लेखक अनिल अनूप
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गीत ऐसे हैं जिन्हें केवल गीत कहना उनके साथ अन्याय करना होगा। वे गीत संगीत की सीमा से निकलकर कविता में प्रवेश करते हैं, कविता से दर्शन की ओर जाते हैं और फिर धीरे-धीरे हमारी निजी स्मृतियों का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है—“हमने देखी है इन आँखों में महकती खुशबू…”। यह गीत पहली बार सुनने पर जितना सहज लगता है, उसके भीतर उतरने पर उतना ही गहरा, रहस्यमय और साहित्यिक दिखाई देता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें प्रेम को किसी परिभाषा में बंद करने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि उसे अनुभूति की तरह स्वीकार किया गया है।
गीतकार गुलज़ार की काव्य-दृष्टि का एक विशेष गुण यह है कि वे प्रेम को सीधे-सीधे बयान करने के बजाय उसके आसपास की चीजों को बोलने देते हैं। कहीं आँखें बोलती हैं, कहीं खुशबू, कहीं मौसम, कहीं चुप्पी और कहीं दो लोगों के बीच का वह मौन, जिसमें बहुत कुछ कहा जा चुका होता है। इस गीत में भी प्रेम को कोई भारी-भरकम दार्शनिक शब्द नहीं बनाया गया। उसे इतनी कोमलता से रखा गया है कि प्रेम अपने नाम से बड़ा और अपनी परिभाषा से मुक्त दिखाई देने लगता है।
“आँखों में महकती खुशबू”: एक असंभव-सा बिंब, जो भीतर जाकर बिल्कुल स्वाभाविक हो जाता है
इस गीत की सबसे पहली साहित्यिक चमत्कारिता इसी बिंब में है—आँखों में खुशबू का दिखाई देना। सामान्य जीवन में हम आँखों से देखते हैं और नाक से सुगंध महसूस करते हैं। दृष्टि और गंध दो अलग-अलग इंद्रिय अनुभव हैं। लेकिन कविता इन दोनों के बीच की दीवार तोड़ देती है। गुलज़ार आँखों को केवल देखने का माध्यम नहीं रहने देते; वे उन्हें ऐसी संवेदनशील जगह बना देते हैं जहाँ सुगंध भी दिखाई दे सकती है।
यहीं से गीत साधारण प्रेमगीत से आगे निकलकर साहित्य की भूमि पर खड़ा हो जाता है। साहित्य में जब अलग-अलग इंद्रियों के अनुभवों को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है, तो उसे व्यापक रूप से संवेदी मिश्रण या सिनेस्थीसिया की काव्यात्मक तकनीक के रूप में समझा जा सकता है। लेकिन इस गीत की सुंदरता यह है कि यह तकनीक किसी प्रदर्शन की तरह सामने नहीं आती। श्रोता यह सोचने नहीं बैठता कि “खुशबू दिखाई कैसे दे सकती है?” वह सीधे उस अनुभव में प्रवेश कर जाता है।
किसी प्रिय व्यक्ति की आँखों में देखकर सचमुच हमें कई बार ऐसी चीजें दिखाई देती हैं जिन्हें शब्दों में समझाना कठिन होता है। वहाँ अपनापन हो सकता है, संकोच हो सकता है, प्रतीक्षा हो सकती है, बेचैनी हो सकती है या प्रेम की वह हल्की चमक, जिसे केवल वही व्यक्ति पढ़ सकता है जो उस आँख को भीतर से जानता हो। इसलिए यहाँ “खुशबू” केवल सुगंध नहीं है। वह व्यक्ति की उपस्थिति का भावात्मक असर है।
प्रेम जब दिखाई नहीं देता, फिर भी दिखाई देता है
प्रेम का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वह भौतिक रूप से दिखाई नहीं देता, लेकिन उसके प्रभाव दिखाई देते हैं। कोई व्यक्ति किसी के आने से बदल जाता है। आवाज का स्वर बदल जाता है। चेहरे की चमक बदल जाती है। बातचीत में अनावश्यक ठहराव आने लगता है। आँखें किसी एक चेहरे को भीड़ में खोजने लगती हैं। यह सब प्रेम की भौतिक अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं, लेकिन प्रेम की उपस्थिति के संकेत जरूर हैं।
गुलज़ार इसी अदृश्य को दृश्य बनाने की कोशिश करते हैं। आँखों में “खुशबू” इसी अदृश्य भाव की दृश्य अभिव्यक्ति है। प्रिय की आँखों में देखने वाला व्यक्ति केवल आँखें नहीं देख रहा; वह उनके भीतर छिपे उस भावलोक को पढ़ रहा है जिसे सामान्य दृष्टि शायद पहचान ही नहीं सकती।
इस अर्थ में यह गीत प्रेम के बाहरी प्रदर्शन से ज्यादा प्रेम की आंतरिक पहचान का गीत है। प्रेम यहाँ हाथ पकड़ने, वादा करने, संबंध घोषित करने या सामाजिक परिचय देने से पहले की अवस्था में मौजूद है। वह उस क्षण में है जब दो लोग शायद अभी यह तय भी नहीं कर पाए हैं कि उनके बीच जो कुछ है, उसे क्या कहा जाए।
“प्यार को प्यार ही रहने दे”: नाम देने से अनुभव छोटा क्यों पड़ सकता है?
