन जाता है। तब विरह केवल प्रेमी और प्रेमिका की दूरी नहीं रह जाता, बल्कि आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी का रूप ले लेता है।

मनुष्य अपने भीतर किसी पूर्णता की तलाश करता है। उसे लगता है कि कुछ है जो अभी मिला नहीं है। वह खोजता है, भटकता है, पुकारता है और अंततः अपने भीतर उतरने की कोशिश करता है। इस आध्यात्मिक बेचैनी को सूफी कवियों ने प्रेम की भाषा में व्यक्त किया।

इस अर्थ में लंबी रात आत्मा की प्रतीक्षा की रात हो सकती है। साजन वह परम प्रिय हो सकता है जिसकी तलाश में मन भटक रहा है। और ‘रातां जो गिण-गिण के’ साधना के उन क्षणों का प्रतीक बन सकता है जिनमें साधक अपने भीतर के अंधेरे से गुजरते हुए प्रकाश की तलाश करता है।

शाह हुसैन की सूफी परंपरा

पंजाबी सूफी कवि शाह हुसैन की काव्य परंपरा में प्रेम, विरह, फकीरी और रूहानी अनुभूति एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। उनकी भाषा में लोकजीवन की सहजता है, लेकिन भावों में आध्यात्मिक गहराई।

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यही सूफी कविता की खासियत है कि वह बड़े आध्यात्मिक प्रश्नों को आम आदमी की भाषा में कह देती है। कोई जटिल दार्शनिक शब्दावली नहीं, बल्कि प्रेमी की पुकार, विरहिणी की प्रतीक्षा, फकीर की राह और प्रियतम की तलाश। इसीलिए ऐसी कविता पढ़ते हुए हर व्यक्ति अपने अनुभव के अनुसार अर्थ खोज सकता है।

‘सजण बिन रातां होइयां लंमियां’ भी इसी कारण एक साथ कई संसारों में प्रवेश करती है। किसी के लिए यह बिछड़े प्रिय की याद है, किसी के लिए प्रेम की पीड़ा और किसी के लिए आत्मा की परम प्रिय की तलाश।

एक पंक्ति, अनेक अर्थ

साहित्य की सुंदरता तब सामने आती है जब एक ही पंक्ति अलग-अलग पाठकों के लिए अलग अर्थ खोलती है। ‘सजण बिन रातां होइयां लंमियां’ किसी ऐसे व्यक्ति को अपने अतीत में ले जा सकती है जिसने कभी किसी का इंतजार किया हो। किसी मां को दूर गए बेटे की याद आ सकती है। किसी पत्नी को परदेश गए पति की। किसी प्रेमी को बिछड़े प्रिय की। किसी साधक को ईश्वर की तलाश की।

यही इसकी सार्वभौमिकता है। यहां ‘साजन’ की पहचान तय नहीं की गई। इसलिए हर पाठक उसमें अपना साजन देख सकता है। साहित्य जब पाठक को अपनी कहानी उसमें खोजने की जगह देता है, तभी वह समय से आगे निकलता है।

आज के मोबाइल युग में भी क्यों जिंदा है यह विरह?

आज हमारे पास संचार के ऐसे साधन हैं जिनकी कल्पना पुराने समय का मनुष्य नहीं कर सकता था। संदेश कुछ सेकंड में पहुंच जाता है। वीडियो कॉल पर दूर बैठा व्यक्ति सामने दिखाई दे सकता है। फिर भी प्रतीक्षा खत्म नहीं हुई।

आज भी कोई संदेश का इंतजार करता है। कोई फोन आने की राह देखता है। कोई अस्पताल से मिलने वाली खबर के लिए रातभर जागता है। कोई विदेश गए अपने बच्चे की आवाज सुनने को बेचैन रहता है। कोई ऐसे व्यक्ति के लौटने की प्रतीक्षा करता है जो बहुत दूर चला गया है।

इससे पता चलता है कि तकनीक दूरी कम कर सकती है, लेकिन मन की दूरी और प्रतीक्षा को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती। इसी वजह से सदियों पुरानी विरह-पंक्ति आज भी हमारे भीतर अपनी जगह बना लेती है।

जब पास होकर भी कोई दूर हो

विरह केवल भौगोलिक दूरी का नाम नहीं है। कई बार व्यक्ति सामने बैठा होता है, लेकिन भावनाओं में बहुत दूर होता है। घर एक होता है, छत एक होती है, कमरे एक होते हैं, फिर भी मनों के बीच दूरी होती है।

