पांच साल बाद भी पत्रकार हादसे की गुत्थी अनसुलझी, जांच पर उठ रहे गंभीर सवाल

जनगणदूत रिपोर्टर सूरज सिंह राणा माइक के साथ जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हुए

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रिपोर्ट : सूरज सिंह राणा

14 अगस्त 2021 की घटना आज भी मांग रही जवाब

CHITRAKOOT 14 अगस्त 2021 को हुई एक गंभीर सड़क दुर्घटना को पांच वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन घटना की परिस्थितियों और उसके बाद हुई जांच को लेकर उठे सवाल अब तक पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं। हादसे में पत्रकार संजय सिंह राणा गंभीर रूप से घायल हुए थे। उपचार का लंबा दौर चला और उनके अनुसार दुर्घटना के प्रभाव से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां आज भी बनी हुई हैं।

लेकिन पांच वर्ष बाद इस मामले का सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि दुर्घटना में क्या हुआ था। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि घटना के बाद सरकारी तंत्र ने क्या किया, शिकायतों पर कितनी कार्रवाई हुई, जांच किस दिशा में आगे बढ़ी और अब तक उसका निर्णायक निष्कर्ष सामने क्यों नहीं आया?

संजय सिंह राणा के अनुसार उन्होंने घटना के बाद स्थानीय पुलिस से लेकर जिला प्रशासन और शासन स्तर तक लगातार शिकायतें कीं। उनका दावा है कि मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक, आईजी जोन, डीआईजी, प्रमुख सचिव, मंडलायुक्त और जिलाधिकारी स्तर तक शिकायतें भेजी गईं। यदि इन शिकायतों और उनके निस्तारण का रिकॉर्ड उपलब्ध है तो उसे सामने लाकर पूरे प्रकरण की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।

यहीं से यह मामला एक व्यक्ति की शिकायत से आगे बढ़कर पुलिस जांच, प्रशासनिक जवाबदेही, सरकारी रिकॉर्ड की पारदर्शिता और नागरिकों की शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण की परीक्षा बन जाता है।

सवाल सिर्फ हादसे का नहीं, उसके बाद हुई कार्रवाई का भी है

किसी सड़क दुर्घटना की जांच का सामान्य उद्देश्य घटना की परिस्थितियों और कारणों को प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट करना होता है। इसके लिए घटनास्थल का निरीक्षण, दुर्घटनाग्रस्त वाहन की स्थिति, वाहन और चालक से संबंधित अभिलेख, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, उपलब्ध तकनीकी साक्ष्य तथा चिकित्सकीय दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

यदि किसी पीड़ित की ओर से घटना की परिस्थितियों पर सवाल उठाए जाते हैं या किसी आपराधिक पहलू की आशंका जताई जाती है तो जांच एजेंसी की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में न तो किसी आरोप को बिना प्रमाण सही माना जा सकता है और न ही उसे बिना जांच के खारिज किया जाना उचित होगा।

संजय सिंह राणा की ओर से लगातार उठाया जा रहा मूल प्रश्न भी यही है कि यदि 14 अगस्त 2021 की घटना सामान्य सड़क दुर्घटना थी तो उसकी परिस्थितियों को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट क्यों नहीं किया गया? और यदि घटना में किसी आपराधिक पहलू की आशंका थी तो जांच उस दिशा में किसी निर्णायक निष्कर्ष तक क्यों नहीं पहुंची?

इन दोनों संभावनाओं के बीच पांच वर्ष तक मामला अनिश्चित बना रहना अपने आप में प्रशासनिक समीक्षा का विषय है।

पांच साल की जांच का निष्कर्ष आखिर क्या है?

इस पूरे प्रकरण में जिला पुलिस और प्रशासन से कुछ सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए।

14 अगस्त 2021 की घटना की मूल जांच किस अधिकारी ने की? घटनास्थल का निरीक्षण कब किया गया? दुर्घटना में शामिल वाहन और चालक से संबंधित किन अभिलेखों की जांच की गई? क्या प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए गए? क्या उपलब्ध तकनीकी या भौतिक साक्ष्यों की जांच की गई? क्या चिकित्सकीय दस्तावेजों को जांच का हिस्सा बनाया गया?