गीत का दूसरा महत्वपूर्ण विचार है—प्रेम को किसी नाम में बाँधने से बचना। यहाँ प्रश्न केवल प्रेम को नाम देने या न देने का नहीं है। असल प्रश्न यह है कि क्या हर अनुभूति को सामाजिक या भाषाई पहचान देना जरूरी है?
मनुष्य की आदत है कि वह हर चीज को नाम देना चाहता है। संबंध है तो उसका नाम चाहिए। भावना है तो उसकी परिभाषा चाहिए। रिश्ता है तो उसकी सामाजिक पहचान चाहिए। आधुनिक जीवन में तो यह आवश्यकता और बढ़ गई है। लोग पूछते हैं—“हमारे बीच क्या है?” “तुम मुझे क्या समझते हो?” “यह रिश्ता आखिर है क्या?” सोशल मीडिया के दौर में रिश्तों के लिए स्टेटस, टैग और सार्वजनिक घोषणाएँ भी लगभग अनिवार्य हो गई हैं।
लेकिन गुलज़ार का यह गीत उस बेचैनी के विपरीत एक दूसरी दुनिया की कल्पना करता है। वहाँ प्रेम को अपने अस्तित्व के लिए किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं। वह इसलिए प्रेम है क्योंकि वह महसूस किया जा रहा है। उसे किसी रिश्ते के खाने में डालकर प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं।
यह विचार भारतीय काव्य और दर्शन की एक पुरानी परंपरा से भी जुड़ता है, जहाँ कुछ अनुभव शब्दों की सीमा से बाहर माने गए हैं। जैसे रस का अनुभव केवल उसकी परिभाषा पढ़कर नहीं होता, वैसे ही प्रेम भी केवल उसकी संज्ञा से नहीं समझा जा सकता। उसे जीना पड़ता है।
भारतीय संस्कृति में अनाम प्रेम की लंबी परंपरा
भारतीय साहित्य में प्रेम हमेशा सामाजिक घोषणा के रूप में उपस्थित नहीं रहा। संस्कृत काव्य से लेकर भक्तिकाल और लोकगीतों तक प्रेम के ऐसे अनेक रूप मिलते हैं, जिनकी शक्ति उनके अनकहेपन में है। राधा और कृष्ण का संबंध भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में प्रेम के सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक है। वहाँ प्रेम केवल सामाजिक संबंध का मामला नहीं रह जाता; वह विरह, प्रतीक्षा, मिलन, समर्पण और आत्मिक आकांक्षा का रूप ले लेता है।
भक्तिकालीन कवियों ने तो लौकिक प्रेम की भाषा में अलौकिक प्रेम को व्यक्त करने की अद्भुत परंपरा विकसित की। मीरा की भक्ति हो, सूरदास की राधा-कृष्ण लीला हो या विद्यापति की प्रेमाभिव्यक्ति—हर जगह प्रेम को केवल सामाजिक अनुबंध के रूप में नहीं देखा गया। उसके भीतर एक ऐसा भावलोक है जहाँ शब्द सीमित पड़ जाते हैं।
लोकगीतों में भी प्रेम अक्सर सीधे नहीं कहा जाता। वहाँ संकेत हैं, प्रतीक हैं, ऋतु हैं, नदी है, चाँद है, पायल है, चुनरी है, आँखें हैं और प्रतीक्षा है। भारतीय स्त्री की पारंपरिक अभिव्यक्ति में तो कई बार आँखों और मौन की भूमिका शब्दों से भी बड़ी रही है। इसलिए “आँखों में खुशबू” जैसी कल्पना भारतीय सांस्कृतिक संवेदना के लिए बिल्कुल अजनबी नहीं लगती।
गुलज़ार की खासियत: शब्दों के बीच की जगह में कविता