ऐसी स्थिति में भी रात लंबी हो सकती है। क्योंकि रात की लंबाई इस बात पर निर्भर नहीं करती कि प्रिय कितने किलोमीटर दूर है। वह इस बात पर निर्भर करती है कि मन उसके कितना करीब या कितना दूर महसूस कर रहा है।

यही इस पंक्ति को और आधुनिक बना देता है। ‘सजण बिन’ का अर्थ केवल यह नहीं कि प्रिय दिखाई नहीं दे रहा। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि प्रिय का अपनापन महसूस नहीं हो रहा।

संगीत जब विरह को आवाज देता है

जब ऐसे सूफी कलाम को महान गायकों की आवाज मिलती है तो शब्दों में एक नया विस्तार पैदा होता है। नुसरत फतेह अली खान जैसे कलाकारों ने सूफी संगीत की परंपरा को व्यापक श्रोताओं तक पहुंचाया। उनकी गायकी में शब्द केवल बोले नहीं जाते, वे सुरों में फैलते हैं।

‘सजण बिन रातां होइयां लंमियां’ जैसी पंक्ति संगीत में दोहराई जाती है तो उसका प्रभाव बदल जाता है। एक बार कही गई बात कुछ क्षण में समाप्त हो सकती है, लेकिन जब वही बात सुरों में लौटती रहती है तो श्रोता उस भाव में ठहरने लगता है। संगीत उस लंबी रात को सुनने वाले के अनुभव में बदल देता है।

यहीं गीत और साहित्य का संबंध सामने आता है। साहित्य भाव को शब्द देता है और संगीत उस भाव को सांस देता है।

दोहराव में छिपी है प्रतीक्षा

सूफी संगीत में किसी पंक्ति का दोहराव महज संगीत की तकनीक नहीं है। कई बार वह भाव की तीव्रता को व्यक्त करता है। प्रेमी एक बार पुकारकर चुप नहीं हो जाता। वह फिर पुकारता है। फिर इंतजार करता है। फिर उसी नाम को दोहराता है।

विरह की यही प्रकृति है। मन एक ही स्मृति के पास बार-बार लौटता है। एक ही सवाल पूछता है। एक ही चेहरे को याद करता है। एक ही आवाज सुनना चाहता है। इसलिए गीत का दोहराव मन की उसी बेचैनी का संगीतात्मक रूप बन जाता है।

विरह केवल दुख नहीं, स्मृति भी है

विरह को केवल रोने या दुखी होने की अवस्था मानना उसके साहित्यिक अर्थ को छोटा कर देना होगा। विरह स्मृति का भी संसार है। प्रिय दूर है, इसलिए उसकी याद और अधिक स्पष्ट होती है।

कभी उसकी कही कोई बात याद आती है। कभी साथ चलने का रास्ता। कभी किसी मौसम में हुई मुलाकात। कभी कोई गीत। कभी कोई गंध। कभी कोई तस्वीर। स्मृति प्रिय को सामने नहीं ला सकती, लेकिन उसकी अनुपस्थिति को अर्थ दे देती है।

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इसलिए विरह में आंसू हैं तो मुस्कान भी है। दुख है तो सुंदर स्मृतियां भी हैं। यही मिश्रित भाव गीत को मनुष्य के इतना करीब ले आता है।

रात के बाद सुबह भी आती है

विरह की साहित्यिक यात्रा केवल अंधेरे में समाप्त नहीं होती। हर रात के बाद सुबह आती है। हर प्रतीक्षा का कोई न कोई अंत होता है—कभी मिलन के रूप में, कभी स्वीकार के रूप में और कभी स्मृति के रूप में।

कई बार प्रिय लौट आता है। कई बार नहीं लौटता। लेकिन प्रतीक्षा कर चुका मन वैसा नहीं रहता जैसा पहले था। उसने प्रेम की कीमत समझी होती है। उसने समय की चाल को महसूस किया होता है। उसने अपनी भावनाओं की गहराई देखी होती है। इसलिए विरह मनुष्य को तोड़ता ही नहीं, उसे भीतर से बदलता भी है।

इस पंक्ति की सबसे बड़ी साहित्यिक शक्ति

‘सजण बिन रातां होइयां लंमियां’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता है। इसमें कोई कठिन शब्द नहीं, लेकिन भाव बहुत गहरा है। यही लोक और सूफी साहित्य की ताकत रही है। वह बड़े सत्य को छोटी बात में कह देता है। रात लंबी हो गई। क्यों? क्योंकि साजन नहीं है।