इसके अलावा यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इस प्रकरण में कितनी बार जांच हुई, क्या जांच अधिकारी बदले गए, कितने बयान दर्ज हुए और क्या किसी स्तर पर जांच की दिशा में परिवर्तन किया गया।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इस मामले में अंतिम जांच रिपोर्ट तैयार हुई है? यदि जांच पूरी हो चुकी है तो उसका निष्कर्ष क्या है? क्या पुलिस ने इसे सामान्य दुर्घटना माना है? यदि हां, तो उस निष्कर्ष के समर्थन में कौन-कौन से साक्ष्य हैं? और यदि जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है तो पांच वर्ष की देरी का कारण क्या है? इन सवालों के जवाब के बिना केवल यह कहना कि मामला जांच के स्तर पर है, नागरिक की जिज्ञासा को समाप्त नहीं करता।

शिकायतों की प्रशासनिक यात्रा भी जांच का विषय बने

संजय सिंह राणा के अनुसार उन्होंने घटना के बाद अलग-अलग स्तरों पर शिकायतें भेजीं। ऐसे में अब यह जानना जरूरी है कि उन शिकायतों की प्रशासनिक यात्रा क्या रही।

किस कार्यालय ने शिकायत प्राप्त की? उसकी डायरी या प्राप्ति संख्या क्या थी? उसे किस अधिकारी को भेजा गया? संबंधित अधिकारी ने कब कार्रवाई शुरू की? शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया गया या नहीं? क्या दूसरे पक्ष से पूछताछ हुई? क्या घटनास्थल या पुराने साक्ष्यों की समीक्षा की गई? जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट किस अधिकारी को सौंपी? उस रिपोर्ट पर क्या निर्णय हुआ?

ये सवाल केवल शिकायतकर्ता के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। सरकारी शिकायत व्यवस्था जनता के धन और सार्वजनिक संस्थाओं से संचालित होती है। इसलिए किसी शिकायत के प्राप्त होने से लेकर उसके निस्तारण तक की रिकॉर्ड-ट्रेल प्रशासनिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

राजापुर क्षेत्राधिकारी कार्यालय से जुड़े रिकॉर्ड पर भी सवाल

इस प्रकरण में राजापुर क्षेत्राधिकारी कार्यालय में दिए गए कथित लिखित बयान और शिकायतों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। संजय सिंह राणा का कहना है कि उन्होंने वहां लिखित बयान दिए थे।

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यदि ऐसा हुआ था तो उन बयानों की प्राप्ति कहां दर्ज है? क्या कोई डायरी संख्या जारी हुई थी? बयान किस अधिकारी ने लिया? वह रिकॉर्ड किस पत्रावली का हिस्सा बना? उसके आधार पर क्या कार्रवाई की गई?

यदि रिकॉर्ड उपलब्ध है तो उसे जांच के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है तो यह अलग प्रशासनिक प्रश्न पैदा करता है कि सरकारी कार्यालय में जमा दस्तावेजों के संरक्षण और रिकॉर्ड प्रबंधन की व्यवस्था क्या थी।

किसी शिकायत पर कार्रवाई न होना गंभीर प्रशासनिक समस्या हो सकती है, लेकिन शिकायत प्राप्त होने के बाद उसके रिकॉर्ड का उपलब्ध न होना उससे भी गंभीर पारदर्शिता संबंधी सवाल खड़े कर सकता है।

इसलिए इस मामले की समीक्षा केवल दुर्घटना की जांच तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शिकायतों और बयानों की रिकॉर्ड-ट्रेल की भी समीक्षा आवश्यक है।

‘जांच के नाम पर जांच’ नहीं, परिणाम चाहिए

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जांच का उद्देश्य किसी फाइल को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक भेजना नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचना है।

यदि पांच वर्ष बाद भी मूल घटना को लेकर सवाल मौजूद हैं तो प्रशासन को यह बताना होगा कि जांच के दौरान कौन-कौन से साक्ष्य जुटाए गए और उनका क्या निष्कर्ष निकला।