गुलज़ार की कविता का आकर्षण केवल सुंदर शब्दों में नहीं है। उनकी असली ताकत उन शब्दों के बीच बनाई गई खाली जगहों में है। वे पाठक या श्रोता को सब कुछ बताकर समाप्त नहीं कर देते। वे कुछ संकेत देते हैं और बाकी अनुभव करने के लिए छोड़ देते हैं।
यही कारण है कि उनकी पंक्तियाँ कई बार पहली सुनवाई में सरल लगती हैं, लेकिन वर्षों बाद अचानक उनका अर्थ बदलता हुआ महसूस होता है। किशोरावस्था में वही गीत प्रेम की मासूम कहानी लगता है। युवावस्था में उसमें रिश्ते की बेचैनी दिखाई देती है। उम्र बढ़ने पर वही शब्द प्रेम की स्वतंत्रता और उसकी नाजुकता के बारे में बात करते प्रतीत होते हैं।
यह साहित्य की सफलता है कि वह एक ही पाठक को अलग-अलग उम्र में अलग अर्थ दे सके। अच्छे गीत की पहचान भी यही है कि वह समय के साथ पुराना नहीं होता; बल्कि श्रोता के बदलने के साथ उसका अर्थ बदलता रहता है।
आँखें: भारतीय प्रेम-काव्य की सबसे पुरानी भाषा
यदि भारतीय प्रेम-साहित्य का इतिहास देखा जाए तो आँखें लगातार प्रेम की भाषा रही हैं। आँखों से प्रेम कहना, आँखों से शिकायत करना, आँखों से विरह व्यक्त करना और आँखों से स्वीकृति देना—यह सब हमारी काव्य परंपरा में बार-बार आया है।
आँखें इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे अक्सर उस समय बोलती हैं जब होंठ चुप होते हैं। प्रेम में यह चुप्पी बहुत अर्थवान होती है। किसी व्यक्ति का अपने प्रिय को देखना और तुरंत नजरें झुका लेना, बिना कुछ कहे देर तक देखना, भीड़ में एक-दूसरे को पहचान लेना—ये सारे दृश्य शब्दों के बिना भी कथा कह देते हैं।
गुलज़ार इस सांस्कृतिक स्मृति को आधुनिक फिल्मी गीत में लेकर आते हैं, लेकिन उसे बिल्कुल नए बिंब से जोड़ देते हैं। आँखों में सिर्फ नमी या चमक नहीं, बल्कि खुशबू दिखाई देने लगती है। इस एक संयोजन से प्रेम की अनुभूति दृश्य से आगे बढ़कर लगभग स्पर्श और गंध की दुनिया में चली जाती है।
खुशबू का अर्थ केवल सुगंध नहीं है
भारतीय साहित्य और संस्कृति में खुशबू का संबंध स्मृति से भी गहरा है। किसी फूल की सुगंध अचानक किसी पुराने व्यक्ति की याद दिला सकती है। किसी कमरे की गंध बचपन के घर तक ले जा सकती है। मिट्टी की खुशबू बारिश को आने से पहले ही महसूस करा सकती है।
प्रेम भी कुछ ऐसा ही करता है। प्रिय व्यक्ति मौजूद न हो, फिर भी उसकी स्मृति आसपास बनी रह सकती है। उसकी आवाज याद आती है, उसकी चाल याद आती है, उसके साथ बिताया कोई छोटा-सा क्षण याद आता है। यानी व्यक्ति चला गया, लेकिन उसकी “खुशबू” रह गई।
इसलिए आँखों में खुशबू देखना केवल एक काव्यात्मक कल्पना नहीं है। यह उस मनोवैज्ञानिक अनुभव का भी रूपक है जिसमें हम किसी व्यक्ति की आँखों में उसकी पूरी उपस्थिति महसूस कर लेते हैं। आँखें सामने हैं, लेकिन उनमें चेहरा ही नहीं, स्मृतियाँ भी दिखाई दे रही हैं।
आज के डिजिटल प्रेम के दौर में यह गीत और भी महत्वपूर्ण क्यों हो गया है?