बस, इतना कहकर कवि पाठक को उसके अपने अनुभव के हवाले कर देता है। इसके बाद हर पाठक अपनी रात, अपना इंतजार और अपना साजन इस पंक्ति में खोज सकता है।

रात की लंबाई का असली राज

शायद इस पूरे भाव को एक ही वाक्य में समझा जा सकता है—रात लंबी नहीं होती, इंतजार लंबा हो जाता है।

घड़ी की सुइयां अपनी गति से चलती रहती हैं। मगर प्रेमी का मन उन सुइयों के साथ नहीं चलता। वह कभी अतीत में चला जाता है, कभी भविष्य की कल्पना करता है और कभी वर्तमान की खामोशी में अटक जाता है।

साजन पास हो तो समय उड़ता है। साजन दूर हो तो समय रेंगता है। यही प्रेम का गणित है, जिसका कोई गणितज्ञ हिसाब नहीं लगा सकता।

गीत से साहित्य तक की यात्रा

‘गीतों की साहित्यिक यात्रा’ का उद्देश्य केवल लोकप्रिय गीतों की जानकारी देना नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपी अनुभूतियों को समझना है। इस अंक में ‘सजण बिन रातां होइयां लंमियां’ के बहाने हमने देखा कि एक छोटी-सी पंक्ति किस तरह प्रेम से विरह, विरह से प्रतीक्षा, प्रतीक्षा से स्मृति और स्मृति से रूहानी अनुभूति तक पहुंच जाती है।

यही साहित्य की यात्रा है। शब्द वही रहते हैं, लेकिन अर्थ यात्रा करते रहते हैं। एक पीढ़ी उन्हें प्रेम के रूप में पढ़ती है, दूसरी विरह के रूप में और तीसरी शायद आध्यात्मिक खोज के रूप में। लेकिन भाव की धड़कन बनी रहती है।

साजन के बिना लंबी रातों की कहानी

अंततः ‘सजण बिन रातां होइयां लंमियां’ किसी एक प्रेमी की कहानी नहीं है। यह उन तमाम लोगों की कहानी है जिन्होंने किसी का इंतजार किया है। यह उस मां की कहानी है जिसने बेटे के लौटने की राह देखी। यह उस प्रेमिका की कहानी है जिसने प्रिय की आवाज सुनने के लिए रात काटी। यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने किसी अपने को खो दिया और फिर भी उसकी याद के सहारे जीवन चलाया। और सूफी अर्थ में यह उस आत्मा की कहानी भी है जो अपने परम प्रिय की तलाश में भटकती रहती है।

शायद इसीलिए यह पंक्ति सुनते ही मन के भीतर कोई पुराना दरवाजा खुल जाता है। हमें कोई चेहरा याद आता है। कोई आवाज सुनाई देती है। कोई रास्ता दिखाई देता है। कोई अधूरी बातचीत याद आती है। और फिर महसूस होता है कि वह रात आज भी कहीं भीतर मौजूद है।

रात वही है, लेकिन समय बदल गया है। साजन शायद लौट आया हो, शायद नहीं आया हो। लेकिन प्रतीक्षा की स्मृति मन में रह जाती है। और यही साहित्य का चमत्कार है। वह बीत चुके समय को शब्दों के सहारे वर्तमान में वापस बुला लेता है।

‘सजण बिन रातां होइयां लंमियां’ इसलिए केवल एक गीत की पंक्ति नहीं, बल्कि प्रेम के उस शाश्वत सत्य की आवाज है जिसमें प्रिय की अनुपस्थिति समय को लंबा, खामोशी को गहरा और स्मृति को बेहद जीवंत बना देती है।

जब कोई अपना होता है तो हमें रात का पता नहीं चलता। जब उसकी अपनी दूरी होती है तो हर घड़ी उसकी याद बन जाती है। इसलिए संभवतः इस पूरे भाव का सबसे मौलिक निष्कर्ष यही है- रात की लंबाई घड़ी तय नहीं करती, दिल तय करता है।

और जिस दिल में साजन की कमी हो, उसका उदाहरण- ‘साजन बिन रातें हो साथी लमियां।’

लेख — अनिल अनूप
प्रस्तुति : अंजनी कुमार त्रिपाठी

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