क्या गवाहों के बयान समय पर दर्ज किए गए? क्या घटनास्थल से संबंधित उपलब्ध सामग्री का परीक्षण हुआ? क्या वाहन संबंधी अभिलेखों की जांच की गई? क्या चिकित्सा दस्तावेजों को जांच की कड़ी में शामिल किया गया? क्या शिकायतकर्ता की ओर से बार-बार उठाए गए सवालों का लिखित जवाब दिया गया?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर हां है तो प्रशासन के पास उसका रिकॉर्ड होना चाहिए। यदि किसी स्तर पर ऐसा नहीं हुआ तो यह स्पष्ट करना जरूरी है कि चूक कहां और क्यों हुई।

प्रभावशाली लोगों के दबाव का आरोप, जवाब भी रिकॉर्ड से हो

संजय सिंह राणा ने अपने आरोपों में प्रभावशाली लोगों के दबाव और मामले में कथित लीपापोती की आशंका भी जताई है। यह गंभीर आरोप है, लेकिन पत्रकारिता की संतुलित कसौटी यही कहती है कि जब तक किसी सक्षम जांच या न्यायिक प्रक्रिया से इसकी पुष्टि न हो, इसे शिकायतकर्ता का आरोप और आशंका ही माना जाए।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। यदि प्रशासन का कहना है कि किसी प्रकार का दबाव नहीं था और जांच पूरी तरह निष्पक्ष रही, तो केवल खंडन पर्याप्त नहीं होगा। जांच की प्रक्रिया और उपलब्ध रिकॉर्ड से उस निष्पक्षता को स्पष्ट किया जा सकता है।

किस अधिकारी ने जांच की? उसे किस स्तर से जिम्मेदारी दी गई? क्या उसने स्वतंत्र रूप से बयान दर्ज किए? क्या उसके निष्कर्ष पर किसी वरिष्ठ अधिकारी ने आपत्ति की? क्या किसी स्तर पर जांच बदली, स्थानांतरित या पुनः शुरू हुई? इन सवालों का दस्तावेजी जवाब ही संदेह की स्थिति को समाप्त कर सकता है।

आरटीआई से खुल सकती है पांच साल पुरानी फाइल

सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से इस प्रकरण से संबंधित रिकॉर्ड हासिल करने का प्रयास अब महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। आरटीआई के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि शिकायत कब प्राप्त हुई, किस कार्यालय में दर्ज हुई, किस अधिकारी को भेजी गई, क्या कार्रवाई हुई, जांच किसके द्वारा की गई और उपलब्ध रिकॉर्ड में उसका निष्कर्ष क्या दर्ज है।

यदि किसी शिकायत पर कार्रवाई हुई है तो उसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। यदि कार्रवाई नहीं हुई तो उसके कारण का पता भी रिकॉर्ड से लगाया जा सकता है। यदि कोई पत्रावली उपलब्ध नहीं है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह कहां गई। इसलिए इस पूरे प्रकरण में अब सबसे महत्वपूर्ण आधार आरोप नहीं, बल्कि दस्तावेज हो सकते हैं।

शिकायत की प्रति, प्राप्ति रसीद, डाक रिकॉर्ड, डायरी संख्या, जांच आदेश, बयान, मेडिकल दस्तावेज, वाहन संबंधी रिकॉर्ड और पुलिस रिपोर्ट—इनमें से प्रत्येक दस्तावेज घटना के बाद की प्रशासनिक प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है।

पत्रकार की सुरक्षा का सवाल भी जुड़ा है

पत्रकार लोकतंत्र में सत्ता, प्रशासन और समाज से सवाल पूछने का काम करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पत्रकार कानून से ऊपर है। लेकिन इसका अर्थ यह जरूर है कि किसी पत्रकार के साथ हुई गंभीर और संदिग्ध घटना की जांच में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

यदि संजय सिंह राणा की आशंका गलत है तो निष्पक्ष जांच उन्हें यह स्वीकार करने का आधार देगी कि घटना वास्तव में दुर्घटना थी। यदि उनकी आशंका में कोई तथ्य है तो वही निष्पक्ष जांच जिम्मेदार लोगों तक पहुंचने का रास्ता खोल सकती है।

दोनों ही परिस्थितियों में अंतिम लाभ सत्य का होगा। इसलिए इस मामले को किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष के विवाद के रूप में देखने के बजाय संस्थागत जवाबदेही के प्रश्न के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