आज प्रेम का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों से व्यक्त होता है। संदेश, इमोजी, वीडियो कॉल, स्टोरी, स्टेटस और ऑनलाइन उपस्थिति ने प्रेम की अभिव्यक्ति को पहले की तुलना में बहुत अधिक सार्वजनिक बना दिया है। अब प्रेम के संकेत केवल आँखों में नहीं रहते; वे स्क्रीन पर भी दिखाई देते हैं।
लेकिन इसके साथ एक नई समस्या भी पैदा हुई है—हर भावना को तुरंत परिभाषित करने की बेचैनी। संबंध को जल्दी नाम देना, उसे सार्वजनिक करना, उसकी तस्वीर साझा करना और दूसरों की स्वीकृति प्राप्त करना आधुनिक रिश्तों की सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है।
ऐसे समय में यह गीत एक शांत प्रतिपक्ष की तरह खड़ा दिखाई देता है। वह कहता है कि प्रेम का मूल्य उसके नाम में नहीं, उसके अनुभव में है। हर खूबसूरत संबंध को तुरंत किसी श्रेणी में रखना आवश्यक नहीं। कभी-कभी दो लोगों के बीच का विश्वास, अपनापन और भावनात्मक निकटता अपने आप में पर्याप्त होता है।
क्या प्रेम को नाम न देना हमेशा सही है?
यहाँ गीत की सुंदरता के साथ एक आधुनिक प्रश्न भी जुड़ता है। आज के संदर्भ में प्रेम को नाम न देना हमेशा रोमांटिक या आदर्श स्थिति नहीं मानी जा सकती। कई बार स्पष्टता आवश्यक होती है। विशेषकर तब, जब किसी संबंध में अपेक्षाएँ, जिम्मेदारियाँ और भविष्य के निर्णय जुड़े हों।
इसलिए गीत को शाब्दिक सामाजिक नियम की तरह पढ़ना उचित नहीं होगा। इसका सौंदर्य इस बात में है कि यह हमें भावना और परिभाषा के बीच अंतर समझाता है। भावना को जन्म लेने के लिए नाम की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन जीवन के किसी चरण में संबंधों को स्पष्टता की आवश्यकता हो सकती है।
यानी गीत यह नहीं कहता कि हर रिश्ते को हमेशा अनाम ही रहना चाहिए। वह केवल उस क्षण की सुंदरता को बचाता है जब प्रेम अभी अपनी पहली, सबसे निर्मल अवस्था में है—जब वह दावा नहीं है, अधिकार नहीं है और सामाजिक घोषणा नहीं है; वह केवल अनुभूति है।
प्रेम बनाम अधिकार: आज के समय की एक बड़ी सीख
समकालीन रिश्तों की एक बड़ी समस्या यह है कि प्रेम कई बार अधिकार में बदल जाता है। “मैं तुम्हें चाहता हूँ” धीरे-धीरे “तुम मेरे हो” में बदल जाता है। प्रेम की जगह नियंत्रण लेने लगता है। सामने वाले की स्वतंत्रता पर सवाल उठने लगते हैं।
इसके विपरीत यह गीत प्रेम को अधिकार की भाषा से बचाता है। यहाँ प्रिय को हासिल करने की उतावली नहीं है। उसे किसी नाम से पकड़ने की कोशिश नहीं है। वह जो है, उसे उसी रूप में स्वीकार करने की इच्छा है।
यही विचार आज के समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। प्रेम यदि सचमुच प्रेम है तो उसमें दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए भी जगह होनी चाहिए। प्रेम का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि दूसरे के अस्तित्व का सम्मान करना भी है।
फिल्मी गीत और साहित्य के बीच की दूरी को मिटाता हुआ गीत
हिंदी सिनेमा के गीतों को लंबे समय तक मनोरंजन की वस्तु मानकर साहित्य से अलग रखा जाता रहा। लेकिन ऐसे गीत इस विभाजन को अस्वीकार करते हैं। एक अच्छा फिल्मी गीत कविता की तरह काम कर सकता है, क्योंकि उसमें बिंब, प्रतीक, ध्वनि, लय, अर्थ और भाव—सभी मौजूद होते हैं।
“आँखों” और “खुशबू” का संयोजन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। एक शब्द दृश्य संसार से आता है और दूसरा गंध के संसार से। दोनों को जोड़कर कवि प्रेम की तीसरी दुनिया बना देता है। यह तीसरी दुनिया वही है जहाँ प्रेम को देखा भी जा सकता है और महसूस भी किया जा सकता है।
सिनेमा इस कविता को दृश्य देता है, संगीत उसे भाव देता है और आवाज उसे आत्मा देती है। इस तरह गीत केवल सुना नहीं जाता, बल्कि कई इंद्रियों के माध्यम से अनुभव किया जाता है।
प्रेम की सबसे खूबसूरत अवस्था शायद वह है, जब उसे समझाना न पड़े
मनुष्य अपने जीवन में कई रिश्ते बनाता है और अधिकांश रिश्तों को नाम देता है। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, पति-पत्नी, साथी—नाम हमें संबंधों की सामाजिक संरचना समझने में मदद करते हैं। लेकिन प्रेम का एक ऐसा क्षेत्र भी है जहाँ नाम से अधिक महत्वपूर्ण वह अनुभव होता है जो दो मनुष्यों के बीच घट रहा होता है।
कभी किसी से बात किए बिना भी उसके पास बैठना अच्छा लगता है। कभी किसी की उपस्थिति ही मन को शांत कर देती है। कभी किसी की आँखों में देखकर लगता है कि बहुत कुछ कह दिया गया है। वहाँ शब्दों की जरूरत कम हो जाती है।
यही वह बिंदु है जहाँ यह गीत अपने सबसे सुंदर अर्थ तक पहुँचता है। प्रेम को यदि केवल “रिश्ता” मान लिया जाए तो उसकी अनुभूति सीमित हो सकती है। लेकिन यदि उसे एक मानवीय संवेदना की तरह देखा जाए तो उसका संसार बहुत बड़ा हो जाता है।
आज भी यह गीत क्यों जीवित है?