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अब सवाल उत्तर प्रदेश के सुशासन से

उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था, पारदर्शिता और सुशासन को लेकर लगातार बड़े दावे किए जाते हैं। नागरिकों को यह भरोसा दिया जाता है कि शिकायतों का निस्तारण होगा, कानून के अनुसार कार्रवाई होगी और पीड़ित को न्याय मिलेगा।

ऐसे में पांच वर्ष पुराने एक मामले में यदि शिकायतकर्ता अभी भी अपनी शिकायतों और जांच की स्थिति को लेकर सवाल उठा रहा है तो यह स्वाभाविक रूप से शासन-व्यवस्था के सामने भी प्रश्न खड़ा करता है।

यह सवाल केवल स्थानीय पुलिस से नहीं, बल्कि वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से भी पूछा जाना चाहिए कि पांच वर्ष के दौरान इस मामले की निगरानी किस स्तर पर हुई।

क्या शिकायतों की समीक्षा वरिष्ठ अधिकारियों ने की? क्या किसी स्तर पर जांच की प्रगति रिपोर्ट मांगी गई? क्या शिकायतकर्ता को अंतिम रूप से बताया गया कि उसके मामले में क्या निष्कर्ष निकला? यदि नहीं, तो ऐसी स्थिति को सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है?

केंद्र के सुशासन विमर्श से भी जुड़ता है व्यापक सवाल

इस मामले की प्रत्यक्ष जांच और कार्रवाई का दायित्व उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासनिक संस्थाओं का है। फिर भी पारदर्शिता, जवाबदेही, नागरिक अधिकार, डिजिटल रिकॉर्ड और समयबद्ध शिकायत निस्तारण जैसे विषय व्यापक सुशासन व्यवस्था का हिस्सा हैं।

एक नागरिक को अपनी शिकायत की स्थिति जानने के लिए वर्षों तक अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर क्यों लगाने पड़ें? सरकारी कार्यालय में दिए गए बयान की रिकॉर्ड-ट्रेल को लेकर सवाल क्यों उठें? शिकायतकर्ता को बार-बार अपनी बात दोहराने की आवश्यकता क्यों महसूस हो? ये सवाल किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं हैं। ये सवाल शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़े हैं।

सुशासन का वास्तविक अर्थ यही है कि नागरिक को केवल शिकायत दर्ज कराने का अधिकार न मिले, बल्कि उसे यह जानने का भी अधिकार हो कि उसकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई।

क्या स्वतंत्र समीक्षा बेहतर रास्ता हो सकती है?

जब कोई शिकायतकर्ता लंबे समय तक स्थानीय जांच पर सवाल उठाता रहे और पांच वर्ष बाद भी उसकी शंकाएं समाप्त न हुई हों तो उच्च स्तर पर स्वतंत्र समीक्षा की मांग पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि स्थानीय पुलिस को दोषी मान लिया जाए। इसका अर्थ केवल इतना है कि जिस जांच की निष्पक्षता पर शिकायतकर्ता सवाल उठा रहा है, उसे किसी वरिष्ठ और स्वतंत्र अधिकारी से रिकॉर्ड के आधार पर पुनः परखा जा सकता है।

ऐसी समीक्षा में उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड, शिकायतों की पूरी श्रृंखला, मेडिकल दस्तावेज, वाहन संबंधी अभिलेख, घटनास्थल से जुड़ी उपलब्ध सामग्री और पूर्व जांच निष्कर्षों को एक साथ देखा जा सकता है।

यदि समीक्षा में यह सामने आता है कि दुर्घटना सामान्य थी और किसी आपराधिक साजिश का प्रमाण नहीं मिला, तो यह स्थिति भी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए। और यदि किसी आपराधिक पहलू के प्रमाण मिलते हैं तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई होनी चाहिए।

जिला प्रशासन के सामने अब क्या होना चाहिए?

जिला प्रशासन के सामने पहला कदम इस पूरे प्रकरण से संबंधित शिकायतों और पत्रावलियों की समेकित सूची तैयार करना हो सकता है। दूसरा, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कौन-सी शिकायत कब प्राप्त हुई और उस पर क्या कार्रवाई हुई। तीसरा, संबंधित पुलिस अधिकारियों से जांच की वर्तमान स्थिति की लिखित रिपोर्ट ली जानी चाहिए। चौथा, राजापुर क्षेत्राधिकारी कार्यालय में कथित रूप से दिए गए बयानों और अन्य दस्तावेजों की रिकॉर्ड स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। पांचवां, यदि किसी रिकॉर्ड के उपलब्ध न होने की बात सामने आती है तो रिकॉर्ड प्रबंधन की जिम्मेदारी और प्रक्रिया की भी समीक्षा होनी चाहिए। प्रशासन के लिए यह अवसर है कि वह शिकायतों को केवल शिकायतकर्ता की नाराजगी मानकर किनारे न करे, बल्कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर प्रत्येक प्रश्न का जवाब दे।

पुलिस प्रशासन से पूछे जाने वाले दस सीधे सवाल

इस पूरे प्रकरण में पुलिस प्रशासन से कम से कम दस सवालों का जवाब अपेक्षित है—

  1. 14 अगस्त 2021 की दुर्घटना की मूल जांच किस अधिकारी ने की?
  2. क्या घटनास्थल का निरीक्षण और उपलब्ध साक्ष्यों का वैज्ञानिक परीक्षण हुआ?
  3. दुर्घटना में शामिल वाहन और चालक से संबंधित किन अभिलेखों की जांच की गई?
  4. क्या प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए गए?
  5. क्या शिकायतकर्ता के सभी लिखित बयानों को जांच रिकॉर्ड में शामिल किया गया?
  6. राजापुर क्षेत्राधिकारी कार्यालय में दिए गए कथित बयान का रिकॉर्ड कहां है?
  7. वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी गई शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई?
  8. क्या इस प्रकरण की अंतिम जांच रिपोर्ट तैयार हुई है?
  9. यदि रिपोर्ट नहीं बनी है तो पांच वर्ष की देरी का कारण क्या है?
  10. क्या अब इस मामले की वरिष्ठ स्तर पर स्वतंत्र समीक्षा की आवश्यकता है?

इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पांच वर्ष का अंतराल जांच की स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम था या प्रशासनिक कमजोरी का।

पांच साल बाद भी जवाब का इंतजार क्यों?

किसी दुर्घटना के बाद इलाज का दर्द समय के साथ कम हो सकता है, लेकिन अनुत्तरित सवालों का दर्द कई बार और गहरा होता जाता है।

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संजय सिंह राणा के अनुसार घटना के बाद उन्होंने अलग-अलग स्तर पर अपनी बात रखी और जांच की मांग की। यदि पांच वर्ष बाद भी उन्हें अपने पुराने दस्तावेजों और शिकायतों के रिकॉर्ड की तलाश करनी पड़ रही है तो यह केवल उनकी व्यक्तिगत बेचैनी का विषय नहीं रह जाता। यह उस व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है जिसे नागरिकों की शिकायतों का समाधान करना है।

न्याय केवल अदालत के किसी अंतिम निर्णय का नाम नहीं है। न्याय का पहला चरण यह भी है कि शिकायत सुनी जाए, रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए, जांच निष्पक्ष हो और शिकायतकर्ता को यह पता हो कि उसके मामले में क्या हुआ।

अब चुप्पी नहीं, रिकॉर्ड बोलना चाहिए

14 अगस्त 2021 की घटना को पांच वर्ष बीत चुके हैं। अब इस मामले में नए आरोपों से अधिक जरूरी पुराने रिकॉर्ड को सामने लाना है।

यदि पुलिस ने निष्पक्ष जांच की है तो उसके पास अपने निष्कर्ष के समर्थन में दस्तावेज होने चाहिए। यदि प्रशासन ने शिकायतों पर कार्रवाई की है तो उसका रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। यदि कहीं गलती हुई है तो उसे स्वीकार कर सुधार की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए।

और यदि प्रभावशाली लोगों के दबाव या किसी अन्य कारण से जांच प्रभावित होने की शिकायत में तथ्य मिलते हैं तो जिम्मेदारी तय करना भी शासन की ही जिम्मेदारी होगी।

यही वह बिंदु है जहां यह मामला एक पत्रकार से आगे बढ़कर आम नागरिक के अधिकार का प्रश्न बन जाता है। आज सवाल एक पत्रकार के मामले का है, कल यही सवाल किसी किसान, मजदूर, व्यापारी, छात्र या किसी अन्य नागरिक के सामने भी खड़ा हो सकता है।

सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल

सरकार के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या पांच वर्ष पुरानी इस घटना की स्वतंत्र और रिकॉर्ड आधारित समीक्षा कराई जाएगी?