समय बदल गया है। प्रेम की भाषा बदल गई है। संचार के साधन बदल गए हैं। रिश्तों की सामाजिक संरचना बदली है। लेकिन मनुष्य की मूल भावनाएँ नहीं बदलीं। आज भी किसी की आँखों में अपने लिए अपनापन खोजा जाता है। आज भी कोई व्यक्ति किसी की आवाज सुनकर मुस्करा देता है। आज भी कोई खुशबू किसी पुराने प्रेम की स्मृति बन जाती है।
यही कारण है कि पुराने फिल्मी गीत केवल पुराने गीत नहीं होते। वे हमारे भावनात्मक इतिहास के दस्तावेज भी होते हैं। उनमें उस समय की भाषा, सामाजिक दृष्टि और प्रेम की कल्पना दर्ज होती है। लेकिन जब कोई गीत सार्वकालिक मानवीय अनुभूति को छू लेता है, तो वह अपने समय की सीमा पार कर जाता है।
गुलज़ार का यह गीत इसी श्रेणी में आता है। इसकी खूबसूरती इस बात में नहीं कि उसने प्रेम को बहुत विस्तार से समझाया, बल्कि इस बात में है कि उसने प्रेम को समझाने से इनकार किया।
प्रेम की खुशबू को बोतल में बंद नहीं किया जा सकता
प्रेम शायद दुनिया की उन अनुभूतियों में से है जिन्हें जितना परिभाषित करने की कोशिश की जाती है, वे उतनी ही रहस्यमय होती जाती हैं। प्रेम को शब्द चाहिए, लेकिन वह शब्दों से बड़ा है। उसे स्पर्श चाहिए, लेकिन वह स्पर्श से आगे है। उसे आँखें चाहिए, लेकिन वह आँखों में दिखाई देने वाली चीज से भी अधिक है।
यही वजह है कि “आँखों में महकती खुशबू” जैसा बिंब असंभव होकर भी इतना सच्चा लगता है। खुशबू दिखाई नहीं देती, लेकिन उसकी मौजूदगी महसूस होती है। प्रेम भी दिखाई नहीं देता, लेकिन उसकी मौजूदगी मनुष्य के व्यवहार, प्रतीक्षा, मौन, मुस्कान और आँखों में पढ़ी जा सकती है।
और शायद यही उस गीत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संदेश है—हर प्रेम को नाम देना जरूरी नहीं, क्योंकि कुछ प्रेम नाम से पहले जन्म लेते हैं और नाम के बाद भी अपनी पूरी गहराई नहीं खोते।
आज जब रिश्तों को परिभाषित करने, सार्वजनिक करने और प्रमाणित करने का दबाव पहले से कहीं अधिक है, तब यह गीत हमें थोड़ी देर ठहरकर यह सोचने का अवसर देता है कि क्या प्रेम की असली खूबसूरती उसके घोषित होने में है या उसके महसूस होने में।
शायद प्रेम की सबसे सुंदर अवस्था वही है जहाँ कोई व्यक्ति सामने बैठा हो, आँखें उससे मिली हों और शब्द अचानक कम पड़ जाएँ। वहाँ न कोई घोषणा आवश्यक हो, न कोई प्रमाण। केवल एक अनुभूति हो—इतनी सूक्ष्म कि उसे छुआ नहीं जा सकता, इतनी गहरी कि उसे भुलाया नहीं जा सकता और इतनी सुगंधित कि वह आँखों में भी दिखाई देने लगे।
यही गुलज़ार की कविता का जादू है—वे प्रेम को बताते नहीं, उसे महसूस करा देते हैं। और जब प्रेम महसूस होने लगे, तब उसे नाम देने की जरूरत सचमुच बहुत छोटी बात लगने लगती है।