क्या संजय सिंह राणा की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों का सत्यापन कराया जाएगा? क्या पुलिस और प्रशासन अपनी ओर से उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करेंगे? क्या यह बताया जाएगा कि अब तक किस अधिकारी ने क्या कार्रवाई की? और यदि जांच में कोई कमी पाई जाती है तो क्या उसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी?

ये प्रश्न किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं हैं। ये प्रश्न उस व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए हैं जो नागरिकों को न्याय और सुशासन का भरोसा देती है।

अब फैसला आरोपों से नहीं, रिकॉर्ड से होना चाहिए

14 अगस्त 2021 को सड़क पर वास्तव में क्या हुआ था, इसका अंतिम सत्य जांच और प्रमाण ही तय कर सकते हैं। लेकिन पांच वर्ष बाद भी यदि उस घटना को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं, शिकायतकर्ता लगातार जांच की मांग कर रहा है और सरकारी रिकॉर्ड को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं तो इस मामले को केवल एक पुरानी सड़क दुर्घटना की फाइल मानकर छोड़ देना जवाबदेही की दृष्टि से उचित नहीं होगा।

संजय सिंह राणा की निष्पक्ष जांच की मांग अपने आप में किसी आरोप की पुष्टि नहीं है। उसी तरह उनकी आशंका को बिना जांच के खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा।

सत्य तक पहुंचने का रास्ता स्पष्ट है—रिकॉर्ड सामने आए, शिकायतों की पूरी श्रृंखला की समीक्षा हो, उपलब्ध साक्ष्यों की जांच हो और निष्कर्ष स्पष्ट किया जाए।

जिला प्रशासन को बताना चाहिए कि शिकायतों का क्या हुआ। पुलिस प्रशासन को बताना चाहिए कि जांच कहां तक पहुंची। उत्तर प्रदेश शासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पांच वर्ष की देरी का कारण क्या है। और यदि स्वतंत्र समीक्षा की आवश्यकता है तो उसे कराने में संकोच क्यों होना चाहिए?

क्योंकि सुशासन की असली परीक्षा बड़े भाषणों और घोषणाओं में नहीं होती। उसकी असली परीक्षा उस समय होती है जब कोई नागरिक, पत्रकार या पीड़ित अपने सवाल लेकर सरकारी दरवाजे पर खड़ा होता है।

आज संजय सिंह राणा का सवाल केवल यह नहीं है कि 14 अगस्त 2021 को उनके साथ क्या हुआ था। उससे बड़ा सवाल यह है कि उस घटना के बाद सरकारी तंत्र ने क्या किया?

किसने शिकायत पढ़ी? किसने बयान लिया? किसने जांच की? किसने रिपोर्ट बनाई? किसने फाइल आगे बढ़ाई? यदि कार्रवाई हुई तो उसका रिकॉर्ड कहां है? और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो पांच वर्ष तक क्यों नहीं हुई?

इन सवालों के जवाब मिलना ही इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी जरूरत है।

अब फैसला आरोपों से नहीं, रिकॉर्ड से होना चाहिए। अब आश्वासन नहीं, जांच का निष्कर्ष चाहिए। अब ‘मामला विचाराधीन है’ जैसी औपचारिकता नहीं, जवाबदेही चाहिए।

और यदि शासन वास्तव में पारदर्शिता और सुशासन के अपने दावे पर कायम है तो पांच वर्ष पुराने इस प्रकरण की निष्पक्ष, स्वतंत्र और दस्तावेज-आधारित समीक्षा से बेहतर रास्ता कोई नहीं हो सकता। क्योंकि न्याय में देरी केवल समय की देरी नहीं होती। कई बार वह व्यवस्था पर नागरिक के भरोसे की भी परीक्षा बन जाती है।

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Author: यायावर

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